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Magazine - Year 1982 - Version 2

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डडडड काया की सूक्ष्म आध्यात्मिक संरचना - एक वैज्ञानिक विवेचना−2

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मानव शरीर के अन्दर भरी पड़ी प्राणाग्नि के भाण्डागार की जानकारी विज्ञान जगत को आधुनिक उपकरणों की सहायता से आज मिल पायी है। इस सम्बन्ध में उपनिषद्कार पहले ही लिख चुके हैं—

“प्राणाग्नये वासिमन ब्रह्मपुरे जागृति”

अर्थात्—इस ब्रह्मपुरी यानी शरीर में प्राण ही कई तरह की अग्नियों के रूप में जलता है। (प्रश्नोपनिषद्)

प्राण को अंगारा व प्राणाग्नि को उससे निकलने वाली ताप ऊर्जा−धधकती लौ के रूप में समझा जा सकता है। जड़−जगत में वेव− क्वांटम (तरंगों) के रूप में तथा चेतन जगत में विचारणा एवं सम्वेदना के रूप में व्याप्त यह प्राण−प्रवाह वस्तुतः विद्युत ऊर्जा का सूक्ष्मतम स्वरूप है। अदृश्य अन्तरिक्ष जगत से अनुदान रूप में प्राप्त ब्राह्मी प्राणशक्ति को मानव शरीर सतत् ग्रहण करता—अवशोषित करता तथा निस्सृत करता रहता है। इसका संचय ही प्राण निग्रह कहलाता है जो व्यक्ति को ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी, बना देता है। क्षरित होने पर यही शिथिल जीवनी शक्ति, निरुत्साह, रुग्णता, हताशा, अवसाद के रूप में प्रकटीकृत है।

प्रश्न यह उठता है कि इस विद्युत भण्डार के अपने शरीर में संव्याप्त होने पर भी हम उसे जान क्यों नहीं पाते? बिजली के नंगे तार को छू लें तो ‘शँट’ लगता है। उसमें तो कुछ ही ‘वाल्ट’ की विद्युत प्रभावित होती है जबकि मानव शरीर में तो 1 लाख वोल्ट प्रति सेण्टीमीटर का विद्युत दबाव होता है। इतनी महत् शक्ति वाले संस्थान को तो एक विशाल बिजली घर की ही संज्ञा दी जा सकती है। फिर शरीर की विद्युत वैसा झटका क्यों नहीं देती, जैसा बिजली का तार देता है− अथवा उसे हम जान क्यों नहीं पाते? इसका उत्तर एक ही है−मानवी विद्युत का मात्र थोड़ा-सा अंश ही व्यावहारिक रूप से काम में आता है। नियन्ता ने इस विद्युत को चक्रों, ग्रन्थियों उपत्यिकाओं में—जीवकोष ऊतकों में कैद कर रखा है। इस इन्सुलेशन के हटने पर ‘लीक’ हो रहे तार की तरह शरीर भी कभी−कभी झटका देने लगता है और आँटोकम्बशन, शरीर से स्फुल्लिंगों का चमक उठना, प्रसिद्ध महिला जेनीमार्गन की तरह छूने वालों को तेज शॉट देकर गिरा देना—(अखण्ड−ज्योति जनवरी 81), इन माध्यमों से अपने अन्दर छिपे विद्युत्भण्डार का परिचय दे उठता है। वस्तुतः यह सूक्ष्म विद्युत शक्ति का स्थूल परिचय मात्र है। भण्डार तो इतना सामर्थ्यवान है कि उसे मापा जाना उपकरणों से सम्भव नहीं।

