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Magazine - Year 1982 - Version 2

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वातावरण अनुकूलन व प्रसुप्त के जागरण हेतु सामूहिक उपासना

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एकाकीपन की अपेक्षा सामूहिकता अधिक बलशाली−सामर्थ्यवान है। लोहे का लम्बा गार्डर एक व्यक्ति अकेला नहीं उठा पाता, पर जब कई व्यक्ति मिलकरन ‘हईशा’ के निनाद के साथ जोर लगाते हैं तो वे समूह शक्ति के सहारे कई गार्डरों को जोड़कर बाँध का ढाँचा तैयार कर देते हैं। बड़े−बड़े पहाड़ काटकर नहरें निकालना व गगनचुम्बी भवन बना सकना समूह शक्ति का ही काम है। बड़ी शक्तियों को भी कुचल सकना के वल समूह बल द्वारा ही सम्भव है। एक से चार का बल हमेशा बड़ा ही होता है।

जब वातावरण को परिष्कृत करने– युग−परिवर्तन की बात सामने आती है तो सामूहिक प्रयासों को ही महत्ता दी जाती है। उस तूफानी प्रवाह में सामान्य जन भी असामान्य भूमिका सम्पादित कर दिखाते हैं। व्यापक परिवर्तन बड़े परिमाण में चिरस्थायी उद्देश्यों के लिये करने हों तो उसके लिये ऐसे सामूहिक प्रयासों की ही आवश्यकता पड़ती है। ऐसे सामूहिक आध्यात्मिक प्रयास जिन्हें प्रार्थना, धर्मानुष्ठान अथवा ध्यान धारणा किसी भी रूप में किया जा सकता है अपने दिव्य प्रवाह से सूक्ष्म जगत को अनुप्राणित कर सक ने में समर्थ होते हैं।

आये दिन देखा जाता है कि एकाकी और सम्मिलित शक्ति में कितना अन्तर है। बुहारी की अलग−अलग सींके चाहे हजारों−लाखों क्यों न हो अलग रहकर किसी स्थान की सफाई नहीं कर सकतीं। वे मिल जायें तो ही समर्थ झाडू बन पायेगी। धागे परस्पर गुंथे तो कपड़ा बने व तन ढक पाये। अलग−अलग दीपक तो सदा जलते हैं, पर जब वे योजनाबद्ध रूप से नियत समय पर पंक्ति बद्ध प्रकाशित होते हैं–दीपावली का उत्सव अपनी निराली छटा लिये अलग ही दृष्टिगोचर होता है। अलग−अलग रहकर शूरवीर योद्धा कोई बड़ा प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते। उनका सम्मिलित स्वरूप –सेना का प्रदर्शन जब ‘मार्च पास्ट’ अथवा गणतन्त्र की परेड के रूप में देखते हैं तो लगता है युद्ध मोर्चे पर इनका पराक्रम अवश्य सफल होगा। उपासना के सम्बन्ध में भी यही बात है। सामूहिक और सुगठित स्वरूप की उपासना के विशालकाय आयोजन वातावरण को बदलने– आमूलचूल रूप से सुधारने का महत् प्रयोजन पूरा करते हैं।

आत्म−कल्याण के लिये की गई करुण आर्त पुकार पर परमात्मा द्रवित होता है, पर जब इस पुकार में सैकड़ों मनुष्यों का करुण स्वर समा जाता है तो अनन्त गुनी शक्ति प्रादुर्भूत होती है। संघ−शक्ति की प्रतीक दुर्गा शक्ति का रहस्य भी यही है कि परमात्मा एकाकी की अपेक्षा अनेकों की पुकार पर अधिक ध्यान देते हैं। सामूहिकता का प्रभाव तुरन्त होता है।

श्रुति का आदेश है–”सहस्र साकमर्चत्”–अर्थात्–”हे पुरुषों! तुम सब सहस्रों मिलकर देवार्चन करो।” समगान व ऋग्वेद की समस्त ऋचाएँ सामूहिक गान ही हैं।

