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Magazine - Year 1982 - Version 2

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शब्द−शक्ति की प्रचण्ड सामर्थ्य

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शब्दोच्चारण को प्रायः जानकारियों के आदान−प्रदान का एक माध्यम भर समझा जाता है। उसके दिव्य प्रवाह संचार की बात से कम व्यक्ति ही परिचित होते हैं। शब्दों के साथ अनेकानेक भाव अभिव्यंजनाएँ−सम्वेदनाएँ, प्रेरणाएँ एवं शक्तियाँ भी जुड़ी होती हैं। यदि ऐसा न होता तो वाणी में मित्रता एवं शत्रुता उत्पन्न करने की सामर्थ्य न होती। दूसरों को उठाने अथवा गिराने में उसका उपयोग न हो पाता। प्रायः देखा यह जाता है कि कटु शब्द सुनते ही क्रोध तथा आवेश उभर आता है और न कहने योग्य कहने और न करने योग्य करने की स्थिति बन जाती है। शोक सम्वाद सुनते ही भूख, प्यास और नींद मारी जाती है, मनुष्य अर्धमूर्छित जैसा हो जाता है। भावुकता भरे उद्बोधन तर्क, तथ्य और प्रमाण के आधार पर देने पर देखते ही देखते जन समूह की विचारधारा बदल जाती है और उस उत्तेजना से सम्मोहित भीड़ कुशल वक्त का अनुसरण करने के लिए बिना आग−पीछा सोचे तैयार हो जाती है। महाभारत कथा प्रसिद्ध है कि द्रौपदी के थोड़े से व्यंग्य−उपहार भरे अपमानजनक शब्द–’अन्धों के अन्धे ही होते हैं’, की प्रतिक्रिया इतनी गम्भीर हुई कि महाभारत के ऐतिहासिक युद्ध का सूत्रपात हो गया, जिसमें अठारह अक्षौहिणी सेना मारी गयी। इन तथ्यों पर विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि वाणी का प्रयोजन मात्र जानकारी देना नहीं है। शब्दोच्चारण में प्रभावोत्पादक चेतन तत्व भी जुड़े होते हैं। वे ध्वनि कम्पनों के साथ घुले रहकर जहाँ भी टकराते हैं, वहाँ विलक्षण चेतनात्मक हलचलें उत्पन्न करते हैं।

पदार्थ विज्ञानियों ने शब्द को भौतिक तरंगों का स्पन्दन भर कहा है, पर उसकी चेतना को प्रभावित करने वाली सम्वेदनात्मक−वैचारिक क्षमता की भौतिक व्याख्या नहीं हो सकी है। आधुनिक मनोविज्ञान ने पदार्थ विज्ञान से एक कदम आगे बढ़कर वाणी के वैचारिक प्रभाव की गरिमा को स्वीकारा है तथा मानसोपचार में उस क्षमता के छोटे−मोटे प्रयोग भी होने लगी हैं। इतने पर भी शब्द की विभिन्न प्रकार की सामर्थ्यों से वे भी अपरिचित हैं। शब्द की वैचारिक एवं सम्वेदनात्मक क्षमता, भौतिक विज्ञान एवं मनोविज्ञान का विषय वस्तु न होकर वस्तुतः आध्यात्मिक है।

जपयोग में मन्त्रशक्ति के इसी आध्यात्मिक प्रभाव का उपयोग करके काम में लाया जाता है तथा आन्तरिक परिवर्तनों के हेतु नियोजित किया जाता है। जपयोग की प्रक्रिया में ऐसी चेतन शक्ति का उद्भव होता है जो साधक के शरीर एवं मन में विचित्र चैतन्य हलचलें उत्पन्न करती है तथा अनन्त अन्तरिक्ष में उड़कर विशिष्ट व्यक्तियों एवं परिस्थितियों को ही नहीं समूचे वातावरण को प्रभावित करती है।

