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Books - वशीकरण की सच्ची सिद्धि

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(1) निरोगता— वशीकरण के साधक को अपने में कुछ अन्य योग्यताएं भी पैदा करनी होती हैं, क्योंकि उनका वाह्य प्रभाव से बड़ा घनिष्ठ संबंध है। उत्तम स्वास्थ्य-यह एक सबसे बड़ी आवश्यकता है। जिनका शरीर निरोग है, उन्हीं की नाड़ियों में शुद्ध रक्त उत्पन्न होगा और उस रक्त के कारण उत्तम सौंदर्य प्रकट होगा। किसी आदमी का रंग तो गोरा है और बनावट भी बहुत बढ़िया है, किंतु स्वास्थ्यहीन है, इसलिए चेहरा पीला पड़ रहा है, मुंहासे से मुरझाया हुआ है, आंखों में दीनता है, पीड़ा और असमर्थता उसके अंग-अंग से झर रही है, ऐसी स्थिति में उसका रूपवान् होना कोई अर्थ नहीं रखता। इसके विपरीत काले रंग का या मामूली आकृति का व्यक्ति यदि स्वस्थ है, तो उसकी सुंदरता बहुत बढ़ी-चढ़ी होगी। सुंदरता, अंगों की बनावट में नहीं, वरन् उस तेज में है, जो शुद्ध रक्त के द्वारा उत्पन्न होता है, इसी तेज को मानवीय विद्युत् शक्ति या आकर्षण शक्ति भी कहते हैं। दूसरों को वश में करने और उन पर अपना असर डालने में यह जादू की तरह आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। लंपट पुरुष, उत्तम स्वास्थ्य पर आसक्त होते देखे गए हैं, चाहे उनमें अन्य कोई गुण न भी हो। सब दृष्टियों से विचार कीजिए कि संपूर्ण सुखोपभोगी का प्रथम साधन स्वास्थ्य है। यदि आपकी तंदुरुस्ती अच्छी नहीं है, तो वशीकरण का सारा प्रयास नीरस प्रतीत होगा, आप सबसे पहले अपनी तंदुरुस्ती को ठीक रखने के लिए प्रयत्नशील रहिए। इसके लिए डॉक्टरों की सलाह लेने या किसी बड़े पचड़े में पड़ने की जरूरत नहीं है। उत्तम स्वास्थ्य हमारी बपौती है। परमपिता परमात्मा ने हमें स्वस्थ बनाकर भेजा है और उसकी इच्छा है कि हम लोग सदैव निरोग रहें। रोग अपने आप प्रायः नहीं आते, उन्हें हम बड़ी खातिर खुशामद से बुलवाते हैं या भारी कीमत देकर मोल खरीदते हैं। ‘‘जीभ और गुप्तेंद्रिय पर यदि काबू रखा जाए, तो बीमारी पास नहीं फटक सकती।’’ इस वाक्य को गांठ बांध लीजिए। बीमार पड़ जाने पर नाना प्रकार के दुःख भोगने और उनसे छुटकारा पाने के लिए बड़े-बड़े प्रयत्न करें, इससे तो यही अच्छा है कि पहले ही सावधान रहा जाए। बिना भूख लगे मत खाइए। स्वाद के लिए मत खाइए, पेट को ठूंसकर मत खाइए और बिना चबाए मत खाइए। इन चारों बातों पर ध्यान रखने से तंदुरुस्ती की समस्या बहुत कुछ हल हो जाती है, जब भूख लगे तब ऐसा भोजन कीजिए जो सात्त्विक और पौष्टिक हो, पेट को थोड़ा खाली रहने दीजिए और हर ग्रास को दांतों से इतना पीसिए कि वह अपने आप पेट में चला जाए। निगलने के लिए झटके लेने की बिलकुल जरूरत न पड़े। ईश्वर आपको जैसा घटिया-बढ़िया भोजन दे, उसी में संतोष कर लीजिए, यह मत सोचिए कि कीमती चीजों में ही ताकत होती है। जीभ को काबू में रखकर खाई हुई जौ की रोटी, मेवा-मिठाइयों से बढ़कर बलकारक प्रमाणित होती है। जिस प्रकार धन जोड़ने के लिए आमदनी बढ़ाना, खर्च कम करना आवश्यक है, उसी प्रकार स्वास्थ्य बढ़ाने के लिए जिह्वा पर काबू रखना चाहिए और उसे संचित रखने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। वीर्य ही जीवन है, उसे नष्ट मत होने दीजिए। जितना अधिक हो सके, दीर्घकालीन ब्रह्मचर्य रखिए। वीर्य जैसी अनमोल वस्तु को कदापि व्यर्थ नष्ट न होने दीजिए। शारीरिक और मानसिक गुणों को चेतना देने वाली वस्तु वीर्य है, इसलिए गुप्तेंद्रिय पर काबू रखिए और उसे कुमार्ग पर मत जाने दीजिए। इन दोनों इंद्रियों को काबू में रखने से आपका स्वास्थ्य बहुत उत्तर रह सकता है। अन्य स्वास्थ्य संबंधी साधारण नियमों को सब लोग जानते हैं। उनका यथाविधि पालन करना चाहिए।