हृदय की धड़कन, माँसपेशियों का आकुँचन−प्रकुचन आँतों की गतिविधियाँ, मस्तिष्क में सन्देशों का आवागमन, अंतःस्रावी ग्रन्थियों से रस स्राव, अस्थिविकास आदि शरीर व्यापार विद्युत शक्ति की ही चमत्कृति हैं। स्वादेंद्रियों से रसों का रसास्वादन, नासिक से ग्रहण किये जाने वाले आहार की गन्ध व लार का टपकने लगना आदि संवेदन ग्रहण करके प्रतिक्रिया उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में भी विद्युतीय शक्ति अपना खेल दिखाती है। आँखों में बाह्य प्रकाश के रेटिना से टकराने पर रेटीना के कोषों का विद्युतीय सन्तुलन जिस प्रकार बदलता है—वही दृश्यों के मानस पटल पर बनने का कारण बनता है। इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम, इलेक्ट्रोएनसेफेलोग्राम, इलेक्ट्रोमायोग्राम, इलेक्ट्रोरेटीनोग्राम, इलेक्ट्रो आँक्युलोग्राम, स्किनरेसीस्टेन्स आदि से तो क्रमशः हृदय, मस्तिष्क, माँसपेशियों, आँख का रेटीना, आँखों की गतिविधि, त्वचा प्रतिरोध के रूप में विद्युत का एक आँशिक भाग ही मापा जाता है। इन्हीं का मापन कर चिकित्सक, शोध−अन्वेषक शरीर की प्राण शक्ति की न्यूनाधिकता तथा रोगों की उत्पत्ति का कारण बताते हैं।

अब पता चला है कि शरीर में जो विद्युत का असीम भण्डार है वह मनुष्य एक विद्युतचक्र के माध्यम से सतत् अवशोषित कणों के रूप में बनाये हुए हैं। विद्युत आवेशधारी कण वायु−मण्डल की गैसों में घुल होते हैं। इस विद्युत आवेश का कारण है—सौर ऊर्जा अन्तरिक्षीय किरणें जिनके स्रोतों की अभी वैज्ञानिकों को जानकारी नहीं, तथा धरती की स्वाभाविक रेडियो धर्मिता। विद्युत आवेशधारी वे अणु−परमाणु ‘आयान’ कहलाते हैं और हर श्वास के साथ मनुष्य के फेफड़ों में प्रवेश करते रहते हैं। इन मानवी अंगों की विशेषता है कि वे ऋण आवेश वाले आयनों को ही सोखते हैं और फेफड़ों से रक्त में प्रवेश कर यह ऋण विद्युत शरीर के सभी भागों में फैल जाती है और शरीर के सभी कोष और ऊतक अपनी−अपनी संधारक क्षमता (केपेसीटी) के अनुसार इसे संचित कर लेते हैं। यदि क्षरण की गति (श्वास से, अत्यधिक श्रम से, अनिद्रा से या असंयम के कारण—वाणी, स्वाद, जननेंद्रिय)। संचय से अधिक न हुई तो शरीर के सभी ऊतक विद्युत संतृप्त हो जाते हैं और धीरे−धीरे विद्युत आवेश उस व्यक्ति जीवधारी की त्वचा से बाहर निकलने लगता है। जिसे डॉ. किलनर ने ‘आँरा’ के रूप में मापा व क्वान्टीफाम किया है, जिसे थियाँसाफी वाले इथरिकडबल व अध्यात्मवादी प्राण शरीर कहते हैं, वह यही शरीर से निरन्तर उत्सर्जित विद्युतधारा ही है। अवशोषण, संतृप्तीकरण व उत्सर्जन तीनों मिलकर एक विद्युतचक्र बनाते हैं। सभी जीवधारियों में यह बराबर चलता रहता है, मात्र मनुष्य को एक अतिरिक्त विशेषता प्राप्त है। इसे अतिरिक्त मात्रा में संचित कर अपने प्रसुप्त केन्द्रों को जगा लेने व इस विद्युत से स्वयं ही नहीं औरों को लाभान्वित कर सकने की क्षमता न्यूनाधिक रूप में हर मनुष्य में होती है। यह बात अलग है कि उसका प्रयोग—सदुपयोग बहुत कम कर पाते हैं अथवा जानकारी के अभाव में इसका सतत् दुरुपयोग करते रहते हैं।

विद्युत चयापचय की आधुनिकतम जानकारी का मूल स्रोत फ्राँस की स्ट्रासबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रो. फ्रेड ब्लेज रहे हैं जिन्होंने अपना शोध प्रबन्ध ही इस विद्युतचक्र पर लिखा है। अपनी पुस्तक “दी बायोलॉजिकल कन्डीशन्स क्रिएटेड बाय द इलेक्ट्रीकल प्रोपर्टीज ऑफ द एटमोस्फियर” में उन्होंने इस सम्बन्ध में अपने प्रयोगों पर विस्तार से लिखा है। 75 हजार अरब कोषों के समन्वय से बनी मानवी काया को उन्होंने इस चक्र के आधार पर चलता−फिरता बिजली घर बताया है तथा इसके सुनियोजन की भारतीय अध्यात्म में वर्णित प्राण विद्या की चर्चा करते हुए कहा है कि यदि ‘हाइडल पॉवर’ की तरह चक्र रूपी ‘टर्बाइन्स’ चलाये जा सकें तो इस आदान−प्रदान को बढ़ाया व अनेक अतिमानवों शक्तियों को जगा पाना सम्भव है।

