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मै क्या हूँ ?

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पहला अध्याय

कः कालः कानि मित्राणि, को देशः कौ व्ययाऽऽ गमौ।
कश्चाहं का च मे शक्तिरितिचिन्त्यं मुहुर्मुह॥-चाणक्य नीति || ४.१८

''कौन सा समय है, मेरे मित्र कौन हैं, शत्रु कौन हैं, कौन सा देश (स्थान) है, मेरी आय-व्यय क्या है, मैं कौन हूँ, मेरी शक्ति कितनी है? इत्यादि बातों का बराबर विचार करते रहो।'' सभी विचारकों ने ज्ञान का एक ही स्वरूप बताया है, वह है ''आत्म-बोध''। अपने सम्बन्ध में पूरी जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रह जाता। जीव असल में ईश्वर ही है। विचारों से बँधकर वह बुरे रूप में दिखाई देता है, परन्तु उसके भीतर अमूल्य निधि भरी हुई है। शक्ति का वह केन्द्र है और इतना है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। सारी कठिनाईयाँ, सारे दुःख इसी बात के हैं कि हम अपने को नहीं जानते। जब आत्म स्वरूप को समझ जाते हैं, तब किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं रहता।

आत्म स्वरूप का अनुभव करने पर वह कहता है-

नाहं जातो जन्म मृत्यु कुतो मे, नाहं प्राणः क्षुस्मिपासे कुतो मे।
नाहं चित्तं शोक मोहौ कुतो मे, नाहं कर्ता बंध मोक्षौ कुतो मे॥

मैं उत्पन्न नहीं हुआ हूँ, फिर मेरा जन्म-मृत्यु कैसे? मैं प्राण नहीं हूँ, फिर भूख-प्यास मुझे कैसी? मैं चित्त नहीं हूँ, फिर मुझे शोक-मोह कैसे? मैं कर्ता नहीं हूँ, फिर मेरा बन्ध-मोक्ष कैसे?
जब वह समझ जाता है कि मैं क्या हूँ तब उसे वास्तविक ज्ञान हो जाता है और सब पदार्थों का रूप ठीक से देखकर उसका उचित उपयोग कर सकता है। चाहे किसी दृष्टि से देखा जाय आत्मज्ञान ही सर्वसुलभ और सर्वोच्च ठहरता है।

किसी व्यक्ति से पूछा जाय कि आप कौन हैं? तो वह अपने वर्ण, कुल, व्यवसाय, पद या सम्प्रदाय का परिचय देगा। ब्राह्मण हूँ, अग्रवाल हूँ, बजाज हूँ, तहसीलदार हूँ, वैष्णव हूँ आदि उत्तर होंगे। अधिक पूछने पर अपने निवास स्थान, वंश व्यवसाय आदि का अधिकाधिक विस्तृत परिचय देगा। प्रश्न के उत्तर के लिए ही यह सब वर्णन हों सो नहीं, उत्तर देने वाला यथार्थ में अपने को वैसा ही मानता है। शरीर-भाव में मनुष्य इतना तल्लीन हो गया है कि अपने आपको वह शरीर ही समझने लगा है।

वंश, वर्ण, व्यवसाय या पद शरीर का होता है। शरीर मनुष्य का एक परिधान, औजार है। परन्तु भ्रम और अज्ञान के कारण मनुष्य अपने आपको शरीर ही मान बैठता है और शरीर के स्वार्थ तथा अपने स्वार्थ को एक कर लेता है। इसी गड़बड़ी में जीवन अनेक अशान्तियों, चिन्ताओं और व्यथाओं का घर बन जाता है।

मनुष्य शरीर में रहता है, यह ठीक है, पर यह भी ठीक है कि वह शरीर नहीं है। जब प्राण निकल जाते हैं तो शरीर ज्यों का त्यों बना रहता है, उसमें से कोई वस्तु घटती नहीं तो भी वह मृत शरीर बेकाम हो जाता है। उसे थोड़ी देर रखा रहने दिया जाय तो लाश सड़ने लगती है, दुर्गन्ध उत्पन्न होती है और कृमि पड़ जाते हैं। देह वही है, ज्यों की त्यों है, पर प्राण निकलते ही उसकी दुर्दशा होने लगती है। इससे प्रकट है कि मनुष्य शरीर में निवास तो करता है पर वस्तुतः वह शरीर से भिन्न है। इस भिन्न सत्ता को आत्मा कहते हैं। वास्तव में यही मनुष्य है। मैं क्या हूँ? इसका सही उत्तर यह है कि मैं आत्मा हूँ।

शरीर और आत्मा की पृथकता की बात हम लोगों ने सुन रखी है। सिद्घान्ततः हम सब उसे मानते भी है। शायद कोई ऐसा विरोध करे कि देह से जीव पृथक नहीं है, इस पृथकता की मान्यता सिद्घान्त रूप से जैसे सर्व साधारण को स्वीकार है, वैसे ही व्यवहार में सभी लोग उसे अस्वीकार करते हैं। लोगों के व्यवहार ऐसे होते हैं मानो वे वस्तुतः शरीर ही हैं। शरीर के हानि-लाभ उनके हानि-लाभ हैं। किसी व्यक्ति का बारीकी के साथ निरीक्षण किया जाय और देखा जाय कि वह क्या सोचता है? क्या कहता है? और क्या करता है? तो पता चलेगा कि वह शरीर के बारे में सोचता है, उसी के सम्बन्ध में सम्भाषण करता है और जो कुछ करता है, शरीर के लिए करता है। शरीर को ही उसने 'मैं' मान रखा है।

