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Magazine - Year 1982 - Version 2

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मनुष्य की सूक्ष्म आध्यात्मिक संरचना एक वैज्ञानिक विवेचन-(1)

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प्रकृति का अन्तराल अपार विद्युत सम्पदा से भरा हुआ है। जब से मानव की अन्वेषण बुद्धि जागृत हुई, उसने इस विपुल सामर्थ्य की जानकारी एवं सदुपयोग में स्वयं को लगाया तथा उसे अपना घनिष्ठ सहयोगी बना लिया। वैज्ञानिक बताते हैं कि पृथ्वी उतनी ही ऋण विद्युत से युक्त है। 5 वोल्ट प्रति मीटर की औसत से विद्युत का दबाव पृथ्वी के हर जीवधारी पर 60 किलोमीटर ऊँचाई पर अवस्थित आयनोस्फियर की सबसे निचली परत से सतत् बना हुआ है। यह भण्डार कितना समर्थ व सशक्त है, उसकी कल्पना मात्र से वैज्ञानिक हतप्रभ हैं। यह भी एक सर्वविदित तथ्य है कि मानवी काया एक अच्छी विद्युत चालक हैं। ऊपर उल्लिखित विद्युत दबाव मानव शरीर में एक विद्युतधारा को प्रवाहित करता है जिसका सूक्ष्मतम उपकरणों द्वारा मापन भी कर लिया गया है और यह लगभग 10 पर ऋण सोलह घात एम्पियर सेकेंड प्रति वर्ग सेण्टीमीटर बैठती हैं। मोटे अनुमान से लगभग दस पीको एम्पियर की ताकत (एक एम्पीयर का एक अरबवाँ भाग) का यह विद्युत्प्रवाह नगण्य-सा दिखाई पड़ता है, पर वस्तुतः तथ्य प्रकृति और ही है। यह कितना सामर्थ्यवान हो कसता हैं, इसकी चर्चा करने से पूर्व मानवी काया के प्रकृति अदृश्य सूत्रों की मोटी रूपरेखा जान लेना समीचीन होगा।

यहाँ जिस वैज्ञानिक विवेचन की चर्चा की गयी है, उसका आशय है मनुष्य के इस सूक्ष्म काय-कलेवर की खोज, जो विद्युत एवं चुम्बकत्व के रूप में हर काया में विद्यमान है और जिसे घटा-बढ़ाकर मानवी काया को सामर्थ्यवान तथा परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जा सकता है। यह विद्युत शक्ति ही जीवधारियों के शरीर संस्थान व मनःसंस्थान का मूल प्राण-प्रेरक बल कहा जा सकती हैं। वैज्ञानिक तो मात्र उतना ही जान पाये हैं जितना मापा जा सका या देखा जा सका, पर ऐसा भी प्रकृति अदृश्य इस ढाँचे में विद्यमान है जो भौतिकी के सिद्धान्तों के आधार पर अति सामर्थ्यशाली पॉवर हाउस के रूप में सिद्ध किया जा चुका है। मानव शरीर को एक प्रकार का महासागर कह सकते हैं जिसमें असंख्यों नस-नाड़ियाँ, नदी नालों की तरह बहती हैं, श्वास-प्रश्वास के रूप में ज्वार-भाटे उठते रहते हैं। अब तो समुद्र में उठने वाले साइक्लोन्स व ज्वार-भाटों से भी विद्युत उत्पन्न करने की तकनीक खोज कर ली गयी है, परन्तु मानव शरीर एक मिनट में 15 से 15 बार जो श्वास-प्रश्वास लेता-निकालता रहता है उससे वायुमण्डल से विद्युत आयनों का अन्दर प्रवेश एवं उसके शक्तिशाली विद्युत संचार के रूप में सारे शरीर में प्रवाहित होने की जानकारी सनातन काल से मनीषियों की है। मस्तिष्क रूपी जेनरेटर और हृदय रूपी विद्युत उत्सर्जन केन्द्र मिलकर जिस स्तर की ऊर्जा उत्पन्न करते है, वह सारे जीवकोषों में समान रूप से प्रवाहित होकर प्रकृति स्थान विशेषों पर प्रचुर मात्रा में विद्यमान पायी गयी है। इस सूक्ष्म स्तर की विद्युत व चेतन स्तर की प्राणसत्ता का जब मिलन संयोग होता हैं तो यही समन्वित स्वरूप व्यक्ति विशेष के आस-पास परिलक्षित होने वाले आकर्षण क्षेत्र के रूप में प्रकट होता है। यह एक सुविदित तथ्य है कि जहाँ विद्युतधारा प्रवाहित होती है वहाँ चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण होता है। इसी चुम्बकीय क्षेत्र को ‘आँर’ या तेजोवलय नाम से पुकारते हैं।

