सुख के आधार
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मनुष्य जैसे विकसित प्राणी के लिए सुख पाने की लालसा स्वाभाविक है। सुख पाने की चेष्टा प्रत्येक प्राणी करता है। यह चेष्टा ही एक ऐसी चाबी है जिससे जीवन रूपी घड़ी निरन्तर क्रियाशील रहती है। घड़ी में चाबी नहीं देने पर वह बन्द हो जाती है उसी प्रकार यदि सुख पाने की चेष्टा समाप्त हो जाय तो वह जीवित रहते हुए भी मर जाता है।
सुख का आधार व्यक्ति की मनोभूमि पर आधारित होता है। इस कारण यह नहीं कहा जा सकता कि अमुक वस्तु के उपभोग में सुख मिलता है। सुअर के लिए गंदगी, कीचड़, दुर्गन्ध सुखदायक है, क्योंकि उसकी मनःस्थिति इसी प्रकार की है किन्तु मनुष्य के लिए वही सब दुःखदायी होती है। यही नहीं भिन्न-भिन्न मनःस्थिति के मनुष्यों में भी सुख की सामग्रियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। शराब पीने वाले व्यक्ति के लिए शराब सुख प्रदान करती है किन्तु जो इस विभीषिका से परिचित है तो इसे छूना भी पाप समझता है।
ईश्वर ने जितनी सुख सुविधाएँ मनुष्य को प्रदान की हैं अन्य किसी जीव को प्रदान नहीं कीं। मनुष्य का अन्तःकरण विवेक से परिपूर्ण है। वह इन क्षमताओं तथा उपलब्धियों का प्रयोग उसकी सृष्टि को सुन्दर सुखी तथा सम्पन्न बनाने में करें इसी हेतु उसे यह सब प्राप्त हुआ है। इसी के आधार पर मनुष्य तथा पशुओं में सीमा रेखा निर्धारित की जानी चाहिए तभी मानव जीवन की उत्कृष्टता तथा सार्थकता सिद्ध हो सकती है।
मानवोचित सुख पशुओं के सुख से कुछ भिन्न अवश्य होना चाहिए। भोग से सुख मिलता है, वह इन्द्रियों को तृप्त करता है। भोग से सुख मिलता है, वह इन्द्रियों को तृप्त करता है। यह तृप्ति क्षणिक होती है। आग में घी डालने की तरह, मरुभूमि में प्यास बुझाने की लालसा से मृगतृष्णा के भुलावे में भटकाने वाली यह इन्द्रियजन्य वासना पाशविक सुख से भी निकृष्ट एक छलावा मात्र है। जो मनुष्य को अपनी गरिमा तथा कर्तव्य से भ्रष्ट करती है। मनुष्य विवेकशील प्राणी है वह अन्तरात्मा की आवाज को सुनता है। उसको सच्चा सुख सेवा साधना में ही मिलता है। इससे बढ़कर कोई ऐसा कर्म नहीं जो मानव को अपनी गरिमा का भान कराता हो।
मेरे पास चार रोटी हैं इनसे मैं अपनी क्षुधा पूर्ति कर लेता हूँ। मेरी इन्द्रियों को क्षणिक सुख मिल जाता है किन्तु इससे मेरी भूख सदा के लिए मिट नहीं जाती। मुझसे भी अधिक भूखा कोई है और उसे उनमें से दो रोटियाँ दे देता हूँ तो मेरी आत्मा में उस भूखे की तृप्ति देखकर जो आनन्द मिलेगा वही सच्चा सुख है।
भगवान ने इसी कारण मनुष्य को सामर्थ्य इतनी अधिक दी है कि वह इतना उपार्जित कर सकता है जिस के दसवें हिस्से में उसकी शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं। शेष जो भाग यदि वह उस समाज के हित में लोक मंगल के लिए प्रयुक्त करे जिसका कि वह चिर ऋणी है तभी वह सुख पा सकता है। समाज का ऋण उतारने का कुछ भी प्रयास करें तो हम सच्चे अर्थों से सुखी हो भी नहीं सकते।
किसी ने ठीक ही कहा कि ईश्वर ने उपार्जन के लिए हाथ दो दिये हैं तथा उदर पोषण के लिए मुँह एक ही दिया है। इसके पीछे जो एक सिद्धाँत छिपा है वह यह है कि हम जो कुछ उपार्जन करें उसका आधा भाग स्वयं के शरीर तथा परिवार के लिए तथा शेष आधा भाग लोक मंगल के लिये प्रयुक्त करें।
त्याग परोपकार-लोक मंगल के लिए अपने स्वार्थों को त्याग कर हम किसी पर अहसान नहीं करते वरन् उस ऋण से उऋण होते हैं जो समाज का हमारे ऊपर चढ़ा हुआ है। हमारे पूर्वजों ने अपनी सेवा साधना द्वारा इस विश्व उपवन को सुसज्जित सुरभित किया है। उसी के परिणामस्वरूप हम सामर्थ्य से अधिक उपार्जन कर पाते हैं। हम इस उपार्जन को अपने आप तथा अपने परिवार तक ही सीमित करें तो न हम स्वयं सुखी हो सकेंगे न दूसरों को सुखी बना सकेंगे तथा कृतघ्नता के दोषी बनेंगे।

