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Magazine - Year 1982 - Version 2

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आरोग्य शास्त्र का पूरक ज्योतिर्विज्ञान

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ऋतु परिवर्तन के साथ−साथ मनुष्य की अपनी गतिविधियों में उपयुक्त अन्तर करना पड़ता है। सोने का स्थान, कपड़े, पंखे, हीटर आदि का उपयोग सर्दी और गर्मी की ऋतुओं में भिन्न प्रकार से होता है। आहार की मात्रा एवं प्रकृति में अन्तर आता है। किसानों की बौने काटने की सारी कार्य पद्धति महीने के अनुसार निर्धारित रहती है। वर्षा में छत्त छप्पर सँभालने की खेतों की मेड़ बाँधने की धुन रहती है। गर्मी में आँधी तूफानों से बचाव करना पड़ता है। विद्यार्थी जाड़े के दिनों में देर तक पढ़ते है, पहलवानों को उन्हीं दिनों कसरत बढ़ाते देखा जाता है। पशु पक्षियों का कुदकने फुदकने और घरौंदों में मुंह छिपाकर बैठे रहने का मौसम होता है। बसन्त में कुछ ऐसा वातावरण होता है जिसमें वनस्पतियाँ फूलती और मादाएँ गर्भ धारण करती है। यह सारे परिवर्तन ऋतु परिवर्तन की प्रकृति सूचना के अनुसार होते रहते है। कृमि कीटकों से लेकर वृक्ष वनस्पति तक इस परिवर्तन प्रवाह से बेहतर प्रभावित होते है। फिर मनुष्यों का तो कहना ही क्या। मक्खी मच्छर वर्षा के दिनों में सर्वत्र छाये रहते है, पर शीत ऋतु में उनके दर्शन दुर्लभ रहते है।

यदि कोई ऐसी मूढ़मति हो जिसे ऋतुओं का समय, परिवर्तन एवं प्रभाव विदित न हो और वह उनके अनुरूप सुरक्षा एवं उपलब्धियों के लिए पूर्व तैयारी न करे तो समझना चाहिए कि उसका निर्वाह कठिन पड़ जायगा और अप्रत्याशित संकटों का सामना करना पड़ेगा। बुद्धिमत्ता के महत्वपूर्ण पक्षों में एक यह भी है कि ऋतु प्रभाव को समझें और तद्नुसार तालमेल बिठाने की दूरदर्शिता बदले।

ऋतु प्रभाव क्या है? अन्तरिक्ष से ग्रहों की स्थिति का हेर−फेर। सूर्य अपनी पृथ्वी को प्रभावित करने वाला प्रधान ग्रह है। पृथ्वी भी एक ग्रह है। दोनों ही अपनी धुरी तथा कक्षा में भ्रमण करते हैं। इस गति क्रम में जो उतार−चढ़ाव आते है। उसी की रात दिन—सर्दी गर्मी, वर्षा, बसन्त आदि के रूप में जाना जाता है पानी बरसने से लेकर भूकम्प तूफान आने तक की अनेकों प्रकृति विचित्रताएँ इसी आधार पर घटित होती रहती है। इनका मनुष्य,वनस्पति, प्राणी तथा परिस्थितियों पर कितना प्रभाव पड़ता है और उससे कितनी सुविधा असुविधा बढ़ती है उसे कौन नहीं जानता। संक्षेप में निर्जीव दीखने वाले और एक दूसरे से बहुत दूर रहते हुए—अपने अपने रास्ते चलते हुए एक दूसरे पर कितना प्रभाव छोड़ते है। इसे बारीकी से देखा समझा जाय तो कोई विचारशील आश्चर्यचकित हुए बिना न रहेगा।

यह मोटी जानकारियाँ हुई। अब तनिक और गहराई में उतरा जाये तो प्रतीत होगा कि ग्रह प्रभाव से न केवल धरती का वातावरण प्रभावित होता है वरन् मनुष्य का स्वास्थ्य और स्वभाव भी समुद्री ज्वार भाटे को किसी अदृश्य प्रवाहों से प्रभावित होकर झूले झूलता रहता है। माना कि ग्रहों का प्रभाव बदल सकना मनुष्य के हाथ की बात नहीं है। इतने पर भी उस जानकारी के आधार पर बचाव करने तथा लाभ उठाने की वैसी ही पूर्व योजना बनाई जा सकती है जैसी कि आमतौर से मौसम बदलने की बात को ध्यान में रखते हुए क्रिया−कलापों में तद्नुरूप परिवर्तन किये जाते रहते है।

स्वास्थ्य के प्रसंग में ग्रहों को—मौसम के प्रभाव को—यदि समझा जा सकें तो खतरे से बचने और अवसर के अनुकूल लाभ उठाने की सुविधा हर किसी को मिल सकती है।

