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Magazine - Year 1982 - Version 2

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आत्मसत्ता − परमात्मसत्ता का मिलन−संयोग

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जीवात्मा की सामर्थ्य सीमित है–परमात्मा की असीम। एक लघु है तो दूसरा विभु। एक सरोवर है–दूसरा चेतना का–शक्ति का महासागर। सामर्थ्य सीमित होते हुए भी जीवात्मा के विकसित होने–असीम बनने और परमात्मा सत्ता के स्तर तक जा पहुँचने की पूरी−पूरी गुंजाइश है। लघु के विभु, बिन्दु के सिन्धु, सीमित के असीम और चेतना के महाचेतना में विकसित होने की प्रक्रिया जिस माध्यम से सम्पन्न होती है उसे योग कहते हैं।

बोलचाल की भाषा में योग का अर्थ होता है–जुड़ना। आध्यात्मिक अर्थ में योग कहते हैं–जीवात्मा के परमात्मा से जुड़ जाने को। जीव सत्ता–विराट् सत्ता से अपना संपर्क सूत्र जोड़ ले– तादात्म्य स्थापित कर उसमें एकाकार हो जाय, इसे ही योग कहा गया है। योग का लक्ष्य है जीवात्मा का विराट् चेतना से संपर्क जोड़कर−दिव्य आदान−प्रदान का मार्ग खोल देना। निस्सन्देह अपना आपा महान है। सामर्थ्यवान है। पर सीमाबद्ध होने से उसकी शक्ति सीमित रह रही है। अपने एकाकी बलबूते वह कोई महान प्रयोजन पूरा नहीं कर पाता। विराट् से–चेतना के महासागर से जुड़ जाने–असीम स्रोत से संपर्क मिल जाने से अपनी सामर्थ्य भी उसी स्तर की बन जाती है।

संपर्क में आने–जुड़ जाने के चमत्कार पग−पग पर दिखाई पड़ते हैं। बिजली के दो तार जुड़ते हैं तो प्रचण्ड धारा मध्य से प्रवाहित होने लगती है। नर−नारी के सान्निध्य, घनिष्ठता से संतानोत्पादन का क्रम चल पड़ता है। नये परिवार एवं नये समाज की रचना का अभिनव आरम्भ हो जाता है। यह तो समान स्तरीय व्यक्तियों एवं पदार्थों की सम्मिलन की प्रतिक्रिया हुई। जिसकी विलक्षण परिणित दैनिक जीवन में सर्वत्र परिलक्षित होती है।

जुड़ने का एक असामान्य पक्ष भी है जिसमें एक का स्तर निम्न तथा दूसरे का महान होता है। एक की शक्ति सीमित–दूसरे की असीम होती है। एक नगण्य होता दूसरा विशेषताओं−विभूतियों से सम्पन्न। पर संपर्क में आने, जुड़ जाने से सामान्य वस्तु एवं व्यक्ति भी अपने से विशिष्ट क्षमता एवं विशेषता सम्पन्न की न केवल विशेषताएँ प्राप्त कर लेते हैं बल्कि उसी स्तर के बन भी जाते हैं। लकड़ी अग्नि के निकट आती और अन्ततः अग्नि का स्वरूप प्राप्त कर लेती है। बल्ब होल्डर के निकट आते ही जल उठता, पंखा चलने लगता–हीटर गरम हो उठता, रेफ्रिजरेटर ठण्ड प्रदान करता है। अपने−अपने अनुरूप विशेषताओं को विद्युत शक्ति से ग्रहण कर लेते हैं। विभिन्न वाट के–विद्युत क्षमता वाले बल्ब अपने−अपने अनुरूप प्रकाश प्राप्त कर लेते हैं। विद्युत उत्पादन पानी से होता है पर उसका मूल स्रोत है समुद्र। नदियों, तालाबों, झरनों की जल सम्पदा भी समुद्र से ही मिलती है। सतत् वाष्पित होकर उड़ने और बादल बनकर बरसने में समुद्र का अथाह जल ही काम आता है। अस्तु प्राप्त होने वाले विद्युत का मूल स्रोत भी समुद्र है। समुद्र से सीधा संपर्क जुड़ सके तो उसके भाण्डागार से असामान्य शक्ति प्राप्त की जा सकती है।

