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Magazine - Year 1985 - Version 2

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परमेश्वर एक है- अनेक नहीं

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इस सृष्टि का सृष्टा एक ही है। वही उत्पादन, अभिवर्धन तथा परिवर्तन की सारी प्रक्रियाएं अपनी योजनानुसार सम्पन्न करता है। न उसका कोई साझीदार और न सहायक। मकड़ी जब चाहती है अपने मुँह के पानी से ही जाला बना देती है और जब उसका मन आता है जाले को समेटकर गोली की तरह निगल लेती है। शास्त्रकारों ने बताया है कि अनादिकाल में वह- परब्रह्म- अकेला था। अकेलापन उसे खला। इच्छा हुई कि एक से बहुत हो जाऊँ। इस इच्छा ने ही सृष्टि का रूप धारण कर लिया। इस प्रकार एक से बहुत बनने की इच्छा पूरी हो गई इस सृजन के कण-कण में वह समा गया। लहरों पर चमकने वाले सूर्य की तरह वह अनेकाधा दृष्टिगोचर होने लगा। प्राणियों को माया ने भरमाया और वे अहन्ताग्रस्त होकर अपनी-अपनी पृथक स्वार्थपरता से ग्रस्त होकर निजी इच्छा आवश्यकताओं के अनुरूप क्रिया-कृत्य करने लगे। यह भूल गये कि हम एक ही उद्गम से प्रादुर्भूत हुए हैं और परस्पर सहोदर भाई के सदृश्य हैं। सबका स्वार्थ संयुक्त है। एक ही सत्ता भिन्न-भिन्न प्रकार की हो गई और समझा जाने लगा कि जो जिस देवी-देवता की पूजा-पत्री करेगा वह उसी को अपना समझेगा और उसी की हिमायत करेगा। इतना ही नहीं जो अपने यजमान का उपेक्षा पात्र या विरोधी होगा उसे त्रास देने से भी न चूकेगा। यह मान्यता है आज के बहुदैववाद की। इस प्रकार सृष्टा का ही खण्ड विभाजन नहीं हुआ वरन् अपने-अपने कुल वंश ग्राम नगर के भी पृथक-पृथक देवी-देवता बन गये। प्रगति सामूहिक है। इसलिए हिल-मिलकर रहना चाहिए और मिल-बाँटकर खाना चाहिए सुखों को बाँट देना और दुःखों को बँटा लेना ही श्रेयष्कर है। उनमें आदमी स्वार्थान्ध हो जाता है और अपनी सुविधा के लिए दूसरों की असुविधा पर ध्यान नहीं देता।