देव प्रयोजनों में सामूहिकता का ही प्रावधान है। यज्ञ प्रक्रिया एक सनातन धर्मानुष्ठान परम्परा है। देवाराधन के समस्त तत्वों का उसमें समावेश है। प्रत्यक्ष है कि यज्ञ का समूचा क्रिया−कलाप सामूहिकता पर ही निर्भर है। ब्रह्मा, आचार्य, अर्ध्वयु, उद्गाता, यजमान, ऋत्विक आदि यज्ञ पदाधिकारियों की मण्डली उसका सूत्र संचालन करती है। संगतिकरण–सामूहिकता यज्ञ का एक अर्थ भी है तथा उसके हर कृत्य में सहकारिता–सामूहिकता का समावेश है। राजनैतिक उद्देश्यों के लिये राजसूय, एवं धार्मिक उद्देश्यों के लिये वाजपेय यज्ञों की परम्परा अनादिकाल से चली आ रही है। अश्वमेध जैसे आयोजन राजसूय तथा गायत्री यज्ञ जैसे आयोजन वाजपेय कहलाते रहे हैं। इनमें राजनेताओं व धर्मवेत्ताओं की बड़ी संख्या में एकत्र कर उनके प्रयत्नों में एकरूपता का सामूहिक शक्ति से सामयिक प्रयोजन पूरे किये जाते थे। नैमिषारण्य आदि आरण्यकों में सूत−शौनक कथा प्रसंगों जैसे विशालकाय ज्ञान सत्र सम्पन्न होते थे जिनमें हजारों ऋषि आत्माएँ श्रद्धापूर्वक भाग लेकर अनुष्ठान को सफल बनाती थीं।

ऋषियों ने रावणकालीन अनाचार से जूझने के लिये सूक्ष्म शक्ति उत्पन्न करने हेतु सामूहिक साधना की व सबने मिल−जुलकर अपना−अपना रक्तसंचय किया। उसे एक घड़े में बन्द करके भूमि में गाड़ दिया, जिससे सीताजी उत्पन्न हुई और उनकी भूमिका के फलस्वरूप तत्कालीन अनाचारों का निराकरण सम्भव हो सका।

सामूहिक साधना, उपासना, प्रार्थना में महत्वपूर्ण प्रयोजन यही है कि सदाशयता की संघबद्ध होने और एक दिशाधारा में चल पड़ने की व्यवस्था बन सके। महत्व तो व्यक्तिगत उपासना का भी है और वैयक्तिक परिष्कार के लिये अलग−अलग एकान्त उपासना की आवश्यकता भी पड़ती है किन्तु सूक्ष्म जगत को प्रभावित करने के लिये अध्यात्म पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। वह एकाकी तो अपने स्थान पर चले ही, उसे सामूहिक स्तर का भी बनाया जाना चाहिए।

सन्त मैकेरियस ने लिखा है–”तुम अकेले गाओगे तो तुम्हारी आवाज थोड़ी दूर जाकर नष्ट हो जायेगी। मिलकर प्रार्थना करोगे तो उसका नाद प्रत्येक दिशा में व्याप्त होगा।” प्रार्थना का वैज्ञानिक रहस्य यही है कि हमारे पास अपनी उतनी सामर्थ्य नहीं है जितने से बाधाओं से टकरा सकें। इसलिये अन्ततः सब मिलकर अनन्त शक्तिशाली परमात्मा से शक्ति तत्व खींचकर हम समष्टिगत कल्याण की–सफलता की कामना करते हैं। आवाज जितने अधिक लोगों की होगी उतनी ही बुलन्द होगी। जितने अधिक भावपूर्ण स्वर उसमें जुड़ेंगे उतनी ही अधिक शक्ति प्रादुर्भूत होगी।

शास्त्रकार कहते हैं–

बहूनामल्य साराणाँ समवायों हि दुर्जनः। तृणैरा वेष्टयते रज्जुः बध्यन्ते तेन दन्तिनः॥

अर्थात्–”क्षुद्र और कमजोर आदमियों की सामूहिकता भी अजेय बन जाती है। कमजोर तिनकों से बनाई गयी रस्सी परस्पर मिल जाने के कारण इतनी मजबूत हो जाती है कि उससे हाथी भी बंध जाता है।”