सीमित की अपेक्षा बड़े स्रोतों से जुड़े रहने से उसी अनुपात में अनुदान भी मिलते हैं। कितनी ही नदियाँ किसी बड़े स्रोत से न जुड़ी रहने के कारण सूख जाती हैं। गंगा और यमुना का अजस्र प्रवाह हिमालय के व्यापक स्रोत से जुड़े होने से वे कभी नहीं सूखतीं। उनकी गरिमा और विशेषताएँ भी अन्य नदियों की तुलना में कहीं अधिक हैं। इनके भौतिक एवं आध्यात्मिक अनुदानों से हर कोई लाभ उठाता। जो श्रद्धाभाव इनके प्रति है अन्यों के प्रति नहीं। झीलों से निकलने वाली नदियाँ भी नहीं सूखती हैं। कारण है–अथाह जलराशि के स्रोत से उनका जुड़ा रहना।

सरकारी सेवाओं में नियुक्ति होने पर कितने ही अधिकार वेतन के अतिरिक्त भी अपने आप प्राप्त हो जाते हैं। न्यायाधीश को अपराधियों को दण्डित करने का अधिकार मिलता है। अधिकारी, कर्मचारी को विभिन्न प्रकार के अधिकार दिए जाते हैं। बैंक का खजांची विपुल धनराशि का मालिक बना रहता है। जिलाधीश को पूरे जनपद की देखरेख करने और सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए निर्णय लेने की पूरी छूट होती है। पुलिस के सिपाही सन्देह होने पर किसी को भी गिरफ्तार कर सकते हैं। प्रान्त के गवर्नर और देश के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री को व्यापक अधिकार होते हैं। जिनका उपयोग वे देश के हितों को ध्यान में रखते हुए करते रहते हैं। पर सेवा विमुक्त होते और मन्त्री मण्डल से निकलते ही प्राप्त सभी अधिकार अपने आप समाप्त हो जाते हैं। व्यक्ति वही और उसकी क्षमताएँ भी वही बनी रहती हैं, पर कारण क्या है कि प्राप्त अनेकों प्रकार के अधिकार समाप्त हो गये। अन्तर एक ही है–वह पहले सरकार से जुड़ा था और अब वह संपर्क टूट गया फलस्वरूप अधिकार भी जाते रहे।

घनिष्ठ संपर्क में आने–जुड़े रहने के कितने ही लाभ हैं। बच्चा माता−पिता से कितनी ही बातें सीखता है–सुविधाएँ प्राप्त करता है। संरक्षण और भावनात्मक पोषण−स्नेह−दुलार पाता है। उत्तराधिकार में उसे पिता की कमाई सम्पत्ति मिल जाती है। माँ का ममत्व उसके अन्तराल में सहज ही उतरता रहता और उसके अन्तराल को तृप्त करता तथा व्यक्तित्व को परिपुष्ट बनाता है। पत्नी पति से जुड़ जाती है। उसे पति का प्यार मिलता और उसकी सम्पत्ति की अधिकारी हो जाती है। पत्नी की अवमानना–अपमान को पति का अपमान माना जाता तथा अपमान करने वाले को सामाजिक तिरस्कार प्रताड़ना से लेकर सरकारी दण्ड का भाजन बनना पड़ता है। दाम्पत्य सम्बन्धों के कारण पति पत्नी में भावनात्मक आदान−प्रदान ही नहीं करते, लड़ते−झगड़ते भी हैं। अन्यों के साथ यह सब नहीं चल पाता।

वायु के संपर्क में आने पर धूल कण भी वायु मण्डल में उड़ने लगते और व्यापक क्षेत्र में विचरण करने का आनन्द लेते हैं। बेल पेड़ का अवलम्बन पकड़कर पेड़ की जितनी ऊँचाई तक जा चढ़ती है। नगण्य बूँदें समुद्र में मिलकर समुद्र बन जाती–गन्दा नाला गंगा में मिलकर गंगाजल बनकर उसकी विशेषताएँ प्राप्त कर लेता है। पानी दूध में मिलकर खोता नहीं पाता अधिक है–अपना मूल्य और स्तर बढ़ा लेता है। पारस पत्थर से छू जाने पर लोहा सोना बन जाता है।

