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Magazine - Year 1986 - Version 2

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आत्मदर्शन का दर्पण प्रयोग

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भारत में तैंतीस कोटि देवताओं की मान्यता है। जैन, बौद्ध, आदि के अलग-अलग देवता हैं। जनजातियों आदिवासियों में अपने-अपने कबीले और गाँव के अलग-अलग देवता हैं। मिश्र, रोम, जापान, चीन के देवताओं की प्रायः इतनी ही बड़ी संख्या है। इसके अतिरिक्त सतियों, पीरों, ऋषियों की मान्यता भी उसी गणना में सम्मिलित होती है। ग्राम देवताओं या कुल देवताओं क्षेत्र-देवताओं की संख्या इसके अतिरिक्त है।

इनमें से किन्हें माना पूजा जाये यह एक विचित्र समस्या है। विशेषतया जब एकेश्वरवादी एक ही ब्रह्म को ब्राह्मणों द्वारा अनेक प्रकार से कहा गया बताते हैं और वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार अपनी आत्मा ही अपने लिए परमेश्वर है।

इष्ट धारण देव-पूजन की आवश्यकता इसलिये पड़ती है कि विपत्तियों में अपनी सहायता करें और समृद्धियों सफलताओं को बढ़ावें। अपनी पीठ पर किसी समर्थ की छत्रछाया अपने ऊपर बनी रहे। देव पूजन उपरोक्त आधारों में से सर्वश्रेष्ठ यह है कि जब प्रतिमायें, मूर्तियाँ काल्पनिक ही हैं वास्तविक नहीं तो अपनी आत्म-सत्ता को ही अपने लिए एक स्वतन्त्र देव क्यों न मान लिया जाये। प्राचीन काल में जब विशाल भारत की आबादी तैंतीस कोटि थी, तब देवताओं की मान्यता भी तैंतीस कोटि ही थी। इसका तात्पर्य यह हुआ कि हर व्यक्ति की अपनी एक स्वतन्त्र मान्यता थी। जब सृष्टि के प्राणियों में से किसी का चेहरा किसी से नहीं मिलता और हर पत्ते की कतरन न्यारी है तो अपने लिये एक स्वतन्त्र देवता का अस्तित्व मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। वेदान्त दर्शन के अनुसार तो इस मान्यता का समर्थन ही होता है। जिसमें सोऽहम्, शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम्, तत्त्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म के रूप में परमेश्वर की विवेचना की गई है। अन्य सिद्धान्तों की तुलना में यह इसलिये भी अधिक उत्तम है कि इससे किसी दूसरे का पराधीन परावलम्बी नहीं होना पड़ता। अपने स्वाभिमान और स्वावलम्बन की सहज रक्षा हो जाती है। सूफी सन्तों ने भी इस मान्यता का समर्थन किया है। मंसूर जैसे सन्त प्राण संकट उत्पन्न होने पर भी इस सिद्धान्त को यथार्थ बताते रहे। उन्होंने शूली पर चढ़ते समय ‘अनल हक’ कहा।

धर्म शास्त्रों में अन्य मन्तव्यों की तरह आत्मा में परमात्मा के दर्शन करने की बात पर कम जोर नहीं दिया है। वेदांत, प्रतिपादन का समर्थन आधुनिक बुद्धिवाद और विस्तारवाद भी करता है।

जीव को ईश्वर का अंश भी माना जाता है। उदाहरण के रूप में लहरों पर चमकने वाले सूर्य को एक ही तत्व का प्रतिबिम्ब दीखने की बात कही जाती है। घटाकाश, मठाकाश का उदाहरण यही सिद्ध करता है। ब्रह्म की व्याख्या विवेचना भी तत्त्वदर्शियों ने इसी प्रकार की है।

उपासना की दृष्टि से आत्म दर्शन, या ईश्वर दर्शन का यह स्वरूप सर्वोत्तम प्रतीत होता है कि अपने भीतर के परब्रह्म परमात्मा की झाँकी की जाये। इसके लिये उपचार माध्यम यह है कि एक बड़ा या दर्पण सुसज्जित रूप में सामने रखा जाये। उसमें जो अपने शरीर की छवि दृष्टिगोचर होती है उसे दिव्य देवालय माना जाये और उसके भीतर निराकार भगवान की स्थापना अपनी प्रखर भावना के आधार पर की जाये।