डॉ. हिरोशी मोटोयोमा, जो जापानी वैज्ञानिक समुदाय में एक विवादास्पद चिकित्सक माने जाते रहे हैं ने शरीर की इस विद्युत पर शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया है। वे एक अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न जापानी महिला ‘ओडाइसामा’ द्वारा पाले गये। इस महिला की इस शताब्दी की विगत की कई भविष्यवाणियाँ बाद में सत्य सिद्ध हुई। अध्यात्म विद्या व झेन योग पर गहरा विश्वास रखने वाली इस महिला के संरक्षण में रहकर उन्होंने टोक्यो यूनिवर्सिटी से साइकोलॉजी व फिजियोलॉजी में क्रमशः एम. ए. व एम. डी. करके ड्यूक यूनिवर्सिटी (प. जर्मनी) में परामनोविज्ञान पर शोध कार्य किया। अपनी संरक्षिका की मृत्यु के बाद 1974 में उन्होंने उनकी इच्छानुसार एक संस्था टोक्यो में स्थापित की − “इन्स्टीट्यूट फाँर रिलीजन एण्ड साइकोलॉजी”। अदृश्य सूक्ष्म अन्तःशक्तियों का कैसे उद्घाटन व मापन किया जाय—इसी पर उन्होंने अपने शोधकार्य को केन्द्रित किया।” “कम्पेरेटिव स्टडीज ऑफ इर्स्टन एण्ड वेर्स्टन मिस्टीसीज्म”, “द वल्ड ऑफ रिलीजस एक्सपीरीयेन्सेस” तथा “साइन्स एण्ड इवाँल्यूशन ऑफ काँशसनेस” ये तीन पुस्तकें उन्होंने अपने गहन अध्ययन के आधार पर लिखी हैं। इसके लिये उन्होंने उपनिषदों, प्राणयोग, पातंजलि के योगदर्शन तथा चीनी चिकित्सा पद्धति का विशद मंथन किया व अपने निष्कर्षों के आधार पर उन्होंने कुछ उपकरण अपनी ही प्रयोगशाला में बनाये जिनसे सूक्ष्म विद्युत का मापन व चक्रों की हलचलों का ग्राफिक अंकन डडडड जा सके। यह तो वे भी जानते थे कि चक्र− उपत्यिकाएं स्थूल अंग नहीं वरन् उस स्थान विशेष से भँवर−चक्रवात यानी विद्युत संतृप्तीकरण के कारण उठ रहे आभा मण्डल का ही दूसरा नाम है। तो फिर मापन कैसे? उन्होंने विभिन्न अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न व पंचकोशी जागरण की साधना कर रहे तिब्बती लामाओं पर प्रयोग किए तथा अपने सूक्ष्म उपकरण से उनके ‘आँरा’ व विद्युत शक्ति के स्थान विशेष पर केन्द्रीभूत हो जाने की प्रतिक्रिया को मापा।

अपने विशद प्रयोगों को उन्होंने जिस उपकरण से सम्पादित किया, उसे ‘चक्रा’ मशीन नाम दिया। सूक्ष्म शरीर के हर चक्र को उन्होंने स्थूल शरीर के प्लेक्ससों से जोड़कर आर्ष ग्रन्थों में वर्णित फलश्रुतियों के आधार पर प्रयोग किए। उन्होंने पाया कि चक्र जागरण की बहिविद्युतीय प्रतिक्रिया को नापा जा सकता है। ‘लेडशील्डेड’ कमरे में साधक को बिठाकर बिना कोई इलेक्ट्रोड शरीर से छुए एक शरीर के चारों ओर घूमने वाले ताँबे के इलेक्ट्रोड द्वारा उत्सर्जित विद्युत्प्रवाह को 800 मेगाओम के प्रिएम्पलीफायर व डी. सी. एम्पली फायर से गुजार कर कमरे के बाहर रखे ‘पॉवर स्पेक्ट्रम एनालाइजर’ से उन्होंने मापा व एक रिकार्डर पर उसे अंकित किया। ध्यान−धारणा व स्थान विशेष पर प्राण−प्रवाह को केन्द्रीभूत करने की प्रतिक्रिया उन्होंने पायी।

