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Magazine - Year 1979 - November 1979

Media: TEXT
Language: HINDI
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शान्ति के बीज अन्तःभूमि में उगते हैं

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First 17 19 Last
संसार के कोलाहल एवं अशान्त वातावरण में एक विशेषता यह दिखायी देती है कि प्रत्येक व्यक्ति शान्ति पाने के लिए व्याकुल है। सारे प्रयत्न पुरुषार्थ इसीलिए किये जा रहे हैं। इस बात का प्रमाण है कि शान्ति शाश्वत है, अशान्ति तो बाह्य हलचलों की प्रतिक्रिया मात्र है। शान्ति का भाव मानव के अन्तःकरण में बीज रूप से विद्यमान है। अनन्त कोलाहल के मर्मस्थल से भी एक मंत्र ध्वनित हो रहा है-’शान्तिः शान्तिः शान्तिः’। वह प्रेरक शक्ति शान्त स्वरूप में समस्त जड़-चेतन में विराजमान है मनुष्य की अन्तरात्मा में स्थित होकर वह अपनी सतत प्रेरणा देती रहती है।

उस शान्त स्वरूप परमात्मा का दर्शन अपने अन्तःकरण में किस प्रकार किया जाय? इसका एक ही उत्तर है-अनन्त शान्ति का अनुभव शान्त मनःस्थिति द्वारा ही किया जा सकता है। आन्तरिक चंचलता का कोलाहल हमें अपनी ही अन्तरात्मा से दूर रखता है। हमारी प्रवृत्तियाँ अनेकों दिशाओं में दौड़ती हुई शक्ति को छिन्न-भिन्न किये दे रही है। बाह्य भाग-दौड़ के असंयमित कारणों से मन सदा अशान्त बन ही नहीं पाती कि वृत्तियों को अन्तर्मुखी करके उस शान्त स्वरूप आत्मा का दर्शन कर सकें।

सामान्यतः लोग जीवन के ह्रास और शक्ति के अभाव को शान्ति समझ लेते हैं। किन्तु जीवन-विहीन शान्ति तो मृत्यु है। शक्ति हीन शान्ति जड़ता का परिचायक है। गति एवं क्रिया से रहित निश्चेष्ट होना शान्ति नहीं है। शान्ति तो एक सुसंतुलित मनःस्थिति है जिसे प्राप्त कर मनुष्य साँसारिक कोलाहल एवं विपन्नताओं में भी निर्लिप्त बना रहता है। जीवन की सम्पूर्ण शक्ति के स्वरूप में जो विद्यमान है वही शान्ति है। जो सृष्टि के सौंदर्य को प्रकाशित एवं प्राणिमात्र के कल्याण करने के लिए सचेष्ट है वह शान्ति है।

इसे एक सामान्य उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। विशालकाय रेल रंजन चलता है। उसके पहिये घूमते हैं, किन्तु इंजन का चलना ही चालक नहीं है वरन् चालक वह है जो इंजन का चलना ही चालक नहीं है वरन् चालक वह है जो इंजन में बैठा उसे गति दे रहा है। गतिशील संसार के मध्य अदृश्य रूप में विद्यमान चेतना शान्त स्वरूप है। रेल के डिब्बे में बैठे यात्री उसकी तीव्र गति से भयभीत नहीं होते। वे जानते हैं कि इंजन को चलाने एवं नियंत्रित करने वाला बुद्धिमान ड्राइवर बैठा है। यह अभय की भावना तभी बनती है जब यात्री इस बात से परिचित होते हैं कि रेल की भयंकर गति अनियंत्रित नहीं है।

विशाल कारखाने में यदि कोई अनभिज्ञ व्यक्ति पहुँचे तो यही समझेगा कि यहाँ कोई दानवीय काण्ड हो रहा है। चक्रों की तीव्र ध्वनि, मशीनों की गड़गड़ाहट उसके मन को विक्षुब्ध बना देगी। किन्तु जब उसे पता चलता है कि उनको नियंत्रित संचालित करने वाला कोई विज्ञ मनुष्य मौजूद है तो उसे वह भयरहित होकर शान्ति का अनुभव करेगा। कारखाने के कोलाहल एवं गति में परिणाम की सार्थकता में उसे शान्ति का दिग्दर्शन होगा।

जगत के प्रचण्ड शक्ति वेग एक विभीषिका के रूप में मानव मन को उद्वेलित कर रहे हैं। रेल की गड़गड़ाहट एवं कारखाने की भयंकर ध्वनि के समान सृष्टि के आवेग क्रिया प्रतिक्रियाओं से मनुष्य विक्षुब्ध बना रहता है। सामान्य प्राकृतिक आघातों से भयभीत हो जाता है। इसका मुख्य कारण है-अंतर्दृष्टि का अभाव। मन की उद्विग्नता उसे जगत के मध्य विद्यमान शान्त सत्ता के दिग्दर्शन से वंचित रखती है। फलस्वरूप जीवन पर्यन्त मनुष्य साँसारिक अभावों, आघातों, से भयभीत होकर विक्षुब्ध बना रहता है। अपने अज्ञान के कारण उस दिव्य सत्ता का अनुभव नहीं कर पाता जो निर्लिप्त भाव से बैठी संसार को गति प्रदान कर रही है।

