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Magazine - Year 1982 - Version 2

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वर्तमान की तप−साधना भविष्य निर्माण के लिए

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चान्द्रायण−कल्प को अन्तर्मुखी रहने और अन्तःक्षेत्र का पुनर्निर्माण करने के लिए उपलब्ध एक असाधारण सौभाग्य माना जाना चाहिए। ऐसा सौभाग्य जैसा कि माता के गर्भकाल में निवास करने का होता है। उन दिनों समाधिस्थ होकर गुफा−सेवन जैसा सुअवसर मिलता है। एकान्त−एकाग्रता को बन्दी−गृह नहीं, भविष्य निर्धारण की योजना बनाने में बरती गई वैज्ञानिकों जैसी लक्ष्यवेधी तत्परता ही समझा जाना चाहिए।

भव−बन्धनों की जकड़न भरे निरन्तर जलाने वाले नरक का और उत्कृष्टता के उन्मुक्त आकाश का आनन्द देने वाले स्वर्ग का दरवाजा बिल्कुल पास है। दोनों में से किसी में भी घुस पड़ने की मनुष्य को पूरी−पूरी छूट है। इस चुनाव में हर किसी को परिपूर्ण सुविधा है। प्रवेश के बाद तो परिस्थितियों का सामना करने की विवशता रहेगी ही, पर स्वेच्छाचार में कहीं कोई व्यवधान−अवरोध नहीं है। है तो उतना ही जितना कि प्रसव काल में बन्धन तोड़ने और उन्मुक्त आकाश का आनन्द लेने के लिए व्याकुल भ्रूण के सामने रहता है। चान्द्रायण को प्रसवकाल कहा जाय तो हर्ज नहीं। उसे अन्धकार और प्रकाश का मध्यवर्ती प्रभात भी कह सकते हैं। जो ऐसा सोच सकें,उनके लिए चान्द्रायण कल्पकाल है, अन्यथा कुछ दिन के लिए जलवायु बदलने–नई परिस्थितियों में जाकर ऊब हटाने का कौतुक−कौतूहल ही उसे समझा जायेगा। प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्रों में भी उपवास की प्रायः ऐसी ही विधि व्यवस्था रहती है। वहाँ भी कितने ही लोग उपचार प्रयोजनों के लिए पहुँचते हैं। बहुत हुआ तो कुछ इस प्रकार की बात सोची जा सकती है। पाप प्रायश्चित्त तो पुण्य का अवलम्बन लेने से होता है, पर कई व्यक्ति छुटपुट कर्मकाण्डों से ही वह कार्य सस्ते मोल में सम्पन्न हो जाने की बात सोचते हैं। ऐसे लोगों के लिए चान्द्रायण साधना कुछ मन बहलाव उत्पन्न कर सकती हैं। किन्तु वास्तविक लाभ उन्हें ही मिलेगा जो इस वातावरण–तप साधना एवं परिवर्तन पर्व का लाभ उठाकर अन्तःक्षेत्र में प्रवेश करेंगे। यही है वह क्षेत्र जिसमें प्रवेश करने और खोदने−कुरेदने के उपरान्त महामानवों को विभूतियों का हस्तगत हुआ है।

उपवास, अनुष्ठान, स्वाध्याय, सत्संग, विशिष्ट साधना उपक्रम, दिनचर्या अनुशासन आदि की निर्धारित विधि−व्यवस्था का परिपालन करते हुए साधकों को अपना चिन्तन इस केन्द्र बिन्दु पर नियोजित करना चाहिए कि अन्तःक्षेत्र को परिष्कृत करने के लिए क्या सोचना चाहिए क्या बदलना चाहिए और क्या कर गुजरने के लिए साहस जुटाना चाहिए। इस निर्धारण में निश्चय ही उपवास−अनुष्ठान एवं तप−साधना के कारण बढ़ी हुई सात्विकता–सही निर्णय तक पहुँचाने में बहुत कुछ सहायक सिद्ध हो सकती है।

