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Magazine - Year 1992 - Version 2

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संघर्ष एक उच्चकोटि का मनोरंजन

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जीवन के साथ जुड़ी हुई सच्चाइयों में एक ‘संघर्ष’ भी है। आत्मरक्षा भी इसके बिना नहीं हो सकती। मक्खी-मच्छरों से लेकर साँप-बिच्छुओं तक कीड़े-मकोड़े भी इस ताक में रहते हैं कि दाँव लगे तो आक्रमण का मजा चखाएँ। हवा और पानी में ऐसे विषाणु तैरते रहते हैं कि उन्हें जीवन के लिये चुनौती ही कह सकते हैं। खटमल, पिस्सू, जूँ आदि अपनी ही दुरभि-संधियाँ रचते रहते हैं। चोर-ठगों की कमी नहीं। आतंकवादी, अनाचारी इस फिराक में रहते हैं कि जहाँ रोकथाम में शिथिलता हो, वहाँ प्रवेश करके लाभ उठायें। परजीवियों की इस दुनिया में कमी नहीं। सिंह, व्याघ्र जैसे हिंसक जीव निरपराध शाकाहारियों का भक्षण करते रहते हैं। शोषण, अपहरण, उत्पीड़न कितना ही हेय क्यों न हो, पर उसके अस्तित्व से इंकार नहीं किया जा सकता। पूर्व संचित कुसंस्कार जब तब उभरते ही रहते हैं। प्रचलन में समाविष्ट अवांछनीयता इतनी समर्थ होती है कि भोले जनों को चपेट में लेते उसे देर नहीं लगती। इन सबसे संघर्ष किये बिना कोई चारा नहीं। समर्पण कर देने पर वे अपने-अपने जाल में फँसाये बिना रह ही नहीं सकती।

दया, करुणा, अहिंसा, क्षमा आदि उच्चस्तरीय सद्गुणों का भी महत्व है, पर देखा जाता है कि कैसे वे अपने सजातियों पर भी प्रभाव छोड़ने में समर्थ होते हैं। दानवी प्रकृति इतने भर से द्रवित नहीं होती वरन् उलटे कायर डरपोक, कमजोर समझकर दूने उत्साह से आक्रमण करती है। प्रतिरोध का खतरा कम देखने पर अनाचारियों के हौसले और भी अधिक बुलंद हो जाते हैं। इस वास्तविकता को समझते हुए प्राणियों ने यह सहज स्वाभाविक रीति अपना रखी है कि जहाँ गुंजाइश हो, आक्रामक के विरुद्ध लड़ाई ठान देना और जहाँ इसमें बात बनती न हो, वहाँ भाग खड़े होना। प्राणी जगत में यह नीति सर्वत्र अपनायी जाती देखी जाती है। इसलिये आत्म-रक्षा को जीवन्त प्रश्न मानते हुए हर समझदार को उसके लिये सन्नद्ध रहना चाहिए ।

संघर्ष में मात्र खतरा ही खतरा होता तो कोई भी उसके लिये तैयार न होता और आक्रान्ताओं का बोलबाला दिखाई पड़ता। यह संसार भले-बुरे दोनों तत्वों से मिलकर बना है। यहाँ काँटे भी हैं और फूल भी। निविड़ निशा का अंधकार भी है और दिनमान का प्रखर प्रकाश भी। उदार नीति की, सेवा सहायता में रस लेने वालों की भी कमी नहीं पर यदि आक्रान्ताओं को परास्त करने वाली सैन्य सज्जा न हो तो सीमा मर्यादा अक्षुण्ण न रहे। इसलिये अन्यान्य स्वाद के साथ भोजन में तीखेपन को स्थान दिया गया है और सब रसों में एक उसे भी गिना गया है।

