शरीर संस्थान में बहती प्रचण्ड विद्युत धारा
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ऊर्जा के सहारे यन्त्रों का संचालन होता है। शरीर भी एक यन्त्र है। इसके सुसंचालन में जिस विद्युत की आवश्यकता पड़ती है उसे प्राण कहते हैं। प्राण एक अग्नि है। अग्नि को ज्वलन्त रखने के लिए ईन्धन की आवश्यकता पड़ती है। प्राण रूपी शरीराग्नि आहार से ज्वलन्त बनी रहती है। प्राणियों में काम करने वाली ऊर्जा को वैज्ञानिकों ने जैव विद्युत नाम दिया है। शरीर संचार की समस्त गतिविधियाँ तथा मस्तिष्कीय हलचलें रक्तमाँस जैसे साधनों से नहीं शरीर में संव्याप्त विद्युत प्रवाह द्वारा परिचालित होती है। यही जीवन−तत्व बनकर रोम−रोम में व्याप्त है। मानवी विद्युत की यह मात्रा जिसमें जितनी अधिक होगी वह उतना ही ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी होगा। प्रतिभाशाली, प्रगतिशील, शूरवीर, साहसी लोगों में इसी क्षमता की बहुलता होती है। शरीर संस्थान में इसकी न्यूनता होने पर विभिन्न प्रकार के रोग शीघ्र ही आ दबोचते हैं। मनःसंस्थान में इसकी कमी होने से अनेकों प्रकार के मनःरोग परिलक्षित होने लगते हैं।
जैव विद्युत भौतिक बिजली से सर्वथा भिन्न है जो विद्युत यन्त्रों को चालित करने के लिए प्रयुक्त होती है। मानवी विद्युत का सामान्य उपयोग शरीर को गतिशील तथा मन, मस्तिष्क को सक्रिय रखने में होता है। असामान्य पक्ष मनोबल, संकल्पबल, आत्मबल के रूप में परिलक्षित होता है, जिसके सहारे असम्भव प्रतीत होने वाले काम भी पूरे होते देखे जाते हैं। “ट्रान्सफार्मेशन ऑफ एनर्जी” सिद्धान्त के अनुसार मानवी विद्युत सूक्ष्मीभूत होकर प्राण ऊर्जा और आत्मिक ऊर्जा के रूप में संग्रहित और परिशोधित परिवर्तित हो सकती है। इस ट्रान्सफार्मेशन के लिए ही प्राणानुसन्धान करना और प्राण साधना का अवलम्बन लेना पड़ता है।
शरीर में काम करने वाली जैव विद्युत में कभी−कभी व्यतिरेक होने से गम्भीर संकटों का सामना करना पड़ता है। भौतिक बिजली का जैव विद्युत में परिवर्तन असम्भव है, पर जैव विद्युत के साथ भौतिक बिजली का सम्मिश्रण बन सकता है। कईबार ऐसी विचित्र घटनाएँ देखने में आयी हैं जिनमें मानवी शरीरों को एक जेनरेटर−डायनेमो के रूप में काम करते पाया गया है।
आयरलैंड की एक युवती जे. स्मिथ के. शरीर को छूते ही बिजली के नंगे तारों की भाँति तेज झटका लगता था। जब तक वह जिन्दा रह, घर के सदस्यों के लिए एक समस्या बनी हुई थी। डॉ. एफ. क्राफ्ट ने उसके शरीर का परीक्षण किया तथा यह बताया कि उक्त युवती की काया से निरन्तर भौतिक बिजली की भाँति विद्युत प्रवाहित होती रहती है।
प्रसिद्ध ‘टाइम्स’ पत्रिका में ओण्टोरियो (कनाडा) की कैरोलिन क्लेयर नामक एक महिला विस्तृत वृत्तान्त छपा था, जिसमें उल्लेख था कि यह महिला डेढ़ वर्ष तक बीमार पड़ी रही, पर जब स्थिति सुधरी तो उसमें एक नया परिवर्तन यह हुआ कि उसके शरीर से विद्युतधारा बहने लगी। यदि वह किसी धातु से बनी वस्तु को छूती, उसी से चिपक जाती। छुड़ाने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता।
