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Magazine - Year 1985 - Version 2

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तस्मिन ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा

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पदार्थ विज्ञान का जन्म और अभिवर्धन कुछ शताब्दियों का है जबकि सृष्टि का जीवन अरबों, खरबों वर्षों का है। हर्मनबेल के अनुसार “हम प्रकृति के रहस्यों का परिचय प्राप्त करने की दिशा में क्रमशः बड़ रहे हैं। इसमें अधीर नहीं हो रहे हैं, फिर चेतना के रहस्यों को जानने के लिए विज्ञान की वर्तमान अपरिपक्व स्थिति को ही क्यों प्रमाणभूत आधार मानें? हमें धैर्य रखना होगा और वैज्ञानिक प्रगति की उस स्थिति के लिए प्रतीक्षा करनी होगी, जहाँ पहुँचकर यह चेतना विज्ञान को भी अपने साथ सम्मिलित कर सके और अपने विकसित ज्ञान के आधार पर जीवन तन्त्र की व्याख्या कर सके।”

शरीर शास्त्री सर चार्ल्स शैरिंगटन ने अपनी पुस्तक “मैन आन हिज नेचर” में लिखा है- चेतना के स्तर की परीक्षा हम ऊर्जा नापने के उपकरणों से नहीं कर सकते। भावनाएं और विचार धाराएं किस स्तर की हैं और व्यक्ति के आदर्श एवं आचरण किस श्रेणी के हैं यह जानने के लिए किसी शरीर का रासायनिक विश्लेषण करने से क्या काम चलेगा? व्यक्तित्व अपने आप में एक रहस्य है उसकी गहराई में उतरने के लिए वे परीक्षण पद्धतियाँ असफल ही रहेंगी जो कोशिकाओं एवं ऊतकों की संरचना तक ही साथ लेकर समाप्त हो जाती है। मनुष्य का कलेवर ही पदार्थों से बना है इसीलिए इसी का विश्लेषण, वर्गीकरण तत्व परीक्षा द्वारा सम्भव हो सकता है। चेतना एवं उसके स्तर जिस संरचना से बने हैं उसका निरूपण एवं सुधार परिवर्तन करने के लिए भौतिकी के नियम, परीक्षण एवं उपकरण निरर्थक सिद्ध होंगे।

भौतिकी में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. ई.पी. बिगनर कहते हैं कि “आधुनिक भौतिकी के सिद्धान्तों से चेतना की संरचना-स्थिति एवं उतार-चढ़ावों की व्याख्या नहीं हो सकती। जिस कारणों से चेतना में उभार उतार, चढ़ाव, परिवर्तन आते हैं और उत्थान पतन के आधार खड़े होते हैं वे तत्व कुछ और ही हैं। वस्तुओं को जिस आधार पर प्रभावित, परिवर्तित किया जाता है वे सिद्धान्त चेतना को परखने और सुधारने के लिए किसी प्रकार काम नहीं आ सकते। मस्तिष्क विद्या शरीर के एक अवयव की हलचलों का विश्लेषण तो कर सकती है, पर उस आधार पर किसी के विचार बदलने या सम्वेदनाओं को प्रभावित करने जैसे प्रयोजन बहुत ही स्वल्प मात्रा में हो सकते हैं। भौतिकी के आधार पर चेतना की व्याख्या करने के लिए जो प्रयत्न किये जाते हैं उनमें विसंगतियाँ ही भरी रह जाती हैं।”

इन प्रतिपादनों के बावजूद चेतना जगत की- गुत्थियों का हल सुलझाने में ब्रह्मांड के कुछ क्रिया-कलाप हमारी कुछ मदद अवश्य करते हैं। ब्रह्मांड भौतिकी में ब्राह्मी चेतना की झाँकी ढूँढ़ने का प्रयास करने वाले दर्शन की ओर रुझान रखने वाले वैज्ञानिक कहते हैं कि “यह ब्रह्मांड निरन्तर बढ़ और फैल रहा है। विराट् की पोल में प्रत्यक्ष ग्रह-नक्षत्र किसी असीम अनन्त की दिशा में द्रुतगति से भागते चले जा रहे हैं। यों यह पिण्ड अपनी धुरी और कक्षा में भी घूमते हैं, पर हो यह रहा है कि वह कक्षा धुरी और मण्डली तीनों ही असीम की ओर दौड़ रहे हैं। सौर-मंडल एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। यह दौड़ प्रकाश की गति से भी कहीं अधिक है। जो तारे कुछ समय पूर्व दिखते थे वे अब अधिक दूरी पर चले जाने के कारण अदृश्य हो गये।” खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार इस प्रक्रिया को विस्तार भी कह सकते हैं- विघटन भी, और यह भी कह सकते हैं कि इसका अन्त एकता में होगा। गोलाई का सिद्धान्त अकाट्य है। प्रत्येक गतिशील वस्तु गोल हो जाती है। स्वयं ग्रह-नक्षत्र इसी सिद्धान्त के अनुसार चोकोर, तिकोने, आयताकार न होकर गोल हुए हैं। यह ब्रह्मांड भी गोल है। नक्षत्रों की कक्षाऐं भी गोल हैं। इस गोल वृत्त की लपेट में आगे यह दौड़ अन्त में किसी न किसी बिन्दु पर पहुँचकर मिल ही जायेगी और इस वियोग प्रक्रिया को संयोग में परिणत होना पड़ेगा।