मन्त्रों में उनके अर्थ का उतना महत्व नहीं होता जितना कि ध्वनि विज्ञान का। गायत्री मन्त्र को ही लें तो मालूम होगा कि अर्थ की दृष्टि सेवा सामान्य है, पर सामर्थ्य की दृष्टि से उसे अद्भुत एवं सर्वोपरि मन्त्र बताया गया है। इस मन्त्र में भगवान से सद्बुद्धि की कामना भर की गई है इसी अर्थ को व्यक्त करने वाले मन्त्र श्लोक हजारों हैं। हिन्दी तथा अन्य कितनी ही भाषाओं में ऐसी कविताएँ–छन्द आदि ढूँढ़ते पर सहस्रों मिल जायेंगे जिनमें परमात्मा से सद्बुद्धि की प्रार्थना की गई है, पर उनका उच्चारण उतना फलप्रद नहीं हो पाता। न ही उनसे गायत्री मन्त्र जैसी शक्ति उत्पन्न हो पाती है। कारण स्पष्ट है कि मन्त्र सृष्टा ऋषियों की दृष्टि में अर्थ नहीं शब्दों का गुँथन महत्वपूर्ण रहा है। कितने ही बीज मन्त्र ऐसे हैं जिनका कोई विशिष्ट अर्थ नहीं निकलता। पर वे सामर्थ्य की दृष्टि से अद्भुत हैं। ह्रीं, श्रीं, क्लीं, ऐ, हूं, यं, फट् आदि बीज मन्त्रों का अर्थ निकालने की माथा पच्ची करने पर भी प्रकृति सफलता नहीं पाती। वस्तुतः उनका सृजन यह ध्यान रखते हुए किया गया है कि उनका उच्चारण किस स्तर का कितनी सामर्थ्य का शक्ति कंपन उत्पन्न करता है तथा जप कर्त्ता अभीष्ट प्रयोजन एवं समीपवर्ती वातावरण पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है?

जपयोग की प्रक्रिया दुहरी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है–एक भीतर, दूसरी बाहर। जिस स्थान पर आग जलती है उस स्थान को तो गरम करती ही हैं, साथ ही वायु मण्डल में भी ऊष्मा बिखेर कर अपने प्रभाव क्षेत्र का परिचय देती है। जप के ध्वनि प्रवाह से शरीर में यत्र−तत्र सन्निहित अनेकों चक्रों तथा उपत्यिकाओं में एक विशिष्ट स्तर का शक्ति संचार होता है इस विशिष्ट शक्ति संचार की अनुभूति जपकर्ता अपने भीतर करता है। बाहर प्रतिक्रिया यह होती है कि लगातार एक नियमित क्रम में किये जाने वाले मन्त्र जप से निकली विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगें निखिल अन्तरिक्ष में विशेष तरह का स्पन्दन पैदा करती हैं जो प्राणि मात्र और समस्त वातावरण को प्रभावित करती हैं।

एक क्रम एक गति से निरन्तर किये जाने वाले सूक्ष्म आघात का चमत्कार वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में देखा जा चुका है। इस प्रयोग की पुष्टि हो चुकी है कि एक टन भारी लोहे का गार्डर किसी छत के बीचों−बीच में लटका दिया जाय और उस पर पाँच ग्राम के नगण्य वजन वाले कर्क का निरन्तर आघात एक गति, एक क्रम ने कराया जाय तो प्रकृति ही समय बाद गार्डर काँपने लगेगा। पुलों पर से होकर गुजरती सेना की पैर मिलाकर चलने से रोक दिया जाता है। कारण यह है कि लेफ्ट–राइट के ठीक क्रम से तालबद्ध पैर पड़ने से जो एकीभूत शक्ति उत्पन्न होती है उसकी सामर्थ्य इतनी अद्भुत एवं प्रचण्ड होती है कि उसके प्रहार से मजबूत पुलों के भी टूटकर गिर पड़ने की सम्भावना बन जाती है। मन्त्र जप के क्रमबद्ध उच्चारण से इसी प्रकार का तालक्रम उत्पन्न होता है। फलस्वरूप शरीर के अन्तःसंस्थानों में विशिष्ट प्रकार की हलचलें उत्पन्न होती हैं जो आन्तरिक मूर्च्छना को दूर करने एवं सुषुप्त अन्तःक्षमताओं को जागृत करने में सक्षम रहती हैं।