गर्भाधान प्रक्रिया एक प्रकार का संघर्ष ही है। प्रसव काल में बच्चे को बलपूर्वक अपने बन्धन काटने पड़ते हैं। स्तनपान के समय भी उसकी चूसने की क्षमता ही क्षुधा निवारण करती है। धरती का पेट चीरकर हम अन्न उगाते हैं। पशुपालकों को कठोर, निर्दयी बर्ताव करना पड़ता है। गन्दगी हर क्षेत्र में निरन्तर उत्पन्न होती है। वह अपने आप आती है, पर चली नहीं जाती। सफाई के लिये अनेक सरंजाम जुटाने पड़ते हैं। अशिक्षा, दरिद्रता, मूढ़ता, प्रमाद के सहज प्रतिफल हैं। प्रगति के लिये पराक्रम, पुरुषार्थ और दुस्साहस को अपनाया न जाय, तो दुर्गति से उबरना कदाचित् ही किसी के लिये संभव हो। मनुष्य ने प्रगति के इस स्तर तक पहुँचने के लिये न जाने अवरोधों के कितने समुद्र और कितने पर्वतों पर चढ़ने के लिये असाधारण प्रयास किये हैं। इसे संघर्ष की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। श्वास-प्रश्वास में, आकुंचन-प्राकुंचन में जीवित रखने की क्षमता है। चेतना जब भी इस पौरुष में अपनी असमर्थता व्यक्त कर देती है, तभी उसका प्राणान्त हो जाता है।

प्रगति की आकांक्षा के साथ ही संघर्ष का साहस जुड़ा हुआ है। दोनों एक-दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए और साथ-साथ काम करते देखे जाते हैं। इंकार करने पर दुर्गतिकारी पराजय ही शेष रह जाती है। ईश्वर भी सिर्फ उनकी सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करने के लिये कटिबद्ध होते हैं, अन्यथा कचरे को बहार फेंकना ही इस सृष्टि का नियम है। मनुष्य आना-कानी करे तो घनघोर वर्षा और आँधी-तूफान अपनी ओर से अनुपयुक्त को हटाने के लिये जोर लगाते हैं।

मनोरंजन में हास्य, विनोद की सहज मनभावन प्रक्रिया से तो सभी परिचित हैं और खेल-खिलवाड़ कौतुक, कौतूहल हास-परिहास आदि के रूप में उसे जहाँ-तहाँ ढूँढ़ते और जाते रहते हैं। इतने पर भी वह छोटे दर्जे की बालक्रीड़ा ही बनीं रहती है। सम्पन्न, भावुक या आलसी ही उसका यत्किञ्चित् अनुभव कर पाते हैं। इसके अतिरिक्त प्रौढ़ता का परिचायक एक और पक्ष रह जाता है-शौर्य साहस का प्रदर्शन। संघर्ष के स्वयंवर में ‘विजयश्री’ का वरण इसके लिये अनौचित्य से दो-दो हाथ करना आवश्यक हो जाता है। उसे छोड़ कर भागने पर प्रगति नहीं। तब बहादुरों की तरह न सही कायरों की मौत तो मरना ही पड़ता है।

संघर्ष भी मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। पहलवान आपस में लड़ें नहीं, एक ने-दूसरे को पछाड़ा नहीं तो दर्शक दंगल देखने क्यों पहुँचे और विजेता को यश पुरस्कार का लाभ कैसे मिले? खेल आयोजनों में हार-जीत ही दर्शकों को दूर-दूर से घसीट लाती है। सैनिकों की दिनचर्या युद्ध काल न होने पर भी आक्रमणों और बचाव से जुड़ी हुई देखी जाती है। श्रमिक, विद्यार्थी, कृषक, व्यवसायी जो कुछ पाते हैं, उसके लिये उन्हें एक नहीं अनेकानेक श्रम संघर्षों के बीच होकर गुजरना पड़ता है। लोक नेतृत्व करने वाले महापुरुषों में प्रत्येक ने अवांछनीयता के साथ संघर्ष किया है। तभी उन्हें तपे सोने जैसी मान्यता मिली है। तपस्वियों का तो तितिक्षा ही प्रधान अवलम्बन होती है, उसी की प्रखरता के बल पर वे सिद्ध पुरुष का पद पाते हैं।

