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Magazine - Year 1992 - Version 2

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परमपूज्य गुरुदेव : लीला प्रसंग

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अवतारों की भूमि है भारतवर्ष। वे विशिष्ट चेतनसत्ता को समाहित कर अवतरित होते हैं व मानवमात्र का मार्गदर्शन करने के लिए शाश्वत तत्त्वदर्शन सूत्र रूप में दे जाते हैं । आज हम जिन क्षणों में यह चर्चा कर रहे हैं, यह बड़ा वैशिष्ट्पूर्ण समय है, जितनी आवश्यकता धरा को इस समय है, उतनी संभवतः पहले कभी नहीं रही । अवतार कौन सा? श्रुति के अनुसार ईश्वरीयसत्ता के अवतार कई रूपों में होते हैं ............. , चेतनावतार , सिद्धावतार इत्यादि ऐसे भिन्न भिन्न रूपों में हमारे समक्ष विगत डेढ़ सौ दो सौ वर्षों में कई सत्ताएँ आयीं व अपने लीला संदोह द्वारा अनेकों को अपना सखा अनुचर बनाकर उनको गढ़ती हुई उनसे असंभव सा दीख पड़ने वाला पुरुषार्थ भी संपन्न करा गयीं। बुद्ध से लेकर आद्यशंकराचार्य तक तथा चैतन्य व कबीर से लेकर ज्ञानेश्वर, समर्थ रामदास, छत्रपति, एवं रामकृष्ण परमहंस से लेकर विवेकानन्द योगीराज अरविन्द तक ये सभी अवतारी सत्ताएँ ही थीं जिनके लाला सहचर बनकर देवतत्व अंशधारी आत्माएँ निहाल हुई व जगती को धन्य बना गयी।

परमपूज्य गुरुदेव के लीला प्रसंग के संदर्भ में जब हम चर्चा करते हैं तो सहज ही किसी को लग सकता है कि क्या किसी की बीमारी दूर होने, नौकरी लग जाने, असंभव काम होते चले जाने से ही उसके लाला पुरुष होने की पहचान की जा रही है? तार्किक यह भी सोच सकता है कि क्या कर्म का कोई महत्व नहीं है? यह कैसे पहचान की जाय कि जिसे कुछ मिला, वह इस योग्य था भी कि नहीं? वस्तुतः इन लीलाप्रसंगों के माध्यम से एक बात समझाने का प्रयास किया जाता है कि हम सब जो उस सत्ता से जुड़े, प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से असाधारण रूप से सौभाग्यशाली हैं। किसी को प्रलोभन टॉफी मिल जाय व फिर भी वह काम न करे तो उस बच्चे पर नाराज नहीं हुआ जाता। क्षमाशील, उदारचेता, वह सत्ता एक विराट हृदय वाले पिता की तरह है तथा बहिरंग के अलौकिक प्रसंगों के मूल में उसका एक ही उद्देश्य होता है व्यक्ति विशेष की चेतना में आमूल चूल हेरफेर-परिपूर्ण बदलाव। यह काम वह सतत् करती रहती है। राम के, कृष्ण के जमाने में भी यही हुआ व आगे भी यही होता रहेगा।

जिन दिनों यह लाला प्रसंग आप हम सब पढ़ रहे हैं, उन दिनों सृष्टि पर एक अभूतपूर्व प्रयोग संपन्न होने जा रहा है। ऐसा विश्व के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। ऐसा विश्व के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। वह है सामूहिक मन पर एक ऐसी प्रक्रिया सूक्ष्म जगत से, जिसके माध्यम से व्यक्ति की चेतना का रूपान्तरण किया जा सके। परमपूज्य गुरुदेव के अभी तक के सभी चमत्कार इसी क्षेत्र में हुए हैं व आगामी दस से लेकर पंद्रह वर्षों में बड़ी संख्या में संपन्न होते हम सब देखेंगे। व्यक्ति का एक विराट स्तर पर चेतना जगत के धरातल पर पुनर्निर्माण हो, यह एक विलक्षण घटना है। महर्षि अरविंद कह गए हैं कि “अतिमानसिक दिव्यता नीचे आकर मानवी प्रकृति का सामूहिक रूपान्तरण करना चाहती है।” यही बात परमपूज्य गुरुदेव ने अपने शब्दों में इस प्रकार कही है-इन दिनों मनुष्य का भाग्य और भविष्य नये सिरे से लिखा और गढ़ा जा रहा है। ऐसा विलक्षण समय कभी हजारों-लाखों वर्षों बाद आता है। इन्हें चूक जाने वाले सदा पछताते ही रहते हैं और जो उसका सदुपयोग कर लेते हैं वे अपने आपको सदा−सर्वदा के लिए