इस तथ्य को टाइप राइटर के उदाहरण से और भी अच्छी तरह समझा जा सकता है। उँगली से चाबियाँ दबाने पर कागज पर तीलियाँ गिरकर अक्षर छापने लगती हैं। मुख में उच्चारण के लिए प्रयुक्त होने वाले कल−पुर्जों को टाइप राइटर की कुँजियाँ कह सकते हैं। मन्त्रोच्चार उँगली से उन्हें दबाना हुआ। इस प्रक्रिया से उत्पन्न हुआ शक्ति प्रवाह नाड़ी तन्तुओं की तीलियों के सहारे सूक्ष्म चक्रों तथा सूक्ष्म ग्रन्थियों तक पहुँचकर उन्हें जगाने की भूमिका सम्पादित करता है। जागृत शक्ति −संस्थान अक्षरों के छपने जैसे उपलब्धि के रूप में दिखायी पड़ते हैं, जिसकी अनुभूति जपयोग के विधि−विधानों का ठीक प्रकार पालन करके हर साधक कर सकता है।

रगड़ से गर्मी, बिजली पैदा होने के सिद्धान्त से विज्ञान वेत्ता भली−भाँति परिचित हैं। जप में अनवरत उच्चारण एक प्रकार का घर्षण उत्पन्न करता है। निरन्तर पत्थर पर रस्सी की रगड़ पड़ने से घिसाव के निशान पड़ जाते हैं। श्वास के शरीर में आवागमन तथा रक्त अभिसरण से शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है। जीवन का व्यापार उपार्जन उसी ऊर्जा के सहारे चलता है। जप में जो घर्षण प्रक्रिया गतिशील होती है वह अन्तर्निहित दिव्य शक्ति संस्थानों को उत्तेजित–जागृत करके दिव्य उपलब्धियों का मार्ग प्रशस्त करती है।

जपयोग का दूसरा लाभ है अन्तरिक्ष में प्रवाहित होने वाले दिव्य चैतन्य प्रवाह से अभीष्ट परिमाण में शक्ति खींच कर उससे लाभ उठाना। मन्त्र जप से उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म तरंगें विश्व ब्रह्माण्ड में प्रवाहित ऊर्जा प्रवाह को खींच लाती हैं। जिस प्रकार तालाब में डेला फेंकने पर लहरें पहुँचती हैं, उसी प्रकार मन्त्र जप में भी चुम्बकीय विप्र तरंगें उत्पन्न होती हैं। यह विश्व ब्रह्माण्ड भी एक तालाब है, पर इसकी आकृति गोल है। इसलिए इसका अन्तिम छोर वही स्थान होता है जहाँ से ध्वनि तरंगों का संचरण आरम्भ हुआ था। इस तरह जप से पैदा होने वाली ऊर्जा तरंगें धीरे−धीरे बहती−बढ़ती चली जाती हैं और अन्ततः एक पूरी परिक्रमा करके अपने मूल उद्गम स्थान−जपकर्ता के पास शब्दवेधी बाण की तरह लौट आती हैं।

परन्तु तरंगों की यह यात्रा चुपचाप नहीं पूरी होती; तरंगों की चुम्बकीय शक्ति बहुत प्रकृति ग्रहण−विसर्जन भी करती चलती है। यह तरंगें जिस क्षेत्र से संपर्क बनाती हैं उसे प्रभावित करतीं और स्वयं प्रभावित होती हैं। यह प्रभाव सजातीयता के सिद्धान्त पर चलता है। समान वर्ग के पदार्थ अथवा प्राणी एक−दूसरे से प्रभावित व आकर्षित होते हैं। मस्तिष्क से निकलने वाले भले−बुरे विचार अपने साथ सजातियों का एक पूरा झुण्ड लेकर अपने उद्गम स्थान पर अपेक्षाकृत अधिक बलवान होकर लौटते हैं। इस प्रक्रिया के अनुसार मनुष्य अपनी विचार सम्पदा से जहाँ असंख्यों को लाभान्वित करता है वहाँ उनसे बहुत प्रकृति प्राप्त भी करता है। इस तरह अपने विचार दूसरों को कम एवं स्वयं को कहीं अधिक प्रभावित करते हैं। अशुभ विचारों के साथ भी यही बात लागू होती है। वे दूसरों को भी हानि पहुँचाते हैं, किन्तु वापिस लौटने पर उनकी बढ़ी−चढ़ी घातक शक्ति की हानि स्वयं को ही अधिक भुगतनी पड़ती है। परिभ्रमण एवं परिपोषण का यह सिद्धान्त सर्वत्र देखा जा सकता है।

