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Magazine - Year 1986 - Version 2

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तत्त्वज्ञान का द्वितीय सूत्र

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आम आदमी इतना ही जानता है कि शरीर के भीतर कोई आत्मा है जो मरने पर इसमें से निकलकर कहीं स्वर्ग-नरक में चली जाती है या भूत-प्रेत बन जाती है।

यह मान्यता उसी प्रकार गलत है जैसा कि शरीर को अपना स्वरूप या शरीर मानना या ईश्वर को कोई ऐसा व्यक्ति विशेष मानना जिसे कोई भी प्रशंसा करके, नाम लेकर या भेंट पूजा देकर अपनी मनोकामना पूरी कराने के लिए तैयार कर सकता है।

भ्रान्तियों से ऊपर उठकर वस्तुस्थिति को समझा जाये तो आत्मा अजर-अमर है। शरीर रूपी चोले उसे नये-नये बदलने पड़ते हैं। जराजीर्ण होने पर, असंयम बरतने पर या दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर शरीर बदलना ही पड़ता है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति नंग धड़ंग फिरने में संकोच करता है, उसी प्रकार आत्मा को भी शरीर धारण करते रहना पड़ता है। जन्मते या मरते समय कुछ कष्ट उसी प्रकार हो सकता है जैसे कि कसा कपड़ा पहनने या उतारने में थोड़ी खींच-तान करनी पड़ती है। ऐसी कठिनाइयाँ तो रोग होने, चोट लगने, फोड़ा-फुन्सी उठने के समय भी होती रहती है। महिलाओं के प्रसव समय में भी ऐसा ही कष्ट होता है।

स्वर्ग नरक जीव को मनुष्य के शरीर में भी मिल सकता है। जो सन्तुष्ट हैं, प्रसन्न हैं, भविष्य के प्रति आशान्वित हैं, साथियों से तालमेल बिठा लेते हैं, वह स्वर्ग में हैं। जो शरीर से रोगी, मन से उद्विग्न, समाज से तिरस्कृत, पैसे से अभावग्रस्त, पारिवारिक विग्रह से विपन्न है, उसे नरकगामी कहा जा सकता है।

हर दो जन्मों के बीच में कुछ अवकाश मिलता है जिसमें आत्मा निरन्तर कार्य करने की थकान को मिटा सके। इस बीच किसी-किसी को अपनी मानसिक उद्विग्नता के कारण प्रेत-पितर जैसी योनियों में रहना पड़ता है। यह जन्म-मरण का चक्र चलता ही रहता है। भगवान तक को बार-बार अवतार लेने और शरीर धरने पर जन्म-मरण के फेरे लगाने पड़ते हैं।

इन मोटी जानकारियों के अतिरिक्त विशेष ध्यान देने और गम्भीरता पूर्वक समझने की बात यह है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। यह मान्यता एक सीमा तक ही सही है कि मनुष्य परिस्थितियों का दास है उसे परिस्थितियों से विवश होकर दिन गुजारने पड़ते हैं। वातावरण के दबाव या प्रभाव से यह बनता या ढलता है। यह बात दुर्बल मनःस्थिति वालों के लिए ही आँशिक रूप में सही कही जा सकती है। वास्तविकता यह है कि मनुष्य मनोबल का धनी है। उसकी इच्छा शक्ति या संकल्प शक्ति बड़ी प्रचण्ड है। उसका सही उपयोग करने के लिए वह अनुकूलता उत्पन्न कर सकता है। प्रतिकूलताओं से लड़-झगड़ कर वह उन्हें अपने अनुकूल बना सकता है।

आत्म विश्वास न हो तो व्यक्ति को पराधीनता की ही बात सूझती है। वह दूसरों के ही शिकंजे में कसा रहता है। कठपुतली की तरह जिस-तिस के इशारे पर नाचता रह सकता है। किन्तु जिन्हें अपनी शक्ति का ज्ञान है, अपने ऊपर भरोसा है, उन्हें दूसरों की चिन्ता नहीं करनी पड़ती। वे सहयोग दें या असहयोग करें, साथियों के साथ वह बंधा रहकर या तो उनको अनुकूल बना लेता है या अपने लिए दूसरा रास्ता बना लेता है।

आकाँक्षा उत्कट हो तो व्यक्ति उस क्षेत्र के लोगों से संपर्क साधता है। रास्ता पूछता है। अपने चिन्तन और चरित्र को अभीष्ट ढाँचे में ढालता है। इसके उपरान्त उसी स्तर के लोगों के साथ परिचय, संपर्क एवं घनिष्ठ भाव बढ़ाता जाता है। तद्नुरूप एक समुदाय बन जाता है और विचार विनिमय, खोज-बीन, समर्थन-सहयोग से वे साधन भी जुटने लगते हैं जो निर्धारित प्रयोजन के लिए अभीष्ट एवं आवश्यक हैं। पहले धीमे कदम उठते हैं पीछे अनुभव, अभ्यास एवं संपर्क से उन कदमों में तेजी आने लगती है और प्रगति की प्रक्रिया तेजी पकड़ लेती है।

