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Books - बड़े आदमी नहीं महामानव बनें

Media: TEXT
Language: HINDI
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सफलताओं का मूलभूत आधार—लगन एवं उत्कट अभिलाषा

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ईसा मसीह ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा है, ‘‘जो द्वार खटखटायेगा उसके लिए दरवाजा खोला जायेगा और जो मांगेगा वह दिया जायगा।’’ इस उक्ति में आध्यात्मिक और भौतिक जीवन के, सम्पूर्ण क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने का अचूक रहस्य उद्घाटित किया गया है। सफलता का द्वार खटखटाने का अर्थ है उसे प्राप्त करने का ढंग संकल्प और मांगने पर मिलने का अर्थ पूरी शक्ति के साथ अपनी शक्तियों का उपयोग। स्मरणीय है सफलताएं भौतिक हों अथवा आध्यात्मिक, उन्हें प्राप्त करने के लिए कोई बाहरी साधनों की आवश्यकता नहीं पड़ती, मूल आवश्यकता तो अपनी आन्तरिक शक्तियों को जागृत करने तथा उन्हें सक्रिय बनाने की होती है। बाहरी साधन और उपकरण भी आवश्यक होते हैं, पर वे एक सीमा तक ही उपयोगी सिद्ध होते हैं। यदि उनका ठीक प्रकार से उपयोग करने की कला न आती हो, संकल्प, साहस और पुरुषार्थ न किया जाय तो वे साधन एक तरह निरर्थक और व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं। मनुष्य जिस प्रकार की इच्छा करता है, हृदय से पूरे प्राण से जो संकल्प करता है उसी के अनुरूप परिस्थितियां उसके निकट एकत्रित होने लगती हैं। इस इच्छा या संकल्प को एक प्रकार का चुम्बक कहा जा सकता है, जिसके आकर्षण से अनुकूल शक्तियां खिंची आती हैं। जहां गड्ढा होता है वहां चारों ओर से वर्षा का पानी बहता हुआ सिमट आता है और गड्ढा भर जाता है, लेकिन जहां ऊंचा टीला है वहां भारी वर्षा होने पर भी पानी नहीं ठहरता। इच्छा और संकल्प एक प्रकार का गड्ढा है जिसमें सब ओर से अनुकूल स्थितियां खिंच-खिंच कर चली आती हैं।

प्रश्न उठता है सफलता और सुख-शांति की इच्छा तो सभी करते हैं, प्रत्येक व्यक्ति उन्नति करना और आगे बढ़ना चाहता है, फिर सभी की इच्छाएं पूरी क्यों नहीं होती? इस प्रश्न का समाधान खोजने के लिए एक उदाहरण देना पर्याप्त होगा। पैर में कांटा चुभता है और पीड़ा होती है, तो मनुष्य सभी काम छोड़कर अपना पूरा ध्यान उस कांटे को को निकालने में लगा देता है। उसे तब तक चैन नहीं आता जब तक कि पैर से कांटा नहीं निकल जाय। इच्छा या आकांक्षा का यही वास्तविक स्वरूप है। सुख-शांति से सभी रहना चाहते हैं, प्रगति और उन्नति करने की आकांक्षा हर कोई करता है, पर कितने व्यक्ति हैं जो इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए समग्र तत्परता से प्रयत्न करते हैं। स्पष्ट है कि जिन्हें इच्छा या आकांक्षा कहा जाता है वे सतही स्तर की होती हैं। यदि पूरे मन और प्राण से इच्छा की जाती है, वर्तमान परिस्थितियां शूल की तरह चुभती हैं तो उन्हें दूर करने के लिए भी उसी स्तर की तत्परता होनी चाहिए।