मन्त्र जप से उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म विचार तरंगों की यात्रा भी इसी प्रकार आरम्भ होती है। वे अपने साथ सजातीय शक्तियों एवं अनुभवों के अनुदान लेकर वापिस लौटती हैं तथा अपनी चैतन्य विशेषताओं से साधक की सामर्थ्य को कई गुनी बढ़ा देती हैं। सजातियों का एकत्रीकरण प्रकृति का भी नियम है। भू गर्भ की खदानें इस सिद्धान्त पर ही बनती और बढ़ती हैं कि अमुक स्थान पर एकत्रित खनिज एक संयुक्त चुम्बकत्व उत्पन्न करते हैं। उस आकर्षण का प्रभाव जितने क्षेत्र में होता है वहाँ से उसी जाति के बिखरे कण खिंचते हुए चले आते हैं। जितनी बड़ी व सम्पन्न खदान होती है उतना ही सशक्त चुम्बकत्व और फिर उतने ही सुदूर क्षेत्र तक उसकी आकर्षण प्रक्रिया, यही वह आधार है जिसके सहारे धातु आदि की खदानें धीरे−धीरे अपना आकार बढ़ाती रहती हैं।

रेडियो प्रसारणों में एक सामान्य−सी आवाज को विश्व व्यापी बना देने तथा उसकी असामान्य गति बढ़ा देने में इलेक्ट्रो मैगनेटिक तरंगों का ही चमत्कार होता है। पदार्थ विज्ञान के विशेषज्ञ जानते हैं कि इलेक्ट्रो मैग्नेटिक वेक्स पर साउण्ड को सुपर इम्पोज कर रिकार्ड कर लिया जाता है। फलस्वरूप वे पलक मारते ही सारे संसार की परिक्रमा कर लेने जितनी शक्ति प्राप्त कर लेती हैं। इन शक्तिशाली तरंगों के सहारे ही अन्तरिक्ष में भेजे गये राकेटों की उड़ान को धरती पर से नियन्त्रित करने, उन्हें दिशा देने, उनकी यान्त्रिक खराबी दूर करने का प्रयोजन पूरा किया जाता है। लेसर स्तर की बनी शक्ति किरणें और भी अधिक सामर्थ्यवान होती हैं। एक फुट मोटी लोहे की चादर में सुराखकर देना उस के लिए एक सामान्य बात है। चिकित्सा जगत में उपचार के लिए इन किरणों का प्रयोग होने लगा है। सुपरसोनिक स्तर की तरंगों का जप प्रक्रिया के द्वारा उत्पादन और समन्वय होता है। जप के समय उच्चारण किये गये शब्द एवं उसके साथ आत्म निष्ठा, श्रद्धा एवं संकल्प के समन्वय से वही क्रिया उत्पन्न होती है जो रेडियो स्टेशन पर बोले गये शब्दों में होता है। प्रकृति ही क्षणों में वे शक्तिशाली होकर समस्त भू−मण्डल पर प्रसारण का उद्देश्य पूरा करते हैं। जपयोग से न केवल समस्त संसार का वातावरण प्रभावित होता है वरन् साधक का व्यक्तित्व भी परिष्कृत होकर जगमगाने लगता है। रेडियो स्टेशनों से प्रसारण तो होता है, पर स्थानीय स्तर पर कोई विलक्षणता नहीं दिखायी पड़ती। लेसर किरणें फेंकने वाले यन्त्रों में निजी प्रभाव नहीं देखा जा सकता। वे उन स्थानों का ही प्रभावित करती हैं जहाँ उनका आघात होता है। जप प्रक्रिया के साथ ऐसी बात नहीं है। इसमें साधक और वातावरण को प्रभावित करने की दुहरी शक्ति होती है। जप के साथ जुड़ी इन मर्यादाओं एवं वैज्ञानिक विधि–विधानों का सही ढंग से पालन किया जा सके तो उससे चमत्कारी लाभ उठाया जा सकता है।

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