वेद भगवान ने इसीलिये मानवों को एक होकर प्रार्थना करने का आदेश दिया है। सम्पूर्ण मानव समाज एक दूसरे से इस तरह सम्बद्ध है कि अपने स्वार्थ को सर्वोपरि समझकर सबके हित की भावना का तिरस्कार नहीं किया जा सकता। जब−जब एकाकीपन की यह संकीर्णता उभर कर आयी है, मानवता की बड़ी हानि हुई है। देवासुर संग्रामों के कई वर्णन शास्त्रों में मिलते हैं। असंगठित देवताओं पर संघबद्ध असुरों की जीत से यही प्रेरणा मिलती है कि जब तक संगठन के प्रतीक रूप से युग वितरण का पुरुषार्थ न होगा असुरता हमेशा हावी रहेगी। स्वार्थ से समाज में निकृष्टता, जड़ता, व अशाँति व असन्तोष फैलता है इसीलिये वेद भगवान कहते हैं–”धियो यो नः प्रचोदयात्।” अर्थात्–”हे भगवान्, हमारी बुद्धि को आप सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।” यहाँ जो “नः” शब्द का प्रयोग किया गया है, वह बड़ा महत्वपूर्ण है। नः अर्थात् हमारी–हम सबकी, अकेले एक की नहीं। इसीलिये गाँधीजी कहा करते थे–”जब तक एकता स्थापित न हो तब तक प्रार्थना, उपवास, जप–तप निर्जीव समान है।”

यहाँ सामूहिक उपासना−साधना की चर्चा इसलिये का जा रही है कि समय विशेष को– संक्रान्तिकाल को देखते हुए यह आवश्यक है। सामूहिकता में जो शक्ति है उसे यदि अपने अन्तः से सब लोग मिलकर उभार सकें तो इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण होने में जरा भी देर न लगे।

जहाँ तक परम्परा की बात है–यह स्पष्टतः देखा जा सकता है कि प्राचीन काल में साधना के सामूहिक स्वरूप से अलग हटकर किसी अन्य स्वरूप की कल्पना भी नहीं की जाती थी। वैदिक साहित्य में समस्त स्तुतियाँ बहुवचन में है। ”आ नो भद्राः क्रनवो यन्तु विश्वतः” अर्थात्−विश्व भर से श्रेष्ठ विचार हमारे भीतर आएँ। प्रार्थना और साधना का सर्वोत्कृष्ट मन्त्र इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि साधक गायत्री मन्त्र में अकेले अपनी ही नहीं, पूरे समूह की बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना सविता देवता से करता है। ईशोपनिषद में साधक अपनी अनुभूति बताता है–”हे प्रकाश पुँज! मैं आपके परम कल्याणकारी तेजोमय स्वरूप की देख रहा हूँ। वह मैं स्वयं ही हूँ।” और तुरन्त इसके बाद कहता है–”अग्नेनय सुपथा राये अस्मान्।” अर्थात्–हे तेज पुँज! हम सबको सन्मार्ग की ओर खींच लीजिये।

जहाँ सामूहिक साधना की जाती है, वहाँ तादात्म्य की चरम सीमा में एक और जहाँ साधक की अनुभूति मुक्त रूप में फूट पड़ती है वहीं उसे समष्टि का भी ध्यान रहता है। इसीलिये ऋषि कहते हैं–

संगच्छध्वं, सं वदध्वं सं वो मनाँसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वें, संजानाना उपासते॥

अर्थात्–’हम सब साथ−साथ चलें, साथ−साथ बातचीत–विचार विमर्श करें व एक से मनोभावों से युक्त रहें।”

समानी व आकूतिः समाना हृदयानिवः। समानमस्तु वो मनोयथा वः सुसहासति॥

अर्थात्–’हमारी चित्त वृत्तियाँ समान हों, हृदय और मन समान हो, जिससे सौहार्द्र रह सके।

इन पंक्तियों में सामूहिक साधना की अनिवार्यता ही प्रकट हुई है। समान चित्त वृत्ति तभी होगी, जब समान साधना की जायेगी। एक-सी विचार तरंगें और भाव तरंगें एक−सी चित्त वृत्तियों को जन्म देती हैं। एकाग्रता का अर्थ यही है कि मन का प्रवाह एक ही दिशाधारा में चलने लगे। चारों तरफ चित्त बिखरे नहीं। जब व्यक्ति समुदाय एक ही भावधारा को एक साथ अपनाता है तो ध्यान धारणा प्रगाढ़ होती है, उससे एकाग्रता बलवती होती है।