इस स्तर की इच्छा जहां भी रहेगी वहां अभिरुचि, मनोयोग और आवश्यक साधन जुटाने के लिए समस्त शक्तियां सक्रिय हो उठेंगी। इसके विपरीत सतही इच्छाएं तथा आकांक्षाओं की कमी रहने पर विभूतियां प्राप्त नहीं हो सकेंगी। स्मरण रखा जाना चाहिए कि मन में जो इच्छा प्रधान रूप से काम करती है, उसे पूरा करने के लिए शरीर की समस्त शक्तियां काम करने लगती हैं। निर्णय शक्ति, निरीक्षण शक्ति, अन्वेषण, चिंतन और कल्पना आदि मस्तिष्क की सभी शक्तियां उसी दिशा में सक्रिय हो जाती हैं और तब एक जीवित चुम्बकत्व तैयार हो जाता है। जिस प्रकार चुम्बक को कूड़े कचरे में भी फिराया जाय तो धातुओं के इधर-उधर बिखरे हुए टुकड़े उससे चिपक जाते हैं उसी प्रकार विशिष्ट आकांक्षाएं मन में उत्पन्न होती हैं तो व्यक्ति की जागृत शक्तियां उन सभी तथ्यों को ढूंढ़ और प्राप्त कर लेती हैं जो सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।

ईसा मसीह के उक्त कथन का यही रहस्य है कि खटखटाने पर द्वार खुलता है और मांगने पर मिलता है अर्थात् आकांक्षा उत्कट और बलवती होनी चाहिए। उत्कट और बलवती आकांक्षा मनुष्य में वह तत्परता उत्पन्न करती है जो प्रत्येक क्षेत्र में अवरोधों को चीरती, रुकावटों को हटाती और बाधाओं को मिटाती अभीष्ट दिशा में बढ़ती जाती है। तत्परता के बल पर ही किसी भी क्षेत्र में सफल हुआ जा सकता है, क्योंकि उसके द्वारा प्रेरित क्रियाशीलता अभीष्ट शक्ति सम्पादित कराती है और यह सुविदित है कि सक्रियता अथवा निरन्तर अभ्यास से पूरे शरीर को या उसके किसी भी अंग को अथवा व्यक्तित्व के किसी भी पक्ष को बलवान बनाया जा सकता है। लुहार का दाहिना हाथ अपेक्षाकृत अधिक मजबूत होता है, क्योंकि अधिक काम में आने के कारण उसकी क्षमता बढ़ी हुई रहती है। पैदल चलने के अभ्यासी लोगों की रागें मजबूत पाई जाती हैं। नफीरी बजाने वालों के गलफड़े फेंफड़े दूसरे लोगों की तुलना में अधिक पुष्ट होते हैं। इसका एक मात्र कारण उन अंगों की क्रियाशीलता ही है।

उत्कट आकांक्षा और तज्जन्य तत्पर क्रियाशीलता के बल पर कितने ही लोगों ने विभिन्न क्षेत्रों में आश्चर्यजनक प्रगति की है। दुबले-पतले शरीर वाले कितने ही लोगों ने बलवान बनने की उत्कट आकांक्षा से प्रेरित होकर व्यायाम, आहार, विहार, संयम, नियम का पालन कर अपने को उच्च श्रेणी का बलवान तथा पहलवान बना लिया। विश्व विख्यात पहलवान सेंडो बचपन में बहुत दुबला-पतला और प्रायः बीमार रहा करता था। परन्तु जब उसमें बलवान बनने की भावना जागी और इसके लिए नियमित रूप से व्यायाम करने के साथ-साथ आहार-विहार का संयम अपनाया तो उसने अपनी पहलवानी की धाक सारे संसार में जमा दी। भारत के माने हुए पहलवान मास्टर चन्दगीराम 21 वर्ष की आयु तक जुकाम, सर्दी, बुखार आदि रोगों से इस बुरी तरह ग्रस्त रहते थे कि उनका शरीर सूख कर कांटा हो गया था। चलते-चलते उन्हें चक्कर आने लगते। किन्तु जब उन्होंने अपना ध्यान शारीरिक बल बुद्धि पर केन्द्रित किया और व्यायाम, कसरत करने लगे तो फिर शरीर का काया-कल्प ही हो गया। ऐसे अगणित उदाहरण हैं जो मनुष्य की उत्कट आकांक्षा, एकाग्रता, लगन और तत्परता के समन्वय द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में आश्चर्यजनक प्रगति के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