ब्रह्मांड के निरन्तर विकास का अर्थ यह हुआ कि सृष्टि में जो कुछ भी है चाहे वह पदार्थ हो, ऊर्जा हो, चुम्बकत्व हो, प्रकाश हो अथवा विचार-सत्ता जो भी स्थूल या सूक्ष्म अस्तित्व में है वह सब एक ही केन्द्र बिन्दु पर समाहित है। इस संदर्भ में भारतीय दर्शन और वैज्ञानिक दोनों की धारणायें एक जैसी हैं। आरम्भ में एक महापिण्ड था, यह विज्ञान की मान्यता है एवं यह भी कि उस ब्रह्मांड में किसी समय एकाएक विस्फोट हुआ। विस्फोट से समस्त दिशाओं में आकाश-गंगा के रूप में ही पदार्थ बह निकला। अब तक की शोधों के अनुसार ब्रह्मांड में 19 अरब आकाश गंगायें हैं और हर आकाश-गंगा में 10 अरब तारे हैं।

सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सवा नौ करोड़ मील है। वहाँ से यहाँ तक प्रकाश आने में सवा आठ मिनट लगते हैं। यदि किसी तारे का प्रकाश पृथ्वी तक 8 हजार वर्षों में आता है तो उसका अर्थ यह हुआ कि वह पृथ्वी से 47 पदम मील दूर है कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में ही अरबों वर्ष लग जायेंगे अर्थात् उस दूरी का तो अनुमान ही असम्भव है। इस तरह सृष्टि की अनन्त गहराई में अनन्त प्रकृति अनन्त रूपों में विद्यमान है।

भारतीय दर्शन की मान्यता चेतना को मूल मानकर ज्यों की त्यों है। आरम्भ में एक ही तत्व परमात्मा पिण्ड रूप में था। उसके नाभि देश से “एकोऽहं बहुस्यामि” (मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ) इस तरह की स्फुरणा, भावना या विचार उठी। इससे वह फट पड़ा और महा प्रकृति की रचना हुई, उसमें सत्, रज, तम तीन गुणों का सम्मिलन था, इन्हीं से सृष्टि में जीवन का निर्माण हुआ और सृष्टि के विस्तार की तरह ही 84 लाख जीव योनियों का निरन्तर विस्तार होता चला गया। जिस तरह ब्रह्मांड विकसित हो रहा है। नाना प्रकार की जीवन सृष्टि का भी विकास हो रहा है, यह सब अत्यधिक करुणा मूलक स्नेहजनक मातृ संज्ञक रूप में चल रहा है। भौतिक आध्यात्मिक दोनों की दृष्टियों में आकाश-गंगायें इस विशाल माता का हृदय कही जा सकती हैं।

ब्रह्मांड के विस्तार की व्याख्या अपने जीवन के घटनाओं व दैनन्दिन जीवन की गतिविधियों से जोड़ते हुए भौतिक वैज्ञानिक डॉ. वैलेस टैकर ने की है। वे लिखते हैं- “विगत बसन्त जब हम और हमारी पत्नी अपने मकान के नजदीक गाँव की एक सड़क पर जा रहे थे तो फली फटने जैसी विचित्र आवाज से हम लोग चौंक गये। सुबह के धुँधलके में देखा तो पाया, सचमुच ही पास की जंगली घास की कलियाँ फट रही थीं। कलियाँ फट-फट कर अपने बीज आस-पास फैला रही थीं। फटने की यह आवाज मुश्किल से एक मिनट रही होगी। इस प्रकार जंगली वनस्पति की वह एक पीढ़ी समाप्त हो गई, कईयों में बंट गयी। इसी प्रकार आसपास ही वहीं अथवा किसी के बगीचे में अन्य फलियाँ भी फटकर बीज फैला रही होंगी।

वैलेस का कहना है- फलियों की तरह प्रकृति में भी ज्वालामुखियों एवं सुपर नोवा का विस्फोट होता रहता है। इन विस्फोटों के माध्यम से ही प्रकृति अपने अन्तराल में छिपी बीजों की सम्पदा पृथ्वी सतह तक पहुँचाती है। यदि यह विस्फोट न हो तो बीज अन्दर ही रह जाय। इस प्रकार जब कोई फली फूटती है तो उसके बीज आस-पड़ौस में फैल जाते हैं और समयांतर में उनसे फिर वैसी ही पौध उत्पन्न हो जाती है। किन्तु इन बीजों का एक गाँव से दूसरे गाँव तक इस विधि द्वारा पहुँचना काफी लम्बा समय ले सकता है, अथवा ऐसा भी हो सकता है कि दूसरे गाँव तक कभी पहुँचे ही नहीं।