विभाजन और संकीर्णता इतने तक ही सीमित नहीं रही। परमेश्वर का भी बँटवारा कर लिया गया। अनेकों देवी देवता बनकर खड़े हो गये। उनकी आकृति ही नहीं प्रकृति भी अपने को न पूजने- दूसरे को पूजने पर वे देवता रुष्ट होने और त्रास देने पर उतारू होने लगे। बहुदैववाद के आरम्भिक दिनों में तीन ही प्रमुख थे ब्रह्मा, विष्णु, महेश और उनकी पत्नियाँ सरस्वती, लक्ष्मी, काली। इसके बाद तो नित नये देवता उपजने लगे। देवताओं की संख्या अगणित हो गई और देवियों की भी। उनकी चित्र-विचित्र फरमाइशें भी गढ़ी गई। इनमें से कुछ शाकाहारी थे कुछ माँसाहारी। कुछ क्रोधी, कुछ शान्त मिज़ाज। कुछ तो प्रेत पितर ही देवी-देवता बन बैठे। इनकी संख्या हजारों लाखों तक जा पहुँची। इस संदर्भ में पिछड़ी जातियों ने देव रचना का काम बहुत उत्साह से बढ़ाया। शारीरिक मानसिक बीमारियों को उन्हीं के रुष्ट होने का कारण माना जाने लगा। उपचार यही था कि किसी मध्यवर्ती ओझा की मारफत समाधान करने के लिए उनकी रिश्वत का पता लगाना। इस समाधान में अक्सर खाने-पीने की वस्तुओं की याचना होती थी। विशेष कर पशु-पक्षियों के बलिदान की। इनका कोई स्थान विशेष बना हो तो वहाँ पहुँचकर धोक देने की (प्रणाम करना)। घर में नई बहू आने या नया बच्चा पैदा होने पर कुल देवता की दर्शन झाँकी करने जाना भी आवश्यक समझा जाने लगा। इस प्रकार देवता का ‘मूड’ ठीक रखना ही हर परिवार के लिए आवश्यक जैसा बन गया। यह छोटी समझी जाने वाली बिरादरियों की बात हुई। बड़ी बिरादरियों के देवता अपेक्षाकृत अधिक शानदार, ठाट-बाट वाले, बड़े देवी-देवताओं के भक्त बनने में अपनी प्रतिष्ठा समझने लगे। उनकी पूजा पंडित पुरोहित द्वारा दुर्गा सप्तशती पाठ, शिव महिमा रुद्री आदि का पाठ, हवन, पूजन जैसे उपचार और उनमें से अपने लिए जिन्हें चुना गया हो उनके दर्शन झाँकी करने का सिलसिला चलता। बहुदैववाद के पीछे अनेकानेक कथा कहानियाँ जोड़ी गई और उनकी प्रसन्नता से मिलने वाले लाभों का- उनकी नाराजी से मिलने वाले त्रासों की माहात्म्य गाथाएं गढ़ ली गईं। कितने ही देवताओं का किन्हीं पर्व त्यौहारों के साथ सम्बन्ध जोड़ दिया गया। कईयों के स्थान विशेष पर जाना आवश्यक माना गया। इनमें से कुछ पुराने बने रहे और कितने ही नये बन कर खड़े हो गये। कई उपेक्षित होते चले गये और कई एकदम नये विनिर्मित होकर प्रख्यात हो गये।

यह बहुदैववाद हिन्दुओं के छोटे बड़े वर्गों में तो है ही। अन्य देशों और धर्मों के पिछड़े वर्गों में भी उसी भाँति प्रचलित है। अफ्रीका के दक्षिण पूर्व एशिया के, दक्षिण अमेरिका के पिछड़े वर्गों में यह प्रचलन बहुत अधिक है समझदार समुदाय तो क्रमशः अब इस जंजाल से अपना पीछा छुड़ाते जा रहे हैं।

इस्लाम और ईसाई सम्प्रदायों में एकेश्वरवाद है। तो भी उनमें पीर, औलिया, पैगम्बर पूजते हैं और उनकी जियारत के लिए जाते हैं। जैन और बौद्ध धर्मों में तीर्थंकरों की लगभग वैसी ही कट्टर मान्यता है। हिन्दुओं के भाँति उनके भी तीर्थ हैं और स्थापित प्रतिमाओं के अनेकानेक नाम हैं। उनकी विशेषताएं अपनी-अपनी कही गई हैं। मनौती इन सभी की मानी जाती है। हमारा अमुक काम बन जाय तो दर्शन करने आने या भेंट चढ़ाने का पूर्व संकल्प किया जाता है यही मनौती है। इसे पेशगी रिश्वत की शर्तबन्दी भी कहा जा सकता है। एक ही सफलता सुनकर दूसरा लालायित होता है और महात्म्य तथा मनौती का प्रचलन निरन्तर बढ़ता जाता है।

इस संदर्भ में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है अन्यथा यह भ्रम जंजाल बढ़ता ही जायेगा और अकारण लोगों में भय तथा लालच का भाव बढ़ता जायेगा आस्था बढ़ेगी सो अलग। उन देवताओं के ऐजेन्टों तथा पुजारियों के पौ बारह होते रहेंगे और बेचारे भावुक लोग अन्ध श्रद्धा के कारण अपनी जेब कटाते रहेंगे।

