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Magazine - Year 1992 - Version 2

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Language: HINDI
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काल को पाटी से बाँधें, सफल बनें

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First 17 19 Last
रावण भी अन्यान्य साधारण मनुष्यों की तरह ही था, पर उसने कौशल इतने अधिक प्रकार के उपलब्ध कर लिए थे कि उसे दस सिर वाला कहा जाता था। दस सिर वाला कोई मनुष्य आज तक न जन्मा है और न भविष्य में जन्म सकेगा, यह मानवीकाय विज्ञान के विपरीत है। दशानन उसका अलंकारिक नाम था, जिससे एक ही संदेश समझा जा सकता है कि उसकी बौद्धिक क्षमता अन्यान्यजनों की तुलना में दस गुनी अधिक थी। उसी के आधार पर वह बलिष्ठता, सम्पदा, पराक्रम, कूटनीति आदि की अनेकानेक विशिष्टताएँ उपार्जित और व्यर्थ कर सका था। सर्व विदित है कि मानसिक विशिष्टता ही अनेकानेक शक्ति सम्पदाओं को अर्जित करने में समर्थ होती है। रावण का बुद्धि कौशल असाधारण रूप से बढ़ा चढ़ा था। इसी तथ्य का प्रतिपादन उसे दशानन नाम देकर किया गया है।

पुलस्त्य ऋषि के साधन रहित तपोवन में उत्पन्न होने पर भी रावण किस प्रकार इतने प्रकार की सिद्धि-सफलताएँ अर्जित कर सका, यह एक टेढ़ा प्रश्न है। आज के समय में तो सामाजिक ढाँचा भी ऐसा है कि उसमें एक दूसरे की सहायता से ही प्रगति पथ पर तेजी से आगे बढ़ सका जा सकता है। इन दिनों अर्थ तंत्र और विज्ञान विद्या भी पहले की अपेक्षा अनेक गुनी बढ़ी-चढ़ी है। ऐसी दशा में यदि कोई मनुष्य किन्हीं क्षेत्रों में असाधारण प्रगति कर सके, अधिक समर्थ-सम्पन्न बन सके तो इसमें कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है। प्रगतिशीलों की विधि-व्यवस्था रीति नीति को बारीकी से समझने पर उसका अनुकरण भी किया जा सकता है, पर पुराने समय में तो ऐसा भी कुछ नहीं था। सुदूर क्षेत्रों में जहाँ तहाँ छोटे-छोटे गाँव बसे थे। यातायात के कार, वाहन के साधन भी नहीं थे। प्रेस पुस्तकों की अब जैसी सुविधा भी नहीं थी। विशेषज्ञता प्राप्त कराने वाले महाविद्यालय का भी थे? ऐसी परिस्थितियों में पूजा उपासना के क्षेत्र में तो कोई व्यक्ति अपनी गतिविधियाँ चलाता और आत्मिक प्रगति करता रह सकता था, पर भौतिक क्षेत्र में वैसी प्रगति कैसे संभव हो सकती थी जैसी कि रावण ने की। उन दिनों ऐसे उदाहरण भी जहाँ-तहाँ सुदूर क्षेत्रों में ही देखने को मिलते थे, जिनसे प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करके कोई अपने लिए विशेष मार्ग निर्धारित करता।

प्रश्न उठता है कि जब उन दिनों ऐसी ही परिस्थितियाँ थीं और भौतिक प्रगति के कोई बड़े आधार अवलम्बन सामने नहीं थे तो फिर तैसी चमत्कारी प्रगति रावण से कैसे बन पड़ी जिससे कि वह अपनी सुरक्षित राजधानी समुद्र के बीच घिरे हुए एक टापू पर बना सका। सोने के महल बना सका और इतनी साधन सामग्री जुटा सका जो उन दिनों की परिस्थितियों को देखते हुए अभूतपूर्व ही कही जा सकती है।

