• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • नास्तिकता क्यों बढ़ रही हैं?
    • त्याग ही वरेण्य
    • “माया महाठगिनी, हम जानी”
    • मोह के बन्धनों को समझा (Kahani)
    • चतुर नहीं, बुद्धिमान बनें
    • पक्ष विपक्ष (Kahani)
    • शालीनता का ध्वजारोहण
    • पेड़ पौधों के विलक्षण ज्ञान तन्तु
    • काम कर गुजरने का दुहरा (Kahani)
    • उज्ज्वल भविष्य की झाँकी, मस्तिष्क के झरोखों से
    • बुद्ध गम्भीर हो गये (Kahani)
    • प्रकृति के गर्भ में घटित हो रहे कुयोग व सुयोग
    • अविवेकी ही डरते हैं मृत्यु से (Kahani)
    • परिवर्तन प्रक्रिया से गुजर रहे हम सब
    • साधना से सिद्धि का अकाट्य सिद्धान्त
    • संस्कृति-पुरुष से मिले-मर्यादा पुरुषोत्तम
    • भाव संवेदना की चमत्कारी शक्ति
    • काल को पाटी से बाँधें, सफल बनें
    • अवसर सबके लिए समान (Kahani)
    • चेतना का एक अति उच्च आयाम
    • नैतिकता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी है-आस्तिकता से
    • संघर्ष एक उच्चकोटि का मनोरंजन
    • सविता की उपासना हर दृष्टि से विज्ञान सम्मत
    • प्राणरक्षक, गाया जा सकने वाला गायत्री मंत्र
    • संस्कृति के सनातन कुल की लक्ष्मी; भारतीय नारी
    • विवेक ही बने हमारा मार्गदर्शक
    • महान विभूतियाँ (Kahani)
    • अति सामर्थ्यवान है, यह सूक्ष्मजगत
    • अपना चेहरा देखकर याद आ जाएगा (Kahani)
    • आत्मावलम्बन पर टिकी हैं -समस्त सिद्धियाँ
    • राजा से भी ढेरों पुरस्कार (Kahani)
    • महत्वाकांक्षाओं की भटकाव भरी पगडंडी
    • Quotation
    • चिन्तन गढ़ता है, हमारा-आचरण
    • जीवन का बहुआयामी विकास (Kahani)
    • संस्कृति का शाश्वत ज्वलन्त प्रश्न!
    • VigyapanSuchana
    • चेतना के अनुसंधान में निरत विज्ञान
    • नगद धर्म का पालन करने वाला देवता
    • VigyapanSuchana
    • राज्यपाल से क्या लेना देना (Kahani)
    • परमपूज्य गुरुदेव : लीला प्रसंग
    • युग-अनुष्ठान
    • युग-अनुष्ठान (Kavita)
    • परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी
    • VigyapanSuchana
    • अपनों से अपनी बात - संस्कृति पुरुष पूज्य गुरुदेव के संकल्प निश्चित ही पूरे होंगे
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1992 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT SCAN


आत्मावलम्बन पर टिकी हैं -समस्त सिद्धियाँ

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 29 31 Last
सहयोग का आदान-प्रदान मानवी स्वभाव भी है और सामाजिक प्रचलन भी। इस संदर्भ में कुशलता बरतना उचित है। किन्तु भूल तब होती है। जब किसी पर पूरी तरह आश्रित होकर यह आशा लगाई जाती है कि वह बिना किसी प्रत्युपकार के हमारे ऊपर अनुग्रह की वर्षा करेगा और उदारतापूर्वक निहाल कर देगा। ऐसी आशा देवताओं, सिद्धपुरुषों या धनी मानी लोगों से भी नहीं करनी चाहिए। वे भी अपनी विभूतियों को बहुत समझ बूझकर सोच समझ कर खर्च करते हैं और यह देखते हैं कि सदुपयोग होने पर दाता को जो श्रेय मिलना चाहिए वह उन्हें मिलेगा या नहीं। घाटे का सौदा कौन करता है? दान-अनुदान में भी इन तथ्यों का समावेश रहता है। हर कोई चाहता है कि उसकी सम्पत्ति किसी ऐसे काम आवे जो श्रेयस्कर परिणाम उत्पन्न करे।

सयानी कन्या को किसी सुयोग्य हाथों में सौंपने की हर पिता की इच्छा होती है उसके लिए सत्पात्र ढूँढ़ने में वह समुचित दौड़-धूप करता है। जब बात बन जाती है तो वह मात्र लड़की को ही नहीं, वरन् कुछ उपहार भी साथ देता है। देते हुए प्रसन्नता भी अनुभव करता है और लेने वाले का मन टटोलता है कि जो दिया गया है उसे उसने पर्याप्त माना या नहीं। यही है सत्पात्र की सहायता करने की प्रथा-प्रक्रिया