इन दिनों भौतिक चिन्ताओं, आकाँक्षाओं–स्मृतियों से जितना विरत रहा जा सके उतनी ही आत्म−चिन्तन में सुविधा रहेगी। जिनका मन परिवार व्यवसाय में ही पड़ा रहेगा, वे दूर रहने के कारण कुछ कर तो सकेंगे नहीं, उल्टे चान्द्रायण काल में विकसित होने वाली पवित्रता−प्रखरता की दोनों उपलब्धियों से वंचित रखने वाले दुर्भाग्य−दुश्चिन्तन अकारण सिर पर लादे रहेंगे। इसलिए उचित यही है कि कुछ समय के लिए अपने को अभ्यस्त ढर्रे से विरक्त, वैरागी, संन्यासी बना लिया जाय। यह समय उसी स्तर का जीवनयापन करने में व्यतीत किया जाय। चान्द्रायण की सारी दिनचर्या एवं विधिव्यवस्था योगी−तपस्वी स्तर की है, फिर उसके साथ उसी स्तर का मनोयोग भी क्यों न जोड़ा जाय। शरीर कहीं मन कहीं की विसंगति बनी रही तो उस लक्ष्य की उपलब्धि कैसे हो सकेगी जिसकी आशा अपेक्षा की गई है। भूखा रहकर भगवान से मनमर्जी पूरी करा लेने वाला ‘ब्लैक−मेंलिग, तो करना नहीं–करना हो तो चलता नहीं है। ऐसी दशा में उचित–उपयुक्त यही है कि शरीर चर्या की तरह विचारणा में प्रज्ञा का और अन्तरात्मा में श्रद्धा का उच्चस्तरीय समावेश करने का प्रचण्ड पुरुषार्थ किया जाय। मन उचाटने वाली कुसंस्कारिता को तपस्वी जैसा मनोबल अपनाकर दबाया−दबोचा जाय।

जीवन का कल्प−वृक्ष, उसका दूरदर्शितापूर्ण सदुपयोग−परिवर्तनों का निर्धारण, निर्धारणों का क्रियान्वयन−क्रियान्वयनों को संकल्पपूर्वक अपनाये रहने का साहस−अवरोधों की सम्भावना और उसका निराकरण−परिवर्तन के फलस्वरूप विनिर्मित होने वाला उज्ज्वल भविष्य–यही हैं वे विषय जिन पर उलट–पुलटकर चिन्तन प्रक्रिया को इन दिनों नियोजित रखा जाना चाहिए। यह प्रयास विशुद्ध ध्यान−धारणा भर है। वास्तविक ध्यान−धारणा निर्धारित विषय पर वैज्ञानिकों की तरह तन्मय हो जाने को कहते हैं। तन्मयता अर्थात् रुचिपूर्वक अभीष्ट प्रसंग पर समूचा मनोयोग केन्द्रीभूत रखे रहना। उसी क्षेत्र की अगणित समस्याओं को समझने, समाधान करने में अत्यधिक व्यस्त रहना। ध्यान का तत्वदर्शन यही है। चान्द्रायण साधक आत्म−समीक्षा, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास के चतुर्विधि उत्कर्ष प्रसंगों में निरत रहे, तो समझना चाहिए, कि योगी तपस्वियों के लिए नितान्त आवश्यक ध्यान धारणा का लाभ भी ले रहे हैं।

भावी जीवन की रूपरेखा इन्हीं दिनों बना लेनी चाहिए। साधनाकाल की छुट−पुट समस्याओं का समाधान तो सूत्र−संचालकों के परामर्श−सहयोग से सहज ही पूरा होता रह सकता है। आहार−विहार सम्बन्धी कोई असुविधा हो तो उसका हल निकलने में आवश्यक संकोच के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। उसका अधिक महत्व भी नहीं है। महत्व इस बात का है कि भविष्य निर्धारण क्या हुआ–उसकी रूपरेखा क्या बनी अवरोधों से निपटने की सूझ बूझ किस स्तर तक उभरी–परिवर्तित दिव्य जीवन के लिए व्रतशील रहने का साहस किस सीमा तक परिपक्व हुआ? इन सारे प्रसंगों पर इन दिनों जितना अधिक मन्थन किया जायेगा, उज्ज्वल भविष्य की रूप रेखा उसी अनुपात से बनती और सुनिश्चित होती चली जायेगी।

