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Magazine - Year 1985 - Version 2

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प्रखर चेतना के प्रतीक प्रतिनिधि- समर्थ गुरु रामदास

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समर्थ गुरु रामदास का जन्म हैदराबाद प्रान्त के जाम्ब गाँव में रामनवमी के दिन सन् 1608 में हुआ। उनका कार्यकाल सन् 1682 तक रहा। उनके पिता का नाम सूर्याजी पन्त था। उनने लगातार 36 वर्ष सूर्य उपासना गायत्री मन्त्र के साथ की थी। पुत्र को भी उन्होंने यही साधना बताई। समर्थ नित्य दो हजार सूर्य नमस्कार और गायत्री का मानसिक जप करते थे। हनुमानजी के प्रति उनकी सहज श्रद्धा थी। वे हनुमान की तरह ही राम-काज करना चाहते थे। वही किया भी।

संस्कारवान माता-पिता ही अपनी गोदी में उच्च आत्माओं को खिलाने का सौभाग्य प्राप्त कर पाते हैं। स्वयंभू-मनु, शतरूपा-रानी, कृष्ण-रुक्मिणी, अर्जुन-सुभद्रा जैसे अनेकों उदाहरण ऐसे हैं जिसमें पिता-माता के तपस्वी जीवन ने उन्हें सुसन्तति प्राप्त कराई। शकुन्तला, सीता, मदालसा के उदाहरण भी ऐसे ही हैं।

समर्थ बाल बैरागी थे। उन्होंने परिवार के सम्मुख आरम्भ में ही जीवनोद्देश्य प्रकट कर दिया और विवाह नहीं किया। आत्म-बल को अधिक प्रखर बनाने के लिए उन्होंने गोदावरी नन्दिनी नदियों के संगम पर टीकली स्थान पर बारह वर्ष तक तपश्चर्या की।

इसके उपरान्त वे धर्म प्रचार की पदयात्रा पर निकल पड़े। इस अवधि में उन्होंने हिमालय के कई स्थानों पर निवास किया और देवात्माओं से संपर्क साधा।

समर्थ को देश से पराधीनता का कलंक मिटाने और स्वतन्त्रता आन्दोलन को गतिशील बनाने का काम ऋषि सत्ता द्वारा सौंपा गया। वे आजीवन उसी प्रयोजन हेतु विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम अपनाते हुए संलग्न रहे।

उनने शिवाजी को महाराष्ट्र में- प्रताप को राजस्थान में और छत्रसाल को बुन्देलखण्ड में महाप्रभु प्राणनाथ के माध्यम से इस प्रयोजन के लिए कटिबद्ध किया। उनका प्रत्यक्ष और परोक्ष मार्गदर्शन किया। इन तीनों की पात्रता परखने के लिए कई कसौटियाँ लगाई और वे सब पर खरे उतरे। उन तीनों के द्वारा स्वतन्त्रता संग्राम को अग्रगामी बनाने तथा व्यापक वातावरण बनाने के लिए जो कुछ किया, उसका घटनाक्रम इतिहास के पृष्ठों पर भली-भाँति पढ़ा जा सकता है।

समर्थ का अधिकाँश समय परिभ्रमण और जन संपर्क में बीता। उनने जन-जन में स्वाधीनता की आकाँक्षा जगाई और नव चेतना का अलख जगाया। तीनों प्रमुख शिष्यों को अभीष्ट जन सहयोग उपलब्ध कराने के लिए उनने दूरगामी योजनाएँ बनाई और उन्हें पूरा करने में जुट गये। उनने 700 प्रमुख स्थानों पर सस्ती लागत के महावीर मन्दिर बनवाये। उनके सबके साथ व्यायामशालाएँ जुड़ी हुई थीं और सत्संग की नियमित व्यवस्था जोड़ी गई। इसका प्रतिफल यह हुआ कि इन देवालयों के संपर्क में व्यायामशाला या सत्संग के माध्यम से प्रभावित होने वाले व्यक्ति स्वतन्त्रता आन्दोलन की आवश्यकता पूरी करने में लगे रहे। शस्त्र, सैनिक और अर्थ-व्यवस्था इन देवालय केन्द्रों द्वारा एकत्रित करके प्रमुख मोर्चे पर भेजी जाती थी।

समर्थ की माता अन्धी हो गई थी। यह समाचार उनने सुना तो घर गये और माताजी के कष्ट का उपचार पूरा होने तक घर ही रहे। परिवार के प्रति सद्भावना रखने से वे विमुख नहीं हुए।

प्रचार एवं संगठन के निमित्त वे हर वर्ष ‘चाफल’ गाँव में रामनवमी के दिन एक बड़ा समारोह करते थे। संपर्क का उत्साह ठण्डा न पड़ जाय, इसके लिए उन सबको एक जगह एकत्रित करके सामूहिकता का वातावरण बनाना भी उन्हें आवश्यक लगा। आरम्भिक दिनों में उसका सारा खर्च उनके प्रधान शिष्य छत्रपति शिवाजी उठाते थे। पीछे समर्थ ने इसे अनुपयुक्त समझा और घर-घर से अन्न एकत्रित करने की एक नई शैली अपनाई।

