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Magazine - Year 1982 - Version 2

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उपासना के तत्व दर्शन को भली भान्ति हृदयंगम किया जाय

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साधना विधान का महत्वपूर्ण अंग है– उपासना। विडंबना यह है कि इस सम्बन्ध में जितने भ्रम−जंजाल फैले हैं उतने साधनादि अन्यान्य विषयों में नहीं। उपासना का दर्शन समझे बिना मात्र कर्मकाण्डों में उलझना एक प्रवंचना मात्र ही है। बहुसंख्य साधकों के साथ होता भी यही है। ऐसे व्यक्ति डींग तो बड़ी लम्बी−चौड़ी हाँकते हैं पर उपासना का कोई परिणाम उनके चिन्तन−चरित्र व्यवहार में परिलक्षित होता दीख नहीं पड़ता। लगता है या तो वह आधार गलत है जिस पर उपासना की गयी अथवा उपासना फलदायी होती ही नहीं। असफलता मिलने पर बहुतायत ऐसों की ही होती है जो अपने को नहीं, दोष दैव को−भाग्य को−देते देखे जाते हैं। प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के अभाव में तथा श्रुतियों के भ्रम−जंजालों के कारण भोले साधना पारायण व्यक्ति भी इस विडंबना से ग्रस्त दुःखी होते देखे जाते हैं।

उपासना को सही अर्थों में समझाना हो तो पहले उसके अर्थ पर एक दृष्टि डाली जाय। उपासना अर्थात् उप−आसन। समीप बैठना। ईश्वर उपासना का अर्थ है ईश्वर का सामीप्य पाना– ईश्वर अर्थात् सद्.गुणों का समुच्चय आदर्शों से ओत−प्रोत परम सत्ता। ऐसी सत्ता जिसका वरण कर हम श्रेष्ठ बन सकें– वर्तमान स्थिति से स्वयं को ऊँचा उठा सकें। ईश्वर और जीवों में यों समीपता तो है, पर है वह उथली। जीव की सार्थकता तभी है जब उसका स्वरूप एवं स्तर भी उसी के अनुरूप ऊँचा उठे। शिश्नोदर परायण जीवन जीते हुए मनुष्य अपनी आस्थाओं को– आकाँक्षाओं को–दिव्य नहीं बना सकता। फिर तो उसे नर–कीट या नर–पशु ही कहना उचित होगा। कायिक विकास तो सभी कर लेते हैं, पर चेतना की दृष्टि से विकास न हो सका, ईश्वर का सामीप्य पाने की पात्रता न बन सकी तो आयु की दृष्टि से प्रौढ़ होते हुए भी ऐसे व्यक्ति अविकसित ही कहे जाएँगे।

पिछली योनियों की निकृष्टताओं से अपना पीछा छुड़ाने के लिये ही उपासना का, ईश्वर की समीपता का उपक्रम अपनाया जाता है। संगति का−समीप बैठने का– महत्व सर्वविदित है– चन्दन के समीप बहने वाली सुगन्धित पवन आस−पास के वृक्षों को भी वैसा ही सुरभित बना देती है। टिड्डा हरी घास में रहता है तो उसका शरीर वैसा ही हो जाता है और जब सूखी घास में रहता है तो पीला पड़ जाता है। महामानवों का सामीप्य पाने वाले उनकी शक्ति से–संगति से– लाभान्वित होते, उन्हीं गुणों से ओत−प्रोत होते देखे जाते हैं। महात्मा गाँधी एकाकी सत्ता के रूप में विकसित हुए पर इस वट वृक्ष के नीचे पलने – बढ़ने वाले पटेल, जवाहर, लाल बहादुर बने। यह संगति का सामीप्य का ही प्रतिफल है। कीट−भँगी का तद्रूपता का उदाहरण सुप्रसिद्ध है।

चन्द्रमा तभी चमकता है जब वह सूर्य का प्रकाश पाता है। अपने आप में वह प्रकाशवान नहीं, उसकी अकेली कोई सत्ता नहीं। सूर्य का आलोक जब उसे प्राप्त नहीं होता तो अमावस्या के दिन चन्द्रमा के यथा स्थान रहते हुए भी उसका अस्तित्व लुप्त प्रायः ही रहता है। परमात्मा वह दिव्य शक्ति आलोक से भरा प्रकाश पुंज है जिससे हम सभी अनुप्राणित प्रकाशवान होते हैं। उपासना हमें उसके समीप ले जाकर स्थायी बल प्राप्त कराती है। जितना सामीप्य हमें ईश्वर का–परमात्मा सत्ता का–मिलता है, उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती चली जाती हैं। इसी अनुपात में हमारी आत्मिक शाँति–प्रगति का पथ–प्रशस्त होता चला जाता है।

उपासना का बहिरंग स्वरूप क्या हो–इसके विस्तार में अभी न जाकर यह देखा जाय कि परमेश्वर साधक के आन्तरिक स्तर को कैसा चाहता है? रामकृष्ण परमहंस कहते थे–”ईश्वर का दर्शन तब होता है जब पाँच सत्प्रवृत्तियाँ अन्दर प्रवेश पाने व फलने–फूलने लगती है। ये पाँच सत्प्रवृत्तियाँ हैं–उत्कृष्टता, निर्मलता, सहृदयता, उदारता, आत्मीयता। ये ही परमात्मा के–ईश्वरीय सत्ता के–भी गुण हैं। जैसे −जैसे इन गुणों का अनुपात अपने अन्दर बढ़ने लगता है, समझना चाहिए जीव उतना ही ईश्वर के समीप पहुँच गया है।”