प्रमुख प्रश्न एक ही है–जीवन सम्पदा की समस्त पूँजी लोभ−मोह और दर्प के त्रिविधि असुरों के कब्जे में पड़ी रहने दी जाय या उनसे कुछ बचाकर आत्म−कल्याण एवं ईश्वर की आशा पूरी करने में भी लगाने का मार्ग निकाल जाय? यदि निकृष्टता ही जीवन का अविच्छिन्न अंग बन गई हो तब तो बात दूसरी है अन्यथा सोचना यह पड़ेगा कि समय, श्रम, चिन्तन, प्रतिभा, सम्पदा जैसे ईश्वर प्रदत्त अनुदानों का सीमित अंश ही निर्वाह−परिवार के लिए खर्च किया जाय। अनिवार्य की पूर्ति ही दृष्टि में रहे तो उपरोक्त सम्पदाओं में से प्रत्येक को उत्साहवर्धक मात्रा में बचाया जा सकता है। इस बचत को उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लगाने पर ही ईश्वर के खेत में पुण्य−परमार्थ बोने और उससे हीरे−मोतियों की फसल उगाने का अवसर मिल सकता है। अनुपयुक्त में कटौती और उपयुक्त के लिए श्रद्धांजलि का एक ही उपक्रम है जिसे अपनाकर महानता की दिशा में बढ़ सकना किसी के लिए सम्भव हुआ है। पूजापाठ से देवताओं को रिझाने और उनकी टोपी, चप्पल उतार लेने का जाल बुनते रहने वाले दिग्भ्रान्तों की पंक्ति में चान्द्रायण के विवेकवान साधकों में से किसी को भी नहीं बैठना है।

कटौती की बचत ही प्रभु समर्पण के काम आती है। इसी से तप और योग का प्रयोजन पूर्ण होता है और आत्मिक प्रगति सम्भव होती है। अपनी समग्र सम्पदाओं का विभाजन−नियोजन करना ही आत्मा और परमात्मा की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है। अध्यात्म के नाम पर प्रचलित छुट−पुट कर्मकाण्डों को हमें आकाश−पाताल जैसा महत्व नहीं देना चाहिए। वे जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने वाली विवेकशीलता एवं साहसिकता उत्पन्न करने वाले नगण्य से व्यायाम निर्देशन मात्र है। उन्हीं को जो साधना मान बैठेंगे, वे किसी दिन तिल का ताड़ मान बैठने वाली अपनी भूल का निश्चय पश्चात्ताप करेंगे। (1) उपासना–परमात्मा की–अर्थात् आदर्शों के लिए आत्म समर्पण की श्रद्धा−भावना। (2) साधना–अन्तरात्मा की। जीवन देवता की। जिसमें कुसंस्कारों से जूझने और सद्गुणों को अभ्यास में उतारने वाला पराक्रम। (3) आराधना– विश्वात्मा की। सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए किया–बरता गया संयम और उदार−अनुदान–यही है संक्षेप में आत्मिक प्रगति की त्रिवेणी जिसमें अवगाहन करने वाले सत्यं शिवं−सुन्दरम्–की पग−पग पर अनुभूति करते हैं। यह सब किस प्रकार बन पड़े–इसका निर्णय महाप्रज्ञा के सहारे ही हो सकता है। अभ्यस्त संकीर्णता तो इसमें कितने ही छद्म रचने और व्यवधान उत्पन्न करने में ही निरत रहती है।

जीवन−साधना मध्यवर्ती मेरुदण्ड है। उसी के साथ उपासना, आराधना जुड़ी हुई है। पापों का प्रायश्चित मात्र उपवास भर से नहीं होता, परिशोधन के लिए जीवन साधना और क्षति पूर्ति के लिए उदार पारमार्थिकता का प्रमाण−परिचय देना पड़ता है। इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखे रहना चाहिए।