यान्त्रिक दृष्टि से तो चुम्बक शब्द से सामान्य अर्थ लोहे के कणों को आकर्षित करने वाले चुंबक से किया जाता है जिसे ‘मैग्नेट कहते हैं। पर उसकी चर्चा जब जीवधारियों के संदर्भ में होती है जो उसे ऐसी सचेतन विद्युत के अर्थ में प्रयुक्त करते हैं जो न केवल पदार्थ-परमाणुओं को वरन् वातावरण में अपने प्रवाह को फेंकती और सजातीय जीवधारियों को भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रभावित करती पायी जाती हैं। यदि इस आणविक ऊर्जा प्रवाह तथा चेतना में संव्याप्त प्राण तत्व के सम्मिश्रण से उत्पन्न ब्रह्मवर्चस् की सामर्थ्य को किसी प्रकार डडडड सके तो यह मानवी सत्ता की सबसे सशक्त -विभूति-सम्पदा कही जा सकती हैं। आध्यात्मिक भाषा में जिसे तेजी डडडड कहते हैं और योगियों, देवपुरुषों के आस-पास जो इस स्तर का चुम्बकत्व पाया जाता है वह इसी सामर्थ्य, के कारण है। मनीषी बताते हैं कि वह वैयक्तिक चुम्बकत्व विचार शक्ति के माध्यम से अपने ऊपर– संपर्क क्षेत्र में तथा समस्त ब्रह्माण्ड में उत्पन्न होने वाले संक्षोभों के आधार पर अनुभव किया जा सकता है। इसी शक्ति के सहारे अतीन्द्रिय क्षमताएँ उभरती है और ब्रह्माण्डीय चेतन प्राण प्रवाह के साथ संपर्क मिलाते हुए सूक्ष्म जगत की गतिविधियों को समझ सकना सम्भव हो पाता है।

ब्रह्म की अंशधर जीवसत्ता का चिन्तन परक तथा संवेदनात्मक गतिविधियों का उभार एवं अवसाद इसी प्राण शक्ति पर निर्भर है जो अपने सूक्ष्म रूप में प्राण प्रवाह का स्वरूप लेकर जीवकोषों–ऊतकों से लेकर मस्तिष्क–सुषुम्ना के स्नायु सिनेप्सों तक तथा एन्जाइम केमीकल्स के रूप में ग्रन्थि उपत्यिकाओं तक इसी प्रकार संव्याप्त हैं, जैसे समुद्र में घुला नमक। इस प्राण शक्ति की प्रखरता ही शरीर में चारों ओर वितरित-विस्तारित होकर मनुष्य को ओजस्वी बनाती है। मनःसंस्थान में गतिमान होने पर उसे मनस्वी तथा अन्तःकरण में सक्रिय होने पर मनुष्य को तेजस्वी बनाती है।