इससे पूर्व आवश्यक यह है कि व्यक्ति नेक और सही हो। झूठे, बेईमान, लवार, दुर्गुणी, व्यसनी लोग अपनी साख गँवा बैठते हैं। फिर उनका न कोई प्रशंसक रहता है, न सहयोगी। मतलब की दोस्ती बनती बिगड़ती रही है। रेत की दीवार की तरह उनका मित्र मण्डल बिखर जाता है और एक दूसरे को उल्लू बनाने के दाँव-पेच चलने लगते हैं। ऐसी दशा में व्यक्ति अकेला ही रह जाता है। अविश्वस्त, अप्रामाणिक और चरित्रहीन का कहीं कोई भरोसा नहीं करता। मतलब निकलते ही पर्दा बदलते और रंग पलटते देर नहीं लगती। ऐसे व्यक्ति चतुरता और धूर्तता के बल पर कुछ कमा लें यह बात दूसरी है। पर वे कोई ऐसा काम नहीं कर सकते जिनके लिए उनके प्रति कहीं सच्ची श्रद्धा उगे और सहयोगी स्तर की चिरस्थायी मैत्री पले।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए व्यक्ति को तत्वज्ञान के दूसरे चरण में प्रवेश करते हुए कुछ सूत्रों को हृदयंगम करना चाहिए।

-मैं स्वभावतः अपने सृजेता की तरह पवित्र और सशक्त हूँ।

-मैं अपने भाग्य का निर्माता आप हूँ। अपनी परिस्थितियों को प्रयत्नपूर्वक बदल सकता हूँ।

-जैसी अपनी मनःस्थिति होगी, वैसी परिस्थितियाँ बनेंगी, वैसे ही साथी मिलेंगे और स्तर के अनुरूप साधन जुटेंगे।

-दुर्गुण शरीर पर चिपकी हुई गन्दगी की तरह है। उन्हें रगड़कर धोया और साफ किया जा सकता है।

-चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की आदर्शवादिता और व्यवहार की शालीनता अपनाकर मनुष्य ऊँचा उठ सकता है, आगे बढ़ सकता है।

इन सूत्रों को बार-बार दुहराया जाये। इन मान्यताओं को गहराई तक अन्तराल में जमाया जाये। इन्हें शाश्वत सत्य माना जाये। साथ ही महा-मानवों की जीवनचर्या पर दृष्टिपात करके इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाये कि इन्हीं तथ्यों के सहारे गई-गुजरी, परिस्थितियों के बीच जन्मे और पले हुए व्यक्ति भी प्रगति के उच्च स्तर तक पहुँचे हैं। कठिनाइयों ने जूझते हुए अपना रास्ता आप बनाते रहे हैं।

इस सृष्टि का कुछ ऐसा विचित्र नियम है कि उठते हुए का अनेकों समर्थन करते हैं और गिरते को सहारा देने की उपेक्षा और गिराने में अपनी बहादुरी समझते हैं। सहयोग सबको देना चाहिए और देखना चाहिए कि अपनी सहायता सत्प्रवृत्तियों के समर्थन में, संवर्धन में जा रही है या नहीं। यदि उलटा हो रहा है, अपने सहयोग का लाभ उठाकर कोई दुर्जन अधिक दुष्टता पर उतारू होते दीख पड़े तो समर्थन से हाथ खींच लेना ही उचित है। मनुष्य जीवन का एक क्रम है कि सहयोग के सहारे ही लोग समर्थ और प्रगतिशील बनते हैं पर इसमें भी एक बात विचारणीय है कि सज्जनों को सहयोग दिया जाये और उन्हीं से सहयोग लिया जाये।

अपना उद्देश्य ऊँचा रखा जाये। अपनी सामर्थ्य और हिम्मत पर भरोसा किया जाये। जो काम हाथ में लिया जाये उसमें समूची तत्परता और तन्मयता दाँव पर लगा दी जाये। काम इस प्रकार किया जाये, मानों उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया गया हो। किसी की इज्जत उसके ठाठ-बाट या कौशल के आधार पर नहीं, इस आधार पर होती है कि उसने किस प्रकार के काम कितनी ईमानदारी और जिम्मेदारी से पूरे किये। ( क्रमशः )

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