ठीक इसी प्रकार भयंकर ज्वालामुखी अथवा विशालकाय उष्णोत्स के प्रस्फुटन के बिना जल भी, जो कि उच्चस्तरीय प्राणियों के विकास के लिए एक आवश्यक घटक माना जाता है, पृथ्वी के गर्भ में ही छिपा पड़ा रहता और किसी प्रकार पृथ्वी पर जीवन सम्भव न हो पाता। जल जैसे अनिवार्य तत्व की उत्पत्ति भी उस महा विस्फोट का परिणाम है।

यह सूर्य, यह पृथ्वी एवं इसके प्राणी सम्भवतः आज नहीं होते, यदि प्रकृति के विस्फोट न हुए होते। धूल और गैस के विशालकाय बादल, जिससे हमारा सौर परिवार बना, सम्भवतः अभी भी अव्यवस्थित बेडौल बादल ही बने रहते, यदि किसी अन्तर तारक कम्पन तरंग- सुपर नोवा ने बादलों को ठोस रूप में परिणत न कर दिया होता।

यह ज्ञातव्य है कि हर 50 साल में हमारी आकाश गंगा के किसी विशालकाय तारे में सुपर नोवा विस्फोट होता है। इस विस्फोट से अन्तरिक्ष में बड़े पैमाने पर विकिरण एवं पदार्थ किसी भावी खगोलीय पिण्ड के “‘बीज’ के रूप में आते हैं और पूरी आकाश गंगा में एक तीव्र कम्पन तरंग उत्पन्न करते हैं। यह कम्पन तरंग अन्तर तारक गैसों को गर्म करती है। बादलों के छोटे टुकड़ों को वाष्पीभूत करती है और बड़ों पर गहरा दबाव डालती है, जिससे वे बादल उसी स्थान पर अपने स्वयं के गुरुत्व बल के कारण दबकर ठोस रूप में परिणत हो जाते हैं और नये तारे का निर्माण करते हैं।

सुपर नोवा ऐसे विस्फोट हैं जो आकाश-गंगा के इंजन को विकास की दिशा में आगे की ओर बढ़ाते हैं। इस विस्फोट से अन्तर तारक गैसों में भारी-भारी तत्व आ जाते हैं। फिर इसे विस्फोट एवं अपनी विकिरण ऊर्जा द्वारा गर्म करते हैं। तत्पश्चात् अपनी भयंकर ऊर्जा एवं कम्पन से इसमें हलचल पैदा करते हैं और इस नये प्रकार नये तारक पिण्डों के निर्माण में अपना योगदान देते हैं। इस प्रकार बने तारों में से कुछ तो अत्यन्त विशालकाय होते हैं। अरबों वर्ष पहले पृथ्वी पर भी प्राकृतिक विक्षोभों की श्रृंखला द्वारा ही जीवन का उद्भव सम्भव हुआ। तारक पिण्डों का अपना एक जीवन चक्र होता है, जिसमें वे घूमते रहते हैं। तारों के निर्माण के कुछ काल पश्चात् उनमें विस्फोट होता है। इस विस्फोट से वे नये-नये भारी तत्वों को अन्तरतारक गैसों में समाविष्ट करते हैं। फिर इनसे दूर खगोलीय पिण्ड का निर्माण होता है जो कुछ काल पश्चात पुनः सुपर नोवा विस्फोट से फटते हैं। इस प्रकार खगोल ब्रह्मांड में सृजन विध्वंस का यह क्रम सदा चलता रहता है।

ब्रह्मांड भौतिकी के इस विवेचन एवं विस्फोट विस्तार के माध्यम से दृश्य ब्रह्मांड के स्वरूप की व्याख्या से उस परब्रह्म की कार्य पद्धति का एक आभास भर मिलता है। यह विराट जब स्थूल परिकर के रूप में उस प्रचण्ड रूप में क्रियाशील है तो उसकी चेतन सत्ता कितनी सुव्यवस्थित, सुनियोजित होगी इसकी कल्पना भर की जा सकती है। ऋग्वेद में ऋषि ने उसे उपमा दी है- “एको विश्वस्य भुवनस्य राजा” तथा आगे यह भी कहा है- “तस्मिन ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा” (उस परमात्मा में ही सम्पूर्ण लोक स्थित हैं।) सेंट आगस्टीन का यह कथन सच ही है कि ईश्वर एक वृत्त है, जिसका केन्द्र तो सर्वत्र है, किन्तु वृत्त रेखा कहीं नहीं।

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