मनुष्य में कई क्षुद्रतायें एवं त्रुटियाँ भी होती हैं। उन्हें उसी प्रकार माना जाये जैसा कि सूर्य, चन्द्र पर कभी-कभी ग्रहण लग जाता है। होली के हुड़दंग में भी कभी-कभी शरीर और कपड़ों पर कीचड़ या रंग पड़ जाते हैं उस समय वह कुरूप लगता है किन्तु जब साबुन लगाकर उस भद्दे रंग को साफ कर डाला जाता है तो वह पूर्ववत् अपने प्राकृतिक स्वरूप में आ जाता है। दोष-दुर्गुण आत्मा के स्वभाव में नहीं हैं। वह तो सत्, चित्, आनन्द स्वरूप हैं। मलीनतायें प्रकृति की विकृतियाँ हैं।

मल मूत्र त्यागते समय मनुष्य गन्दा गलीज लगता है। पर जब वह शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लेता है तो उसके चरण छूने, गले मिलने, गोदी में उठाने से किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। यही अवधारण अपने दोष-दुर्गुणों के सम्बन्ध में रखनी चाहिये। वे पश्चाताप, प्रायश्चित एवं रीति-नीति बदल देने पर शुद्ध किये जा सकते हैं। ऐसे तो मन्दिर की दीवारें भी ऋतु प्रभाव से मलीन हो जाती हैं। पुताई रंगाई के उपरान्त वे पहले की तरह फिर चमकने लगती हैं।

दर्पण में अपनी आकृति को देखते हुये समझना चाहिये कि यह ईंट चूने के द्वारा बनी हुई इमारत है। देवता इसके अन्दर बैठा है। वह निराकार है तो भी विश्व में, काया में भी सर्वत्र समाया हुआ है। उसे देखने के लिए अर्जुन जैसे दिव्य चक्षुओं को प्रकाशवान बनाना पड़ता है। दूध में मक्खन समाया होता है पर वह आँखों से नहीं विवेक से ही जाना जाता है, या मन्थन क्रिया द्वारा पृथक किया जाता है। यही बात पंचतत्व विनिर्मित काया के अन्तराल में समाहित परमात्मा के प्रतिनिधि आत्मा की झांकी करने के रूप में सही उतरती है।

काया में आत्मा की उपस्थिति का विश्वास जमाना दर्पण देखने की क्रिया का प्रथम चरण है। द्वितीय चरण में उसे सर्व समर्थ और स्वभावतः पवित्र होने की भावना का विकास करना होता है। “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है”, इस सत्य की पुष्टि इसी रूप में होती है कि अपनी आत्मा यदि उच्च दृष्टिकोण मान्यताओं और भावनाओं को अपना ले तो उसके गुण-कर्म-स्वभाव में तद्नुरूप परिवर्तन आरम्भ हो जाता है। उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श कर्त्तव्य और शालीन व्यवहार की रीति-नीति अभ्यास में उतर जाने के उपरान्त व्यक्तित्व निखरना और प्रतिभाओं, विभूतियों के चमकने में देर नहीं लगती। पवित्रता और प्रखरता का उदय होते ही व्यक्ति सामान्य से असामान्य स्थिति में पहुँच जाता है। उसे गई गुजरी में डाले रखने का अनाचार तो दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों का ही होता है। पर साथ ही यह बात भी है कि अनात्म तत्व से सम्बन्धित होने के कारण उन्हें धोया और हटाया जाता है।

पूजा वेदी के निकट जाते ही सर्वप्रथम स्वच्छता का काम हाथ में लेना पड़ता है। पुजारी मन्दिर में प्रवेश करने से पूर्व स्नान करता और धुले कपड़े पहनता है। फिर देवालय में प्रयुक्त होने वाले सभी उपकरणों की सफाई करता है। प्रतिभा के आवरण आच्छादनों को सुव्यवस्थित करता है। देवालयों में बुहारी लगाता है। पूजा पात्रों को माँज-धोकर चमकदार बनाता है। इसके पश्चात् पूजा-कृत्य आरम्भ होता है।

