समग्र समाधान -मनुष्य में देवत्व के अवतरण से
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
पदार्थ- सम्पदा की उपयोगिता और महत्ता कितनी ही बढ़ी- चढ़ी क्यों न हो, पर
यदि उसका दुरुपयोग चल पड़े तो अमृत भी विष बनकर रहता है। कलम बनाने के काम
आने वाला चाकू किसी के प्राण हरण का निमित्त कारण भी बन सकता है। बलिष्ठता,
सम्पदा, शिक्षा के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनके सत्परिणाम तभी देखे जा
सकते हैं, जब सदुपयोग कर सकने वाली सद्बुद्धि सक्रिय हो। यहाँ इतना और भी
समझ लेना चाहिए कि नीतिनिष्ठा और समाजनिष्ठा का अवलम्बन लेना भी पर्याप्त
नहीं है, उसमें भाव- संवेदनाओं का पावन प्रवाह ही भले- बुरे लगने वाले
ज्वार- भाटे लाता रहा है।
मस्तिष्क आमतौर से सभी के सही होते हैं। पागलों और सनकियों की संख्या तो सीमित ही होती है। फिर अच्छे खासे मस्तिष्क ,, आदर्शवादी उत्कृष्टता क्यों नहीं अपनाते? उन्हें अनर्थ ही क्यों सूझता रहता है? उनसे सुविधा, प्रसन्नता और प्रगति जैसा कुछ बन पड़ना तो दूर, उलटे संकटों, विपन्नताओं, विभीषिकाओं का ही सृजन होता रहा है। इस तथ्य का पता लगाने के लिए हमें भाव- संवेदनाओं की गहराई में उतरना होगा। यह तथ्य समझना होगा कि अन्त:करण में श्रद्धा, संवेदना की शीतलता, सरसता भरी रहने पर ही सदाशयता का वातावरण बनता है। मानसिकता तो उस चेरी की तरह है, जो अन्तःश्रद्धा रूपी रानी की सेवा में हर घड़ी हुक्म बजाने के लिए खड़ी रहती है।
स्पष्ट है कि देवमानवों में से प्रत्येक को अपनी सुविधाओं, मनचली इच्छाओं पर अंकुश लगाना पड़ा है और उससे हुई बचत को उत्कृष्टताओं के समुच्चय समझे जाने वाले भगवान् के चरणों पर अर्पित करना पड़ा है। लोकमंगल के लिए, आत्म परिष्कार के लिए अपनी क्षमता का कण- कण समर्पित करना पड़ा है। इसी मूल्य को चुकाने पर किसी को दैवी अनुग्रह और उसके आधार पर विकसित होने वाला उच्चस्तरीय व्यक्तित्व उपलब्ध होता है। महानता इसी स्थिति को कहते हैं। इसी वरिष्ठता को चरितार्थ करने वाले देवमानव या देवदूत कहलाते हैं। उन्हीं के प्रबल पुरुषार्थों के आधार पर शालीनता का वातावरण बनता और समस्त संसार इसी आधार पर सुन्दर व समुन्नत बन पड़ता है।
तात्त्विक दृष्टि से यह प्रगतिशीलता, कुटिलता की पक्षधर बुद्धिवादी मानसिकता को तनिक भी नहीं सुहाती। इसमें उसे प्रत्यक्षतः: घाटा ही घाटा दीखता है। अपना और दूसरों का जो कुछ भी उपलब्ध हो, उस सब को हड़प जाना या बिखेर देना ही उस भौतिक दृष्टि का एकमात्र निर्धारण है, जो जनमानस पर प्रमुखतापूर्वक छाई हुई है। संकीर्ण स्वार्थपरता, स्वच्छन्द उपयोग की ललक उभारती है। उसी की प्रेरणा से वह निष्ठुरता पनपती है, जो मात्र हड़पने की ही शिक्षा देती है, जिसके लिए भले ही किसी भी स्तर का अनाचार बरतना पड़े। निष्ठुरता इसी स्थिति की देन है। वही है जो अनावश्यक संचय और अवांछनीय उपभोग के लिए हर समय उकसाती- उत्तेजित करती रहती है। यही है वह मानसिकता जिसकी छाप जहाँ भी पड़ी है, वहीं चित्र- विचित्र संकट एवं विग्रह उत्पन्न होते चले गए हैं। इसी मानसिकता को दूसरे शब्दों में कुटिलता, नास्तिकता अथवा शालीनता को पूरी तरह समाप्त कर देने में समर्थ ओले की वर्षा के समतुल्य भी समझा जा सकता है।
