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Books - हमारी वसीयत और विरासत

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Language: HINDI
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उपासना का सही स्वरूप

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भूल यह होती रही है कि जो पक्ष इनमें सबसे गौण है, उसे ‘‘पूजा पाठ’’  की उपासना मान लिया गया और उतने पर ही आदि अंत कर लिया गया। पूजा का अर्थ है हाथों तथा वस्तुओं द्वारा की गई मनुहार, दिए गए छुट-पुट उपचार, उपहार, पाठ का अर्थ है-प्रशंसा परक ऐसे गुणगान जिसमें अत्युक्तियाँ ही भरी पड़ी हैं। समझा जाता है कि ईश्वर या देवता कोई बहुत छोटे स्तर के हैं, उन्हें प्रसाद, नेवैद्य, नारियल, इलायची जैसी वस्तुएँ कभी मिलती नहीं। पाएँगे तो फूलकर कुप्पा हो जाएँगे। जागीरदारों की तरह प्रशंसा सुनकर चारणों को निहाल कर देने की उनकी आदत है। ऐसी मान्यता बनाने वाले देवताओं के स्तर एवं बड़प्पन के सम्बन्ध में बेखबर होते हैं और बच्चों जैसा नासमझ समझते हैं, जिन्हें इन्हीं खिलवाड़ों से  फुसलाया-बरगलाया जा सकता है। मनोकामना पूरी करने के लिए उन्हें लुभाया जा सकता है। भले ही वे उचित हों अथवा अनुचित। न्याय संगत हों या अन्याय पूर्ण। आम आदमी इसी भ्रान्ति का शिकार है। तथाकथित भक्तजनों में से कुछ सम्पदा पाने या सफलता माँगते हैं, कुछ स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि की फिराक में रहते हैं। कइयों पर ईश्वर दर्शन का भूत चढ़ा रहता है। माला घुमाने और अगरबत्ती जलाने वालों में से अधिकतर संख्या ऐसे ही लोगों की है। मोटे अर्थों में उपासना उतने तक सीमित समझी जाती है। जो इस विडम्बना में से जितना अंश पूरा कर लेते हैं, वे अपने को भक्तजन समझने का नखरा करते हैं और बदले में भगवान ने उनकी मनोकामनाओं की पूर्ति नहीं की, तो हजार गुना गालियाँ सुनाते हैं। कई इससे भी सस्ता नुस्खा ढूँढते हैं। वे प्रतिमाओं की, संतों की दर्शन झाँकी करने भर से ही यह मानने लगते हैं कि इस अहसान के बदले ये लोग झक मारकर अपना मनोरथ पूरा करेंगे।    
 
बुद्धिहीन स्तर की कितनी ही मान्यताएँ समाज में प्रचलित हैं। लोग उन पर विश्वास भी करते हैं और अपनाते भी हैं। उन्हीं में से एक यह भी है कि आत्मिक क्षेत्र की उपलब्धियों के लिए दर्शन-झाँकी या पूजा-पाठ जैसा नुस्खा अपना लेने भर से काम चल जाना चाहिए, पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। यदि ऐसा होता तो मन्दिरों वाली भीड़ और पूजा-पाठ वाली मंडली अब तक कब की आसमान के तारे तोड़ लाने में सफल हो गई होती।

समझा जाना चाहिए कि जो वस्तु जितनी महत्त्वपूर्ण है, उसका मूल्य भी उतना ही अधिक होना चाहिए। प्रधानमन्त्री के दरबार का सदस्य बनने के लिए पार्लियामेंट का चुनाव जीतना चाहिए। उपासना का अर्थ है पास बैठना। यह वैसा नहीं है जैसा कि रेलगाड़ी के मुसाफिर एक दूसरे पर चढ़ बैठते हैं। वरन् वैसा है जैसा कि दो घनिष्ठ मित्रों को दो शरीर एक प्राण होकर रहना पड़ता है। सही समीपता ऐसे ही गम्भीर अर्थों में ली जानी चाहिए, समझा जाना चाहिए कि इसमें किसी को किसी के लिए समर्पण करना होगा। चाहे तो भगवान अपने नियम विधान, मर्यादा और अनुशासन छोड़कर किसी भजनानन्दी के पीछे-पीछे नाक में नकेल डालकर फिरें और जो कुछ भला-बुरा वह निर्देश करे उसकी पूर्ति करता रहे। अन्यथा दूसरा उपाय यही है कि भक्त को अपना जीवन भगवान की मर्जी के अनुरूप बनाने के लिए आत्म-समर्पण करना होगा।

हमें हमारे मार्गदर्शक ने जीवनचर्या को आत्मोत्कर्ष के त्रिविध कार्यक्रमों में नियोजित करने के लिए सर्वप्रथम उपासना का तत्त्वदर्शन और स्वरूप समझाया। कहा-‘‘भगवान तुम्हारी मर्जी पर नहीं नाचेगा। तुम्हें ही भगवान का भक्त बनना और उसके संकेतों पर चलना पड़ेगा। ऐसा कर सकोगे, तो तद्रूप होने का लाभ प्राप्त करोगे।’’

उदाहरण देते हुए उनने समझाया कि ‘‘ईंधन की हस्ती दो कौड़ी की होती है, पर जब वह अग्नि के  साथ जुड़ जाता है, तो उसमें सारे गुण अग्नि के आ जाते हैं। आग ईंधन नहीं बनती, ईंधन को आग बनना पड़ता है। नाला नदी में मिलकर वैसा ही पवित्र और महान बन जाता है, पर ऐसा नहीं होता कि नदी उलट कर नाले में मिले और वैसी ही गंदी बन जाए। पारस को छूकर लोहा सोना होता है, लोहा पारस नहीं बनता। किसी भक्त की यह आशा कि भगवान उसके इशारे पर नाचने के लिए सहमत हो जाएगा, आत्म-प्रवंचना भर है। भक्त को ही भगवान के संकेतों पर कठपुतली की तरह नाचना पड़ता है। भक्त की इच्छाएँ भगवान पूरी नहीं करते। वरन् भगवान की इच्छा पूरी करने के लिए भक्त को आत्म-समर्पण करना पड़ता है। बूँद को समुद्र में घुलना पड़ता है। समुद्र बूँद नहीं बनता। यही है उपासना का एक मात्र तत्त्वदर्शन। जो भगवान के समीप बैठना चाहे, वह उसी का निर्देशन, अनुशासन स्वीकार करें। उसी का अनुयायी, सहयोगी बने।’’

हमें ऐसा ही करना पड़ा है। भगवान की उपासना गायत्री माता का जप और सविता पिता का ध्यान करते हुए करते रहे। भावना एक ही रखी है कि श्रवण कुमार की तरह आप दोनों को तीर्थयात्रा कराने के आदर्श का परिपालन करेंगे। आपसे कुछ माँगेंगे नहीं, आपके सच्चे पुत्र कहला सकें, ऐसा व्यक्तित्व ढालेंगे। आपकी निकृष्ट संतान जैसी बदनामी न होने देंगे।

ध्यान की सुविधा के लिए गायत्री को माता और सविता को पिता माना तो सही पर साथ ही यह भी अनुभव किया कि वे सर्वव्यापक और सूक्ष्म हैं। इसी मान्यता के कारण उनको अपने रोम-रोम में और अपना उनकी हर तरंग में घुल सकना सम्भव हो सका। मिलन का आनंद इससे कम में आता ही नहीं यदि उन्हें व्यक्ति विशेष माना होता तो दोनों के मध्य अंतर बना ही रहता और घुलकर आत्मसात् होने की अनुभूति होने में बाधा ही बनी रहती।
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