ध्यान योग की दार्शनिक पृष्ठभूमि
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व्यक्ति चेतना का विश्व चेतना से−आत्मा का परमात्मा से−घनिष्ठ तादात्म्य किस प्रकार स्थापित हो? दिव्य आदान−प्रदान कैसे आरम्भ हो? इसके लिए कितने ही प्रकार के साधनात्मक प्रयोग करने पड़ते हैं। ध्यान के माध्यम से एकाग्रता का अभ्यास करना होता है। एकाग्रता अर्थात् इष्ट के प्रति−उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति−निष्ठा उत्पन्न करने के लिए मन को प्रशिक्षित करना। योग ग्रन्थों में योग की परिभाषा “चित्त वृत्ति निरोधः” के रूप में की गई है अर्थात् चित्त की वृत्तियों को परिष्कृत, परिमार्जित कर ईश्वरीय प्रयोजनों में लगा देने का नाम योग हैं। महाचेतना से जुड़ने की प्रक्रिया में मन की प्रवृत्तियाँ−चित्त की वृत्तियाँ ही प्रधान बाधक हैं। अभ्यस्त ढर्रा ही मन को रुचता है। पतन की ओर उसका सहज झुकाव है। अनभ्यस्त को अभ्यस्त बनाने के लिए−चित्त की वृत्तियों को मोड़ना मरोड़ना होता है। यह कार्य अतिकठिन है। अचेतन में स्वभाव एवं अभिरुचियों के संस्कार जड़ जमाये रहते हैं। क्रिया एवं विचारणा उन्हीं के द्वारा अभिप्रेरित होती है। अधिकाँश व्यक्तियों की स्थिति पराधीनों जैसी होती है। अधिकाँश व्यक्तियों की स्थिति पराधीनों जैसी होती है। कुसंस्कारों को तोड़ना भौतिक माध्यमों से कठिन पड़ता है।
मन की अनियन्त्रित कल्पनाएँ एवं अनावश्यक उड़ानें उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित किया गया होता तो गहराई में उतरने और महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता। यह चित्त की चंचलता ही है जो मनःसंस्थान की दिव्य क्षमताओं को ऐसे ही निरर्थक गँवाती और नष्ट−भ्रष्ट करती हैं। संसार में जिसने भी किसी क्षेत्र, किसी विषय विशेष में प्रवीणता, पारंगतता प्राप्त की है उन सभी को विचारों पर नियन्त्रण करने−उन्हें अनावश्यक चिन्तन से हटाकर उपयोग में नियोजित करने के लिए प्रयास करना पड़ा है। इसके बिना चंचलता की वानर वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है। शिल्प, कला, शिक्षा विज्ञान आदि महत्वपूर्ण सभी प्रयोजनों के सफलता में एकाग्रता की शक्ति की ही प्रधान भूमिका होती है। चंचलता को असफलता की सगी बहिन माना जाता है।
आत्मिक प्रगति के लिए−उस महान शक्ति से सम्बन्ध−तादात्म्य स्थापित करने के लिए तो एकाग्रता की और भी अधिक उपयोगिता है। इसलिए ध्यान के नाम पर उसका अभ्यास विविध प्रयोगों द्वारा किया जाता है। ध्यान में जिस एकाग्रता का प्रतिपादन किया गया है उसका लक्ष्य है−भौतिक जगत की कल्पनाओं से चित्त को−मन को विरत करने और उसे अंतर्जगत की क्रिया−प्रक्रिया में नियोजित कर देना। साँसारिक प्रयोजनों में मन न भटके और आत्मिक क्षेत्र की परिधि में परिभ्रमण करता रहे तो समझना चाहिए कि एकाग्रता का लक्ष्य पूरा हो रहा है। विज्ञान के शोध कार्यों में− साहित्य के सृजन प्रयोजनों में वैज्ञानिक या लेखक का चिन्तन अपनी निर्धारित दिशाधारा में सीमित रहता है। इतने भर से एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। जबकि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप से गतिशील रखना पड़ता है ओर कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है। तो भी उसे चंचलता नहीं कहा जाता। अपनी निर्धारित परिधि में कितना ही द्रुतगामी चिन्तन क्यों न किया जाय−कितनी ही कल्पनाएँ−कितनी ही स्मृतियाँ−कितनी ही विवेचना क्यों न उभर रही हों, वे एकाग्रता की स्थिति में तनिक भी विक्षेप नहीं उत्पन्न करेंगी। गड़बड़ी तो अप्रासंगिक चिन्तन से उत्पन्न होती है।