प्रदूषण, विकिरण, युद्धोन्माद, दरिद्रता, पिछड़ापन, अपराधों का आधार खोजने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि उपलब्धियों को दानवी स्वार्थपरता के लिए नियोजित किए जाने पर ही यह संकट उत्पन्न हुए हैं। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को चौपट करने में असंयम और दुर्व्यसन ही प्रधान कारण हैं। मनुष्यों के मध्य चलने वाले छल- छद्म प्रपंच एवं विश्वासघात के पीछे भी यही मानसिकता काम करती है। इनमें जिन अवांछनीयताओं का अभ्यास मिलता है, वस्तुतः: वे सब विकृत मानसिकता की ही देन हैं।
दोष न तो विज्ञान का है और न बुद्धिवाद का। बढ़ी- चढ़ी उपलब्धियों को भी वर्तमान अनर्थ के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि विकसित बुद्धिवाद का, विज्ञान का, वैभव का, कौशल का उपयोग सदाशयता के आधार पर बन पड़ा होता तो खाई- खन्दकों के स्थान पर समुद्र के मध्य प्रकाश स्तम्भ बनकर खड़ी रहने वाली मीनार बनकर खड़ी हो गई होती। कुछ वरिष्ठ कहलाने वाले यदि उपलब्धियों का लाभ कुछ सीमित लोगों को ही देने पर आमादा न हुए होते, तो यह प्रगति जन- जन के सुख सौभाग्य में अनेक गुनी बढ़ोत्तरी कर रही होती। हँसता- हँसाता खिलता- खिलाता जीवन जी सकने की सुविधा हर किसी को मिल गई होती। पर उस विडम्बना को क्या कहा जाए, जिसमें विकसित मानवी कौशल ने उन दुरभिसन्धियों के साथ तालमेल बिठा लिया, जो गिरों को गिराने और समर्थों को सर्वसम्पन्न बनाने के लिए ही उतारू हों।
विकृतियाँ दीखती भर ऊपर हैं, पर उनकी जड़ अन्तराल की कुसंस्कारिता के साथ जुड़ी रहती है। यदि उस क्षेत्र को सुधारा, सँभाला, उभारा जा सके, तो समझना चाहिए कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बदला और साथ ही उच्चस्तरीय परिवर्तन भी सुनिश्चित हो गया।
भगवान् असंख्य ऋद्धि- सिद्धियों का भांडागार है। उसमें संकटों के निवारण और अवांछनीयताओं के निराकरण की भी समग्र शक्ति है। वह मनुष्य के साथ सम्बन्ध घनिष्ठ करने के लिए भी उसी प्रकार लालायित रहता है, जैसे माता अपने बालक को गोद में उठाने, छाती से लगाने के लिए लालायित रहती है। मनुष्य ही है जो वासना, तृष्णा के खिलौने से खेलता भर रहता है और उस दुलार की ओर से मुँह मोड़े रहता है, जिसे पाकर वह सच्चे अर्थों में कृतकृत्य हो सकता था। उसे समीप तक बुलाने और उसका अतिरिक्त उत्तराधिकार पाने के लिए यह आवश्यक है कि उसके बैठने के लिए साफ- सुथरा स्थान पहले से ही निर्धारित कर लिया जाए। यह स्थान अपना अन्तःकरण ही हो सकता है।
अन्तःकरण की श्रद्धा और दिव्य चेतना के संयोग की उपलब्धि, दिव्य संवेदना कहलाती है, जो नए सिरे से, नए उल्लास के साथ उभरती है। यही उसकी यथार्थता वाली पहचान है, अथवा मान्यता तो प्रतिमाओं में भी आरोपित की जा सकती है। तस्वीर देखकर भी प्रियजन का स्मरण किया जा सकता है, पर वास्तविक मिलन इतना उल्लास भरा होता है कि उसकी अनुभूति अमृत निर्झरिणी उभरने जैसी होती है। इसका अवगाहन करते ही मनुष्य कायाकल्प जैसी देवोपम स्थिति में जा पहुँचता है। उसे हर किसी में अपना आपा हिलोरें लेता दीख पड़ता है और समग्र लोकचेतना अपने भीतर घनीभूत हो जाती है। ऐसी स्थिति में परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ बन जाता है। दूसरों की सुविधा अपनी प्रसन्नता प्रतीत होती है और अपनी प्रसन्नता का केन्द्र दूसरों की सेवा- सहायता में घनीभूत हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने चिन्तन और क्रियाकलापों को लोक- कल्याण में, सत्प्रवृत्ति- संवर्धन में ही नियोजित कर सकता है। व्यक्ति के ऊपर भगवत् सत्ता उतरे, तो उसे मनुष्य में देवत्व के उदय के रूप में देखा जा सकता है। यदि यह अवतरण व्यापक हो, तो धरती पर स्वर्ग के अवतरण की परिस्थितियाँ ही सर्वत्र बिखरी दृष्टिगोचर होंगी।