समझा जाना चाहिए कि ईश्वर एक है। उसकी व्यवस्था में अनेक साझीदार नहीं हो सकते। धर्म सम्प्रदायों की मान्यता के कारण उसके आकार-प्रकार भी अनेक प्रकार के नहीं हो सके। सम्प्रदायों में ईश्वर का आकृति और प्रकृति अनेक प्रकार की मानी गई है। यदि यह सच मानी जाय तो इनमें से किसी एक को सच्चा और बाकी सबको झूठा कहना पड़ेगा। किस को सही और कितनों को गलत माना जाय। यह बड़ा टेढ़ा प्रश्न है। फिर इसकी कोई कसौटी भी नहीं है। मान्यताएं श्रद्धा पर अवलम्बित हैं। वह श्रद्धा पैगंबरों और ऋषियों के कथनों पर आधारित है। उनके प्रति पूज्य भाव रखते हुए भी वह निर्णय करना कठिन है कि परस्पर विरोधी इन प्रतिपादनों में कौन सही और कौन गलत है। ऐसी दशा में किसी सत्यान्वेषी के लिए भारी कठिनाई उपस्थिति होती है कि इस विरोध विडम्बनाओं में से किसे ग्राह्य और किसे अग्राह्य करें।

तत्व-दर्शन और विवेक बुद्धि के आधार पर यह मानना पड़ता है कि परमेश्वर एक है। सम्प्रदायों की मान्यताओं के अनुसार उसके स्वरूप और विधान सही नहीं हो सकते। यह उनकी अपनी-अपनी ऐसी मान्यताएं हैं जो मानने वालों की निजी मान्यता पर अवलम्बित हैं।

व्यापक शक्ति को निराकार होना चाहिए। जिसका आकार होगा वह एक देशीय और सीमित रहेगा। कहा भी गया है- ‘न तस्य प्रतिमा अस्ति’ अर्थात् ‘उसकी कोई प्रतिमा नहीं है।’ न स्वरूप न छवि। आप्त वचनों का एक और भी कथन ऐसा ही अभेद्य है। उसमें कहा गया है- ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ अर्थात् एक ही परमेश्वर को विद्वानों ने बहुत प्रकार से कहा है। यहाँ अन्धों द्वारा हाथी का एक-एक अंग पकड़कर उसे उसी आकृति का बताये जाने वाली कहानी याद आ जाती है।

ईश्वर की प्रसन्नता अप्रसन्नता का आधार नैतिक नियमों का पालन करना ही हो सकता है। नाराज उससे होगा जो चारित्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन करेगा। दूसरा आधार पुण्य परमार्थ है। पिछड़ों को आगे बढ़ाना और गिरों को ऊँचा उठाना- समाज में सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन करना यहीं पुण्य परमार्थ की परिभाषा है। यह मान्यता हर सम्प्रदायों और हर दर्शन द्वारा परस्पर से सर्वमान्य की गई है। विवाद पुण्य-परमार्थ की परिभाषाओं से आरम्भ होता है जिसे दूरदर्शी विवेकशीलता की कसौटी पर कसने के अलावा यथार्थता का अनुमान लगाने का और कोई आधार नहीं है।

ईश्वर की पूजा से उनकी प्रसन्नता और न करने से अप्रसन्नता मानी जाने की बात के पीछे भी एक ही रहस्य प्रतीत होता है कि निर्धारित कर्मकाण्डों के सहारे मनुष्य आत्म-परिष्कार और लोक-कल्याण की सत्प्रवृत्तियों के प्रति अधिकाधिक निष्ठावान बने। आमतौर से लोग न्यायशील सर्वव्यापी परमात्मा को भूल जाते हैं और निर्भय होकर कुकर्म करने लगते हैं। कर्मफल की सुनिश्चितता को संदिग्ध मानते हैं। इस भ्रम के निराकरण में ईश्वर स्मरण का, उसके पूजा विधान का अन्तःकरण पर उपयोगी प्रभाव पड़ सकता है और मनुष्य अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समावेश कर सकता है। प्रार्थना मन्त्रों में न्यूनाधिक मात्रा में ऐसे संकेत भी हैं।

चन्दन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपहारों को ईश्वर के सम्मुख उपस्थित करने की पूजा प्रक्रिया का यही रहस्य है। इन वस्तुओं में जो श्रेष्ठताएं हैं उन्हें अपने जीवन में धारण करने का प्रयत्न किया जाय और यह माना जाय कि जल रूपी सरसता, पुष्प जैसी कोमलता, नैवेद्य जैसी मिठास, दीपक जैसी स्वयं जलकर प्रकाश करने की प्रक्रिया, चन्दन की भाँति वातावरण महकाने जैसी सत्प्रवृत्तियाँ अपने में उत्पन्न करनी चाहिए और श्रेष्ठ व्यक्तित्व को भगवान के चरणों में अर्पित करने की भावना सुविकसित करनी चाहिए। अन्य उपहार भी भेंट किये जाते रहे हों तो उन्हें एक प्रकार का आत्म-प्रशिक्षण समझा जाना चाहिए। भगवान को किसी के स्तवन या उपहार की कोई आवश्यकता नहीं है। पूजा उपासना की समूची प्रक्रिया संकेत रूप में अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं प्रखर बनाने के लिए प्रशिक्षण प्रक्रिया है। जो इतना कर सकेंगे वे सृष्टा का अनुग्रह प्राप्त कर सकेंगे और महामानव, ऋषि, देवता बनने की दिशा में अग्रसर होंगे उन्हें आत्मसन्तोष और जन सम्मान एवं सहयोग की कमी न रहेगी।

अन्य देशों में प्रचलित भगवानों या देवताओं की आकृति-प्रकृति का निर्धारण किस आधार पर हुआ है इसका कारण तो विदित नहीं है पर भारत के देवताओं को सत्प्रवृत्तियों का प्रतीक मानकर उनकी आकृतियों का गठन किया गया है। जैसे शिव की आकृति में शिर से गंगा का निकलना अर्थात् ज्ञान की धारा प्रवाहित होना। मस्तक पर चन्द्रमा अर्थात् सौम्य शीतलता का होना। गले में मुण्डों की माला अर्थात् मौत को स्मरण रखना। गले में सर्प अर्थात् दुष्टजनों को भी गले से लगाकर उनकी प्रकृति बदलना। नन्दी वाहन अर्थात् परिश्रमी और सौम्य प्रकृति के प्रति अनुराग होना कमर में सिंह चर्म अर्थात् अनाचारियों का दमन करना। हाथ में त्रिशूल अर्थात् अभाव, अज्ञान और अनाचार का उच्छेदन करना। हाथ में डमरू अर्थात् संगीत उल्लास को पसन्द करना। आदि आदि।

ब्रह्माजी के चार मुख- वेद में निहित ज्ञान की चार धाराओं का प्रसारण, चार प्रसंग, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। कमल पुष्प पर विराजमान अर्थात् सर्वोपम पुष्पित आधार की पसन्दगी, इन प्रतीकों के परिचायक हैं।

विष्णु की चार भुजाओं में चार आयुध हैं। शंख अर्थात् जागरण का उद्घोष। चक्र अर्थात् गतिशीलता प्रगति। गदा- पराक्रम, संघर्ष के उपयुक्त शौर्य पराक्रम। पद्म अर्थात् खिले कमल जैसी सुगन्ध और शोभा की अवधारणा। गले में बैजन्ती माला अर्थात् धर्म धारणा। सिर पर मुकुट अर्थात् शासन की स्थिति सुव्यवस्थित रहना आदि।

देवियों में सरस्वती, लक्ष्मी और काली की प्रमुखता है। इनके वाहनों तथा आयुधों में भी ऐसे ही संकेत सन्देश सन्निहित हैं जिनसे यह प्रेरणा ली जा सकती है कि मनुष्य को अन्य किन विशेषताओं विभूतियों को अपने व्यक्तित्व में विकसित समाविष्ट करनी चाहिए।

यथा- ‘सरस्वती’ वाहन हंस, नीर क्षीर विवेक। हाथ में वीणा पुस्तक। संगीत और साहित्य की कलाकारिता। ‘लक्ष्मी’- हाथियों द्वारा पूजन। धनवान बनने के लिए हाथियों जैसी बुद्धिमत्ता, बलिष्ठता और ऊँचाई। ‘काली’- का वाहन सिंह, पराक्रम, साहस, आयुध, तलवार त्रिशूल आदि। असुरों को निरस्त करने के लिए आवश्यक उपकरणों का धारण।