ध्यान के सम्बन्ध में एक भ्रान्ति यह बनी हुई है कि कितने ही व्यक्ति एकाग्रता का अर्थ मन की स्थिरता समझते हैं। दोनों में बड़ा भारी अन्तर है। एकाग्रता अभ्यास है ओर स्थिरता उसकी अन्तिम परिणति। आरम्भ में यह कठिन पड़ता है। स्थिरता को निर्विकल्प समाधि कहा गया है और एकाग्रता को सविकल्प। सविकल्प का अर्थ है–उस अवधि में आवश्यक विचारों का मनःक्षेत्र में काम करते रहना। निर्विकल्प से तात्पर्य है–एक केन्द्र बिन्दु पर सारा चिन्तन सिमटकर स्थिरता की स्थिति में उत्पन्न हो जाना। जिस एकाग्रता की आवश्यकता ध्यान की सफलता के लिए बताई गई है वह मन की स्थिरता नहीं, चिन्तन की दिशाधारा है। ध्यान के समय चिन्तन आत्मा के स्वरूप, क्षेत्र एवं लक्ष्य को समझने में लगना चाहिए और भाव क्षेत्र में यह प्रतिष्ठापना करनी चाहिए कि ब्राह्मी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा को बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिल सके।
एकाग्रता के अभ्यास के लिए दो बातें आवश्यक हैं। इष्ट का निर्धारण और श्रद्धा का आरोपण। इष्ट के निर्धारण से अभिप्राय है−भगवान का एक स्वरूप निर्धारित करना। स्वरूप क्यों? जबकि वह स्वरूपातीत है? क्योंकि मनुष्य की बनावट ही ऐसी है कि वह सीधे निराकार को पकड़ नहीं पाता। उसके हृदय में निराकार सत्ता से प्रेम तादात्म्य नहीं उत्पन्न हो सकता। बिजली, गर्मी,ठण्ड, चुम्बक भी शक्ति की विविध धाराएँ हैं, पर इनसे कहाँ किसी के प्यार करने का जी करता है। प्यार के लिए प्रतीक माध्यम चाहिए। मस्तिष्कीय संरचना भी ऐसी है कि उसे सोचने चिन्तन को उत्कृष्टता की और मोड़ने के लिए प्रतीक आधार चाहिए। कथा, उपन्यासों में ऐसी बातों का समावेश होता है जो मनोरंजन के लिए आवश्यक हैं किन्तु फिर भी मनुष्य सिनेमा, नाटक, सर्कस देखने जाता है और उसके माध्यम से भले−बुरे प्रभावों को ग्रहण करता है। विचार कथाएँ और सम्बद्ध सिद्धान्तों का समावेश होते हुए भी उपन्यासों, कथाओं की पुस्तकों की तुलना में सिनेमा के चलचित्र कही अधिक लोकप्रिय बने हुए हैं। कारण एक ही है−−प्रतीकों के माध्यम से मनोरंजन अधिक हो जाता है। आरम्भ में निराकार विराट् चेतना से संपर्क साधने और प्रेम भावना उत्पन्न करने में मन को कठिनाई होती है। इष्ट कष्ट निर्धारण इसी प्रयोजन के लिए किया जाता है। योगाभ्यास के आरम्भ में गुण परक इष्ट के निर्धारण को तत्वदर्शियों ने आवश्यक माना है। अपनी−अपनी अभिरुचि के अनुरूप विभिन्न देवी− देवी−देवताओं को इष्ट मानकर साधना आरम्भ की जाती है। अपने को मर्यादा में बाँधने के लिए भगवान राम की साकार प्रतिमा को हृदय में प्रतिष्ठापित करना होता है। पूर्णता के लक्ष्य को याद रखने तथा अवधारण करने के लिए पूर्ण पुरुष भगवान कृष्ण को प्रतीक बनाया जाता है। समर्पण की साकार प्रतिमा हनुमान माने जाते हैं। दुर्गा