(2) प्रसन्नता — प्रसन्न रहना, हंसते-मुस्कराते रहना—यह वशीकरण की साधना में बड़ी ही दिव्य अस्त्र है। फूल जब खिलता है, तो बरबस सबका मन अपनी ओर खींच लेता है। मुख की बंद कली में से दांतों की पंखुड़ी जब आप खोल देंगे, तो यह स्वर्गीय पुष्प बड़ा ही सुंदर बन जाएगा और दूसरों के मन को लुभा लेगा। फूल जब तक अपने दांतों को होठों के अंदर बंद किए रहता है, तब तक उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता। कहते हैं कि हंसने से मुंह से फूल झड़ते हैं। हंसना एक कला है, जिसमें विश्व की सहानुभूति को अपनी ओर खींच लेने का गुण है। हंसना एक मरहम है, जो दूसरों के दर्द से भरे हुए जीवन को आराम पहुंचाता है। जब आप हंसते हैं, तो ऐसे सुंदर चित्र बन जाते हैं, जिसे देखने के लिए बच्चे भीड़ लगाए रहते हैं। जब आप हंसते हैं तो ऐसे पुष्प बन जाते हैं, जिन पर मधु-लोलुप मक्खियां सदैव भिनभिनाती रहती हैं। जिसके चेहरे पर मुस्कराहट नाचती है, उसके मन में ईर्ष्या, द्वेष, चिंता, कुढ़न को स्थान नहीं मिलता है। आज आपका किसी से झगड़ा हो जाता है, कल उससे मिलते हैं तो प्रेम के साथ मुस्करा जाते हैं बस जरा-सी बात में सारा वैर-विरोध दूर हो गया। एक अरबी विद्वान् का कथन है, ‘‘खुदा ने कामयाबी की नियामत खुश मिज़ाज लोगों के लिए बनाई और बद-किस्मती का मर्शिया पढ़ने वालों का लानत बख्शी।’’ बात ठीक है। आप अपने दुर्भाग्य, घाटे, अपमान, दुःख, निराशा का रोना रोयें तो सब लोग नाक-भौं सिकोड़ेंगे। दुनिया में किसी को इतनी फुरसत नहीं कि वह आपका रोना सुने और अपने को रंजीदा बनावे। आप हंसेंगे तो दूसरे भी साथ-साथ हंसेंगे, रोयेंगे तो दुत्कारकर अलग कर लिए जावेंगे। इसलिए अपने दुर्भाग्य का रोना कभी मत रोइए, यदि सचमुच कोई मुसीबत आई हुई है, तो भी हंसिए, इससे दुःख हलका हो जाएगा और जग हंसाई नहीं होगी। आप कुरूप हैं, तो कई हर्ज नहीं, जरा मुस्कराइए तो सही आपके मुंह से फूल बरसने लगेंगे। हंसना, यह एक कला है, जो मनुष्य के पहाड़ के समान दुःख को भी हलका कर देती है, जो जीवन को सरस और स्निग्ध बना देती है। जिसके मुंह पर मृदुल हंसी की रेखा खिंची होती है, उसके प्रति कौन आकर्षित नहीं होता? ईश्वर बालकों को छोटेपन से ही यह गुण सिखा देता है। हंसना आत्मा का सर्वप्रिय गुण है, यह दूसरों को वश में ही नहीं करता, वरन् उन्हें शांत और मुक्त भी बना देता है।