मस्तिष्क की स्मरण शक्ति और बुद्धि की प्रखरता बढ़ाने में इंग्लैण्ड के डब्ल्यू.जे.एम. बाटन की कोई सानी नहीं रखता। इंग्लैण्ड के केंट कस्बे में जन्मा बाटन आरम्भ में इतना मन्दबुद्धि था कि उसे पढ़ी हुई कोई बात याद नहीं रहती। कमजोर भी काफी था और कमजोरी बीमारी के कारण उसे 11 वर्ष की आयु में ही स्कूल छोड़ देना पड़ा। अब मस्तिष्क या बुद्धि के विकास की क्या कल्पना या आशा की जा सकती थी। लेकिन इस स्थिति में भी बाटन ने अपने पिता की प्रेरणा से मनोरंजन का एक शौक बढ़ाया। वह इधर-उधर की बातें याद कर लेता और उनका स्थान, समय, घटनाक्रम आदि का ठीक-ठीक विवरण बताकर लोगों पर अपनी स्मरण शक्ति का रोब जमाता।

धीरे-धीरे उसने अपनी स्मरण शक्ति को इतना अधिक विकसित कर लिया वह चलता-फिरता विश्व कोश समझा जाने लगा। यह अभ्यास उसने इस लक्ष्य के प्रति गांठ-बांधकर किया कि उसे अपनी याददास्त को बढ़ाना है। पूरी तत्परता के साथ इस दिशा में लगे रहने के बाद उसने अपनी याददाश्त को इतना तेज कर लिया कि उसकी ख्याति चारों दिशाओं में फैलने लगी। एक बार उससे यूरोप के प्रमुख ज्योतिषियों, राजनीतिज्ञों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने ऐसी घटनाओं के विवरण पूछे जो विस्मृति के गर्त में गुम गये ही प्रतीत होते थे, पर उससे पूछी गई सारी घटनाओं को सिलसिलेबार सन्, तारीख सहित इस प्रकार बताया कि पूछने वालों को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा। बाटन अपने समय में इतना प्रसिद्ध हो गया था कि उसकी मृत्यु के बाद अमेरिका के एक स्वास्थ्य संस्थान ने उसका सिर 10 हजार डालर में खरीदा ताकि उसकी मस्तिष्कीय विलक्षणताओं का रहस्य मालूम किया जा सके।

इच्छा शक्ति का केन्द्रीकरण तथा पूरी तत्परता के साथ प्रयत्नशील रहना ही वह आधार है जिसके बल पर इच्छित उपलब्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। मनुष्य उन्हीं वस्तुओं अथवा उपलब्धियों को प्राप्त कर सकता है जिसके लिए वह आग्रहपूर्वक प्रयत्न करता है। अगर किसी लक्ष्य विशेष का निर्धारण न कर काम किया जाय तो उनका परिणाम भी शून्य या नगण्य ही रहेगा और कहना नहीं होगा कि लक्ष्य का निर्धारण तभी होता है जब मन में किसी विशिष्ट आकांक्षा का निवास हो और उसे प्राप्त करने के लिए तत्परता के स्तर की व्यग्रता हो। अनेक जीव-जन्तु कीट पतंगे फूलों के आस-पास घूमते रहते हैं, पर उनमें से केवल मधुमक्खी ही शहद निकालती है, क्योंकि उसे मधु प्राप्त करने की आकांक्षा और व्यग्रता रहती है। इस सम्बन्ध में ब्रिटेन के प्रसिद्ध विचारक कार्लाईल का कथन है कि, ‘एक ही विषय पर अपनी शक्तियों को एकाग्र करने से कमजोर व्यक्ति भी बहुत कुछ कर सकता है, जबकि बलवान व्यक्ति भी यदि अपनी शक्तियों को कई दिशाओं में बिखेर देता है तो वह बलवान होते हुए भी कुछ नहीं कर सकता। एक-एक बूंद पानी अगर एक ही स्थान पर निरन्तर पड़ता रहे तो कड़े-से-कड़े पत्थर में भी छेद हो जाता है लेकिन यदि पानी का बड़ा भारी बहाव भी शीघ्रतापूर्वक उसके ऊपर से निकल जाय तो उसका नाम-निशान भी उस पर नहीं दिखाई पड़ता।’