फ्रांस से प्रकाशित होने वाले ‘मेडिकल टाइम एण्ड गजट’ में एक ऐसे ही लड़के का विवरण छपा था जिसके शरीर से सतत् विद्युत धाराएँ निकलती थीं। लियोन्स नामक व्यक्ति के घर जन्मा शिशु जब सात माह का हुआ तभी से उसको छूने से झटके लगते थे। माँ जब उसे दूध पिलाने के लिए अपनी छाती से चिपकाती तो उसे तेज झटक लगता था। कितनी बार वे बेहोश हो गयीं। बाद में उन्होंने बच्चे को अपना दूध पिलाना ही बन्द कर दिया। उसके लिए बाहरी दूध की व्यवस्था बनानी पड़ी। माँ−बाप के प्यार से वंचित यह दुर्भाग्यशाली लड़का कमरे के एक कोने में पड़ा रहता। भय वश उसे कोई उठाता नहीं था। इस माह तक यह बालक किसी तरह जीवित रहा, पर मरते समय उसके शरीर से नीले वर्ण का प्रकाश निकलते देखा गया जिसका फोटो भी खींचा गया था।
कुमारी जेनी मार्गन को चलते−फिरते पावर हाउस के रूप में ख्याति मिली। 13 वर्ष की आयु के बाद उसके शरीर से विद्युत शक्ति प्रचण्ड रूप से उभर कर प्रकट हुई। एक वैज्ञानिक ने प्रयोग करने के लिए जेनी को छुआ तो इतना तीव्र झटका लगा कि वे घण्टों बेहोश रहे। एक लड़के ने प्रेमवश उसका हाथ पकड़ा तो दूर जा गिरा। स्नेहवश जेनी ने एक बिल्ली को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया पर बिल्ली के लिए जेनी का प्रेम अत्यन्त महंगा पड़ा। वह न केवल मूर्च्छित हो गयी बल्कि कुछ ही समय बाद चल बसी। जेनी अपने हाथ के स्पर्श से सौ वाट का बल्ब जला देती थी।
आस्ट्रेलिया के एक बाईस वर्षीय युवक को उपचार के लिए न्यूयार्क लाया गया। उसका शरीर विद्युत बैटरी की भाँति काम करता था। छोटे−छोटे बल्ब उसके शरीर से स्पर्श कराके जलाये गये। पर उसके शरीर में विद्युत प्रवाह पूरे दिन एक समान नहीं रहता अपितु सूर्य के ताप की भाँति घटता−बढ़ता रहता था। जब आवेश कम होता तो बेचैनी और थकान महसूस करता। वह प्रायः अधिक फास्फोरस युक्त खाद्य−पदार्थों को खाना पसन्द करता था।
शरीर से विद्युत भौतिक बिजली की तरह क्यों प्रवाहित होती है, इस सम्बन्ध में अनेकों स्थानों पर खोजबीन हुई है तथा महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलें हैं। कोलोराडो के डॉ. डब्ल्यू पी. जेन्स और उनके मित्र डॉ. नार्मलोंग ने विस्तृत खोज के बाद बताया कि मनुष्य शरीर की प्रत्येक कोशिका एक छोटी किन्तु सजीव विद्युत घर है। कोशिका के नाभिक में विद्युत की प्रचण्ड मात्रा भरी पड़ी है। किसी अविज्ञात व्यतिरेक के कारण सन्निहित कोशिकाओं की विद्युतधारा फूटकर बाहर निकलने लगती है। ‘सोसाइटी ऑफ फिजीकल रिसर्च’ की रिपोर्ट है कि शरीर की कोशाओं के नाभिकों के आवरण ढीले पड़ने के कारण बिजली उसे चीरती हुई बाहर प्रवाहित होने लगती है। शरीर विद्युत पर शोध करने वाले डॉ. ब्राउन का मत है कि मनुष्य शरीर की प्रत्येक कोशिका में विद्युत भण्डार भरा पड़ा है। उनके अनुसार शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों के संचालन के लिए जितनी बिजली खर्च होती है उससे एक बड़ी कपड़ा मिल चल सकता है। छोटे बच्चे के शरीर में संव्याप्त विद्युत शक्ति से रेल इंजन को चलाना सम्भव है।
शरीर विद्युत का असन्तुलन कभी−कभी भयंकर विग्रह खड़ा करता देखा गया है तथा जीवन−मरण जैसे संकट प्रस्तुत कर देता है। अमेरिका के सेण्ट पीटर्स (फ्लोरिडा)की रहने वाली महिला श्रीमती मेरीहार्ड रोजर अपने मकान में विचित्र रूप से जली पायी गयीं। दिन के 10 बजे तक दरवाजा न खुलने पर पड़ौसियों ने कमरे का दरवाजा खटखटाना चाहा पर कुन्दा छूते ही एक पड़ौसी छिटककर दूर जा गिरा। उपस्थित लोगों ने समझा सम्भवतः मकान में बिजली का करेंट दौड़ गया हो। मेन स्विच ऑफ किया गया पर विद्युतधारा अभी भी प्रवाहित हो रही थी। बिजली के विशेषज्ञों ने पूरी जाँच−पड़ताल कर ली पर कहीं भी गड़बड़ी नहीं पायी गयी। किसी प्रकार दरवाजा तोड़ा गया। श्रीमती रोजर्स का शरीर राख का ढेर बना फर्श पर पड़ा था। कमरा अभी भी भट्टी जैसा गरम था।
