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Magazine - Year 1982 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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अपनों से अपनी बात - जागृत आत्माएँ भाव−भरे अनुदान प्रस्तुत करें

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प्रज्ञा परिवार उत्कृष्टता में रुचि लेने वाले विवेकवान,दूरदर्शिता को प्रश्रय देने वाले और आदर्शों के लिये सक्रियता अपनाने वाले ऐसे लोगों का समुदाय है जिनकी प्रकृति को दैवी कहा जा सकता है। जब−जब भी महत्वपूर्ण समय आते हैं, ऐसे ही परिकरों की खोजबीन की जाती है और उसमें से उपयोगी तत्व ढूंढ़ निकाले जाते हैं। मोती समुद्र में हर जगह नहीं मिलते। उनके कुछ विशेष क्षेत्र होते हैं। बहुमूल्य धातुओं की खदानें एवं तेल के कुएँ कहीं−कहीं ही मिलते हैं। सन्त अलख जगाने तो गली मुहल्लों में सर्वत्र जाते हैं। पर द्वार उन्हीं का खटखटाते हैं, जहाँ से कुछ सहानुभूतिपूर्ण उत्तर की अपेक्षा हो।

अब तो परिवर्तन की प्रचण्ड बेला आ पहुँची। इन दिनों बड़े कदम उठाने हैं, बड़े उत्तरदायित्व सौंपने हैं एवं इसके लिये भारी—भरकम व्यक्तित्व ढूंढ़ने या बनाने हैं। इन दिनों महाकाल द्वारा ऐसे ही व्यक्तियों की खोजबीन चल रहीं है जिनमें महानता को अवधारणा करने की पात्रता, प्रामाणिकता और सुसंस्कारिता के तत्व उपयुक्त मात्रा में विद्यमान हों। व्यक्तित्व कुछ ऐसे विनिर्मित होने हैं जो न केवल स्वयं पार हों, वरन् अपनी डोंगी पर लादकर असंख्यों को पार कर सकें। प्रज्ञा परिवार ऐसी ही प्रसुप्त, पर व्यक्तित्व सम्पन्न आत्माओं से सुसम्पन्न हैं, पर अब इन वरिष्ठों को अपनी बाल−क्रीड़ा समाप्त करके वयस्कता के साथ−साथ कन्धों पर आने वाली जिम्मेदारियाँ उठानी चाहिए। आह्वान आमन्त्रण के स्वर प्रस्तुत बसन्त पर्व पर विगत दो वर्षों की तुलना में अधिक प्रखर हुए हैं। समझाने−बुझाने की प्रक्रिया झकझोरने—चिकौटी काटने से लेकर जहां आवश्यकता थी, कान पकड़ने तक आ पहुँची है। इतिहास में ऐसे अनेकों व्यक्तियों, अवसरों एवं घटनाओं का उल्लेख है जिनमें स्वेच्छाक्रम से थोपी गयी प्रेरणा ने अधिक बड़ी भूमिका निभाई है। लगता है ऐसा ही कुछ फिर से होने जा रहा है।

प्रज्ञा, परिजनों में से एक हजार ऐसों को समग्र समय के लिये आमन्त्रित किया गया है जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व हल्के हैं और जो अपनी वरिष्ठता एवं प्रतिभा लोक मानस को मोड़ने-मरोड़ने में समर्थ हो सकते हैं। युग सृजन के लिये न तो पलायनवादी चाहिए न आलसी−न प्रतिभा रहित ही। वे ऐसे होने चाहिए जा अपनी समर्थता और दूसरों की महानता दोनों कसौटियों पर खरे उतर सकें। उन्हें जमकर मन लगाना और स्वेद बहाना हैं। चंचल चित्त लोगों को नहीं, इन दिनों अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए उन्हें बुलाया गया है जो अंगद की तरह दुर्धर्ष रावण के समझ अपना पैर गाड़ सकें और भगीरथ जैसा करने−मरने का व्रत ले सकें।

उन्हें क्या करना होगा, उसका निर्णय सबके लिए एक नहीं हो सकता। व्यक्ति की योग्यता और मिशन की आवश्यकता का तालमेल बिठाते हुए यह निर्णय किया जा सकेगा कि किसे क्या कार्य सुपुर्द किया जाय। हर लोक सेवी को बिना किसी काम को छोटा−बड़ा अनुभव किए वैसा ही निरभिमानी,कर्त्तव्यनिष्ठ होना चाहिए जैसा कि एक आदर्श स्वयंसेवक को होना चाहिए। गाँधी जी के आश्रम में टट्टी साफ करने का काम बिना हिचक के करना पड़ता था। ऊँचे कामों की माँग करने वाले और निम्न स्तर के समझे जाने वाले कामों में अरुचि दिखाने वालों को अपनी महत्वाकांक्षा अन्यत्र पूरी करना चाहिए। लोक सेवा का क्षेत्र उनके लिए है ही नहीं। मान और पद के लिये जिस प्रकार राजनैतिक क्षेत्रों में आए दिन विग्रह खड़े होते रहते हैं, वैसी परम्परा से नव सृजन का क्षेत्र तो बचाया ही जाना चाहिए। जिन

एक हजार का आमन्त्रण किया जा रहा है उनका स्तर ऐसा नहीं चाहिए जिसे सुधारने के लिए अनगढ़ बन्दरों को लकड़ी के बल पर सिखाने की व्यवस्था संचालकों को करनी पड़े। इन दिनों तो सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता है, जो हाथ बँटा सके और बिगड़ी बना सकें। ऐसी प्रकृति प्रायः जन्मजात होती है। सिखाने का काम तो हीरे की खराद कर चमका भर देने का है। कौए को कबूतर में कैसे बदला जाय?