अजर-अमर बना लेते हैं।”

(प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया पेज 27)

विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से इस स्तम्भ द्वारा एक ही तथ्य का प्रतिपादन किया जाता है कि यह परोक्ष जगत में छाई चेतना है जो भिन्न-भिन्न रूपों में अपने प्रभाव दर्शा रही है, जिन्हें हम चमत्कार के रूप में जानते हैं। एक चमत्कार यह भी हो सकता है कि अगणित व्यक्तियों की प्रतिभा उस क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित कर दी गयी, जिसके विषय में न उनकी योग्यता थी, न उनने स्वयं कभी चिन्तन किया था कि ऐसा भी कुछ हो सकेगा। एक चमत्कार यह भी है कि एक बहुत बड़ा वर्ग औरों की तरह भौतिक जगत के प्रवाह में न बहकर श्रेष्ठता की ओर ले चलने वाले प्रवाह से जुड़ने की सोचने लगा, न केवल सोचने वरन् छोटे-छोटे दीपयज्ञों-यज्ञायोजनों द्वारा सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के कार्यक्रमों में जुट गया। एक चमत्कार यह है कि नये जन्म लेने वाले बालक-बालिकाओं का एक बड़ा वर्ग भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों को जीवन में उतारने लगा और बौद्धिक व भावनात्मक दोनों ही क्षेत्रों में बहुमुखी प्रतिभा उसकी दृष्टिगोचर होने लगी, क्या यह सभी चमत्कार नहीं हैं? संभवतः इन सबका मूल्याँकन अभी न होकर बाद में हो, अतः फिलहाल उन प्रसंगों की चर्चा हम यहाँ कर रहे हैं, जिनसे स्थूल बहिरंग जगत में दृष्टिगोचर प्रसंगों का ऊहापोह किया जाता है।

जो अवतारी सत्ता के काम में स्वयं को नियोजित कराता है, उसका वह सदा सर्वदा ध्यान रखती है योग क्षेत्र को वहन करने का दायित्व वह पूरी तरह निभाती है। कर्मक्षेत्र में अग्रसर होने की प्रेरणा भी सतत् देती रहती है। सीकर (राजस्थान ) के श्री बंशीनारायण साधक 26 फरवरी 92 को भेजी अपनी अनुभूति में लिखते हैं कि वे 7 से 11 जनवरी 1974 की अवधि में चलने वाले प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र में भागीदारी करने शान्तिकुञ्ज आए तो विदा के समय पूज्यवर ने एक ही पंक्ति में अपनी बात कही “बेटा मौत को याद रखना ।” उस समय उनने यही अर्थ लगाया कि जीवन में जो दोष दुर्गुण हैं उनको समाप्त करने का ही निर्देश दिया गया है। शान्तिकुञ्ज से आते ही डेढ़ मास पश्चात् उनके सिर में भयंकर दर्द शुरू हो गया। दर्द इतना असहाय कि वे फूट- फूट का बच्चों की तरह रोते थे। खूब दवाई की कोई आराम नहीं। उन्हें लगा कि गुरुदेव की बात सही होने जा रही है उनने कहा था “मौत को याद रखना”। अतः अब सत्य का योग आ गया है। पहले से उनने सावधान कर दिया था। यह मृत्यु होनी ही है तो गुरु के चरणों में शान्तिकुञ्ज में ही हो, यह सोचकर शान्तिकुञ्ज रहने के इरादे से ही सब सामान आदि लेकर 17 अप्रैल 1974 को प्रातः हरिद्वार पहुँच गए। पहुँचते ही ऊपर से बुलावा आ गया। कुंभ का पर्व था। खूब भीड़ थी । गुरुदेव ने पूछा-बेटा कैसे आये?” “दर्शन के लिए।” अच्छा दर्शन के लिए तो अब वापस लौट जा।” इनने अब असली बात कही कि वे तो सामान व बच्ची सहित शान्तिकुञ्ज रहने की दृष्टि से आए हैं तो पूज्य गुरुदेव गर्म होकर कहने लगे कि “तू सारी मर्यादाएँ तोड़कर बिना कुछ काम किए यहाँ रहना चाहता है। जा । रहना है तो काली-कमली वाले के यहाँ जा। यहाँ कोई जगह नहीं है।” पूज्यवर के श्रीचरण उनने पकड़ लिए व कहा कि इन्हें छोड़कर कहीं जाना नहीं हैं।