इन पाँच सत्प्रवृत्तियों को परमेश्वर का प्रतिनिधि–पंचदेव भी कह सकते हैं। इन्हीं पाँच पाण्डवों को आजीवन आँतरिक असुर कौरवों से लड़ना होता है। जब असुरता के उन्मूलन का हृदय मंथन आक्रोश पूर्वक हो रहा हो–स्पष्ट मान लेना चाहिये कि जीव रूपी अर्जुन ने गीता का ज्ञान स्वीकार कर लिया और वह कृष्ण की आज्ञा मान कर्त्तव्य पारायण–सच्चा योगी–ईश्वर भक्त हो गया। उपासना स्थली पर बैठकर इन सद्गुणों के सम्वर्धन का ही ध्यान किया जाय तो उल्टे ऋषिकेश को ही पार्थ अर्जुन का रथ चलाने–सफलता का पथ–प्रशस्त करने आना पड़ता है। भक्त और भगवान के बीच अनादिकाल से यही क्रम चलता आया है व चलता रहेगा।

आत्मा−परमात्मा के निकट पहुँचने पर भौतिकी का ऊर्जा स्थानान्तरण वाला सिद्धान्त ही सार्थक होता है। गरम लोहे को ठण्डे के साथ बाँध देने पर गर्मी एक से दूसरे में जाती है और थोड़ी देर में तापमान एक सरीखा हो जाता है। दो तालाबों को यदि परस्पर सम्बद्ध कर दिया जाय तो अधिक पानी वाले तालाब का जल दूसरे कम पानी वाले तालाब में पहुँचकर दोनों का स्तर समान कर देता है। उपासना के माध्यम से आत्मा को परमात्मा से सम्बन्धित करने का प्रयास किया जाता है। यों तो वह हर समय, हर एक के पास, हर स्थिति में कोई भी काम करते समय बना रहता है। किन्तु सामान्य व्यक्ति उसके सान्निध्य की अनुभूति नहीं कर पाते। यदि मनुष्य अपने हर काम को परमात्मा को सौंप दे, हर काम उसी को जान समझ कर करे और हर क्रिया को उपासना जैसी श्रद्धा व आस्था से करे तो मनुष्य के साधारण नित्य नैमित्तिक कार्य भी ईश्वरोपासना के रूप में बदल जाये व वैसी ही शाँति–सन्तोष–आनन्द के पुण्यफल देने लगे।

ऋषियों और सन्त भक्तों के जीवन इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उन्होंने अपार आत्म−शान्ति पाई, अपने आशीर्वाद और वरदान से असंख्यों के भौतिक कष्ट मिटाये, अन्धकार में भटकतों को प्रकाश दिया और उन दिव्य विभूतियों के अधिपति बने जिन्हें ऋद्धि एवं सिद्धि कहा जाता है। नाम गिनाये जायें तो रैदास, दादू, नानक, ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम ऐसे अनेकों हैं जिन्होंने गृही और विरक्त सन्त का जीवन जिया। इनके जीवन–चरित्रों को कसौटी पर कसा जा सकता है और देखा जा सकता है कि कोल्हू के बैल की तरह ढर्रे का नीरस जीवन बिताने की अपेक्षा यदि उनने ईश्वर का आश्रय लेने का निर्णय लिया तो वे घाटे में नहीं रहे। कम लाभ की अपेक्षा अधिक लाभ का व्यापार करना बुद्धिमत्ता ही कहा जायेगा। फिर उपासना का अवलम्बन लेना क्यों अदूरदर्शिता माना जाय? निस्सन्देह यही सही जीवन की रीति−नीति है कि शरीरगत स्वार्थों का ध्यान रखने के अतिरिक्त आत्म−कल्याण की भी आवश्यकता समझी जाय और उपासना का आश्रय इसके लिये लिया जाय। इसे नियमित दिनचर्या का अंग बनायें तो हर व्यक्ति अनुपम लाभ प्राप्त कर सकता है।

शरीर को नित्य स्नान कराया जाता है, वस्त्र हम नित्य धोते हैं, कमरा नित्य बुहारी लगा कर साफ करते हैं। कारण यह कि एक बार की सफाई रोज काम नहीं दे सकती। मन को एक बार चिंतन−मनन− स्वाध्याय द्वारा साफ कर लिया तो सदा वह वैसा ही बना रहेगा, ऐसी आशा निरर्थक है। अभी आकाश साफ है। उस पर कब आँधी, कुहासा धूलि−बादल छा जायेंगे प्रकृति कब कुपिता हो जाएगी कहा नहीं जा सकता। अन्तरात्मा पर निरन्तर छाते रहने वाले इन मलिन आवरणों की सफाई के लिये उपासना की नित्य निरन्तर आवश्यकता पड़ती है ईश्वरीय गुणों का समावेश अपने चिन्तन व्यवहार में इससे कम में हो ही नहीं सकता। आग के समीप बैठे बिना गर्मी आये कैसे?

अपने आपे को साधने, अनगढ़ से सुगढ़ बनाने हेतु सुसंस्कारिता की साधना की जाती है। यह तो पूर्वार्ध हुआ। इसका उत्तरार्ध है उपासना जिसमें ईश्वरीय गुणों से स्वयं को अनुप्राणित किया जाता है। यह आत्मिक पुरुषार्थ हर साधक के लिये अनिवार्य है।

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