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Books - सतयुग की वापसी

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लेने के देने क्यों पड़ रहे हैं?

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क्रौंच पक्षी को आहत- विलाप करते देखकर वाल्मीकि की करुणा जिस क्षण उभरी, उसी समय वे आदि कवि के रूप में परिणत हो गए। ऋषियों के अस्थि- पंजरों की पर्वतमाला देखकर राम की करुणा मर्माहत हो गई और उनसे भुजा उठाकर यह प्रण करते ही बन पड़ा कि ‘‘निशिचर हीन करौं महि’’। बाढ़, भूकम्प, दुर्भिक्ष, महामारी जैसे आपत्तिकाल में जब असंख्यों को देखा जाता है, तो निष्ठुर भले ही मूकदर्शक बने रहें, सहृदयों को तो अपनी सामर्थ्य भर सहायता के लिए दौडऩा ही पड़ता है। इसके बिना उनकी अन्तरात्मा आत्म- प्रताड़ना से व्याकुल हो उठती है। निष्ठुरों को नर- पिशाच कहते हैं, उनका मनुष्य समुदाय में भी अभाव नहीं है।

    विकास की अन्तिम सीढ़ी भाव- संवेदना को मर्माहत कर देने वाली करुणा के विस्तार में ही है। इसी को आन्तरिक उत्कृष्टता भी कहते हैं। संवेदना उभरने पर ही सेवा साधना बन पड़ती है। धर्म- धारणा का निर्वाह भी इससे कम में नहीं होता। तपश्चर्या और योग साधना का लक्ष्य भी यही है कि किसी प्रकार संवेदना जगाकर उस देवत्व का साक्षात्कार हो सके, जो जरूरतमन्दों को दिए बिना रह ही नहीं सकता। देना ही जिनकी प्रकृति और नियति है, उन्हीं को इस धरती पर देवता कहा जाता है। उन्हीं का अनुकरण और अभिनन्दन करते विवेकवान्, भक्तजन् देखे जाते हैं।

    देने की प्रकृति वाली आत्माओं का जहाँ संगठन- समन्वय होता रहता है, उसी क्षेत्र को स्वर्ग के नाम से सम्बोधित किया जाने लगता है। इस प्रकार का लोक या स्थान कहीं भले ही न हो, पर सत्य है कि सहृदय, सेवाभावी, उदारचेता न केवल स्वयं देवमानव होते हैं, वरन् कार्यक्षेत्र को भी ऐसा कुछ बनाए बिना नहीं रहते जिसे स्वर्गोपम अथवा सतयुग का सामयिक संस्करण कहा जा सके।

    अपने समय को अभूतपूर्व प्रगतिशीलता का युग कहा और गर्वोक्तियों के साथ बखाना जाता है। इस अर्थ में बात सही भी है कि जितने सुविधा साधन इन दिनों उपलब्ध हैं, इतने इससे पहले कभी भी हस्तगत नहीं हो सके। जलयान, वायुयान, रेल, मोटर जैसे द्रुतगामी वाहन, तार, रेडियो, फिल्म, दूरदर्शन जैसे संचार साधन, इससे पूर्व कभी कल्पना में भी नहीं आए थे। कल- कारखानों का पर्वताकार उत्पादन, सर्जरी- अङ्ग प्रत्यारोपण जैसी सुविधाएँ भूतकाल में कहाँ थीं? कहा जा सकता है कि विज्ञान ने पौराणिक विश्वकर्मा को कहीं पीछे छोड़ दिया है।

    बुद्धिवाद की प्रगति भी कम नहीं हुई है। ज्ञान, पुरातन एकाकी धर्मशास्त्र की तुलना में अब अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञानशास्त्र जैसे अनेकानेक कलेवरों में असाधारण रूप से बढ़ा और भविष्य में और भी अधिक खोज लेने का दावा कर रहा है। शोध संस्थानों की, प्रयोगशालाओं की उपलब्धियाँ घोषणा कर रही हैं कि निकट भविष्य में मनुष्य इतना अधिक ज्ञान- विज्ञान खोज लेगा कि पुरातन काल की समस्त उपलब्धियों को उसके सामने बौना ठहराया जा सके।

    इस तथाकथित प्रगति ने इतना तक कहना शुरू कर दिया है कि ईश्वर मर गया है या उसे मार दिया जाना चाहिए। धर्म के सम्बन्ध में नई व्याख्या विवेचना यह है कि वह अन्धविश्वासों का जमघट मात्र है। उसे यथास्थिति स्वीकार करने के लिए गले के नीचे उतारी जाने वाली अफीम की गोली भर कहा जाना चाहिए।

    यहाँ उपलब्धियों, आविष्कारों के सदुपयोग- दुरुपयोग की विवेचना नहीं की जा रही है, यह स्पष्ट है कि इन दिनों विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति हुई वह असाधारण एवं अभूतपूर्व है। विकास विस्तार तो हर भले- बुरे उपक्रम पर लागू हो सकता है। इन अर्थों में आज की प्रगतिशीलता की दावेदारी को स्वीकार करना ही पड़ता है। फिर भी एक प्रश्न सर्वथा अनसुलझा ही रह जाता है कि यह तथाकथित प्रगति, अपने साथ दुर्गति के असंख्यों बवण्डर क्यों और कैसे घसीटती, बटोरती चली जा रही है?

