युगांतर चित्रण (kavita)
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आ रहे उभरकर नये चित्र, युग का आकाश निहारो तो।
नूतन-युग के नव-चित्रण का, अनुपम-आभास उभारो तो॥1॥
युग की धरती पर फूट रहे, देखो तो आज नये-अंकुर।
फूटी पड़तीं कोंपलें नई, नूतन-पल्लव हो रहे मुखर॥
आने वाली है नई-फसल, युग के खेतों, खलियानों में।
नूतन-रस भरता जाता है, युग की फसलों के दानों में॥
युग-परिवर्तन के चित्र-तनिक, आंखों के बीच उतारो तो॥2॥
देखो! वह चित्र उभर आया, जिसमें श्रम का श्रृंगार हुआ।
देखो! वह चित्र कि जिसमें, नव-सृजन सहज-साकार हुआ॥
वह चित्र निहारो तो जिसमें, युग-कलाकार की मनमानी।
हैं जहां विशेषताएं, युग की समता का भरती हैं पानी॥
शोषण, उत्पीड़न, भेद-भाव, हैं शेष न तनिक विचारो तो॥3॥
यह चित्र गजब है, गिरतों को युग-पुरुष उठाते हाथ पकड़।
देखो! कितनी करुणा छलकी, दीनों का दर्द न जाये बढ़॥
युग की ममता टूटी पड़ती, जन-जन को प्यार लुटाने को।
रस की धारा फूटी पड़ती, प्यासे को प्यार पिलाने को॥
अपनी संवेदन-क्षमता को, पीड़ित के लिये पुकारो तो॥4॥
नव-युग के चित्र अनूठे हैं, अपने घर का श्रृंगार करो।
जन-मानस में इन चित्रों को जड़कर स्वर्णिम-उल्लास भरो॥
ये चित्र मनुज की गरिमा को, देवत्व प्रदान करायेंगे।
ये चित्र मनुज की धरती को, स्वाभाविक-स्वर्ग बनायेंगे॥
इन चित्रों से आचारों की दीवारें तनिक संवारो तो॥5॥
-मंगल विजय
*समाप्त*