सामूहिक उत्कर्ष के प्रयास सामूहिक साधना द्वारा ही सम्भव हुए हैं। जब−जब सामूहिक साधना से जनमानस विरत हुआ है तब−तब व्यक्तिवाद की प्रवृत्तियाँ पनपी व बढ़ी हैं, समाज की अवनति हुई है। समुद्र मंथन एक सामूहिक साधना ही थी जो देवों और असुरों की सम्मिलित उपासना द्वारा पूरी हो सकीं और चौदह रत्नरूपी सिद्धियों की उपलब्धि सम्भव हो सकी। रावण वानरों सहित सामूहिक साधना ही थी। श्रीकृष्ण का महारास तत्ववेत्ताओं द्वारा सामूहिक साधना का एक स्वरूप हो माना जाता है जिसमें वृत्तियों का सामूहिक विलय, विसर्जन समष्टि सत्ता में किया गया है। बुद्ध ने सामूहिक साधना के विशाल आयोजनों को व्यापक स्तर पर आयोजित कर लोक जागरण किया। महात्मा गाँधी ने भी सामूहिक प्रार्थना सभाओं का जागृति विस्तार का एक अनिवार्य अंग माना व उसे हमेशा महत्व देते रहे।

इसी प्रकार इन मतों का समर्थन करते हुए ‘ब्राह्मण’ ग्रन्थ कहते हैं कि–”देवता सामूहिक रूप से सबके कल्याण की इच्छा करते हैं। एक व्यक्ति के हित के लिये अनेकों के हित का मर्दन उन्हें प्रिय नहीं होता।” सम्भवतः इसीलिये हमारी संस्कृति में ही सर्वप्रथम सामूहिक उपासना का प्रचलन हुआ। वातावरण के अनुकूलन एवं सूक्ष्म जगत के परिशोधन में ऐसी ही संयुक्त उपासना शक्ति सफल कारगर सिद्ध होती है। सामूहिक रूप से नियत समय और नियत क्रम से विधि व्यवस्था से की गयी उपासना प्रचण्ड शक्ति का उत्पादन कर सकने में समर्थ हो सकती है। इस तथ्य को इन दिनों प्रत्यक्षतः कारगर होते देखा जा सकता है।

आज का समय एकाकी साधना–एकाकी मुक्ति का नहीं अपितु समष्टिगत सुरक्षा–सबकी आत्मिक समृद्धि हेतु सामूहिक पुरुषार्थ का है। नवयुग की सुखद परिस्थितियों की सम्भावना का एकमात्र आधार यही है कि व्यक्ति का अन्तराल उत्कृष्ट बने, दृष्टिकोण में उदारता और चरित्र में शालीनता का समावेश हो। यह एक के नहीं, समग्र मानवता के परिष्कार से ही सम्भव है। आस्थाओं के दुर्भिक्ष का निवारण अन्तःक्षेत्र में उत्कृष्टता की मान्यताओं को स्थापित करके ही सम्भव है। सामूहिक उपासना का उद्देश्य अन्तःक्षेत्र में उच्चस्तरीय श्रद्धा का आरोपण, परिपोषण एवं अभिवर्धन। इस प्रचण्ड सामर्थ्य से देव शक्तियों को भी आह्वान आमंत्रण ताकि उनकी तपः शक्ति से असुरों से संघर्ष किया जा सके।

सामूहिक धर्मानुष्ठानों की शक्ति से वातावरण गरम होता है और उस गर्मी से परिस्थितियों के प्रवाह में असाधारण मोड़ आते और परिवर्तन होते देखे गये है। समय के प्रवाह में तिनकों और पत्तों की तरह अगणित व्यक्ति बहते चले जाते हैं। आँधी के साथ धूल से लेकर छत−छप्पर तक ने जाने क्या−क्या उड़ता चला जाता है। आँधी का रुख जिधर होता है उधर ही पेड़ों की डालियाँ और पौधों की कमरें झुकी दिखाई पड़ती है। इसे प्रवाह का दबाव ही कहेंगे यह भी उस वातावरण का ही प्रभाव है जो सामूहिक शक्ति के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। गायत्री महापुरश्चरणों, नवरात्रि अनुष्ठानों, यज्ञायोजनों के पीछे युगान्तरकारी चेतन सत्ता का सही उद्देश्य छिपा होता है कि समय−समय पर एकत्र होने वाली अनाचार, अज्ञान, अभावरूपी अवाँछनीयताओं की कालिमा धुलती रहे।