पूज्य गुरुदेव लीला पुरुष हैं। वे तो देखकर ही समझ गए थे कि क्यों इन सज्जन का आगमन हुआ है? वह भी जीवनदानी बनकर। उनने बंशीनारायण जी की धर्मपत्नी से पूछा-यह-यह तो कुछ बताता नहीं तू बता।” उनकी पत्नी ने सिर की पीड़ा वाली बीमारी व मौत के भय का पूरा विवरण सुनाया। बताया कि कहीं आराम नहीं मिला । आपको पत्र लिखा तो जवाब नहीं मिला । आपको पत्र लिखा तो जवाब नहीं मिला। फिर यही सोचा कि अब यहीं शरण मिलेगी तो पेंशन की कार्यवाही करके रहने आए हैं। कहते हैं कि जीवनदान मिल गया तो यहीं रहकर सेवा करेंगे नहीं तो यहीं मृत्यु वरण करेंगे। इतना कहकर वे रोने लगीं। गुरुदेव ने कहा कि “नौकरी के अभी काफी वर्ष बाकी हैं। पेंशन लेने की क्या जरूरत है। बच्ची छोटी है। नौकरी भी करो व समाज का काम करो । उम्र तुम्हारा हम बढ़ा देंगे। बच्चों व बहू को घर छोड़ आओ। एक माह का प्रशिक्षण सत्र अटेंड कर लो व नौकरी फिर कर लो। प्रशिक्षण के बाद जाकर जहाँ हम भेजें कार्यक्रम करने जाना पर नौकरी मत छोड़ना। जिम्मेदारियाँ पूरी करके फिर समाज का पूरे समय काम करना।” इतना कहकर उनने आशीर्वाद देकर विदा किया । नीचे उतरते सिरदर्द तो समाप्त हो गया था, एक विलक्षण प्रकार की हल्केपन की अनुभूति हो रही थी। उसके बाद वह सिर दर्द पुनः कभी नहीं हुआ। 18 वर्ष पूरे बीत चुके हैं। उनके दायित्व सब निभते चले गए। सारा परिवार प्रसन्नचित्त मिशन के कार्यों में लगा है। वे स्वयं एक समर्पित कार्यकर्ता है।

“तुम्हारी पत्नी की बीमारी एक रहस्य है और जिन्दगी भर रहस्य ही बनी रहेगी। माँ पर विश्वास रखो। बहू की तबियत ठीक रहेगी” यह पत्र परम वंदनीया माताजी के हस्ताक्षर से श्री अश्विनी कुमार शर्मा, जो बी. एच. ई. एल. भोपाल में कार्यरत हैं, को प्राप्त हुआ तो उनके समक्ष विगत दो वर्षों की अपनी पत्नी की बीमारी का पूरा दृश्य घूम गया । साथ ही पूज्यवर के कक्ष में उनके द्वारा बोला गया एक ही वाक्य पुनः मन मस्तिष्क में गूँजने लगा-रोता क्यों है बेटे-मैंने उसे जीवनदान दिया है।” यह उनने 29 जून 1983 को शान्तिकुञ्ज में अपने कक्ष में ब्रह्ममुहूर्त में कहा था जब वे दर्शनार्थ पत्नी सहित शान्तिकुञ्ज आए थे। वस्तुतः स्थिति ऐसी ही थी। 7 मई 1982 को पहली बार जब उन्हें मिर्गी के दौरों के साथ बेहोशी की स्थिति में कस्तूरबा अस्पताल में भर्ती किया गया तो स्थिति गंभीर ही थी, बेहोशी टूटती तो दौरे तेजी से आने लगते व दौरे समाप्त होते तो गहरी बेहोशी चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. के. व्ही. पाण्ड्या सहित कुशल चिकित्सकों की एक पूरी टीम जाँच-पड़ताल करने में लगी थी व अभी कोई सुनिश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पायी थी कि कारण क्या है। उसी दिन रात्रि ढाई बजे साँस उल्टी चलने लगी व लगा कि अब अंतिम समय आ गया है। उसी क्षण स्वयं डा. पण्डाल जी ने टेलीग्राम बनाकर विवरण पूज्यवर को भेज दिया। इधर पोस्ट-आफिस से टेलीग्राम किया गया व उधर साँस नॉरमल हुई। धीरे-धीरे वे गहरी बेहोशी में चलीं गयीं । 4 दिन बाद वंदनीया माताजी का पत्र आ गया कि “हम माँ से प्रार्थना कर रहे हैं।’ श्रीमती शर्मा की जान बच गयी। रोग क्या था, कोई जान न पाया , बम्बई जाने तक व कैटस्कैन से लेकर सभी जाँच पड़तालें हुई पर बीमारी रहस्य ही बनी रही। अढ़ाई तीन वर्ष बाद दौरे स्वतः बन्द हो गए व अब वे पूर्णतः ठीक हैं। कोई नहीं कह सकता कि कभी ब्रेन ट्यूमर जैसी डाइग्नोसिस इनकी की गयी होगी॥ आश्चर्य यही है कि गंभीर बेहोशी की स्थिति में वे न किसी को पहचान पाती थीं न जवाब दे पाती थीं पर गायत्री मंत्र का स्पष्ट उच्चारण स्वयमेव करती थीं। श्री अश्विनी कुमार जी व उनकी पत्नी नैष्ठिक कार्यकर्ता है, व उनका रोम रोम गुरुसत्ता के प्रति कृतज्ञ है जिनने उनके घर को बिखरने से रोका। सबका उसी तरह ध्यान रखा जैसा आकाश में उड़ती चिड़िया को घोंसले में बैठे बच्चों का होता है।