अंग्रेजी भाषा में प्रख्यात साहित्यकाल बुल्वर लिटन शौकिया तौर पर ही लिखा करते थे लेकिन उन्होंने जो कुछ भी लिखा वह इतना श्रेष्ठ था कि उसके कारण लिटन की गणना अंग्रेजी के अग्रणी लेखकों में की जाती है। एक बार किसी ने उनसे इसका रहस्य पूछा तो लिटन ने कहा कि, ‘मैं कभी शीघ्रतापूर्वक बहुत अधिक काम कर डालने की कोशिश नहीं करता बल्कि उसे उत्तम रीति से करना ही ज्यादा पसन्द करता हूं। अगर आज अपनी शक्ति से अधिक काम कर डाला जाय तो कल तक थकान आ जायगी और फिर थोड़ा-सा काम भी ठीक ढंग से नहीं हो सकेगा। जब मैंने कालेज छोड़ा और सांसारिक कामों में पड़ा तो उसके पहले वास्तव में मैंने ऐसे कामों का कोई अध्ययन नहीं किया था। लेकिन इसके बाद मैं पढ़ने लगा और मेरा विश्वास है कि मैंने सामान्य लोगों से कम नहीं पढ़ा। मैंने बहुत-सी दूर-दूर देशों की यात्राएं की, राजनीति में भाग लिया और उद्योग धन्धों में भी समय बिताया। फिर भी साठ से अधिक किताबें लिख डालीं। आपको विश्वास नहीं होगा कि मैंने इस पढ़ने-लिखने में कभी तीन घन्टे से अधिक समय खर्च नहीं किया। लेकिन इन तीन घंटों में जो भी पढ़ता-लिखता था वह पूरी एकाग्रता, तन्मयता और तत्परता के साथ।’

सफलता का मूलभूत आधार उत्कट इच्छा, तत्पर सक्रियता और क्रियाशीलता ही है। इसके बिना कोई भी व्यक्ति ऊंचा नहीं उठ सका है और कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं प्राप्त कर पाया है। तत्परता, तन्मयता, सक्रियता और मनोयोग के मूल में भी उत्कट आकांक्षा ही उत्प्रेरक का काम करती है। यद्यपि सुख-दुःख भली-बुरी परिस्थितियों और उत्थान पतन का मुख्य कारण मनुष्य का कर्म समझा जाता है। लेकिन कर्म रूपी वृक्ष भी तो विचार और इच्छा रूपी बीज से ही उत्पन्न होता इच्छा से प्रेरणा की और प्रेरणा से कर्म की उत्पत्ति होती है।

मनुष्य अपनी आकांक्षा के अनुरूप सोचता है और जैसा वह सोचता है वैसे ही साधन उपलब्ध करता है। जैसे साधन उपलब्ध होते हैं वैसा ही कर्म वह करने लगता है। जैसे कर्म किये जाते हैं वैसी ही परिस्थितियां सामने आ खड़ी होती हैं और उसी तरह के परिणाम प्रस्तुत करती है। इसे भाग्य, कर्मों का फल, किस्मत चाहे, जो नाम दे दिया जाय, पर सचाई यह है कि यह सब अपनी ही इच्छाओं की परिणति और फलश्रुति है। जो चाहा जाता है वही प्राप्त होता है। इसीलिए कहा गया है कि प्रत्येक मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता और तकदीर का लेखक स्वयं है। संसार में जितने भी व्यक्तियों ने सफलताएं प्राप्त की हैं उन्होंने अपने प्राप्तव्य के लिए पूरे मन से अभिलाषा की है और वे इस बात के लिए तड़पते, बेचैन होते रहे हैं कि किस प्रकार अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त की जाय। इस आकांक्षा और तड़प ने ही उन्हें क्रियाशील बनाया तथा समस्त बाधाओं से जूझते हुए, असफलताओं की घड़ी में भी आशान्वित रहते और पराजय के बाद भी नये प्रयत्न करते रहकर अन्त में अपने अभीष्ट को प्राप्त किया। अस्तु उत्कट आकांक्षा ही एक शब्द में सफलता का मूलभूत आधार कही जा सकती है।   

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