चरक सूत्र—अ. 6।4 के अनुसार ऋतुओं के अनुरूप आहार−विहार में परिवर्तन करते रहने से ही स्वास्थ्य और निरोग रहा जा सकता है। चरक ने ऋतुओं के विभाग के अनुसार वर्ष को छः अंग और छः ऋतुओं में विभाजन किया है। [1] माघ−फाल्गुन को शिशिर [2] चैत्र बैसाख को बसन्त [3] ज्येष्ठ, आषाढ़ को ग्रीष्म [4] श्रावण,डडडड डडडड डडडड डडडड डडडडड डडडड भाद्र पक्ष को वर्षा [5] आश्विन, कार्तिक को शरद [6] अगहन, पौष को हेमन्त ऋतु समझा जा सकता है। यह विभाजन सुश्रुत संहिता के अनुसार किया गया है।

आयुर्वेद में ज्योतिर्विद्या का विशद वर्णन मिलता है। दिन रात और ऋतुओं आदि का प्रभाव प्राणियों एवं वनस्पतियों पर समान रूप से पड़ता है। आयुर्वेद शास्त्र के आचार्य इस तथ्य से परिचित थे कि इन परिवर्तनों का मूल कारण पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र और वायु की गति विशेष है। चरक संहिता के अनुसार वनस्पतियों में से सौम्य अंश सूख जाने से इनमें तिक्त, कषाय और कटु रस की क्रमशः वृद्धि होती है तथा प्राणियों में रुक्षता अधिक पायी जाती है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य पृथ्वी का जलीयाँश ले लेता है तथा वायु तीव्र और रुक्ष होकर संसार के स्नेह भाग का शोषण करती है परिणाम स्वरूप शिशिर बसन्त और ग्रीष्म इन तीनों ऋतुओं में रुक्षता उत्पन्न हो जाने से तिक्त, कषाय और कटु रसों की वृद्धि से मनुष्य शरीर में दुर्बलता आती है।

बसन्त ऋतु में जब सूर्य मीन और मेष राशि पर रहता है सूर्य की उष्णता बढ़नी आरम्भ होती है। फलतः दुर्बलता एवं व्याधियों का बढ़ना भी यही से आरम्भ होता है। ग्रीष्म ऋतु में जब सूर्य वृष और मिथुन राशि पर आता है तो उसकी किरणें अत्यन्त प्रखर हो जाती है जिससे भूमण्डल के सभी पदार्थों में कटु रस की वृद्धि होती तथा प्राणियों में रुग्णता और दुर्बलता सर्वाधिक बढ़ती है।

सूर्य और चन्द्र की गति और स्थिति का पृथ्वी की वनस्पतियों और प्राणियों पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों की रोकथाम के लिए ऋतुओं के अनुरूप आहार−विहार में हेर−फेर करने का आयुर्वेद में ‘विस्तृत वर्णन आता है। मनीषी सुश्रुत के अनुसार—

हेमन्त ऋतु में सामान्यतया शरीर की जठराग्नि सशक्त रहती है। इन दिनों वायु का प्रकोप अधिक रहता है। स्निग्ध पदार्थ स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते है।

शिशिर ऋतु में कटु, तिक्त, कषाय रसों से युक्त बात वर्धक पदार्थों का सेवन वर्जित है।

हेमन्त ऋतु में संचित हुआ कफ बसन्त ऋतु में सूर्य किरणों से प्रभावित होकर जठराग्नि को मन्द कर देता है अतः अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते है। अतः स्निग्ध और अम्लीय पदार्थों का सेवन वर्जित है पुराने अन्न का सेवन लाभकारी है।

ग्रीष्म ऋतु में शरीर में स्निग्धता का अभाव पड़ जाता है। इस काल में स्निग्ध पदार्थ, मधुर रस, घी, चावल आदि का सेवन अधिक करना चाहिए, लवण, अम्लीय तथा कटु रस वाले पदार्थों का सेवन हानिकारक है।

वर्षा ऋतु में जठराग्नि सर्वाधिक दुर्बल रहती है। रोगों की बहुलता भी इसी कारण इन्हीं दिनों देखी जाती है। दिन में सोना, धूप में बैठना वर्जित है। पुराने जौ, गेहूँ का प्रयोग लाभप्रद है। अम्लीय लवण से युक्त, स्निग्ध पदार्थों की बहुलता स्वास्थ्य रक्षक है।

शरद ऋतु में वर्षा ऋतु में संचित पित्त प्रकुपित रहता है, वसा, क्षारीय एवं दही का सेवन वर्जित है।