प्रदूषण, युद्धोन्माद, खाद्य- संकट अपराधों की वृद्धि आदि समस्याएँ समस्त तटबन्ध तोड़ती चली जा रही हैं। अस्वस्थता, दुर्बलता, कलह, विग्रह, छल- प्रपञ्च जैसे दोष, व्यवहार तथा चिन्तन को धुँआधार विकृतियों से भरते क्यों चले जा रहे हैं? निकट भविष्य के सम्बन्ध में मूर्द्धन्य विचारक यह भविष्यवाणी कर रहे हैं कि स्थिति यही रही, रेल इसी पटरी पर चलती रही, तो विपन्नता बढ़ते- बढ़ते महाप्रलय जैसी स्थिति में पहुँचा सकती है। वे कहते हैं कि हवा और पानी में विषाक्तता इस तेजी से बढ़ रही है कि उसे धीमी गति से सर्वभक्षी आत्महत्या का नाम दिया जा सकता है। बढ़ता हुआ तापमान यदि ध्रुवों की बरफ पिघला दे और समुद्र में भयानक बाढ़ ला दे तो उससे थल निवासियों के लिए डूब मरने का संकट उत्पन्न कर सकता है। वनों का कटना, रेगिस्तान का द्रुतगामी विस्तार, भूमि की उर्वरता का ह्रास, खनिजों के बेतरह दोहन से उत्पन्न हुआ धरित्री असन्तुलन, मौसमों में आश्चर्यजनक परिवर्तन, तेजाबी मेघ वर्षण, अणु विकिरण, बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुरूप जीवनसाधन न बढ़ पाने का संकट जैसे अनेकानेक जटिल प्रश्न हैं। इनमें से किसी पर भी विचार किया जाए तो प्रतीत होता है कि तथाकथित प्रगति ही उन समस्त विग्रहों के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। वह प्रगति किस काम की, जिसमें एक रुपया कमाने के बदले सौ का घाटा उठाना पड़े।

    आश्चर्य इस बात का है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है एवं कैसे हो रहा है? इसे कौन करा रहा है? आखिर वह चतुराई कैसे चुक गई, जो बहुत कुछ पाने का सरंजाम जुटाकर अलादीन का नया चिराग जलाने चली थी। पहुँचना तो उसे प्रकृति विजय के लक्ष्य तक था, पर यह हुआ क्या कि तीनों लोक तीन डगों में नाप लेने की दावेदारी, करारी मोच लगने पर सिहरकर बीच रास्ते में ही पसर गई। उसे भी आगे कुआँ पीछे खाई की स्थिति में आगे पग बढ़ाते नहीं बन रहा है। साँप- छछूँदर की इस स्थिति से कैसे उबरा जाए, जिसमें न निगलते बन रहा है और न उगलते ।।

    फूटे घड़े में पानी भरने पर वह देर तक ठहरता नहीं है। चलनी में दूध दुहने पर दुधारू गाय पालने वाला भी खिन्न- विपन्न रहता है। ऐसी ही कुछ भूल मनुष्य से भी बन पड़ी है, जिसके कारण अत्यन्त परिश्रमपूर्वक जुटाई गई उपलब्धियों को हस्तगत करने पर भी, लेने के देने पड़ रहे हैं, परन्तु स्मरण रहे कि असमंजस की स्थिति लम्बे समय तक टिकती नहीं है। मनुष्य की बुद्धि इतनी कमजोर नहीं है कि वह उत्पन्न संकटों का कारण न खोज सके और शान्तचित्त होने पर उनके समाधान न खोज सके।

    बड़प्पन को कमाना ही पर्याप्त नहीं होता, उसे सुस्थिर रखने और सदुपयोग द्वारा लाभान्वित होने के लिए और समझदारी, सतर्कता और सूझबूझ चाहिए। भाव- संवेदनाओं से भरे- पूरे व्यक्ति ही उस रीति- नीति को समझते हैं, जिनके आधार पर सम्पदाओं का सदुपयोग करते बन पड़ता है। अपने समय के लोग इन्हीं भाव- संवेदनाओं का महत्त्व भूल बैठे और उन्हें गिराते- गँवाते चले जा रहे हैं। यही है वह कारण, जो उपलब्धियों को भी विपत्तियों में परिणत करके रख देता है।
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