ऐसे व्यक्ति जिनमें तीनों ही काया के स्तर समुचित रूप से प्रभावित हो सक्रिय होते हैं–अपने आत्मतेज से समीपवर्ती वातावरण को भी प्रभावित करते, हैं। इन आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों के समीप आने पर एक विचित्र-सा आकर्षण, खिंचाव प्रतीत होता हैं। उनकी आँखों, वाणी चेहरे की भाव-भंगिमाओं, हाथों-उंगलियों से मानों ऊर्जा का प्रवाह निरन्तर गतिशील बना रहता है। महामानव, ऋषि, देवदूत अवतारी महापुरुष ऐसे ही होते हैं। उनके समीपस्थ वातावरण ऐसा बन जाता है कि व्यक्ति नजदीक आने पर अपने अन्दर भी उत्कृष्टता के भाव बढ़ते अनुभव करता है। इसके विपरीत अपराधी, छली, द्विमुखी व्यक्तित्व वाले, हीन-निषेधात्मक चिन्तन प्रधान, कामुक–लम्पटों के चेहरे–शरीर से एक अलग प्रकार का विकर्षण करने वाला (रिपेलिग) प्रवाह निस्सृत होता है। ऐसे व्यक्तियों से दूर रहने को ही मन करता है, साथ ही आस-पास का वातावरण तक वे अभिशप्त बना डालते हैं–यह सारी मानवी विद्युत–चुम्बकत्व-प्राण प्रवाह से युग्म की न्यूनाधिकता की ही परिणति है।

यह एक डडडड तथ्य है कि हर व्यक्ति अपने इस चुम्बकत्व को ब्रह्मवर्चस् को साधना-उपचारों के माध्यम से बढ़ाते रह सकता है। शरीर में सतत् प्रवाहित इस प्राण प्रवाह का ही कमाल है कि व्यक्ति स्वयं को समर्थ आत्मबल अनुभव करता है। मानवी अन्तराल की इस सूक्ष्म संरचना की जानकारी व कैसे इस प्रवाह को बढ़ाया जाय इनका अध्यात्म शास्त्र के ग्रन्थों में विशद रूप में विवेचन किया गया है। ओजस्, तेजस्, वर्चस् को उभारने की विधाओं का ही साधना उपक्रमों के माध्यम से ऊहापोह किया जाता है। ध्यानयोग, क्रियायोग प्राणयोग इत्यादि की साधनाओं के माध्यम से जिन उपचारों का वर्णन व साधकों का मार्गदर्शन प्रस्तुत विशेषांकों में किया जा रहा है, वे इस आध्यात्मिक कायकलेवर की क्षमता–मानवी चुम्बकत्व के सम्वर्धन से ही सम्बन्धित हैं। यह उचित समझा गया कि साधकों को इस सूक्ष्म काय-कलेवर की भी जानकारी करायी जाय जिसे माइाक्रो–सटलर (अति सूक्ष्म) कहा जा सकता है व जिसकी विकृति से ही अदृश्य रूप में रोगों का आक्रमण तथा जिसके परिष्कार-सम्वर्धन से व्यक्तित्व में आकर्षण, ऋद्धि-सिद्धियों का प्रवेश सम्भव हो पाता है। यह सारी आध्यात्मिक संरचना पूर्णतः विज्ञान सम्मत है, सारे भौतिकीय व गणितीय प्रमाण इसकी पुष्टि भी करते हैं।

भूमण्डल पर बैठा मनुष्य वातावरण से न जाने क्या-क्या अदृश्य प्रवाह ग्रहण करता व उन्हें विसर्जित करता रहता है। गामा, बीटा, लेसर एक्स किरणों तथा इंफ्रारेड अल्ट्रावायलेट स्तर की तरंगों की शक्ति वायुमण्डल में काम करती रहती है। इन सबका ही समग्र समावेश मानवी काया में भी है। स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में बँधा होने के कारण ससीम है, पर सूक्ष्म शरीर में इन शक्तियों की कोई सीमा नहीं। बाहर से एक जीवधारी नजर आते हुए भी इसी कारण मनुष्य असीम सामर्थ्यों का पुँज है। चूँकि वे प्रसुप्त पड़ी रहती हैं व उन्हें बाहर से ग्रहण करने का भी कोई आधार नहीं बन पाता, सामान्य जन इस शक्ति स्रोत का लाभ नहीं उठा पाते। डडडड डडडडड डडडड डडड