युग निर्माण मिशन को आगामी दिनों विश्व की महती समस्याओं को सुलझाने के लिए व्यापक वातावरण बनाना है—नव सृजन की प्रचण्ड चेतना उत्पन्न करनी है। प्रज्ञा संस्थानों के माध्यम से शक्ति संचय की प्रारम्भिक प्रक्रिया पंच सूत्री योजना के रूप में आरम्भ की गयी है। इसे कलम पकड़ने, वर्णमाला सीखने जैसी प्राथमिक आवश्यकता घोषित किया गया है। जो इतने सरल प्रयोजनों को भी हाथ में न ले सकेंगे, उनके कंधों पर बड़े उत्तरदायित्व सौंपने की व्यवस्था कैसे बनेगी?

कुछ ही दिनों बाद साक्षरता संवर्धन, वृक्षारोपण, सृजन प्रयोजनों के लिये अंशदान, विवाहोन्माद जैसी कुरीतियों का उन्मूलन, शिक्षा व्यवसाय का उच्छेदन, नशेबाजी पर कुठाराघात, पर्दा प्रथा और जाति गत ऊँच−नीच की मान्यता की अन्त्येष्टि, आलस्य−प्रमाद को अपराधों के हेयवर्ग में सम्मिलित करना मुफ्तखोरी और हरामखोरी को चोरी−डकैती स्तर की भर्त्सना से लाद देना, प्रजनन के सीमा बन्धन कड़े करना जैसे अनेक कार्यों को जन सहयोग एवं शासन व्यवस्था के माध्यम से सम्पन्न कराने के लिए विशालकाय काम हाथ में लिये जाने और उन्हें पूरा कर दिखाने के लिये हर स्तर के साधन जुटाने होंगे।

“वसुधैव कुटुम्बकम्” के आदर्श को क्रिया रूप देने और आत्मवत् सर्वभूतेषु, की स्नेह−सम्वेदना जन−जन के मन−मन में लगाने की युगान्तरीय चेतना का सरंजाम जुटाने के लिए कि तने प्रकार के, कितने स्थानों पर, कितने स्तर के ढांचे खड़े करने होंगे। इसका आज तो संकेत ही किया जा सकता है। समय आने पर वे सभी कार्य प्रायः उसी स्तर पर चल पड़ेंगे जिस प्रकार कि सरकार पंचवर्षीय योजनाएँ हाथ में लेती है और महायुद्ध के दिनों में समस्त साधनों को सुरक्षा के मोर्चे पर जुटाया जाता है। जिन्होंने भी कभी बड़े काम हाथ में लिए है और पूरे कराये हैं, वे ही जानते हैं कि ‘सृजन शब्द की व्याख्या, विवेचना, योजना, तैयारी किस स्तर की होती है और उसे कितनी क्षमता सम्पन्न जनशक्ति तथा कितने प्रचार साधनों द्वारा सम्भव किया जाता है।

एक राष्ट्र, एक भाषा, एक नीति, एक व्यवस्था के एकता सूत्र में 450 करोड़ों को बाँध देना, उनकी विषमतावादी उलटी मान्यताओं को उलट कर सीधी कर देना ऐसा कार्य है जिसे आज की स्थिति में असम्भव ही कहा जा सकता है ऐसी दिशा में निराशा में आशा की एक ही किरण ज्योतिर्मान होती दिखाई देती है कि सृष्टा ने समय−समय पर असंतुलन पर निभाई है। सृष्टि महान है। सृष्टा और भी महान है। फिर उसका संकल्प तो इतना सक्षम है कि राई को पर्वत बनते देर नहीं लगती।

प्रज्ञा परिवार से एक हजार जागृतात्माओं की सृजन प्रयोजनों के लिए माँग की गयी है। उनकी पूर्ति इस देव समुदाय में से सहज ही हो जाने की आशा है। इन्हें आकर तत्काल जो कार्य हाथ में लेने हैं, उनमें तीन प्रमुख हैं—(1)प्रज्ञा संस्थानों के समीपवर्ती क्षेत्रों में लोक शिक्षण आयोजनों की प्रव्रज्या(2)शाँतिकुञ्ज में प्रशिक्षण की बहुमुखी व्यवस्था (3) साहित्य सृजन में सहयोग। ये तीनों ही कार्य ऐसे हैं जिनके लिए पूरी तरह से स्वयं को झंझटों से मुक्त कर यहाँ आना होगा। सुविधाओं की दृष्टि से कुछ कमी तो यहाँ रहेगी ही क्योंकि यह ऋषि आश्रम है, होटल नहीं। जो पूरा समय नहीं दे सकते, वे घर रहकर भी समीपवर्ती क्षेत्र में सेवा साधना का नियोजन कर अपना योगदान देते रह सकते हैं। जो कुछ भी समय नहीं दे सकते हैं। जो कर रहे हैं, उनके लिए निर्वाह के साधन जुटा देना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आशा है महाकाल का यह आमन्त्रण अनसुना उपेक्षित नहीं रहेगा।

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