की प्रतिमा प्रखरता की प्रतीक मानी जाती है। इष्ट के रूप में गायत्री माता को− प्रज्ञा महाशक्ति को इसलिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है कि इसके साथ विवादास्पद कथानक नहीं जुड़े हुए है। सभी देवी−देवता के साथ अनेकों कथाएँ जुड़ी हुई हैं। जो इष्टदेव को सामान्य मनुष्यों जैसी सीमित परिधि में बाँधती हैं। जबकि इष्ट को कथानक से रहित विशुद्ध रूप से उच्चस्तरीय आदर्शों का प्रतीक प्रतिनिधि होना चाहिए। गायत्री−प्रज्ञा महाशक्ति कथानक रहित है। वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता, ऋतम्भरा आद्य शक्ति के रूप में गायत्री महाशक्ति का निरूपण किया गया है। आदिकाल से ही गायत्री योगाभ्यासियों की इष्ट रही है। ऋषियों से लेकर अवतारों तक ने इस महाशक्ति को ही इष्ट के रूप में वरण कर उसके दिव्य अनुदानों से लाभ उठाया है। ध्यान योगी इसी का पयपान कर अमृत आनन्द का लाभ लेते रहे हैं। इस महामन्त्र के साथ जुड़ी प्रेरणाओं में उन समस्त गुणों का समावेश है जो ध्यान में चिन्तन को परिष्कृत करने−उदात्त बनाने के लिए आवश्यक है।
युवा नारी के रूप में मातृ शक्ति को वरण करने से ‘मातृवत् परदारेषु’ की भावना का अपने आप विकास होता है, वही उसके गुणों−विशेषताओं पर चिंतन करते रहने और प्रज्ञा का अवलम्बन लेने से योग का कंटकाकीर्ण मार्ग सरल बन जाता है। इस मार्ग में मन का विक्षोभ एवं चिन्तन का भटकाव ही अधिक बाधक होता है। प्रज्ञा को वरण कर लेने से वह विवेक बुद्धि विकसित होती है जिसके कारण भटकाव रुकता है।
इष्ट निर्धारण ही पर्याप्त नहीं, एकाग्रता की उपलब्धि के लिए श्रद्धा का आरोपण भी उतना ही आवश्यक है। ध्यान कास यह प्राण है। इसके अभाव में सभी यौगिक उपचार मात्र स्थूल कर्मकाण्ड रह जाते हैं और कोई विशेष उपलब्धि नहीं हो पाती। कितने ही व्यक्ति ध्यान पूजा पाठ की लकीर पीटते रहते और जहाँ की तहाँ स्थिति में पड़े रहते हैं। जबकि उसी निर्धारित प्रक्रिया को अपनाकर कितने ही चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित कर लेते हैं। इन परिणामों के भारी अन्तर का कारण क्या है? उत्तर स्पष्ट है−एक ने अपनी सघन श्रद्धा को आरोपण किया और दूसरा स्थूल क्रिया−कृत्य की लकीर पीटता रहा। इष्ट को सर्व समर्थ सत्ता मानने और उसके गुणों के अवधारण से श्रद्धा का लक्ष्य पूरा हो जाता है। श्रद्धा अर्थात्−लक्ष्य के प्रति अटूट निष्ठा। उच्चस्तरीय सिद्धांतों एवं आदर्शों के प्रति असीम प्यार। लघु को विभु, क्षुद्र को महान, नर को नारायण और पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने की प्राण ऊर्जा जहाँ से निस्सृत होती है, वह केन्द्र बिन्दु है–अन्तः का श्रद्धा क्षेत्र। गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण में श्रद्धा और विश्वास को ‘भवानी शंकरौ’ के रूप में मानकर अभ्यर्थना की है। रामकृष्ण परमहंस की काली, मीरा के शालिग्राम पत्थर सजीव बनकर पग−पग पर चमत्कार दिखाते रहे और अपने अनुदानों से उन्हें परितृप्त करते रहे। ध्यान में एकाग्रता तभी उत्पन्न होती है जब इष्ट के प्रति श्रद्धा सघन एवं सुदृढ़ हो। किसी प्रकार के विक्षोभ उसे डगमगा न सकें। उथली श्रद्धा से किसी विशिष्ट उपलब्धि की आशा नहीं की जा सकती।