रावण की प्रगति का केन्द्रबिन्दु था उसका समय के एक-एक क्षण का तत्परता और तन्मयता भरा उपयोग। इसी का पुराणों में इस प्रकार उल्लेख है कि उसने काल को पाटी से बाँध रखा था। स्थूल दृष्टि से यह कथन भी अविश्वस्त लगता है। “काल” अर्थात् समय तो एक प्रगति क्रम की विधा है, जिसे घड़ी जैसे यंत्रों के माध्यम से जाना जाता है। रस्सी से तो निकटवर्ती प्रत्यक्ष वस्तुएँ ही बाँधी जा सकती हैं। जानवरों को खूँटे से बाँधा जा सकता है पर काल, को समय को कोई किस प्रकार बाँधे? वह तो अनवरत क्रम से प्रवाहवान ही रहता है। उसे अवरुद्ध कर सकना किसी के वश की बात नहीं। हवा रोशनी को किसी प्रकार रोका भी जा सकता है, पर समय को अवरुद्ध कर सकना किसी के वश की बात नहीं। सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि की गति को कोई किस प्रकार रोक सकेगा? यदि यह संभव नहीं तो काल को रावण भी चारपाई की पाटी से कस कर बाँध सका होगा? यह बात समझ से बाहर की ही रहेगी? वस्तुतः काल को पाटी से बाँधे रखने का अभिप्राय है, समय के साथ जीवनक्रम का इस प्रकार तालमेल बिठाना जिसमें एक क्षण भी व्यतिरेक न होने देना। यही है विधा, जिसे काल को पाटी से बाँध कर रखना जैसा अलंकारिक प्रतिपादन करना कहा जा सकता है।

लोग दृश्यमान वस्तुओं का ही मूल्याँकन कर सकने में समर्थ होते हैं। सोना, चाँदी, वस्त्र, आभूषण, जमीन, घर, पशु आदि दृश्यमान वस्तुओं की ही कीमत आँकी जाती हैं प्रियजनों परिचितों के संबंध में भी चर्चा होती रहती हैं व्यवसाय निर्माण में चर्चा होती रहती हैं पर कोई यह नहीं सोचता कि उनकी अनमोल जीवन सम्पदा का किस प्रकार व्यतिरेक हो रहा है। जीवनीशक्ति किस प्रकार निरर्थक कामों के कुचक्र में पड़कर चुकती चली जा रही है।

न किसी को आत्म सम्पदा के उत्थान-पतन का ज्ञान है और न विचारों की प्रचंड शक्ति का आभास ये अप्रत्यक्ष करने वाली महान क्षमताएँ निरर्थक प्रयोजनों में उलझी रहती हैं और अपनी पूँजी समाप्त करती रहती हैं। फलतः लम्बे समय जीने वाला मनुष्य भी कोल्हू की बैल की तरह जिन्दगी के दिन ही किसी प्रकार पूरे कर पाता है। होश तब आता है जब जोश-आवेश समाप्त हो जाता है। मरणबेला के निकट पहुँचने पर जब पीछे की ओर मुड़कर देखा जाता है तब प्रतीत होता है कि बहुत कुछ कर सकने की सामर्थ्य हाथ में थी, पर वह उपेक्षित पड़ी रही। आलस्य प्रमाद में, लोभ मोह में वह सम्पदा झुक गई, जो परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति थी और जिसके सदुपयोग बन पड़ने पर कुछ से कुछ बन सकना संभव हो सकता था।

पुरुषार्थ की प्रायः सराहना होती रहती है, पर यह तथ्य विरलों को ही विदित है कि आखिर पुरुषार्थ है क्या? उसकी विवेचना इसी रूप में हो सकती है कि समय को योजनाबद्ध रूप से तन्मयता और तत्परतापूर्वक प्रयोग किया जाय। जिनने इस रहस्य को समझ लिया और अपनी क्षमताओं का अभीष्ट प्रयोजन के नियोजन सीख लिया, समझना चाहिए कि उसने काल को पाटी से बाँध लिया।

रावण ने जो असाधारण क्षमताएँ, कुशलताएँ अर्जित कीं उसके पीछे एक ही रहस्य था कि समय के हर क्षण का निर्धारित प्रयोजन के लिए नियोजित किये रहना। सम्पूर्ण विचार शक्ति और श्रमशक्ति को एक ही केन्द्र पर केन्द्रीभूत किये रहना। इतना कर सकने वाले हर व्यक्ति को अपना अभीष्ट प्राप्त कर सकने में असाधारण सफलता मिलकर रहती है।

संसार में कितने ही महापुरुष हुए हैं जो तीस वर्ष जितनी आयु में ही कूच कर गये। ऐसे लोगों में विवेकानंद, रामतीर्थ, मिल्टन, आद्यशंकराचार्य, ईसा आदि के नाम ही ऐसे हैं जो अधेड़ बनने से पहले ही इस संसार से चले गये। किन्तु इतने ही दिनों में उतने काम कर लिए जितने कि परिश्रमी लोग भी सौ वर्ष की अवधि में नहीं कर सकते। इसके विपरीत जो लम्बी जिन्दगी जिये वे भी कुछ न कर पाये और जिन्दगी गँवा बैठने की शिकायत करते रहे। इसका कारण एक ही है कि उनने समय का मूल्य नहीं समझा और उसे योजनाबद्ध रूप से अभीष्ट प्रयोजनों में निरत करते रहने का क्रम न बन पड़ा। समय की बरबादी प्रकारान्तर में जीवन की बरबादी ही है।