शरीर आत्मा का मन्दिर है। उसकी स्वस्थता, स्वच्छता और सुविधा के लिए कार्य करना उचित एवं आवश्यक है, परन्तु यह अहितकर है कि केवल मात्र शरीर के ही बारे में सोचा जाय, उसे अपना स्वरूप मान लिया जाय और अपने वास्तविक स्वरूप को भुला दिया जाय। मनुष्य अपने आपको शरीर मान लेने के कारण शरीर के हानि-लाभों को भी अपने हानि-लाभ मान लेता है और अपने वास्तविक हितों को भूल जाता है। यह भूल-भुलैया का खेल जीवन को बड़ा कर्कश और नीरस बना देता है।

आत्मा शरीर से पृथक् है। शरीर और आत्मा के स्वार्थ भी पृथक हैं। शरीर के स्वार्थों का प्रतिनिधित्व इन्द्रियाँ करती हैं। दस इन्द्रियाँ और ग्यारहवाँ मन यह सदा ही शारीरिक दृष्टिकोण से सोचते और कार्य करते हैं। स्वादिष्ट भोजन, बढ़िया वस्त्र, सुन्दर-सुन्दर मनोहर दृश्य, मधुर श्रवण, रूपवती स्त्री, नाना प्रकार के भोग-विलास यह इन्द्रियों की आकांक्षाएँ हैं। ऊँचा पद, विपुल धन, दूर-दूर तक यश, रौब, दाब यह सब मन की आकांक्षाएँ हैं। इन्हीं इच्छाओं को तृप्त करने में प्रायः सारा जीवन लगता है। जब यह इच्छाएँ अधिक उग्र हो जाती हैं तो मनुष्य उनकी किसी भी प्रकार से तृप्ति करने की ठान लेता है और उचित-अनुचित का विचार छोड़कर जैसे भी बने स्वार्थ साधने की नीति पर उतर आता है। यही समस्त पापों का मूल केन्द्र बिन्दु है।

शरीर भाव में जाग्रत रहने वाला मनुष्य यदि आहार, निद्रा, भय, मैथुन के साधारण कार्यक्रम पर चलता रहे तो भी उस पशुवत जीवन में निरर्थकता ही है, सार्थकता कुछ नहीं। यदि उसकी इच्छाएँ जरा अधिक उग्र या आतुर हो जायें तब तो समझिये कि वह पूरा पाप पुंज शैतान बन जाता है, अनीतिपूर्वक स्वार्थ साधने में उसे कुछ भी हिचक नहीं होती। इस दृष्टिकोण के व्यक्ति न तो स्वयं सुखी रहते हैं और न दूसरों को सुखी रहने देते हैं। काम और लोभ ऐसे तत्त्व हैं कि कितना ही अधिक से अधिक भोग क्यों न मिले वे तृप्त नहीं होते, जितना ही मिलता है उतनी ही तृष्णा के साथ-साथ अशान्ति, चिन्ता, कामना तथा व्याकुलता भी दिन दूनी और रात चौगुनी होती चलती है। इन भोगों में जितना सुख मिलता है उससे अनेक गुना दुःख भी साथ ही साथ उत्पन्न होता चलता है। इस प्रकार शरीर भावी दृष्टिकोण मनुष्य को पाप, ताप, तृष्णा तथा अशान्ति की ओर घसीट ले जाता है।

जीवन की वास्तविक सफलता और समृद्घि आत्मभाव में जागृत रहने में है। जब मनुष्य अपने को आत्मा अनुभव करने लगता है तो उसकी इच्छा, आकांक्षा और अभिरुचि उन्हीं कामों की ओर मुड़ जाती है, जिनसे आध्यात्मिक सुख मिलता है। हम देखते हैं कि चोरी, हिंसा, व्यभिचार, छल एवं अनीति भरे दुष्कर्म करते हुए अन्तःकरण में एक प्रकार का कुहराम मच जाता है, पाप करते हुए पाँव काँपते हैं और कलेजा धड़कता है इसका तात्पर्य यह है कि इन कामों को आत्मा नापसन्द करता है। यह उसकी रुचि एवं स्वार्थ के विपरीत है। किन्तु जब मनुष्य परोपकार, परमार्थ, सेवा, सहायता, दान, उदारता, त्याग, तप से भरे हुए पुण्य कर्म करता है तो हृदय के भीतरी कोने में बड़ा ही सन्तोष, हलकापन, आनन्द एवं उल्लास उठता है। इसका अर्थ है कि यह पुण्य कर्म आत्मा के स्वार्थ के अनुकूल है। वह ऐसे ही कार्यों को पसन्द करता है। आत्मा की आवाज सुनने वाले और उसी की आवाज पर चलने वाले सदा पुण्य कर्मी होते हैं। पाप की ओर उनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती इसलिए वैसे काम उनसे बन भी नहीं पड़ते।