भौतिक वस्तुओं एवं व्यक्तियों के संपर्क जुड़ने एवं उनके परिणाम एवं फलितार्थ की तुलना में जीवात्मा के परमात्मा से योग की उपलब्धियाँ असंख्य गुनी अधिक और अनुभूति अत्यधिक आनन्ददायक है। वह समस्त संसार का अधिष्ठाता है और चेतना का महासागर। भौतिक और आध्यात्मिक सभी विभूतियों उसमें समाहित हैं। सृष्टि के सभी जड़ चेतन उसी से अपने−अपने अनुरूप सामर्थ्य प्राप्त करते हैं। जड़ की जड़ से मिलन की प्रतिक्रिया इतनी चमत्कारी चेतन जीवों की इतनी सुखद और सरस हो सकती है वो जो इन सबका मूल स्रोत है उसका संपर्क कितना सरस, आनन्ददायक और विलक्षण होगा, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जड़ पदार्थ सामर्थ्य, गति एवं विलक्षणता तथा चेतनप्राणी जीवन, प्राण उस महास्रोत से सीमित मात्रा में प्राप्त कर थिरकन करते, उछलते−फुदकते और सरसता का आनन्द लेते हैं। योग बन जाने– स्रोत से सीधा संपर्क जुड़ जाने और दिव्य आदान−प्रदान का क्रम चल पड़ने की विधिव्यवस्था कितनी सरस, हृदय को दिव्य आनन्द से भर देने वाली होगी, यह सोचकर मन पुलकित हो उठता है।

सामान्यता तृष्णा, वासना और अहंता की फूहड़ परितृप्ति के लिए मृग−मरीचिका में मनुष्य जीवन पर्यन्त भटकता रहता है। क्षणिक आनन्द में मोद मनाने और उसमें व्यतिक्रम उपस्थित होते ही दुःख और शोक से आकुल−व्याकुल हो उठता है। मन बन्दर की भाँति वस्तुओं एवं व्यक्तियों से सुख के लिए उनके इर्द−गिर्द मचलता–मचकता −उछलता−चक्कर काटता रहता है। अतृप्ति और अशान्ति ही अन्ततः पल्ले पड़ती। समूचा जीवन ही ऐषणाओं की पूर्ति में खप जाता है। दिव्य चेतना से संयोग न बन पाने पर शाश्वत आनन्द से मनुष्य को जीवन पर्यन्त वंचित रहना पड़ता है। अतृप्ति लेकर पैदा होता और अतृप्त ही चला जाता है। यह भटकाव मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी हार कही जायेगी।

योग का प्रयोजन है इस भटकाव को रोकना और उस विराट् चेतना से तादात्म्य जोड़ देना और दिव्य आदान−प्रदान का मार्ग प्रशस्त करना। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं शक्ति है जिसकी अनुभूति अन्तःकरण में उच्चस्तरीय आस्थाओं एवं भाव संवेदनाओं के रूप में की जा सकती है। आत्म साक्षात्कार– ब्रह्म साक्षात्कार का अर्थ है अपनी आस्थाएँ परिष्कृत स्तर की–अनुदारता जैसी दुष्प्रवृत्तियों के भव बन्धन से छुटकारा मिल जाय। परिष्कृत चिन्तन की सुखद प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए ही उसे स्वर्ग कहा गया है। ललक और लिप्सा, निकृष्टता एवं कुसंस्कारिता के भव बन्धनों को तोड़ फेंकने की स्थिति मुक्ति कहलाती है। स्वर्ग, मुक्ति,के विस्तृत अलंकारिक आख्यायिकाओं में तथ्य इतना भर है कि परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाने वाला स्वर्गीय सुख सन्तोष पाता है और आत्मीयता के विस्तार के साथ सम्बद्ध सेवा उदारता की नीति अपनाते हुए लोभ−मोह के पाश से मुक्त हो जाता है। इस योग दृष्टि का विकास परमात्मा से जुड़ने से ही सम्भव हो पाता है।

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