वस्तुतः महापुरुष जिस लोक में रहते हैं उसमें वे स्थूलजगत में कहीं और विचरण कर रहे होते हैं व अपने भक्त को कष्ट हरने सूक्ष्म रूप में पहुँच जाते हैं। एक ही समय में एक ही सत्ता विभिन्न स्थानों पर कहीं भी हो सकता है।

स्थूल शरीर से न रहने पर वह मार्गदर्शन करेगी कि नहीं हमारी विपदाओं को हरेगी कि नहीं यह असमंजस किसी के भी मन में आ सकता है। किन्तु यदि हम उनके आश्वासन पर दृष्टि डालें तो वस्तुतः सूक्ष्म व कारण रूप में उनकी सत्ता और भी अधिक व्यापक क्षेत्र में गतिशील है व अपना प्रभाव सतत् दिखा रही है। एक छोटा सा घटना प्रसंग बताकर इस चर्चा का समापन करेंगे। रतलाम नगर के कार्यकर्ता रुद्र कुमार कृष्णात्रे 6 से 8 फरवरी 1992 की अवधि में सामूहिक शक्ति साधना कार्यक्रम की तैयारी में जुटे थे । संयोग से वसंत पंचमी भी साथ में होने से परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस भी साथ ही मनाया जा रहा था।

श्री कृष्णात्रे जी कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए दिन रात लगे हुए थे। 6 फरवरी का प्रसंग है। कलश यात्रा रवाना करने के बाद वे देवस्थापना के लिए कुछ परिजनों को तैयार रहने का संदेश देने के लिए अपनी मोपेड पर रवाना हुए। नगर के एक व्यस्त मार्ग से

गुजरते समय सामने से तेज गति से आ रही एक साइकिल से उनकी टक्कर हुई, दोनों को उठाकर खड़ा कर दिया। जिस समय इधर टक्कर लगी थी, उसी समय शोभा यात्रा का समापन हो रहा था। काफी तेज हवा चल रही थी व गुरुजी व माताजी के चित्र उसी समय वेग से गिर कर उनके काँच टूट गए थे। परिजनों ने तुरंत चित्रों को काँच मढ़वाने के लिए भेज दिया था । संयोग ही था कि ऐक्सीडेंट व चित्र गिरने का समय एक ही था। जब वे अपनी मामूली सी खरोंच व साइकिल चालक की ऊपरी चोट का प्राथमिक उपचार कराके कार्यक्रम स्थल पहुँचे तो सारी जानकारी उन्हें मिली।

जिन्हें लगता है कि स्थूल शरीर से पूज्यवर नहीं हैं, अब उन्हें कौन देखेगा, कौन उनका कष्ट निवारण करेगा, उनके लिए सतत् आश्वासन है उस सत्ता का कि मेरा काम करते रहने वाले हर परिजन की देख−रेख मेरी सूक्ष्मसत्ता व वंदनीया माताजी की स्थूल शक्ति सतत् करती रहेगी। कभी भी उस संरक्षण में कोई कमी नहीं आने वाली।

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