मस्तिष्क आमतौर से सभी के सही होते हैं। पागलों और सनकियों की संख्या तो सीमित ही होती है। फिर अच्छे खासे मस्तिष्क ,, आदर्शवादी उत्कृष्टता क्यों नहीं अपनाते? उन्हें अनर्थ ही क्यों सूझता रहता है? उनसे सुविधा, प्रसन्नता और प्रगति जैसा कुछ बन पड़ना तो दूर, उलटे संकटों, विपन्नताओं, विभीषिकाओं का ही सृजन होता रहा है। इस तथ्य का पता लगाने के लिए हमें भाव- संवेदनाओं की गहराई में उतरना होगा। यह तथ्य समझना होगा कि अन्त:करण में श्रद्धा, संवेदना की शीतलता, सरसता भरी रहने पर ही सदाशयता का वातावरण बनता है। मानसिकता तो उस चेरी की तरह है, जो अन्तःश्रद्धा रूपी रानी की सेवा में हर घड़ी हुक्म बजाने के लिए खड़ी रहती है।
स्पष्ट है कि देवमानवों में से प्रत्येक को अपनी सुविधाओं, मनचली इच्छाओं पर अंकुश लगाना पड़ा है और उससे हुई बचत को उत्कृष्टताओं के समुच्चय समझे जाने वाले भगवान् के चरणों पर अर्पित करना पड़ा है। लोकमंगल के लिए, आत्म परिष्कार के लिए अपनी क्षमता का कण- कण समर्पित करना पड़ा है। इसी मूल्य को चुकाने पर किसी को दैवी अनुग्रह और उसके आधार पर विकसित होने वाला उच्चस्तरीय व्यक्तित्व उपलब्ध होता है। महानता इसी स्थिति को कहते हैं। इसी वरिष्ठता को चरितार्थ करने वाले देवमानव या देवदूत कहलाते हैं। उन्हीं के प्रबल पुरुषार्थों के आधार पर शालीनता का वातावरण बनता और समस्त संसार इसी आधार पर सुन्दर व समुन्नत बन पड़ता है।
तात्त्विक दृष्टि से यह प्रगतिशीलता, कुटिलता की पक्षधर बुद्धिवादी मानसिकता को तनिक भी नहीं सुहाती। इसमें उसे प्रत्यक्षतः: घाटा ही घाटा दीखता है। अपना और दूसरों का जो कुछ भी उपलब्ध हो, उस सब को हड़प जाना या बिखेर देना ही उस भौतिक दृष्टि का एकमात्र निर्धारण है, जो जनमानस पर प्रमुखतापूर्वक छाई हुई है। संकीर्ण स्वार्थपरता, स्वच्छन्द उपयोग की ललक उभारती है। उसी की प्रेरणा से वह निष्ठुरता पनपती है, जो मात्र हड़पने की ही शिक्षा देती है, जिसके लिए भले ही किसी भी स्तर का अनाचार बरतना पड़े। निष्ठुरता इसी स्थिति की देन है। वही है जो अनावश्यक संचय और अवांछनीय उपभोग के लिए हर समय उकसाती- उत्तेजित करती रहती है। यही है वह मानसिकता जिसकी छाप जहाँ भी पड़ी है, वहीं चित्र- विचित्र संकट एवं विग्रह उत्पन्न होते चले गए हैं। इसी मानसिकता को दूसरे शब्दों में कुटिलता, नास्तिकता अथवा शालीनता को पूरी तरह समाप्त कर देने में समर्थ ओले की वर्षा के समतुल्य भी समझा जा सकता है।
प्रदूषण, विकिरण, युद्धोन्माद, दरिद्रता, पिछड़ापन, अपराधों का आधार खोजने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि उपलब्धियों को दानवी स्वार्थपरता के लिए नियोजित किए जाने पर ही यह संकट उत्पन्न हुए हैं। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को चौपट करने में असंयम और दुर्व्यसन ही प्रधान कारण हैं। मनुष्यों के मध्य चलने वाले छल- छद्म प्रपंच एवं विश्वासघात के पीछे भी यही मानसिकता काम करती है। इनमें जिन अवांछनीयताओं का अभ्यास मिलता है, वस्तुतः: वे सब विकृत मानसिकता की ही देन हैं।
