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Magazine - Year 1979 - November 1979

Media: TEXT
Language: HINDI
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रोगों की जड़ शरीर में नहीं मन में

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शरीर और मन का सम्बन्ध शासित और शासक का सा है। शरीर शासित है तो मन शासक। शरीर वही कुछ करता है जिसका निर्देश उसका शासक मन संस्थान देता है। ऐसा कोई शारीरिक क्रियाकलाप नहीं जो मन की इच्छा के विपरीत सम्पन्न होता हो। दीखने में भले ही लगे कि शरीर उस ढंग से स्वस्थ नहीं रह पाता जैसा कि हमारा मन चाहता है। पर मन के जिस भाग से हमारा परिचय होता है वह बुद्धि विचार तक ही सीमित है, जब कि मन का एक छोटा सा विभाग है। संपूर्ण मन संस्थान यदि चाहे तो शरीर को रोगी होने का कोई कारण नहीं है। वैसे मन से कोई नहीं चाहता कि बीमार हुआ जाय, पर उसकी अस्तव्यस्तता, अव्यवस्था और अस्थिरता ऐसे कई कारण उत्पन्न कर देती हैं जिनसे शरीर को रोगाक्रांत होना पड़ता है। ढीली ढाली और लचर शासन व्यवस्था में जिस प्रकार अराजकता अव्यवस्था और अन्यान्य अस्त व्यस्तताएँ उत्पन्न होती हैं उसी प्रकार बिगड़ी हुई मनःस्थिति स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न करती है।

मन का एक भाग जिसे विज्ञान की भाषा में मस्तिष्क भी कहा जाता है शरीर की स्वसंचालित प्रक्रियाओं को सम्पन्न करता है। रक्त संचार; श्वास प्रश्वास, आकुँचन, प्रकुँचन, निद्रा, स्पन्दन, मल विसर्जन आदि क्रियाकलापों पर मन के इसी भाग का नियंत्रण होता है। दूसरे सचेतन भाग द्वारा विभिन्न प्रकार के जीवन व्यवहार सम्पन्न होते हैं और वह दसों इन्द्रियों के अंग प्रत्यंगों के क्रिया व्यापार का नियमन करती है। इस प्रकार मन को शरीर राज्य का अधिपति कहा जा सकता है।

समाज व्यवस्था में उत्पन्न होने वाली गड़बड़ियों को भले ही पूरी तरह शासन सत्ता को उत्तरदायी न ठहराया जा सके। क्योंकि समाज में ऐसे तत्वों का अस्तित्व भी रहता है जो शासन सत्ता को चुनौती देते हैं और उसकी व्यवस्था में रुकावट डालते हैं। पर शरीर के सम्बन्ध में ऐसा कुछ नहीं है। वह निर्विवाद रूप से मन की इच्छा कहना चाहिए यह ऐसा राज्य है जिस पर मन का एकछत्र और निर्द्वन्द्व शासन है। इस तथ्य को जानने के बाद यह मानने से इन्कार करने का कोई कारण नहीं है कि मन को असंतुलित करने का अर्थ न केवल शोक संतापों में डूबना और असंतोष उद्वेग की आग में जलना है वरन् अच्छे भले शरीर को भी रोगी बना डालना है। विज्ञान भी इस निष्कर्ष पर पहुँचता जा रहा है कि रोगों का कारण शरीर में नहीं मन में है। वहीं से सारे रोग जन्म लेते हैं और शरीर को विभिन्न रूपों में खोखला बनाते हैं।

अमेरिका के मानसिक रोग विज्ञानी राबर्ट डी राय ने व्यापक सर्वेक्षण के बाद यह प्रतिपादन किया कि असाध्य समझे जाने वाले अधिकाँश रोगों का कारण मनुष्य मन में विद्यमान रहने वाली दुश्चिंताएँ, कुँठाएँ, उलझनें, ग्रंथियाँ और चिंतन की विकृतियाँ हैं। अरब देश में कुछ शताब्दियों पूर्व एक विख्यात चिकित्सक हुआ है हकीम इब्नसीना। उसने अपनी पुस्तक कानून में ऐसे अनेक अनुभवों का उल्लेख किया है कि अमुक प्रकार के मानसिक उभारों के कारण शरीर में अमुक प्रकार की विकृतियाँ अथवा बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। चिकित्सा उपचार में इब्नसीना ने दवादारू के स्थान पर रोगी की मनःस्थिति बदलने के उपाय किये और उससे असाध्य लगने वाले रोग भी आसानी से अच्छे हो गये।

जटिल से जटिल रोग जो मानसिक कारणों से उत्पन्न होते ही हैं। साधारण रोगों की जड़ में भी यही मानसिक विकृतियाँ बैठी रहती हैं। कनाडा के एक शरीर शास्त्री और मनोविज्ञानी डा॰ डानियल कापोन के अनुसार तमाम उपचारों के बाद भी काबू में न आने वाला साधारण सा रोग जुकाम केवल मानसिक कारणों से ही उत्पन्न होता है। शरीर शास्त्रियों के अनुसार जुकाम के भी विषाणु होते हैं,पर उनकी प्रकृति अन्य सजातियों से सर्वथा भिन्न होती हैं। चेचक, पोलियो आदि रोगों का आक्रमण एक बार होने पर शरीर में उस रोग से लड़ने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। फलतः इन रोगों के दुबारा आक्रमण का खतरा नहीं रहता लेकिन जुकाम के बारे में यह बात लागू नहीं होती वह कई बार आता है और लगातार बना रहता है। जिस दवा से एक बार अच्छा हो जाता है दुबारा उससे अच्छा नहीं होता। सही बात तो यह है कि दवाओं से वह ठीक ही नहीं होता। मन बहलाने के लिए चाहे जो दवायें ली जाती रहें लेकिन वास्तव में जुकाम की कोई दवा नहीं होती।