इसके विपरीत किसी कुपात्र द्वारा कन्या माँगने पर पिता न केवल असहमत ही होता है वरन् उसे भला बुरा भी कहता है। कारण कि वह सोचता है कि दान सम्पदा की यदि दुर्गति हुई तो सदा शोक-संताप करना पड़ेगा।

देने के बाद दाता की जिम्मेदारी पूरी तरह समाप्त

नहीं हो जाती वरन् तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि उसका सदुपयोग नहीं होने लगता, सत्परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होने लगता। कोई भी सर्वथा निस्पृह नहीं। सहायता भी एक प्रकार का कर्ज है। उसे देने के उपरान्त मात्र धन्यवाद, जय-जयकार से ही काम नहीं चलता वरन् यह भी देखना पड़ता है कि प्रतिफल क्या मिला। बदले में क्या मिलने की संभावना है। प्रत्यक्ष न सही तो वह परोक्ष तो होना ही चाहिए। पुण्य परमार्थ की पूर्ति तो उससे होनी ही चाहिए। यदि दोनों में से एक भी प्रयोजन न सधता दिखाई पड़े तो फिर कोई किसी को सहायता देने का साहस नहीं करेगा। कसाई का बूचड़खाना खोलने के लिए कोई सहायता दे तो उसके कारण जो पशुवध का व्यवसाय चलेगा उसमें पाप का भागी उस दानी को भी बनना पड़ेगा।

देने की समर्थता से भरी पूरी शक्तियों की कमी नहीं है। समुद्र में अथाह जल भरा है जो बादलों के माध्यम से भूमि पर उदारतापूर्वक बरसता रहता है। पर

उसमें ग्रहण उतना ही किया जाता है जितना कि अपने पास पात्र हो। जोहड़, सरोवर भी उतना ही जल एकत्रित कर पाते हैं जितनी कि उनमें गहराई होती है। सूर्य में प्रचंड ऊर्जा के भण्डार भरे पड़े हैं। पर उसे ग्रहण कर सकना उन्हीं के लिए संभव होता है जो खुली धूप में बैठते हैं। जिनने अपने मकान के दरवाजे खिड़कियाँ बन्द कर रखी हैं। उनके लिए यह कठिन है कि धूप या हवा उस बन्द कमरे में प्रवेश कर सके। प्रवेश पाना, उपलब्धियों को ग्रहण कर सकना सामान्य बात नहीं है।

जब कभी भूकम्प, बाढ़, महामारी, दुर्भिक्ष आदि संकट आते हैं तो संकटग्रस्तों की सहायता करने अनेकों उदारमना दौड़ पड़ते हैं और तन, मन, ध्यान से उनकी सहायता करते हैं। पर जो समर्थ होते हुए भिक्षा व्यवसाय अपनाते हैं उन्हें जहाँ तहाँ धक्के खाने और तिरस्कार के वचन सुनने पड़ते हैं। यह कुपात्रता का ही प्रतिफल है।

मोती हर सीप में पैदा नहीं होता। स्वाति बूँदों को धारणा कर सकने की क्षमता विशेष आकृति की सीपों में ही होती है। लोहा पारस को छूकर तभी सोना बनता है जब वह किसी आवरण में लिपटा हुआ न हो। महत्वपूर्ण घास, फल, या फूल अपने ढंग की भूमि में ही पैदा होते हैं। जिस भूमि में उर्वरता या अनुकूलता नहीं है, उसमें जो बोया गया है वह भी निरर्थक चला जाता है।

उदारमना समृद्ध व्यक्ति या योगी-तपस्वी अपनी विभूतियाँ हर किसी याचक पर नहीं उड़ेल देते। मुफ्तखोरों की कहीं कमी नहीं। वे बिना परिश्रम के बिना बदला चुकाये जहाँ तहाँ से मनमर्जी का चीज बटोरने की फिक्र में रहते हैं। देवी-देवता उन्हें सब से अधिक बेअकल प्रतीत होते हैं, जिनकी थोड़ी सी पूजा−पत्री या मनुहार करने से मनोकामना पूर्ति का वरदान हाथ लगे। यह एक प्रकार की जेब कटी का धंधा है, जिसकी सफलता सदा संदिग्ध रहती है।

सहायता पर निर्भर रहना न तो बुद्धि संगत है और न नैतिक । बिना मूल्य चुकाये किसी की कमाई हड़प लेना, बेईमानी या विश्वासघात में गिनी जाती है। इतना होने पर किसी समझदार को चकमा देना चूना लगाना सरल नहीं है। जो अपना खर्च चला लेता है किसी की सहायता नहीं माँगता साथ ही इतना बचा भी लेता है तो समझना चाहिए कि उनकी बुद्धिमानी में कमी नहीं है। जिनमें बुद्धि है वही कमाते हैं, चाहे आध्यात्मिक सम्पदा हो या भौतिक। जिनने गाढ़ी से कुछ संचय किया है वह इतनी अकल भी रखते हैं कि उसे मुफ्तखोरों पर न लुटाया जाय। उस कमाई को उस कार्य के लिए उस व्यक्ति को दिया जाय जा उपलब्ध सहायता से अपना ही नहीं दूसरों का भी कल्याण कर सके। जिसमें मनुहार करके झटकने और फिर उसे गुलछर्रे उड़ाने के लिए आँखें मूँद कर उड़ेल दें, यह नहीं हो सकता। जो अपनी पात्रता सिद्ध करेगा वही अधिकारी बनेगा। सरकारी ऑफिसर भी प्रतिस्पर्धा जीत कर ही नियुक्ति पत्र प्राप्त करते हैं। कोई अनपढ़ व्यक्ति उस प्रतिफल को प्राप्त करना चाहे तो उसके लिए लोमड़ी खट्टे अंगूरों की ही शिकायत करती रहेगी।