(3) पवित्र विचार — अच्छे विचार और निःस्वार्थ भावनाओं में यह शक्ति है कि वे अपने चारों ओर एक विशेष प्रकार का वातावरण बना लेते हैं, जिसमें वशीकरण का पूर्ण प्रभाव होता है। ऋषि-महात्माओं के आश्रमों में सिंह और हिरण पास-पास बैठे रहते हैं। दुष्ट स्वभाव के जीव-जंतु भी वहां पहुंचकर अपना स्वभाव भूल जाते हैं। महात्मा बुद्ध से अप्रसन्न होकर एक डाकू उन्हें मारने आया, पर जैसे ही सामने पहुंचा, कि उसके हाथ कांप गए और उनके चरणों में गिर पड़ा। दासूर नामक एक व्यक्ति जब हजरत मुहम्मद साहब को मारने पहुंचा, तो तलवार उसके हाथ से गिर पड़ी। स्वामी रामतीर्थ भयानक जंगलों में रात-रात भर घूमते रहते थे। कितनी ही बार शेर, रीछ आदि से उनकी भेंट हुई, पर किसी ने उन्हें हानि नहीं पहुंचाई। विचारों में एक ऐसी शक्ति होती है कि वे अपनी जाति के विचारों को अखिल आकाश तत्त्व में से खींच लाते हैं। शुभ विचार अपने ही समान अन्य लोगों के विचारों को खींच लाते हैं। जो लोग प्रेम और पवित्रता के विचार करते रहते हैं, उनके ऊपर संसार की सहानुभूति और सद्भावनाएं उमड़-उमड़कर आती हैं और प्रसन्नता की छाया से चारों ओर ढक देती हैं। जिनका उद्देश्य ऊंचा है, जो भलाई के विचार सामने रखकर किसी कार्य में प्रवृत्त होता है, उसको पग-पग पर सफलता है, हार भी उसके लिए जीत है। श्रीमती लिली ऐलन कहती हैं, ‘‘वास्तविक शक्ति और बल पवित्रता में है। जिस मनुष्य के कर्म अच्छे हैं, जिसने मस्तक पर कलंक का टीका नहीं लगाया और जिसकी गर्दन किसी के सामने शर्म से नीची नहीं झुकती, वह सच्चा बहादुर है। ऐसे आदमी के गले में विजयमाला पहनाई जाएगी। उसके चेहरे के आस-पास वैभव की वास्तविक आभा चमकती होगी, जिस रास्ते से वह निकलेगा ईंट-पत्थर तक उसके आगे अपना हृदय बिछा देंगे। पवित्रता के बिना ऐसा व्यक्तित्व और किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकता।’’ श्री अरनाल्ड कहते हैं, ‘‘पवित्रता की शक्ति अपार है, उसका कोई अंत नहीं। यह बल साधारण नहीं, वरन् एक दैवी तेज है। यदि आपके विचार ईमानदारी के हैं, तो हमारी घोषणा है कि लोगों के हृदय का राज्य आपके लिए है।’’