इसी प्रकार सभी देवी-देवताओं की आकृति-प्रकृति, वाहन, आयुध आदि के पीछे ऐसे संकेत और सन्देश हैं जिनका विकसित व्यक्तित्व में समावेश होना चाहिए। यह सब आत्म शिक्षण है। जिस प्रकार बाल कक्षाओं में, अ-अमरूद। आ-आम। इ-इमली। ई-ईख। उ-उल्लू। ऊ-ऊँट। के चित्र बनाकर स्वर और व्यंजन की वर्णमाला याद कराई जाती है, ठीक उसी प्रकार देवी-देवताओं की चित्र-विचित्र आकृतियों आयुधों, वाहनों, उपकरणों द्वारा आस्तिकजनों को यह प्रशिक्षण मिलता है कि आस्तिकता का अर्थ श्रेष्ठ सद्गुणों का महत्व समझना और अपने में धारण करना है। यह प्रतीक मात्र है। अनेक मुख, अनेक हाथ वाले देवी-देवताओं का होना विवेकशीलता द्वारा स्वीकार्य नहीं हो सकता। भारत कवियों, कलाकारों का देश रहा है। यहाँ के तत्त्वदर्शियों ने सर्वसाधारण की सामान्य बुद्धि को चित्रकारिता के माध्यम से मानवी गरिमा और उत्कृष्टता के लिए आवश्यक धारणाओं और प्रयासों के सम्बन्ध में रहस्यमय चित्रों में चित्रित किया है। उनका यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि निराकार, सर्वव्यापी और न्यायकारी परमेश्वर की सृष्टि व्यवस्था में कोई साझीदार भी है और वे मात्र मनुहार, उपहार, उपचार के आधार पर प्रसन्न अप्रसन्न होते रहते हैं। पात्रता कुपात्रता का विचार किये बिना शाप वरदान देते रहते हैं। रुष्ट और प्रसन्न होते रहते हैं। ऐसी मान्यताएं- अन्धविश्वास में गिनी जायेंगी और उन्हें अपनाने वालों को भ्रमित करेगी। वास्तविकता को कोसों दूर ले जा पटकेंगी। हममें से प्रत्येक को यथार्थवादी और तत्त्वदर्शी होना चाहिए। ईश्वर सम्बन्धी विविध विधि कथाओं, लीलाओं और पूजा उपचारों का प्रचलन इसीलिए है कि हर व्यक्ति विश्व के नियामक और उसके सुनिश्चित विधि-विधान को समझकर चरित्रवान बने और पुण्य-परमार्थ में निरत रहे।

यदि इन मान्यताओं से विरत रहा जाय तो नास्तिकता उपजेगी और मनुष्य स्वेच्छाचारी उद्दण्ड और अनाचारी बनने लगेगा। कुकर्म करने और कुमार्ग अपनाने वाले, समाज दण्ड और राजदण्ड से बच सकते हैं, इन दोनों को ही चकमा दे सकते हैं, पर जिनने आस्तिकता की मान्यता स्वीकार की है उन्हें यह विश्वास बना रहेगा कि घट-घट वासी और सर्वत्र विद्यमान परमेश्वर की दृष्टि से हमारी कृतियाँ छिपी नहीं रह सकती और साथ ही तद्नुरूप दंड पुरस्कार की परिणति भी फलित हुए बिना नहीं रह सकती। इसलिए नास्तिकता का समूचा ढाँचा खड़ा किया गया है ताकि मनुष्य मानवी गरिमा के प्रति निष्ठावान रहे और वह करे जो उसके लिए करने योग्य है। उस मार्ग पर कदम न बढ़ाये जिससे सृष्टा को सृष्टि को, अन्तरात्मा को खिन्न होना पड़े।

परमेश्वर की अनेक शक्तियों व्यवस्थाओं और गतिविधियों को यदि चित्र-विचित्र देवी-देवता माना जाय तो इस अलंकारिक मान्यता में कोई हर्ज नहीं है, पर सृष्टि व्यवस्था में साझीदारी करने वाले स्वतन्त्र अस्तित्व के देवी-देवताओं की मान्यता से मुँह मोड़ लेना ही सत्य और तथ्य को अपनाने की विवेकशीलता है।

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