जिसके पास आत्म-क्षमता है, उसे दूसरे लोग भी सहायता करते हैं। फूलों की शोभा बढ़ाने के लिए तितलियाँ कहीं से भी दौड़ आती हैं। सोना खरा हो तो उसके आभूषण बना देने वाले कई स्वर्णकार मिल जाते हैं। पर जहाँ अपनी मूलसत्ता में ही खोट भरी हो, वहाँ इस प्रकार की उपलब्धियाँ हस्तगत नहीं होती।

जो सुयोग्य सत्पात्रों के लिए सुरक्षित है। जो लोकप्रिय नेता या व्यक्ति जन समर्थन प्राप्त करते और वोट पत्र पाते हैं उन्हें ही शासन तंत्र में प्रतिनिधि की हैसियत से चुने जाने का अवसर मिलता है।

अच्छा हो हम अपनी सहायता आप करें। अपने निर्माण में स्वयं जुटें। अपने पंखों पर खड़े हों और अपनी प्रतिभा का परिचय दें। योग्यता और पात्रता की अभिवृद्धि होने पर सहायता तो सारा संसार करेगा भगवान भी?

First 29 31 Last


Other Version of this book



Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • नास्तिकता क्यों बढ़ रही हैं?
  • त्याग ही वरेण्य
  • “माया महाठगिनी, हम जानी”
  • मोह के बन्धनों को समझा (Kahani)
  • चतुर नहीं, बुद्धिमान बनें
  • पक्ष विपक्ष (Kahani)
  • शालीनता का ध्वजारोहण
  • पेड़ पौधों के विलक्षण ज्ञान तन्तु
  • काम कर गुजरने का दुहरा (Kahani)
  • उज्ज्वल भविष्य की झाँकी, मस्तिष्क के झरोखों से
  • बुद्ध गम्भीर हो गये (Kahani)
  • प्रकृति के गर्भ में घटित हो रहे कुयोग व सुयोग
  • अविवेकी ही डरते हैं मृत्यु से (Kahani)
  • परिवर्तन प्रक्रिया से गुजर रहे हम सब
  • साधना से सिद्धि का अकाट्य सिद्धान्त
  • संस्कृति-पुरुष से मिले-मर्यादा पुरुषोत्तम
  • भाव संवेदना की चमत्कारी शक्ति
  • काल को पाटी से बाँधें, सफल बनें
  • अवसर सबके लिए समान (Kahani)
  • चेतना का एक अति उच्च आयाम
  • नैतिकता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी है-आस्तिकता से
  • संघर्ष एक उच्चकोटि का मनोरंजन
  • सविता की उपासना हर दृष्टि से विज्ञान सम्मत
  • प्राणरक्षक, गाया जा सकने वाला गायत्री मंत्र
  • संस्कृति के सनातन कुल की लक्ष्मी; भारतीय नारी
  • विवेक ही बने हमारा मार्गदर्शक
  • महान विभूतियाँ (Kahani)
  • अति सामर्थ्यवान है, यह सूक्ष्मजगत
  • अपना चेहरा देखकर याद आ जाएगा (Kahani)
  • आत्मावलम्बन पर टिकी हैं -समस्त सिद्धियाँ
  • राजा से भी ढेरों पुरस्कार (Kahani)
  • महत्वाकांक्षाओं की भटकाव भरी पगडंडी
  • Quotation
  • चिन्तन गढ़ता है, हमारा-आचरण
  • जीवन का बहुआयामी विकास (Kahani)
  • संस्कृति का शाश्वत ज्वलन्त प्रश्न!
  • VigyapanSuchana
  • चेतना के अनुसंधान में निरत विज्ञान
  • नगद धर्म का पालन करने वाला देवता
  • VigyapanSuchana
  • राज्यपाल से क्या लेना देना (Kahani)
  • परमपूज्य गुरुदेव : लीला प्रसंग
  • युग-अनुष्ठान
  • युग-अनुष्ठान (Kavita)
  • परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी
  • VigyapanSuchana
  • अपनों से अपनी बात - संस्कृति पुरुष पूज्य गुरुदेव के संकल्प निश्चित ही पूरे होंगे
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj