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Magazine - Year 1985 - Version 2

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ध्यान धारणा का आधार और प्रतिफल

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मस्तिष्क एक छोटा किन्तु अत्यन्त शक्तिशाली बिजलीघर है। उसमें से अगणित दिशाओं में प्रवाह चलता है। इनमें कुछ तो शरीर के भीतर हैं जो जीवनचर्या से सम्बन्धित अनिवार्य जैविक गतिविधियों को चलाते हैं। कुछ ऐसे हैं जो बाह्य जीवन से सम्बन्धित हैं। भावना, आकाँक्षा, विचारणा, क्रिया का निर्धारण बाहर की परिस्थिति से सम्बन्धित होता है। इसमें मस्तिष्क के सचेतन भाग की अधिकाँश क्षमता नियोजित रहती है।

श्वास-प्रश्वास, आकुँचन-प्रकुँचन जैसी आंतरिक क्रियाओं का नियन्त्रण तो कठिन है। यह सब स्वसंचालित अचेतन भाग (आटोनॉमिक नरबस सिस्टम) द्वारा गतिशील रहता है। उसमें खर्च होने वाली बिजली पर नियन्त्रण नहीं हो सकता। पर वाह्य जीवन की समस्याओं में जो शक्ति खर्च होती है, उसे ध्यान द्वारा रोका जा सकता है। इस निग्रह से जो शक्ति एकत्रित होती है उसे अभीष्ट प्रयोजनों में लगाकर असाधारण प्रतिफल प्राप्त किया जा सकता है।

पाया गया है कि ध्यान की दशा में व्यक्ति के मस्तिष्क और शरीर में कई तरह की जैव रासायनिक प्रक्रियाएं सक्रिय होती हैं। कई अवाँछनीय प्रक्रियाएं उस समय निष्क्रिय हो जाती हैं। इसलिए अन्तर्मुखी ध्यान की स्थिति को विचार के सूक्ष्म स्तर तक उस समय तक उतारते जाना चाहिए जब तक मन विचार के सूक्ष्मतम अमूर्त्त स्तर तक न पहुँच जाये और उनके मूल स्त्रोत की खोज न कर ले। इस प्रक्रिया से चेतन मन की शक्तियों का विस्तार होता है। फलतः मनुष्य का सम्बन्ध सृजनात्मक बौद्धिकता से जुड़ता और उसी परिणति को प्राप्त होने लगता है। इस प्रक्रिया को हम केवल श्रमहीन शारीरिक मानसिक क्रिया कह सकते हैं जो एक साधारण मानव भी करने में सक्षम हो सकता है। केवल घण्टे भर के दैनिक अभ्यास से मानव प्रसन्नचित्त और सृजनशील बना रह सकता है।

ध्यान किसी भौतिक प्रयोजन में भी लगाया जा सकता है और अध्यात्म उद्देश्य के लिए भी। वैज्ञानिक, कलाकार, शिल्पी, साहित्यकार अपना ध्यान इन कार्यों में संलग्न करके तद् विषयक सफलताएं पाते हैं और जिन्हें अन्तर्मुखी होकर आत्मशोधन करना है अथवा प्रसुप्त शक्ति यों को जागृत करना है वे उस दिशा में प्रगति करते हैं। प्रयोजन विशेष के अनुसार ध्यान को वैसा मोड़ दिया जा सकता है। इस प्रक्रिया की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर भी अब विशद अनुसन्धान किया जा चुका है।

ध्यान साधना से शरीर-क्रिया-विज्ञान पर पड़ने वाले सम्भावित प्रभावों की खोज का कार्य “न्यूरोफिजियॉलाजिस्ट” गणों ने किया है। अमेरिका, इंग्लैण्ड, पश्चिमी जर्मनी में ही नहीं अपितु भारत के विभिन्न संस्थानों में भी इस प्रकार व्यापक कार्य हो रहा है। त्रिवेन्द्रम, बैंगलौर, मद्रास व दिल्ली के चिकित्सा संस्थानों ने इस विद्या पर अनुसंधान हेतु विशेष केन्द्र खोले हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान भी दिल्ली में डा. छिन्ना एवं डा. बलदेव सिंह ने आज से 9 वर्ष पूर्व यह कार्य प्रायोगिक स्तर पर किया था। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मननशील एकाग्र ध्यानस्थ मस्तिष्क में अनेकों विशेषताऐं विकसित होती हैं।

ध्यान से शरीर की चयापचय प्रक्रियाएं सामान्य से कम क्रियाशील हो जाती हैं। इलेक्ट्रो एन सेफेलोग्राफ (ई. ई. जी.) की सहायता से वैज्ञानिकों ने डीप डी.सी. ब्रेन पोटेन्शियल प्राप्त कर व्यक्ति के मस्तिष्क की स्वप्नावस्था, सुप्तावस्था, जागृत एवं ध्यान तथा समाधि की मुद्राओं में हो रहे परिवर्तनों का अध्ययन किया है। मानवी मस्तिष्क में करोड़ों न्यूरान्स हैं जो सूचना को एक सिरे से दूसरे तक पहुँचाते हैं। केन्द्रकों में इन सूचनाओं का विवेचन विश्लेषण होता है। तत्पश्चात् शरीर के सम्बन्धित अंगों को निर्देश जाता है। मस्तिष्कीय स्नायु तन्त्र में सूचना सम्प्रेषण वस्तुतः एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है। “एसिटाइल कोलीन” नामक स्नायु रसायनों के माध्यम से जो विद्युत आवेश धारण किये होते हैं, सन्देशों का आदान-प्रदान एक प्रसुप्त केन्द्रों को जगाने का काम चलता रहता है। इस तरह मस्तिष्क एक अत्यन्त उच्च क्षमता वाला जैव रासायनिक विद्युत संयन्त्र है। अन्तर्मुखी ध्यान की स्थिति में क्रियाशीलता आने पर जो भी परिवर्तन होते हैं उन्हें ई. ई. जी. में देखा जा सकता है। साथ ही रक्त के स्नायु रसायनों का उपकरणों के माध्यम से मापन कर जाना जा सकता है कि शरीर के अन्दर क्या प्रतिक्रिया हुई?

मस्तिष्क में विद्यमान विद्युत स्फुल्लिंग के प्रवाह द्वारा छोड़ी गयी तरंगें चार प्रकार की होती हैं। अल्फा, बीटा, थीटा एवं डेल्टा। अल्फा तरंगें 8 से 13 प्रति सेकेंड, थीटा तरंगें 5 से 7 प्रति सेकेंड, बीटा तरंगें 13 से 30 प्रति सेकेंड एवं डेल्टा तरंगें 0.5 से 4 चक्र प्रति सेकेंड पूरा करती हैं, इसी आधार पर इनका वर्गीकरण है। शरीर शिथिल हो तो भी अन्तर्मुखी ध्यान की स्थिति में मस्तिष्क पूर्णतः क्रियाशील पाया गया है एवं अल्फा तरंगें मस्तिष्क के अग्रभाग से उभरती देखी गयी हैं, जिसे प्रिफ्रन्टल लोब, फ्रण्टल कार्टेक्स कहते हैं।

इसी प्रकार जब बीटा तरंगों का अध्ययन अन्तर्मुखी ध्यान के दौरान किया गया तो यह देखा गया कि बीटा तरंगें भी मस्तिष्क के अग्रभाग की ओर से ही उभरती हैं बीटा तरंगों के दौरान योगी को गहरी नींद आने का भी अनुभव होता है अतः निष्कर्ष निकाला गया कि सम्भवतः इस अल्पकालीन नींद के परिणाम स्वरूप ही योगी ध्यान के अन्त में मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से जागरूक स्वस्थ एवं हलका-फुलका महसूस करता है।

मस्तिष्क का शारीरिक क्रियाओं पर पूर्ण आधिपत्य होने से ध्यान की व्यवस्था में दिन की धड़कन, रक्तवाहिनियों में रक्त दबाव में कमी एवं श्वास की दर में कमी आ जाती है। इसके परिणाम स्वरूप ही शरीर में मेटावोलिक गतिविधि घट जाती है। इसकी परिणति होती है तनाव से पूर्ण मुक्ति और शरीर व मस्तिष्क को पूर्ण विश्रान्ति।

श्वास क्रिया शिथिल होने से शरीर की आक्सीजन की पूर्ति में कमी आ जाती है। परीक्षण के दौरान यह मात्रा 100 मिलिलीटर रक्त में 110.4 से घटकर 80 मिलिग्राम हो जाती है। इसके परिणाम स्वरूप माँसपेशियों में होने वाली क्रियाओं के फलस्वरूप रक्त में विद्यमान अम्ल रूपी विष “लैक्टेट” काफी मात्रा में कम हो जाता है। ये सारी रासायनिक प्रक्रियाएं ध्यानस्थ साधक के शरीर में होती देखी व उनकी फलश्रुतियाँ बहिरंग में प्रत्यक्षतः पायी जा सकती हैं। ध्यान की इस उच्चावस्था में हल्की योग निद्रा आने लगती है अर्थात् शरीर शिथिल होकर अपने हिस्से की विद्युत भी मनोनिग्रह के साथ किये गये ध्यान प्रयोजन में नियोजित कर देता है फलतः वह अधिक शक्तिशाली हो जाता है। इस स्थिति को “सविकल्प” या “निर्विकल्प” समाधि कहते हैं। इस स्थिति में मनोबल इतना सशक्त हो जाता है कि अभीष्ट प्रयोजनों को भली प्रकार पूरा कर सके, चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक। ध्यान की महिमा का यही आधार है।

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