चान्द्रायण पूर्ण होने पर घर वापिस पहुँचने पर हर साधक को इस रूप में बदलकर जाना है मानो वहाँ पहुँचते ही संपर्क क्षेत्र के हर व्यक्ति को यह अनुभव विश्वास होने लगे कि जिस ‘कल्प’ प्रयोजन के लिए गए थे, उसे वस्तुतः उपलब्ध करके वापिस लौटा गया है।

जल्दी सोना जल्दी उठना। सूर्योदय से पूर्व नित्य कर्म से निवृत्त होना। दिनचर्या बनाकर काम करना। हाथ में आये काम को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर परिपूर्ण मनोयोग के साथ पूरा करना। आलस्य प्रमाद का तनिक भी आश्रय न देना। स्वभाव में सज्जनता का अधिकाधिक समावेश। अपनी नम्रता और दूसरे का सम्मान प्रकट करने वाला–मधुर सम्भाषण−शिष्टाचार। समय एवं धन का एक छोटा अंश भी व्यर्थ न गँवाना। कुसंग से बचना। स्वाध्याय को दिनचर्या का आवश्यक अंग बनाना। दैनिक उपासना में व्रतशील रहना। आहार में सात्विकता रखना, सादगी अपनाना। अस्वच्छता और अव्यवस्था को बदलने में तनिक भी ढील न होने देना। मिल बाँट कर खाना। हँसते−हँसाते जीना। अपने प्रति कठोर और दूसरों के प्रति उदार रहना। सहायता करने और उदारता बरतने में सन्तोष अनुभव करना। अवाँछनीयताओं के प्रति असहयोग, विरोध एवं संघर्ष की प्रवृत्ति जीवन्त रखना। धैर्य, साहस और विवेक के तीन मित्रों का कभी साथ न छोड़ना। जैसे थोड़े से ही जीवन−सूत्र हैं जिन्हें व्यवहार में उतारने पर व्यक्तित्व में प्रखरता आती है, प्रामाणिकता बढ़ती है, फलतः प्रगति पथ पर तेजी से बढ़ चलने का सुअवसर मिलता है। सफलताएँ, सहायताएँ एक के बाद एक अनायास ही खिंचती चली आती हैं। व्यावहारिक नकद धर्म है जिसका प्रतिफल हाथोंहाथ मिलता है। जीवन साधना को ही व्यावहारिक योगाभ्यास एवं तपश्चर्या माना गया है। इसका माहात्म्य आकाश−पाताल की काल्पनिक उड़ानों की तुलना में कहीं अधिक है। इस मार्ग पर चलते हुए परिष्कृत दृष्टिकोण पर आश्रित स्वर्ग और व्यापक आत्मीयता की उपलब्धि जीवन−मुक्ति का आनन्द हर घड़ी मिलता है। महामानवों में से प्रत्येक को जीवन साधना तो अनिवार्यतः करनी पड़ी है। इससे बच निकलने का और कोई ‘शार्टकट’ है नहीं।

आत्म−कल्याण के लिए जीवन साधना और विश्व−कल्याण के लिए परमार्थ की आराधना–इन दोनों के मिश्रण से उस सच्ची भक्ति −भावना का उदय अनुभव होता है जिसके द्वारा आत्म−दर्शन और ईश्वर

दर्शन के दोनों ही प्रयोजन सधते हैं। परमार्थ बातों के बताशे बनाने से नहीं सधता, उसके लिए समयदान−अंशदान का एक महत्वपूर्ण भाग निकालना ही होता है। संचय का विभाजन करते समय उत्तराधिकारियों को ही नहीं–लोक मंगल को भी परिवार का एक सदस्य माना जाय और जिस तरह परिजनों का खर्च उठाना पड़ता है उसी प्रकार परमार्थ को भी एक सदस्य मानकर उसके लिए भी उतना ही दुलार अनुदान दिया जाय, जितना कि परिजनों के लिए किया जाता है। चान्द्रायण काल में भावी रीति−नीति ऐसी बनाकर लौटना चाहिए जिससे उपासना, साधना एवं आराधना की सुगन्धित शोभा सुषमा के सहारे उल्लसित रहने और प्रमुदित करने की प्रक्रिया सहज ही सधती रहे।

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