दर्पण में अपनी आकृति देख लेना भर ही पर्याप्त नहीं है। वरन् उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कराने जैसी भावना का समावेश करना चाहिये और यह विश्वास गहराई तक जमाना चाहिये कि इस पंच तत्वों से बने शरीर के अन्तराल में दिव्य, देव सत्ता विद्यमान है। उसकी सामर्थ्य में कोई कमी नहीं। अपनी सूझ-बूझ और प्रतिभा को निखारते हुये पुरुषार्थपूर्वक प्रयत्न करने से ही संसार के महामानवों ने अपने को श्रेष्ठ, वरिष्ठ एवं सफल बनाया है। हमें भी यही करना है। सर्वप्रथम इसके ऊपर छाये हुये कुसंस्कारों का परिमार्जन करना है। उन्हें बारीकी से देखना, परखना है। साथ ही उन्हें दूर हटाने का स्वच्छता अभियान हाथ में लेना है। जो दुर्गुण अब तक की आदतों में सम्मिलित रहे हैं, उन्हें गन्दगी मानकर हटाने का प्रबल प्रयास करना चाहिये। आरम्भ में यह उत्साह दर्पण देखते समय भावना क्षेत्र में उतरना होता है। संकल्प को सुदृढ़ करना होता है। पीछे तो वह परिमार्जन क्रिया जीवनचर्या का अंग बन जाती है और अपने ऊपर सुधार की पैनी दृष्टि रखने में निर्दोषता का अंश दिनों-दिन बढ़ता जाता है। भावना की प्रगाढ़ता के अनुरूप दुष्प्रवृत्तियाँ स्वयं ही घटने लगती हैं।

पूजा का तीसरा चरण है प्रतिमा की सुसज्जा। उसे भगवान का प्रतिनिधि मान लेने और स्वच्छता का उपक्रम पूरा कर लेना आवश्यक तो है पर पर्याप्त नहीं। इस कमी को पूरा करने के लिये पूजा उपचार की सामग्री का समर्पण करना, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, जल, अक्षत आदि यह सभी प्रतिमा की सुसज्जा के लिये मन्दिर का वातावरण सुवासित करने के लिये किये जाते हैं। इस स्थूल प्रक्रिया का सूक्ष्म स्वरूप दर्पण साधना के साधक को करना होता है। सद्गुण ही आत्मदेवता की सर्वोत्तम शोभा सज्जा है। संयम, सदाचार, साहस, पराक्रम पुरुषार्थ जैसी उच्च भावनाओं की दृढ़ता जैसे-जैसे अन्तराल में उपस्थित रहने लगती है, वैसे ही आत्मा का सौंदर्य कमल पुष्पवत् निखरने लगता है, भले ही वह शरीर की दृष्टि से काला, कुरूप, रुग्ण या जर्जर क्यों न हो?

बाहरी प्रकाश बाहरी क्षेत्र को प्रकाशवान करता है, और आन्तरिक प्रकाश अन्तःक्षेत्र को। आत्मा ऐसे तो निराकार है पर उसकी कल्पना अंगुष्ठ मात्र प्रकाश ज्योति में की गई है और उसका स्थान उपनिषद्कारों ने हृदय बताया है। अपने शरीर की लक्ष्य की दृष्टि से झाँकी करते हुये आत्म-ज्योति का दर्शन भाव नेत्रों से हृदय स्थान में करना चाहिये। उसका प्रकाश अन्तराल की सभी दिव्य विभूतियों, सूक्ष्म शक्तियों को ज्योतिर्मय करता है। वे सब भी प्रकाशित हो उठती हैं और अन्तराल देवत्व की विशेषताओं से जगमग करने लगता है।

इतनी सी साधना आरम्भ में दस मिनट में की जा सकती है और फिर उसे क्रमशः आधे घन्टे तक बढ़ाया जा सकता है। मन की चंचलता को देखते हुए ध्यान प्रक्रिया एवं भाव साधना को आरम्भ में थोड़े में करके पीछे उसे क्रमशः बढ़ाने की परम्परा है। वही विषय इस प्रसंग में भी निर्वाह होना चाहिए।

यह दर्पण हर काम में न लाया जाये। मात्र पूजा के लिये ही प्रयुक्त किया जाये। उस पर कपड़े का पर्दा पड़ा रहने दिया जाये। उसे तभी उलटा जाना चाहिए, जब साधना करनी हो। प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। पर जिन्हें कोई अन्य समय उपयुक्त जंचता हो वे उसका अपना नियम बना सकते हैं।

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