पश्चिम जर्मनी, ‘वोकुम’ स्थित वेधशाला के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. हाइन्ज कामिस्की के अनुसार हर नवें ग्यारहवें, अठारहवें वर्ष सूर्य के धरातल पर भंसकर विस्फोट होते हैं। इस सदी में किए गये अध्ययन के अनुसार विस्फोटों की तीव्रता में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। सन् 1972 अगस्त माह में सूर्य पर एक विस्फोट हुआ जो करोड़ों हाइड्रोजन बमों की शक्ति के बराबर था।

इस विस्फोट की घातक तरंगें बाह्यावरण आयनोस्फियर को चीरकर पृथ्वी पर पहुंची जिनका घातक प्रभाव पृथ्वी के वातावरण, वृक्ष वनस्पतियों एवं जीवों पर भी पड़ा। प्रो. हाइन्ज के अनुसार कैंसर, हृदय रोग, रक्त चाप जैसी बीमारियों में अभिवृद्धि का एक कारण सूर्य का विषैला प्रभाव है। प्रो. कामिस्की का मत है कि यदि उस समय कोई अन्तरिक्ष यात्री अन्तरिक्ष में रहा होता तो एक्स किरणों से उसकी तत्काल मृत्यु हो सकती थी।

अमेरिका के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. स्टीफन कोजेन ने बताया है कि मौसम का प्रभाव सुनिश्चित रूप से औषधि पर व उसे लेने वाले पर पड़ता है। न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित एवं इण्डियन एक्सप्रेस 7 अगस्त 1981 द्वारा उद्धृत इस समाचार के अनुसार जिसने औषधि सेवन में मौसम की अवहेलना की—उसे या तो दुष्परिणामों या मृत्यु का सामना करना पड़ा है। मौसम से उनका मतलब है गृह नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार पृथ्वी पर संभावित वातावरण में परिवर्तन। यदि सूखी गर्म जलवायु में बिना सोचे समझे व व्यक्ति का पूरा निरीक्षण किये आँख में एट्रोपीन नामक दवा डाल दी जाय, जो पुतलियों को चौड़ा करती है, तो शरीर के तापमान नियमन की व्यवस्था छिन्न−भिन्न हो जाती है एवं हीट स्ट्रोक से रोगी की मृत्यु हो सकती है। दोष यहाँ लू को देकर छुट्टी पा ली जाता है जबकि उत्तेजक कारण था जलवायु का ध्यान रखें बिना एण्टी कोलिनर्जिक औषधि दे देना।

पिछले दिनों तीन मानसिक रोगी न्यूयार्क के एक अस्पताल में अप्रत्याशित रूप से मृत पाये गये। उन्हें जो एण्टी सायंकोटिक औषधियाँ दी गयीं उन्होंने उन रोगियों को वातावरण से जूझने की क्षमता को नष्ट कर दिया एवं वे जरा से मौसम परिवर्तन को भी सहन न कर पाये। डॉ. रोजेक का कहना है कि पहले से रोगी की मनःस्थिति व वातावरण में संभावित परिवर्तनों का ज्योतिर्विज्ञान के आधार पर एक चार्ट बना लेना चाहिये तथा तभी औषधि दी जानी चाहिये जब उसे मौसमीय प्रतिकूलताओं से लड़ने के लिये बाध्य न होना पड़े।

डॉक्टर रोजेक का कहना है—कि कितने व्यक्ति जानते हैं कि—दवा की पोटेन्सी, दुष्प्रभाव व वाँछित प्रभाव मनुष्य के पर्यावरण पर पूर्णरूपेण निर्भर है। मौसम परिवर्तन के अनुसार ही औषधियाँ अपने प्रभाव बनाती हैं। यही बात कुछ एण्टी बायोटिक, कुछ एलर्जी की औषधियों एवं कुछ तनाव शामक औषधियों पर भी लागू होती है।

रोगों के निराकरण, आरोग्य सम्वर्धन के संदर्भ में जहाँ आहार−बिहार परिचर्या उपचार पर ध्यान दिया जाता है वहाँ इस तथ्य को भी नजर अंदाज किया जाना चाहिए कि अन्तरिक्षीय परिस्थिति से भी मानवी स्वास्थ्य के बनने बिगड़ने का बहुत कुछ सम्बन्ध है उस विवशता को भाग्यवाद के समर्थन में तो प्रस्तुत किया जाय पर सतर्कता एवं चेष्टा के अन्याय उपाय सोचते समय एक मार्ग यही भी जुड़ा रखा गया जाय कि अंतरिक्षीय स्थिति से अवगत रहा जाय और उस आधार पर पड़ने वाले प्रभाव के अनुकूलन का प्रयत्न उठा न रखा जाय। इस आवश्यकता की पूर्ति आरोग्य शक्ति के साथ−साथ ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी रखने से ही हो सकती है।

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