पृथ्वी पर जिस भूमण्डलीय दबाव तथा विद्युत विभव के आकर्षण क्षेत्रे में जीवधारी रहते हैं वैज्ञानिकों के अनुसार शरीर रुपो जेनरेटर तथा मनःसंस्थान की विद्युत को सक्रिय बनाये रखने के लिये वह अत्याधिक आवश्यक है। यह विशेषकर तब देखा गया जब अन्तरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी के वातावरण से दूर भेजा गया व उनमें स्फूर्ति का अभाव, निर्णय लेने में अक्षमता व अत्याधिक शारीरिक थकान पाई गयी। कृत्रिम रूप से अन्तरिक्ष यानों के अन्दर जब ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न की गयीं जैसी पृथ्वी पर होती हैं, तब ये लक्षण समाप्त हो गये। इससे स्पष्ट होता है कि मानव जिस वातावरण में रहता है, वहाँ से विद्युत्बल अपने अन्दर अवशोषित कर निरन्तर सक्रिय बना रहता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक द्वय डाण्डेनियल एवं कार्ट वर्ग ने तो यह भी सिद्ध कर दिया है कि मानव का दीर्घजीवन तथा प्रजनन क्षमता अदृश्य बाह्य क्षेत्रों से आ रही विद्युत वर्षा पर निर्भर है। आज के आधुनिक युग में आयुष्य कम होने व नपुँसकता बढ़ने का कारण वे वातावरण की विद्युत में सतत् कमी व मनुष्य की कृत्रिमता को अपनाने के कारण जो प्रकृति भी उपलब्ध है, उसे ग्रहण करने में अक्षम बताते हैं।

इस विशाल विद्युत को, जिसके मध्य हम सब बैठे हैं–वैज्ञानिक ‘ग्लोबल केपेसीटर’ कहते हैं। यह शान्त नहीं बैठा रहता वरन् उसमें प्राकृतिक हलचलें व विद्युत स्खलन निरन्तर होता रहता है। इस ‘केपेसीटर’ से जो तरंगें निस्सृत होती है। उनकी मूल आवृत्ति लगभग 7-8 तरंगें प्रति सेकेंड होती है। वे पृथ्वी सतह तथा आयनों स्फियर के बीच निरन्तर गुंजायमान होती रहती है। इन तरंगों को ‘शूमेन रेजोनेन्स भी कहते हैं और यह एक अद्भुत साभ्य हैं कि हमारे मस्तिष्क की विद्युत तरंगें इनसे हर गुण में मिलती-जुलती हैं। एक ही आवृत्ति फ्रिक्वेन्सी) पर दोनों चलायमान हैं। श्री आर. ए. वेद ने तो अपनी पुस्तक “दि सर केडियन रिदम्स ऑफ मैन” में यहाँ तक सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य के रिद्म (क्रिया-कलाप) विद्युतीय क्षेत्रों और विद्युत चुम्बकीय तरंगों से विशेष रूप से प्रभावित होते हैं तथा आस-पास के वातावरण को अपने अन्दर चलायमान इन हलचलों से प्रभावित करने में भी पूर्णतः सक्षम होते है।