वह प्रकृति को फल और फूल से प्राण और सौंदर्य से भरपूर बनाकर मंगलमय बना रही है। सृष्टि के शक्ति के वेग को भी एक मंगलमय लक्ष्य की ओर लिए जा रही है। धात्री के समान अनादि काल से जगत की रक्षा कर रही है। समस्त ग्रह नक्षत्रों को जड़ पदार्थों को आबद्ध किये सुव्यवस्थित ढंग से संचालित कर रही है। चेतन प्राणियों का पालन पोषण कर रही है। अनेकों स्वरूपों में वह पालन-शक्ति के रूप में जगत में विचरण कर रही है। जीवन उसका एक स्वरूप है मृत्यु दूसरा। सुख-दुख हानि लाभ उसके ही विभिन्न रूप हैं। जीवन व्यापार की समस्त गतिविधियों में कल्याणकारी भाव में शान्त रूप में विराजमान है। यदि ऐसा न होता तो आज संसार में जो सौंदर्य आकर्षण दिखाई दे रहा है। वह आघातों द्वारा लुप्त हो जाता। मानव मानव अन्यान्य प्राणियों के बीच जो सम्बन्ध बन्धन आकर्षित कर रहा है, वह समाप्त हो जाता। वह शान्त स्वरूप कल्याणकारी परमात्मा ही समस्त संसार की रक्षा कर रहा है।

मन की चंचलता ही उस शान्त स्वरूप को जो अन्तरात्मा में बैठा अपना भाव प्रेषित करता रहता है के सान्निध्य लाभ से वंचित रखती है। बाह्य संसार में मन शान्ति की तलाश में भटकता रहता है। कभी उसे वस्तुओं के आकर्षण में ढूंढ़ता है तो कभी व्यक्तियों में। आकर्षणों के ये बन्धन उसे और भी आबद्ध करके अशान्त बनाते हैं। वस्तुओं व्यक्तियों से बद्ध होकर मनुष्य अपने आन्तरिक स्रोत से दूर हटता चला जाता है। जीवन पर्यन्त मन की भाग दौड़ चलती रहती है तथा मनुष्य को व्यग्र बनाये रहती है। भाग दौड़ का परिणाम यह होता है कि मनुष्य की शक्ति क्षीण हो जाती है? शक्ति क्षीण होने से अशान्ति उसी अनुपात में बढ़ती जाती है। शान्ति प्राप्त करने का यह अविवेकपूर्ण प्रयास अशान्ति के परिणाम के रूप में मिलता है। थकी इन्द्रियाँ निश्चेष्ट जीवन की बाह्य स्थिरता को शान्ति का स्वरूप मान बैठने की भूल करती है शक्ति के ह्रास होने पर भी मन की चंचलता उसी प्रकार बनी रहती है। फलस्वरूप मनुष्य अपने जीवन के अन्तिम दिनों में और भी अधिक व्यग्र बना रहता है तथा अन्तरात्मा के अमृत पान से सदा वंचित रहता है।

अन्तरात्मा के शान्त स्वरूप का दर्शन शान्त मनःस्थिति द्वारा कर सकना सम्भव है। इसके लिए मन को संयमित करना अति आवश्यक है। संयमित मन सदा चलायमान रहता है। शास्त्रकार इसी कारण मन को निग्रहित करने का निर्देश देते हुए कहते हैं-

“मनएव मनुष्याणाँ कारणं वन्ध मोक्ष्योः” (गीता)

मन बन्धन और मुक्ति का कारण है। बाह्य आकर्षणों में आबद्ध मन के कारण ही अशान्ति बनी रहती है। अशान्ति दूर करने एवं शान्ति प्राप्त करने का मन तो करता है किन्तु उसका प्रयास बहिर्मुखी होता है। जड़ वस्तुओं के क्षणिक आकर्षणों में शान्ति पा सकना सर्वथा असम्भव हैं। आन्तरिक भाव प्रेरणाओं को समझा जा सके तथा मन की घुड़ दौड़ को अंतर्मुखी बनाया जा सके तो स्पष्ट होगा कि न केवल अपनी अन्तरात्मा में वरन् समस्त सृष्टि में शान्ति स्वरूप परमात्मा विद्यमान है। बाह्य कोलाहल सुख-दुख तो परिवर्तनशील तरंगें हैं। उन तरंगों का प्रेरणा स्रोत तो इन हलचलों के प्रभाव से रहित कल्याणकारी परमात्मा है, जो निर्लिप्त भाव में सम्पूर्ण चराचर में शान्त रूप में स्थित है। मानवी काया में अंतरात्मा के रूप में वही विराजमान हो कर अपने दिव्य गुणों का आभास प्रेरणाओं के रूप में कराता रहता है। उन प्रेरणाओं को समझा जा सके तथा अपनी चेष्टाओं को अन्तर्मुखी बनाया जा सके तो जिस की प्राप्ति के लिए मन सदा व्यग्र बना रहता है, उस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है।

साँसारिक सुख-दुख, एवं अभाव उसे ऐसी स्थिति में पहुँचने पर प्रभावित नहीं कर पाते। सर्वत्र आनन्द की शान्ति की निर्झरिणी बहती दिखायी देती है। जगत के कोलाहलों में भी उसे कल्याणकारी भाव का दर्शन होता है। मन का भटकाव बन्द हो जाता है। अनन्त कोलाहल में भी उसे एक ही ध्वनि सुनायी पड़ती है-शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः।

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November 1979
Type: TEXT
Language: HINDI
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