संघर्ष के अवसर ढूँढ़ निकालने के लिये समग्र मनोरंजन के इच्छुकों को कटिबद्ध होना पड़ता है। वे अनीति के विरुद्ध लड़ते हैं। अवांछनीयताओं से टक्कर लेते हैं। अनौचित्य से लड़ने के लिये उनकी भुजाएँ फड़कती रहती हैं। राम ने वनवास काल में ऋषियों के अस्थि समूह देखे तो उनने भुजा उठाकर “निशिचर ही करौं महि” की प्रतिज्ञा की थी और उसे पूरा करके भी दिखाया।

संघर्ष मनोरंजन में ठीक तरह खेलने की एक ही शर्त है कि मानसिक संतुलन हर स्थिति में अक्षुण्ण बनाये रखा जाय। नफा-नुकसान का बहीखाता न फैलाया जाय। कोई सेनापति अपने घनिष्ठ साथियों के मारे जाने पर यदि धैर्य खोने और विलाप करने लगे तो समझना चाहिए कि आगे का युद्ध संचालन कर सकने में वह असमर्थ हो गया। राणा साँगा के बारे में कहा जाता है कि उनके सारे शरीर में अस्सी गहरे घाव लगे थे, फिर भी मरते दम तक वे तलवार चलाते रहे। भीष्म पितामह ने पूरा शरीर बाणों से छिदा होने पर भी मौत को वापस लौट दिया था और कहा “मेरे इच्छित समय उत्तरायण काल आने पर तुम आना और खुशी-खुशी ले चलना।”

ईसा के लिये शूली एक मजाक थी। सुकरात ने जहर का प्याला हँसते-हँसते पिया। मंसूर को शूली पर चढ़ते समय तनिक भी गम नहीं था। भारतीय क्रान्तिकारियों में से कितनों ने ही फाँसी का फन्दा अपने हाथों बाँधा और गीता की पुस्तक हाथ में लिये हुए फाँसी के तख्ते पर झूल गये, यह उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि अनीति के साथ संघर्ष करने में जीत की तरह हार के दृश्य भी देखने को मिल सकते हैं। पर इससे क्या? सटोरिये आये दिन लाखों का वारा न्यारा करते हैं, पर माथे पर शिकन नहीं आने देते। लंका युद्ध में लक्ष्मण को भी तो मूर्छित होना पड़ा था। पाण्डवों ने कितने लम्बे मुसीबत के दिन काटे थे। नल दमयंती के वनवास की कथा सभी को विदित है इतने पर भी इनमें से किसी ने न तो धर्म खोया और न पीछे पग हटाने की बात सोची। संघर्ष की चुनौती भी एक प्रकार का परीक्षाकाल है, जिसमें वे ही विद्यार्थी उत्तीर्ण होते हैं, जो मनोबल बनाये रहते हैं। हड़बड़ी में जीतने वाले भी अक्सर जीती बाजी हारते देखे गये हैं।

जीवन में पग-पग पर चुनौतियाँ भरी पड़ी हैं। अवांछनीयताओं से रहित भीतर और बाहर का कोई क्षेत्र खाली नहीं। परिस्थितिजन्य विपदाएँ आती रहती हैं। इनसे सर्वथा अछूते बचे रहना किसी के लिये भी संभव नहीं। अपने-अपने ढंग से हर किसी को जूझना पड़ता है। इसलिये तत्त्ववेत्ताओं ने जीवन को संघर्ष का प्रतीक माना है। इस मोर्चे को छोड़ भागने पर कोई गति नहीं। आगे कुआँ और पीछे खाई। इसलिये चैन के दिन गुजारने और शान्ति की खोज में भटकने वालों में से हर एक से कहा जाना चाहिए कि अशान्ति को परास्त करने के उपरान्त जो शान्ति मिलती है, वही सच्ची शान्ति है। संघर्ष को भी एक उच्चकोटि का मनोरंजन ही मानकर चलना चाहिए शौर्य, साहस और धैर्य की इसी कसौटी पर परीक्षा होती है।

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