काम में मन न लगने की शिकायत वे ही लोग करते देखे गये हैं जो समय का दैनिक क्रम चक्र बनाने पर ध्यान नहीं देते। जिनने अपने दिनचर्या विवेकपूर्वक बनाई और उसे सतर्कतापूर्वक कार्यान्वित करने में तत्परता बरती, उनके लिए यह सरल संभव हो गया कि निर्धारित मार्ग पर अनवरत चलते रहने में मन लगे। रस आने लगे। कार्य की बारीकियों में प्रवेश करने और उसे सर्वोत्तम ढंग से कर सकने के लिए उत्साह उभरे। इतना बन पड़ने पर प्रगति का अवरुद्ध मार्ग खुल जाता है और सफलता की दिशा में द्रुत गति से आगे बढ़े सकना सहज संभव होता है।

विश्व इतिहास के चमकदार व्यक्तित्वों पर दृष्टिपात किया जाय और यह जाँचा जाय कि वे सामान्य एवं कठिन परिस्थितियों के बीच भी किस प्रकार अपने लिए अग्रगमन का मार्ग बना सके तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि उनने समय का श्रेष्ठतम उपयोग किया है। एक क्षण भी निरर्थक बातों में नष्ट न होने दिया। नींद के घण्टों को छोड़कर वे अपनी नियत क्रिया पद्धति में तत्परतापूर्वक संलग्न रहे। हाथ में लिए काम को भली प्रकार पूरा करना उनने अपने प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया। उसमें इतना रस लिया कि समूची इच्छाशक्ति उसी पर केन्द्रीभूत हो गई। काम न रहने पर उन्हें ऐसा लगता रहा मानों जीवनाधार का कोई महत्वपूर्ण अंश हाथ से छिन गया।

मन न लगने का, चित्त उचटने का, आवारागर्दी में समय काटने का अवसर तब आता है जबकि कोई लक्ष्य सामने नहीं होता। किसी योजना के साथ अपने आप को कसकर बाँधा नहीं गया होता। महत्वाकांक्षाएँ तब बुरी होती हैं जब वे किसी निकृष्ट प्रयोजन के लिए मचले । यदि उपयोगिता की कसौटी पर खरे उतरने वाली गतिविधियों में संलग्न रहकर ऊँचा उठने, आगे बढ़ने और उच्चस्तरीय सफलता के शिखर पर पहुँचने की आकांक्षा हो तो उसे सराहा ही जायगा। ऐसे सराहे जाने योग्य व्यक्तियों ने सबसे पहला काम यह किया है कि समय का मूल्य समझा उसके सुनियोजन के प्रतिफल पर विचार किया और अन्ततः इसी निर्णय पर पहुँचे कि समय के एक-एक क्षण को मणि मुक्तकों से भी अधिक मूल्यवान समझकर उसका परिपूर्ण तत्परता के साथ श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाय।

चर्चा रावण की प्रगति से आरंभ हुई थी और बताया गया था कि उसने काल को पाटी से बाँध रखा था। इसी कारण उसे अभीष्ट मनोरथ पूरे करने का अवसर मिला। यह तथ्य हर किसी के लिए समझने योग्य है। साथ ही यह भी ध्यान रखने योग्य है कि हेय प्यारेजनों के साथ अपने आपको न जोड़ा जाय अन्यथा उपलब्ध हुई प्रगति विनाशकारी परिणाम उत्पन्न करेगी। रावण से यही भूल हुई कि वह शक्ति के मद में अपना होश गँवा बैठा और उस कुमार्ग पर चल-पड़ा जिस पर चलने वाले पतन के गहरे गर्त में गिरते और अपना पराया सर्वनाश करते हैं। यदि उसने यह भूल न की होती तो वह संसार के श्रेयाधिकारी महामानवों में से एक होता। क्षमता-गाँधी बुद्ध जैसे महामानवों में भी सामान्य ही थी, उनमें उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया और वह कर दिखाया जिससे समूची मानवता कृतकृत्य हो गई। सम्राट अशोक ने अपने साधनों को, कौशलों को धर्म चक्र प्रवर्तन के निमित्त लगाया था। उसका प्रतिफल यह हुआ कि समूचे संसार में श्रेष्ठता की पक्षधर एक महाक्रान्ति प्रस्तुत हो गई। जो हैं, जिनने भी इस संसार में कुछ कहने योग्य कार्य किये हैं, उसने समय का श्रेष्ठतम सदुपयोग किया है। यही हमें भी करना चाहिए।

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