दोष न तो विज्ञान का है और न बुद्धिवाद का। बढ़ी- चढ़ी उपलब्धियों को भी वर्तमान अनर्थ के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि विकसित बुद्धिवाद का, विज्ञान का, वैभव का, कौशल का उपयोग सदाशयता के आधार पर बन पड़ा होता तो खाई- खन्दकों के स्थान पर समुद्र के मध्य प्रकाश स्तम्भ बनकर खड़ी रहने वाली मीनार बनकर खड़ी हो गई होती। कुछ वरिष्ठ कहलाने वाले यदि उपलब्धियों का लाभ कुछ सीमित लोगों को ही देने पर आमादा न हुए होते, तो यह प्रगति जन- जन के सुख सौभाग्य में अनेक गुनी बढ़ोत्तरी कर रही होती। हँसता- हँसाता खिलता- खिलाता जीवन जी सकने की सुविधा हर किसी को मिल गई होती। पर उस विडम्बना को क्या कहा जाए, जिसमें विकसित मानवी कौशल ने उन दुरभिसन्धियों के साथ तालमेल बिठा लिया, जो गिरों को गिराने और समर्थों को सर्वसम्पन्न बनाने के लिए ही उतारू हों।
विकृतियाँ दीखती भर ऊपर हैं, पर उनकी जड़ अन्तराल की कुसंस्कारिता के साथ जुड़ी रहती है। यदि उस क्षेत्र को सुधारा, सँभाला, उभारा जा सके, तो समझना चाहिए कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बदला और साथ ही उच्चस्तरीय परिवर्तन भी सुनिश्चित हो गया।
भगवान् असंख्य ऋद्धि- सिद्धियों का भांडागार है। उसमें संकटों के निवारण और अवांछनीयताओं के निराकरण की भी समग्र शक्ति है। वह मनुष्य के साथ सम्बन्ध घनिष्ठ करने के लिए भी उसी प्रकार लालायित रहता है, जैसे माता अपने बालक को गोद में उठाने, छाती से लगाने के लिए लालायित रहती है। मनुष्य ही है जो वासना, तृष्णा के खिलौने से खेलता भर रहता है और उस दुलार की ओर से मुँह मोड़े रहता है, जिसे पाकर वह सच्चे अर्थों में कृतकृत्य हो सकता था। उसे समीप तक बुलाने और उसका अतिरिक्त उत्तराधिकार पाने के लिए यह आवश्यक है कि उसके बैठने के लिए साफ- सुथरा स्थान पहले से ही निर्धारित कर लिया जाए। यह स्थान अपना अन्तःकरण ही हो सकता है।
अन्तःकरण की श्रद्धा और दिव्य चेतना के संयोग की उपलब्धि, दिव्य संवेदना कहलाती है, जो नए सिरे से, नए उल्लास के साथ उभरती है। यही उसकी यथार्थता वाली पहचान है, अथवा मान्यता तो प्रतिमाओं में भी आरोपित की जा सकती है। तस्वीर देखकर भी प्रियजन का स्मरण किया जा सकता है, पर वास्तविक मिलन इतना उल्लास भरा होता है कि उसकी अनुभूति अमृत निर्झरिणी उभरने जैसी होती है। इसका अवगाहन करते ही मनुष्य कायाकल्प जैसी देवोपम स्थिति में जा पहुँचता है। उसे हर किसी में अपना आपा हिलोरें लेता दीख पड़ता है और समग्र लोकचेतना अपने भीतर घनीभूत हो जाती है। ऐसी स्थिति में परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ बन जाता है। दूसरों की सुविधा अपनी प्रसन्नता प्रतीत होती है और अपनी प्रसन्नता का केन्द्र दूसरों की सेवा- सहायता में घनीभूत हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने चिन्तन और क्रियाकलापों को लोक- कल्याण में, सत्प्रवृत्ति- संवर्धन में ही नियोजित कर सकता है। व्यक्ति के ऊपर भगवत् सत्ता उतरे, तो उसे मनुष्य में देवत्व के उदय के रूप में देखा जा सकता है। यदि यह अवतरण व्यापक हो, तो धरती पर स्वर्ग के अवतरण की परिस्थितियाँ ही सर्वत्र बिखरी दृष्टिगोचर होंगी।