इसका कारण बताते हुए डा॰ डानियल कापोन का मत है कि जुकाम इतना शारीरिक रोग नहीं है। जितना कि मानसिक। जब मनुष्य थक हार कर निहाल हो जाता है उसे अपनी असफलताएँ निकट दिखाई देने लगती हैं तो मन उस लाँछन से बचने के लिए वह जुकाम बना लेता है ताकि दूसरे उसकी हार का दोष इस आपत्ति के सिर मढ़ते हुए उसे निर्दोष ठहरा सकें। डा॰ कापोन का मानना है कि यह रोग वस्तुतः ठहरा सके। डा॰ कापोन का मानना है कि यह रोग वस्तुतः अनार्मन का अनुदान है जो व्यक्ति को थोड़ा सा शारीरिक कष्ट देकर उसे असफलता के लाँछन से बचाता है। ऐसी स्थिति में रोगी बहुत हद तक पराजय की आत्म प्रताड़ना से बच जाता है। जुकाम की दैवी विपत्ति टूट पड़ने से वह हारा या असफल हुआ। इसकी योग्यता हिम्मत एवं चेष्टा में कहीं कोई कमी नहीं थी। यह मान लेने पर मनुष्य को साँत्वना की एक हलकी थपकी मिल जाती है। इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए अंतःचेतना जुकाम का ताना बाना बुनती है।

इस प्रतिपादन की पुष्टि में कोपोन ने अनेकों प्रमाण प्रस्तुत किये। उदाहरण के लिए उन्होंने कहा खिलाड़ी लोग प्रतियोगिता के दिनों में, विद्यार्थी परीक्षा के दिनों में, प्रत्याशी चुनाव तिथि पर अक्सर जुकाम से पीड़ित होते हैं इन में अधिकाँश ऐसे होते हैं जिन्हें अपनी सफलता पर सन्देह होता है और हार की कल्पित विभीषिका उनकी मनश्चेतना को जुकाम निमंत्रित करने के लिए विवश करती है। हालाँकि जुकाम के विषाणु होते हैं। ऐसी बात नहीं है कि वे होते ही नहीं, उनका अस्तित्व होता है। पर शरीर में जिस प्रकार अन्य रोगों को लड़ भगाने की प्रतिरोधी क्षमता होती है उसी प्रकार जुकाम के रोगाणुओं को मार काट देने की क्षमता रहती है। दूसरे जुकाम के विषाणु इतने कमजोर होते हैं कि वे अन्य रोगों के समान मनुष्य के लिए कष्टकारक नहीं होते। चूहे, बन्दर आदि के शरीर में जुकाम के विषाणु प्रविष्ट कराये गये किन्तु उनके शरीर पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

यह मानना भी गलत है कि सर्दी के कारण जुकाम होता है। ध्रुव प्रदेशों में कड़ाके की ठिठुरा और जमा देने वाली शीत पड़ती है। फिर भी वहाँ निवास करने वाले एस्किमो लोग अपनी सारी उमर उसी शीत में गुजार लेते हैं पर उन्हें कभी जुकाम नहीं होता। उस क्षेत्र में अन्वेषण के लिए जाने वाले खोजी दलों का भी यह कथन है कि जब तक वे ध्रुव प्रदेश में रहे तब तक उन्हें जुकाम नहीं हुआ। इस विषय में किये गये शोध अन्वेषणों का निष्कर्ष यह है कि जुकाम का प्रकोप शीत ऋतु की अपेक्षा गर्मी के दिनों में अधिक होता है। इस सामान्य से रोग का उपचार करने के लिए कितनी ही औषधियाँ, चिकित्सा फार्मूले खोजे गये पर वे सभी असफल रहे। इसका मात्र एक ही कारण है कि जुकाम दीखने भर में शारीरिक रोग लगता है पर वस्तुतः यह है मनोरोग।

यही बात अन्यान्य रोगों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। उनकी प्रतिक्रिया लक्षण शरीर पर भले ही दिखाई दें लेकिन उनकी जड़ मनुष्य के मन में होती है। वृक्ष की जड़ें जिस प्रकार जमीन के भीतर होती हैं और उसका तना, शाखायें, पत्ते, फूल, फल और शिखर आकाश में होते हैं।

इसी प्रकार रोगों का स्वरूप, उत्पात, प्रतिक्रिया शरीर के तल पर दिखाई देते हैं लेकिन उन का मूल मन में होता है। इसी तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए महर्षियों ने हजारों वर्ष पूर्व कहा है प्रज्ञापराधों रोगस्य मूल कारणम्, अर्थात् प्रज्ञापराध मानसिक अस्त-व्यस्त असन्तुलित मनःस्थिति, चिंता क्षोभ और अन्यान्य मानसिक विकृतियाँ समस्त रोगों का मूल कारण हैं। यदि अपनी मानसिक स्थिति को सम्हाला जाय उसे शाँत संतुलित बनाया जाय तो शरीर को पूर्ण स्वस्थ निरोग और पुष्ट रखा जा सकता है।

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November 1979
Type: TEXT
Language: HINDI
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