इसके अतिरिक्त मनुष्य जिस धरती पर रहता है उसके गर्भ में एक प्रचण्ड प्रभावशाली विद्युतीय शक्ति क्षेत्र पाया गया है। प्रति वर्ग सेण्टीमीटर एक एम्पियर के लगभग प्रवाहित यह शक्ति धारा सारे पृथ्वी क्षेत्र में कुंडलाकार व्याप्त होने के कारण कई गुना हो जाती व चुम्बकीय–विद्युतीय तूफानों का रूप ले लेती है और मानवी काया के हर अंग अवयव को, जीवकोषों, रक्त कोषों तथा चक्र–उपत्यिकाओं को प्रभावित करती हैं। रूस में इस दिशा में परामनोवैज्ञानिक शोधों ने बताया है कि अतीन्द्रिय क्षमता का जागरण बहुत प्रकृति अपने अन्दर के प्रवाह का इस चुम्बकीय धारा से साम्य बिठाना सम्भव है।

ऊपर वर्णित गूढ़ वैज्ञानिक विवेचन का सार समझने का प्रयास करें तो हम प्रकृति निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। ब्रह्माण्ड में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सत्ता विद्यमान है जो ग्रह नक्षत्रों की भ्रमणशीलता और आकर्षण शक्ति के उभय-पक्षीय प्रयोजन तो पूरा करती ही है, साथ ही अणु जगत की हलचलों के लिये भी जिम्मेदार होती है। ईथर के ब्रह्माण्डव्यापी महासागर पर इसी विद्युत चुम्बक का आधिपत्य छाया है। यह जड़ शक्ति नहीं है वरन् प्राण शक्ति का प्रवाह है। अणु परमाणुओं की संरचना व गतिविधियों के रूप में हर जीवधारी के अन्दर वह दृश्यमान होती है।

यह प्राण एक चेतन ऊर्जा है जो मनुष्य में काया के इर्द-गिर्द फैली दिखाई देती है। इसे ही तेजोवलय कहते हैं। विश्वव्यापी महाप्राण के वैभव भण्डार से हर जीवधारी अपनी-अपनी पात्रता के अनुसार इसे पाते रहते हैं। यह मानव के लिये ही सहज सम्भव है कि वह प्रयत्न करे उत्साह सँजोये और संकल्पबल के माध्यम से इस समष्टिगत प्राण प्रवाह को अधिकतम अपने अन्दर खींच सके।

इस प्राण-चुम्बक को काया में प्रविष्ट कर कैसे प्रयोग किया जाता है उसे जानने से पूर्व मानवी काया की संरचना की भी थोड़ी जानकारी ली जाय। मनुष्य शरीर लगभग 75 हजार अरब कोषों का समन्वय है। हर जीवकोष के आर–पार 60 से 90 वोल्ट का विद्युत डिडडभव होता है। इस प्रकार मानव शरीर एक शक्तिशाली साधन सम्पन्न बिजलीघर है। हर अवयव की गतिविधि-हृदय की धड़कन, मांस–पेशियों का आकुँचन–प्रकुँचन, मस्तिष्क में संदेशों व प्रेरणाओं का आवागमन, अंतःस्रावी क्रिया-कलाप हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि प्रत्येक मनुष्य अपने वायु मण्डल से ऋण विद्युत आयनों को श्वास द्वारा सोखता रहता है। ये आयन (विद्युत आविष्ट कण) रक्त के माध्यम से शरीर के सभी भागों में फैलकर समस्त ऊतकों और कोषों को ऋण विद्युत से संतृप्त कर देते हैं। ये विद्युत आयन त्वचा से निष्कासित हो वातावरण में फैल जाते हैं। इस प्रकार वैज्ञानिक फ्रेडब्लेस के अनुसार शरीर में एक विद्युत चक्र सतत् चलता रहता है।