पुलिस को सूचना मिली। साथ ही शरीर शास्त्रियों का एक विशेष दल अध्ययन के लिए आया। डॉ. विल्टन क्राग ने लम्बी खोजबीन की। उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि शरीर को भस्मीभूत करने के लिए तीन हजार फारेनहाइट तापमान चाहिए। यह केस ‘स्पान्टेनियस ह्युमन कम्बशन’ (अपने आप जल उठाना) का है। श्रीमती रोजर्स अपनी ही शरीराग्नि से जलकर मरी हैं न कि भौतिक विद्युत से।
फ्लोरिडा की सड़क पर जाते समय एक व्यक्ति के शरीर से अचानक आग की–नीली लपटें निकलने लगीं। उसके साथ चलने वालों में से एक ने बाल्टी भर पानी डाल दिया तो आग कुछ क्षणों के लिए थम गयी पर थोड़े ही देर बाद पुनः भभक उठीं और देखते ही देखते कुछ ही मिनटों में वह व्यक्ति राख की ढेर में परिवर्तित हो गया। एक स्थानीय मेडिकल जनरल में छपी इस घटना पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए फ्लोरिडा के वैज्ञानिकों ने कहा कि–शरीर में नब्बे प्रतिशत जल की मात्रा विद्यमान होते हुए भी अपनी ही शरीराग्नि द्वारा कुछ ही क्षणों में जलकर मरना विज्ञान जगत के लिए एक अनोखी घटना है जो यह बताती है कि शरीर शास्त्रियों को शरीर के विषय में जितना ज्ञान है उसकी तुलना में कई गुना अधिक अभी रहस्यमय है। 7 दिसम्बर 1956 को होनोलूलू द्वीप में एक ऐसी ही घटना घटी। कॉमेट नामक महिला दूसरे पड़ौसियों के यहाँ काम करके अपना गुजारा करती थी। एक दिन काम पर नहीं पहुँचने पा पड़ौसी एक महिला खोजबीन करने पहुँची। घर जाकर जो दृश्य देखा उसे देखकर वह अवाक् रह गयी। कॉमेट के शरीर से तेज नीली लपटें निकल रहीं थीं। शरीर सूखी लकड़ी की भाँति जल रहा था। जितनी देर में आग बुझाने का उपक्रम बनाया गया कॉमेट का शरीर जल कर राख में परिवर्तित हो चुका था।
सेनफ्रांसिस्को में 31 जनवरी 1959 को लैगूना होम नामक स्थान पर जहाँ वृद्धों की देखरेख काम एक सरकारी संस्था करती है, कार्यकर्त्ताओं द्वारा शाम को दूध वितरित किया जा रहा था। अचानक लाइन में दूध के लिए लगे वृद्ध जैक लार्चर के शरीर से अग्नि की ज्वालाएं निकलने लगीं। बचाव के लिए ऊपर कम्बल डाला गया पर कुछ ही सेकेंडों में वह भस्मी भूत हो गया। अग्नि बुझाने के अन्यान्य प्रयास भी असफल सिद्ध हुए। मात्र पाँच मिनट में ही जैक लार्चर का शरीर राख की ढेरी में बदल चुका था।
जेम्सफोर्ड, इंग्लैंड की बात है। 20 सितम्बर 1938 को एक आलीशान होटल में मध्यरात्रि को आर्केस्ट्रा की मधुर ध्वनि गूँज रही थी। इतने में नर्तकी के शरीर से तेज नीली लौ फूट पड़ी। भयवश कुछ लोग एक किनारे खड़े हो गये और कुछ सहायता के लिए पानी आदि लाने दौड़े। इतने में अग्नि ने लपटों का रूप ले लिया और कुछ ही क्षणों में नर्तकी के शरीर के स्थान पर धधकता अग्निपिण्ड दिखायी पड़ने लगा। थोड़ी ही देर बाद वह राख में परिवर्तित हो गयी।
ये घटनाएँ मानव शरीर में सन्निहित प्रचण्ड−प्राण शक्ति का परिचय देती हैं। जिसके व्यतिरेक द्वारा गम्भीर संकटों का सामना भी करना पड़ सकता है। प्राण पर नियंत्रण–परिशोधन और उसका संचय अभिवर्धन किया जा सके तो मनुष्य असामान्य शक्ति का स्वामी बन सकता है।