तत्वदर्शी ऋषियों ने उपासना विज्ञान के निर्धारण में इस तथ्य को बहुत महत्ता दी है कि नियत समय, नियत क्रम से निर्धारित मनोभूमि की व्यवस्था बनाकर उपासना की जाय ताकि सूक्ष्म जगत का उद्देश्य पूरा होता रहे। सूर्योदय और सूर्यास्त काल को ही सन्ध्यावन्दन के लिये क्यों निर्धारित किया गया, इसका एक ही उत्तर है कि इससे संयुक्त शक्ति की अत्यन्त प्रभावशाली प्रचण्ड धारा उत्पन्न होती है। यह शक्ति के केन्द्रीकरण का चमत्कार है। गायत्री उपासना में वे सारे तत्व विद्यमान है जो व्यक्ति को लौकिक दृष्टि से स्वस्थ, सुखी, सन्तुष्ट, समृद्ध बनाने वाला प्राण तो फूँकते ही हैं, साथ ही उसे आत्मिक दृष्टि से इतना अधिक सक्षम और समर्थ बना देते हैं जिससे कोई भी अवाँछनीयता, अनैतिक उसका कोई अनिष्ट न कर सके। इस शक्ति का सामूहिक उत्पादन तो और भी अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियों के द्वार खोलता है।

एकाकी प्रयत्न व पुरुषार्थ का भी अपनी जगह महत्व है व ऐसे भागीरथी प्रयासों को सम्मानित–प्रोत्साहित किया ही जाना चाहिये। ईश्वर का अंश राजकुमार अपने रचयिता सृष्टा की समस्त विभूतियाँ साथ लेकर आया है और यदि वह चाहे तो अपनी प्रसुप्ति को जागृति में बदलकर–प्रखरता को अपनाकर समष्टि क्षेत्र में भी इतना प्रकृति कर सकता है जिसे चमत्कारी कहा जा सके। तेजस्वी, मनस्वी, तपस्वी स्तर के व्यक्ति ऐसा ही प्रकृति कर गुजरते हैं। इतने पर भी वातावरण की महत्ता अपने स्थान पर यथावत् बनी रहती है। उसके प्रभाव की प्रचण्डता पग−पग पर परिलक्षित होती है। हमेशा यह आवश्यकता प्रतीत होती है कि किसी प्रकार समूचे वातावरण का अनुकूल सम्भव बनाया जाय। इसके लिये सुनिश्चित उपचार सामूहिक साधना को ही जाना माना जाता रहा है।

विभिन्न धर्मों में प्रचलित उपासनाओं को भी सामूहिकता की शृंखला में ही बाँधा गया है। मुसलमानों की नमाज का समय नियत है व प्रत्येक धर्मानुयायी कड़ाई के साथ उसका पालन करता है। जुम्मे की, ईद की नमाज पर एकत्र समुदाय की उपासना सामूहिक धर्मानुष्ठान का ही एक स्वरूप है।

ईसाई रविवार को चर्च में एकत्र होते व सामूहिक प्रार्थना करते पाये जाते हैं। कोई भी ईश्वर−विश्वासी इस समय को चूकता नहीं। जब उद्देश्य सभी का समष्टिगत कल्याण की प्रार्थना ही है तो क्यों न उसे एक समय पर एक साथ किया जाय। इसका अर्थ यह नहीं कि एक स्थान पर बैठा जाना ही अनिवार्य है। सन्धिकाल की नैष्ठिक साधना नियत समय पर ध्यान धारण के रूप में नियमित रूप से प्रातः सायं की जा सकती है। इसे युग परिवर्तन के लिये समर्थ मार्गदर्शन में दैवी प्रवाक् के द्वारा युगशक्ति के प्रचण्ड उत्पादन हेतु प्रेरित की गयी विशिष्ट साधना समझा जा सकता है। इसके आधार पर ही सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण के अनुकूलन व प्रसुप्त की जागृति की अपेक्षा की जा सकती है।

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