गत 8 वर्षों में उन्होंने अपने अनुसंधान का केन्द्र बिन्दु मानव शरीर के अन्दर छिपी इस ‘सटलर’ विद्युत को ही बना रखा है और इस साधना से वे उसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं जिसकी चर्चा प्राणमय—विद्युतमय शरीर के रूप में लेख के प्रारम्भ में की गयी। कोई कारण नहीं कि प्रयास किये जाने पर विद्युत चुम्बकत्व, रक्त में घुले रसायनों आदि के विश्लेषण से निकट भविष्य में यह बताया न जा सके कि मानव के सूक्ष्म संस्थान के जागरण की सम्भावनाएँ भी असीम व महान हैं। न जानने व अपनी तकनीक को उस सीमा तक न पहुँचा पाने के कारण यदि जीव विज्ञानी इस विद्युत भण्डार को माप सके तो मतलब यह नहीं कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। मानवी काया की संरचना इतनी विलक्षण है कि उसके कई रहस्यों का अभी विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं। विद्युत भण्डार तक चर्चा सीमित हो जाती तो एक बात थी, पर जब हम चुम्बकत्व की सत्ता की चर्चा करते हैं तो हतप्रभ रह जाते हैं। इतना सामर्थ्यवान यह चुम्बकीय विश्व इस काया में विराजमान है कि वह उक्ति यथार्थ ही प्रतीत होती है जिसमें पृथ्वी के दो ध्रुवों की तरह मानव को भी ‘डायपोल मैग्नेट बताया गया है। विद्युतधारा जहाँ भी बहती है—वहाँ चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण हो जाता है—यह सर्वविदित है।

मानव सतत् श्वास द्वारा प्राणशक्ति खींचता है तथा उसका संचय−ऊतकों का संतृप्तीकरण कर अवशिष्ट को प्रश्वास द्वारा वापस वातावरण में धकेल देता है। यह संचित प्राण ऊर्जा ही वास्तविक सम्पदा है जो विशिष्ट प्रयोगों द्वारा चक्र— उपत्यिकाओं रूपी खजानों में बन्द कैद कर ली जाती है व इसी को आँखों से, वाणी से, उँगली के पोरों से, काया के रोम−रोम से तेजोवलय विद्युतचुम्बकत्व के रूप में साधक निरन्तर निस्सृत कर वातावरण को—व्यक्ति को—वस्तु विशेष को—प्रभावित कर सकने की सामर्थ्य से सम्पन्न बनते हैं। प्राण ऊर्जा सम्बन्धी ‘सटलर पॉवर’ के ये प्रयोग अब तो विज्ञान जगत के समख परीक्षण के विषय वस्तु बन गये हैं। सही भी है—विज्ञान सम्मत होने पर प्राणाकर्षण—प्राण संचय की विद्या को, क्षरण रोकने से होने वाले लाभों इत्यादि को प्रामाणिक मान सकना सबके लिए सहज ही सम्भव भी हो सकेगा।

प्राणशक्ति इस ब्रह्माण्ड के कण−कण में प्रवाहित हो रही है। मानवी सत्ता उसका एक अंग मात्र है। उस शक्ति प्रवाह के बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं। शरीर को समर्थ−शक्ति सम्पन्न बनाने, निरोग−बलिष्ठ बनाने के लिये आवश्यक है कि व्यष्टि प्राण सत्ता के तारों को उस असीम समष्टि प्राणसत्ता के विद्युत केन्द्र से जोड़ दिया जाय। उस आदान−प्रदान को आरम्भ कर दिया जाय, जिसे सम्पादित कर अपनी सूक्ष्म सत्ता को जगाना व जीव−ब्रह्म सम्मिलन−संयोग के शास्त्र वर्णित लाभों से स्वयं को कृतकृत्य अतिमानवी सामर्थ्य सम्पन्न बना सकना सम्भव है।

(क्रमशः)

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