इस बहाने संपर्क भी सधता था और सम्मिलित होने के लिए आग्रहपूर्वक निमन्त्रण भी किया जाता। इस उपाय को अपनाते ही उपस्थिति हर वर्ष बढ़ने लगी और वह समारोह एक बड़े धार्मिक मेले के रूप में विकसित होने लगे। एक वर्ष का प्रचार कार्य जितना उद्देश्य पूरा करता था, उतना ही इस एक समारोह से पूरा होने लगा।

समर्थ ने इन सब कार्यों के बीच अपना साहित्य सृजन कार्य भी जारी रखा। उनकी रचनाओं में “दास-बोध” को सर्वोत्तम समझा जाता है। महाराष्ट्र में उसे उतना ही सम्मान प्राप्त है, जितना कि उत्तरप्रदेश में रामायण को। दासबोध के अतिरिक्त भी उनने आत्माराम-मनचिश्लोक- पंचभान, मान पंचक, पंजीकरण बोध, करुषाष्टक आदि पुस्तकों का सृजन किया।

समर्थ के समकालीन सन्त तुकाराम भी थे। उनकी भी उस समय बड़ी ख्याति और मान्यता थी। उनने अभंग रचे। पण्डितों द्वारा ऐसी रचना का निषेध करने पर उनने वे रचनाएँ नदी में फेंक दी पर ये प्रभु कृपा से कुछ ही समय में तैरती हुई तुकाराम के निवास तक जा पहुँची एवं उन्हें सबकी मान्यता मिली। वे गृहस्थ थे। पत्नी द्वारा गन्ने से पीटने और उनके हँसते रहने की कथा प्रख्यात है। सन्त तुकाराम ने भी धर्म प्रचार से स्वतन्त्रता की पृष्ठभूमि बनाने का ही काम किया। उनका समर्थ के कामों में पूरा योगदान था।

समर्थ गुरु रामदास के अनेकों सिद्धि चमत्कार प्रसिद्ध हैं। एक बार उन्होंने शिवा से सिंहनी का दूध मँगाया था वह सिंहनी उन्हीं की मानसिक सृष्टि थी। कइयों को उनने मृतक से जीवित किया था।

शिवाजी ने अपने राज्य सिंहासन पर भरत की तरह समर्थ की चरण पादुकाएँ स्थापित की थीं और राज्य का स्वामित्व उन्हीं का माना था। राणा प्रताप जी मेवाड़ के राज्य को एकलिंग का मानते थे। मुनीम रहकर काम करने की यह पद्धति त्याग और कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से एक उच्चकोटि की प्रक्रिया है।

सन् 1682 में उनका स्वर्गवासी हुआ। राम नाम का जयघोष करते हुए उनने प्राण त्यागे। मरण समय निकट आया जानकर वे एकान्त सेवन करने लगे थे और प्रातःकाल थोड़ा दूध ही सेवन करते थे।

उनका सारा जीवन देश की स्वतन्त्रता का ताना-बाना बुनने में ही गया। इस प्रयास के समय दिल्ली की बादशाहत जो महाराष्ट्र एवं दक्षिण भारत पर भी कब्जा करना चाहती थी पश्त हिम्मत होती और सीमित दायरे में सिकुड़ती चली गई।

सूक्ष्म शरीर से समर्थ के कार्य- जिस प्रकार कबीर ने अपने जीवन काल में तथा मरणोत्तर काल में निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए प्रयास जारी रखे, उसी प्रकार समर्थ ने भी सूक्ष्म शरीर के प्रयत्न कार्य सीमित ही कर सके, जिन्हें इतिहासकारों ने उनकी जीवन गाथा में लिपिबद्ध किया है। पर वे कार्य अगणित हैं जिन्हें वे जीवन काल में सूक्ष्म शरीर के द्वारा दूरदर्शी लोगों को भी अंतःप्रेरणा देकर करते रहे और मरने के उपरांत नया जन्म मिलने तक की मध्यावधि में और भी अच्छी तरह-और भी व्यापक क्षेत्र में सम्पन्न करते रहे।

उनकी सूक्ष्म प्रेरणा से बाजीराव पेशवा, तात्या टोपे, लक्ष्मीबाई रानी आदि कितने ही महाराष्ट्रियन स्वतन्त्रता संग्राम के लिए प्राणों की बाजी लगाकर लड़ते रहे।

सन्त समुदाय में उन्होंने दक्षिण भारत में सन्त त्यागराज खड़े किये। जिन्होंने उस क्षेत्र में धर्म प्रचार के साथ-साथ समर्थ का काम भी किया। इसके अतिरिक्त भी और भी कितने ही उनके अनुयायी प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से उनकी जलाई ज्वाला के ईंधन बनते रहे। उनके न रहने के उपरान्त स्वतंत्रता की लड़ाई अगणित ज्ञात और अविज्ञात आत्माओं द्वारा लड़ी जाती रही। और चेतना धीमी नहीं पड़ी वरन् दिन-दिन प्रदीप्त होती गई। उनका प्रयास काँग्रेस आन्दोलन में विकसित होता गया और लोकमान्य तिलक जैसी प्रतिभाएँ उन्हीं की जोती बोई भूमि में विशाल वृक्ष बनकर पल्लवित हुईं।

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