चिन्तन कण (kavita)
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इतने अमूल्य मानव जीवन को,
नाच नचायेगा क्या-क्या?
कुल चार दिनों का जीवन था,
दो काट चुके दो कटने हैं,
दो दिन के बाकी जीवन में,
संसार दिखायेगा क्या-क्या?
खुद जान-बूझ कर ही जिसने
काँटों में पैर बढ़ाया हो,
तरकीब काँटों से बचने की
तरकीब बताएगा क्या-क्या?
अनुमान लगाने बैठूँ तो
सचमुच सिर चकरा जायेगा,
मैंने थोड़े से जीवन में
खोया क्या-क्या पाया क्या-क्या?
सब भले-बुरे की परिभाषा
ही बदल जाएगी क्षण भर में,
यदि तुम्हें बताने बैठूं मैं
देखा है भला-बुरा क्या-क्या?
हर चीज मुझे जब हासिल था,
मिलता था मगर एक तू ही नहीं,
क्या तुझको बताएँ तेरे बिना
इस दिल का तमाशा था क्या-क्या?
मैं तो पहचान नहीं पाया
तू ही जाने तेरी माया,
जीवन के इन व्यापारों में,
मेरा क्या-क्या तेरा क्या-क्या?
–यादराम शर्मा रजेश
*समाप्त*