सुषुम्ना को वैज्ञानिक स्थायी विद्युतीय द्विध्रुव केन्द्र (पैरमानेन्ट इलेक्ट्रिक डायपोल) मानते हैं। इसका निचला भाग जो मूलाधार चक्र में अवस्थित है। (काँडा इक्वाइना स्थित) ऋण विद्युत आवेशयुक्त तथा ऊपरी सिरा सहस्रार (सेरिब्रम स्थित) धन विद्युतधारी है। असामान्य स्थिति में यह ग्वाह नीचे से प्रबल होकर उल्टी दिशा में अर्थात् ऊपर की ओर ऊर्ध्वगमन करता बह सकता है व मस्तिष्क को सतत् जागृत व अति सामर्थ्यवान बनाये रख सकता है- वैसे सामान्यतः जीवधारियों में इसका प्रवाह ऊपर से नीचे होता है। मात्र मनुष्य को यह सुविधा प्राप्त है कि वह प्राण प्रहार–विद्युत केन्द्रीकरण के माध्यम से लोअर पोल को सशक्त बनाकर अपने प्रवाह को क्षरण से रोककर ऊर्ध्वगमन की ओर दौड़ा दे। वैज्ञानिकों का चिन्तन अभी इस विषय में और भी सम्भावनाओं को लेकर गतिशील है और अध्यात्म विज्ञान तो इन मान्यताओं को पहले से ही प्रतिपादित करता आया है कि ओजस् का संग्रह किया जाता है व यही मनःशक्ति –संकल्पबल को बढ़ाकर मनुष्य के तेजोवलय को प्रभावशाली बना देता है। यह ‘आँरा’ और प्रकृति नहीं त्वचा से, आँखों से, वाणी से सतत् प्रवाहित होते रहने वाला विद्युत्प्रवाह ही है।

शरीर में कुल मिलाकर 1 लाख वोल्ट प्रति मेण्टी मीटर करा विद्युत दबाव होता है। अन्य जीवधारियों की भाँति यह भी श्वास से, त्वचा से, जननेन्द्रियों से क्षरित हो वातावरण में बहता रहता है। यदि इस विद्युतधारा को सुनियोजित किया जा सके तो इसी से उस चुम्बकत्व का निर्माण किया जा सकना सम्भव है जो व्यक्ति को आकर्षक शक्ति सम्पन्न बनाता है। मनःक्षेत्र में यही साहस, विवेक, सन्तुलन आदि गुणों के रूप में तथा अन्तः क्षेत्र में सम्वेदनाओं–आत्मबल–ओज–के रूप में विकसित होकर समीपवर्ती लोगों पर गहरी छाप छोड़ता है। ऐसे व्यक्तियों का लोग अनुगमन करने को बाध्य होते हैं।

ध्रुवीय प्रदेशों में जिस प्रकार चुम्बकीय तूफानों का प्रकाश “अरोरा बोरिएलिस” के रूप में छाया रहता है, उसी प्रकार महापुरुषों का चुम्बकत्व–विद्युत ऊर्जा के प्रकाशवलय के रूप में उनके चतुर्दिक् व्याप्त रहता है। यह प्रकाश वलय भी आन्तरिक चुम्बकत्व व विद्युत प्रवाहों के अनुरूप भिन्न-भिन्न होता है। तत्वदर्शी–मनीषी किसी व्यक्ति के चतुर्दिक् व्याप्त इसी तेजोवलय से उसका आन्तरिक चेतना स्तर व अन्तःकरण में जन्म ले रही प्रवृत्तियों की झाँकी देख लेते हैं।

ब्रह्मतेजस् संवर्धन की इस विद्या को और विस्तार से समझने के लिये आध्यात्मिक काय-कलेवर के सूक्ष्म पक्ष को अभी और भी खोलना है, उसके विभिन्न प्रसुप्त पक्षों पर वैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन किया जाना है। साधना विज्ञान के वटवृक्ष की जड़ों के रूप में इस विद्या को उपमा दी जा सकती है। इसका ज्ञान भी उतना ही अनिवार्य है जितना कि साधना उपचारों के विभिन्न पक्षों का। इसी लेखमाला में आगे इस सूक्ष्म संरचना को और विस्तार से समझाने का प्रयास किया जायेगा।

(क्रमशः)

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