(4) मधुर भाषण — भोजन के छहों रसों में मधुर रस अग्रणी है। बच्चे से लेकर बड़े तक सभी मीठे को पसंद करते हैं। इसमें इतनी मधुरता है कि मनुष्य तो क्या देवता भी इसे पसंद करते हैं। हवन यज्ञों में मीठे का भोग अवश्य होता है। ब्राह्मणों को मीठा खिलाने में अधिक पुण्य बताया जाता है। संसार में सबसे अधिक मीठी बोली है। मधुर भाषण जैसी मिठास भला और कहां मिल सकती है? तुलसीदास जी कहते हैं—‘वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर।’ रहीम कहते हैं—कागा काको धन हरे कोयल काको देय, मीठे वचन सुनाय के जग वश में कर लेय।’ हिरण मधुर शब्द सुनकर भागना भूल जाते हैं, बीन सुनने के लिए सांप बिल से बाहर निकल आते हैं। एक विद्वान का कथन है—‘‘भाषण में वशीकरण शक्ति है।’’ इससे पराये अपने हो जाते हैं। सर्वत्र मित्र ही दृष्टिगोचर होते हैं। मधुर वाणी एक दैवी वरदान है। मोहनास्त्रों में इसे शिरोमणि कहते हैं।

किसी के साथ भलाई की है, उसे प्रकाशित मत कीजिए। किस स्थान पर आपका धन गढ़ा हुआ है, यह जगह-जगह बताते फिरें, तो वह चोरी चला जाएगा, इसी प्रकार किया हुआ उपकार यदि आप प्रकाशित कर देंगे, तो वह नष्ट हो जाएगा। बाइबिल में कहा है, ‘‘जो तू करता है, उसे इस तरह कर कि एक हाथ के काम को दूसरा हाथ न जानने पावे।’’ अपने शत्रुओं को क्षमा कर इससे वे मित्र होंगे एवं प्रेम का सागर लहराता हुआ नजर आवेगा। किसी से कडुए शब्द मत बोलिए, क्रोध में भी अपशब्द मत कहिए, छोटों को भी तू जैसे कर्ण कटु शब्दों से संबोधित मत कीजिए, मधुर बोलिए और विनयपूर्वक बोलिए, फिर देखिए कि आपको इससे कैसी अद्भुत सफलता मिलती है।

(5) उदारता — उदारता की जंजीरें इतनी मजबूत हैं कि इनमें बंधा हुआ मनुष्य छूट नहीं सकता। जिसके साथ में आप कोई उपकार-अहसान कर देते हैं, वह जन्म भर के लिए आपका गुलाम बन जाता है। एक विद्वान ने कहा है, ‘‘आदमी का दिल रुपये-पैसे से नहीं खरीदा जा सकता है।’’ जिन लोगों को आप अपना प्रेम पात्र बनाना चाहते हैं, उनके साथ में कुछ एहसान कीजिए, उदारता प्रदर्शित कीजिए, जिसकी उसे आवश्यकता है, बिना मांगे दीजिए। बस इस कीमत में आप बड़े से बड़े व्यक्ति को खरीद सकते हैं। जो आज देकर उसका बदला आज मांगता है, उसे उतना ही एवज में मिल जाता है किंतु जो पीछे के लिए छोड़ देते हैं, वह दिन दूनी रात चौगुनी ब्याज के हिसाब से बढ़ता हुआ वापस आता है। अपने स्वभाव को उदार बना लीजिए, हर वक्त यह सोचते रहिए कि मैं इस समय किसे, क्या दे सकता हूं? जो कुछ दे सकते हैं, आज ही दीजिए।

अपने शत्रुओं को क्षमा कर दीजिए, अपने प्रेमियों को हर वक्त कुछ देने की सोचते रहिए। दीजिए, आपके पास पैसा, रोटी, विद्या, सदाचार, श्रद्धा, प्रेम, समय, शरीर जो कुछ भी हो, मुक्तहस्त से दुनिया को दीजिए, वह आपको बदले में कुछ देगी। दान वृत्ति को अपनाना, उदारता को स्वीकार करना—गरीब हो जाने का मार्ग नहीं है। समझदार किसान जानते हैं कि गेहूं बो देने के बाद वह सैकड़ों गुना मिल जाता है। उदारता से ही दूसरों के दिल खरीदे जाते हैं।

यह पांच गुण वशीकरण के आवश्यक साधन हैं। आप अपने अंदर इनको झरने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहिए, इनकी वृद्धि के साथ आपकी सफलता का मार्ग भी साफ होता जाएगा और फिर आपके लिए वशीकरण विद्या कुछ भी कठिन न रहेगी।

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वशीकरण की सच्ची सिद्धि
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