बलिदान की आवश्यकता
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समझा जाता है कि वशीकरण एक तांत्रिक विद्या है। इसलिए इसके विधि-विधान भी तांत्रिक रीतियों के ही होने चाहिए। हम देखते हैं कि तांत्रिक लोग अपने इष्टदेव को प्रसन्न करने के लिए बलिदान की अनिवार्य आवश्यकता समझते हैं। भैरव, भवानी आदि के मठों पर अक्सर पशु-पक्षियों का भी बलिदान किया जाता था। सुधरे हुए दक्षिणमार्गी तांत्रिक भी नारियल आदि का बलिदान करते हैं। ठीक भी है, बिना दिए दूसरी चीज नहीं मिलती। जो लेना चाहता है, उसे देना अवश्य पड़ेगा। संसार के सभी तत्त्वों का निर्माण ‘‘पहले दो तब मिलेगा’’ के आधार पर हुआ है। बीज बोने पर खेत उगता है, प्रसव कष्ट सहकर माता संतान सुख उठाती है। कठिन परिश्रम के बाद पैसा मिलता है, पानी से भरे प्याले में दूध लेना चाहते हैं, तो पहले पानी को फैला देना आवश्यक है। मुफ्त में कुछ नहीं मिलता, यदि मिल भी जाए, तो ठहर नहीं सकता। आप किसी का हृदय जीतना चाहते हैं, इसके लिए कुछ बलिदान करना पड़ेगा, क्योंकि मुफ्त में कुछ नहीं मिल सकता। पुराणों में ऐसी असंख्य कथाएं भरी पड़ी हैं, जिनसे प्रकट होता है कि बलिदान करने से देवता प्रसन्न होते हैं और वे मन चाहा फल देते हैं। रावण ने अपने सिरों का बलिदान शंकर को देकर इच्छित वरदान प्राप्त किए थे। भागीरथ ने तप करके गंगा को प्रसन्न करने की कथा प्रसिद्ध है। बलिदान तत्त्व पर अधिक गंभीरता से विचार करने पर उसमें उच्चकोटि के त्याग का आभास मिलता है। साधारण त्याग वह है, जिसमें अपनी फालतू चीज दूसरे को दे दी जाए। बलिदान वह है, जिसमें अपनी जरूरी प्रिय वस्तु भी स्वयं कष्ट सहकर दूसरे को दे दी जाए। यह ऊंचे दर्जे का त्याग हुआ। बलिदान का अर्थ ऊंचे दर्जे का त्याग ही समझना चाहिए।
आप जिसे प्रसन्न करना चाहते हैं, जिसे वश में करना चाहते हैं, उसके लिए कुछ बलिदान कीजिए, कष्ट सहिए, तपस्या कीजिए, अपनी प्रिय वस्तु को दीजिए। बनावट से नहीं, हृदय के अंतःस्थल से लालच देकर बहकाने के लिए नहीं, निःस्वार्थ भाव से। इस प्रकार आप अपने ध्येय के अधिक निकट पहुंच जावेंगे। प्रेम का मार्ग कठिन नहीं, वरन् सुगम है। प्रेमी को प्राप्त करना बहुत आसान है, बशर्ते कि अपने में त्याग, प्रेम और उदारता की भावनाएं मौजूद हों। नीचे हम कुछ प्रेमियों के अनुभव उद्धत करते हैं, यह लोग वशीकरण के पहुंचे हुए सिद्ध कहे जा सकते हैं।
संत कबीर कहते हैं—
पिया का मारग सुगम है, तेरा चलन अपेड़ा ।
नाच न जाने बारी, कहे कि आंगन टेढ़ा ।।
सच्चा प्रेमी अपने लिए कुछ नहीं चाहता। बदले में चाहे उसे प्रेम प्राप्त न हो, तो भी खिन्न नहीं होता। अपने प्रेम में किसी प्रकार का अंतर नहीं आने देता। वह ‘हरिऔध’ के शब्दों में कामना करता है कि—
प्यारे जीव, जगत हित करें, गेह चाहे न आवें ।
श्री मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं—
तुम यहां सुधि लो कि न लो कभी ।
उचित उत्तर दो कि न दो कभी ।।
पर यही कहे हम हैं अहो ।
तुम सदैव सहर्ष, सुखी रहो ।।
सच्चे प्रेमी की भावना होती है—
‘‘मेरी प्रीति होय नंदनंदन सों आठों याम ।
मोसों जनि प्रीति होय नंद के किशोर की ।।’’
तुलसीदास जी कहते हैं—
जलदि जनम भरि सुरति बिसारेउ ।
याचत जल पवि पाहन डारेउ ।।
चातक रटनि घटे घटि जाई ।
बढ़े प्रेम सब भांति भलाई ।।
कनकहि बान चढ़हि जिसि दाहे ।
तिमि प्रियतम पद नेह निबाहे ।।
सच्चा प्रेम स्वयं ही एक वरदान है। प्रेमी के मिलने में जो आनंद आता है, वह पूरा का पूरा प्रेम की भावना में मौजूद है। जो शुद्ध हृदय से प्रेम करता है, उसको वियोग नाम की कोई वस्तु दुनिया में नहीं है। रामचरितमानस में कहा गया है—
जेहि कर जेहि पर सत्य सनेहू ।
सो तेहि मिलै न कछु सन्देहू ।।
चाहे ध्येय कितना ही कठिन हो, सच्ची लगन से वह प्राप्त हो ही जाता है। एक अंग्रेजी कवि कहता है—
‘‘मैंने झरने के किनारे पर पत्थर का बारीक पिसा हुआ चूर्ण बालू की तरह दूर-दूर तक फैला हुआ देखा, इस बालू में से एक मुट्ठी उठाकर मैंने देखा तो जाना कि यह बढ़िया जाति के पत्थरों का चूरा है, जो बड़ा कठोर होता है और तीक्ष्ण औजारों के द्वारा भी बड़ी मुश्किल से काटा जाता है। मैं विचार करने लगा कि यहां न तो कोई बड़ा यंत्र है न कोई चतुर इंजीनियर, फिर वे शिलाखंड क्यों कर चूर-चूर हो गए? और पर्वत शिखर से उतरकर इस साधारण भूमि में कैसे लौटने लगे?’’
‘‘बहुत सोच-विचार कर मैंने जाना कि झरने की कोमल बूंदें उन चट्टानों पर लगातार गिरती रही हैं और उन्हें गलाकर अपने प्रवाह में बहा ले गई हैं। मैंने यह भी जाना कि यदि कोई मनुष्य पर्वत की तरह अहंकारी हो और चट्टान की तरह उसका दिल कठोर हो, तो भी वह आंतरिक प्रेम की सुकोमल बूंदों से गलकर ऐसी ही धूल बन सकता है, जैसे कि इस झरने के किनारे पर दूर-दूर तक फैली हुई दिखाई देती है।’’
एक दूसरे तत्त्वज्ञ का उपदेश है, ‘‘संसार में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे आप प्राप्त न करें। कोई भी सुंदर भविष्य इतनी दूर नहीं है कि आप न पा सकें। कोई भी ऐसी संपदा नहीं है, जिसे कोई व्यक्ति प्राप्त कर सका हो, पर आप न पा सकें। आप अपने साथियों के हृदयों में ज्ञान और प्रेम का संचार कीजिए, उनके लिए शुभ कामना कीजिए और भलाई चाहिए। उनके सुखों को अपना सुख मानिये, वे सब आपके चरणों पर लोटने लगेंगे, आपकी आज्ञा का पालन करने में गौरव अनुभव करेंगे।’’
कवि हैरिंगटन कहते हैं—‘‘पैनी तलवार फौलाद की ढालों को भी काट सकती है, क्योंकि वह अचूक है। मुझमें दस आदमियों की बराबर शक्ति है, क्योंकि मेरा हृदय पवित्र है।’’
इमर्सन कहते हैं—‘‘मनुष्य के हृदय की पवित्रता से बढ़कर कोई भी दूसरी वस्तु नहीं है। अपने आपको दुर्भावनाओं और स्वार्थपूर्ण विचारों से मुक्त कर लो, फिर समस्त संसार तुम्हारे साथ होगा।’’
यह सभी अनुभव इस बात के साक्षी हैं कि वशीकरण की महान् साधना के लिए त्याग सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है। दिए बिना कुछ नहीं मिल सकता। स्वयं कष्ट सहिए, तप कीजिए, अपने प्रेमी को अपनी सर्वोत्तम वस्तुएं समर्पण कीजिए, तो वह आपका अपना हो सकता है। आपके वश में आ सकता है।

