ईश्वर को वश में करना
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मनुष्यों का ही नहीं, ईश्वर का भी वशीकरण संभव है। इस संसार की कोई भी वस्तु ऐसी नहीं, जो तीव्र इच्छा शक्ति होने पर भी प्राप्त न हो सके। जिन्हें सच्ची आकांक्षा हो। वे परमात्मा की समीपता प्राप्त कर सकते हैं, उसे अपना सहचर बना सकते हैं। प्रेम के भक्ति के बंधन ऐसे अटूट हैं कि उनमें मनुष्य की भांति परमात्मा को भी बांधा जा सकता है।
आप परमेश्वर के प्रिय पात्र बनना चाहते हैं। क्या आप किसी ऐसे मनुष्य को कृपा पात्र बना सकते हैं, जो आपके प्रियजनों से उदास रहा हो या द्वेष करता हो? जब आपके प्रियजन विपत्ति में पड़े हुए हों और आप से उनकी ओर मुंह बिचकाकर उदासीनतापूर्वक आगे बढ़ जाऊं, तो क्या यह कार्य आपकी कृपा प्राप्त करने योग्य होगा? कोई माता-पिता उस व्यक्ति से प्रसन्न न होंगे, जो उसकी संतान से द्वेष करता हो या उपेक्षा की दृष्टि से देखता हो। प्रभु के प्रिय पुत्र के साथ उदासीनता और दुष्टता का व्यवहार करने वाला कोई जीव यदि यह आशा करता है कि उसे ईश्वर अपना कृपा पात्र बना लेंगे, तो वह एक बड़े भारी भ्रम में भटक रहा है। यदि किसी व्यक्ति का प्रेम प्राप्त करना है, तो उसकी खुशामद की अपेक्षा उसके आदेशों का पालन करना, उसके प्रियजनों को सुख पहुंचाना, उसकी संपत्ति को सुरक्षित रखना अधिक महत्त्वपूर्ण है। ऐसा भक्त जो मुंह से तो राम-राम रटता है, पर कठोर पत्थर जैसा कलेजा लिए बैठा है। किसी के दुःख पर जरा भी नहीं पसीजता, व्यर्थ की विडंबना कर रहा है। शायद ही उसकी तोता रटंत का कुछ परिणाम प्राप्त हो। ईश्वर कर्मकांड को नहीं, हृदय की पवित्रता और प्रेम को देखता है। जो संसार के साधारण प्राणियों की सेवा-सहायता करके उनको उन्नत बनाने, सन्मार्ग पर लाने, छाती से चिपटाने के लिए प्रेरित न करे, वह क्या प्रेम?
प्रेम सुगंधित पुष्प के समान है, वह अपने वैभव का परिचय सबसे प्रथम अपने पड़ोसियों को देता है। जिसके हृदय में परमात्मा के प्रति भक्त है, वह आत्माओं के लिए भी प्रकट होगा। पर्वत की कठोरता में से निकलकर जब कोई नदी महासागर में मिलने के लिए प्रयाण करती है, तो वह रास्ते में अनेक प्राणियों को तृप्त करती जाती है, क्योंकि प्रेम का यह धर्म है कि यह जहां कहीं रहे सुगंधित पुष्प की तरह अपनी दिव्यता से निकटवर्ती लोगों को तृप्त करे। जिस नदी को देखकर प्यासे पशु-पक्षी निराश लौट रहे हों। आप दूर बैठकर भी यह अनुमान लगा सकते हैं कि यह दीखने मात्र की नदी है, जल इसका सूख गया है और जब तक इसमें जल न भर जाए, सागर में आत्मसात् होने के लिए नहीं पहुंच सकती। परमात्मा की सच्ची उपासना और कुछ नहीं, केवल उससे अनंत प्रेम करना है। बनावट या पाखंडों से नहीं, वरन् सच्चे प्रेम से ही प्रभु को प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी अनन्य भक्ति या पवित्र प्रेम, जिसके अंतःकरण में होगा, वह अपने निकटवर्ती लोगों को उस अजस्र धारा से स्नान अवश्य करा देगा।
ईश्वर-भक्ति की यह कसौटी है कि वह ईश्वर की संतान का भी भक्त होगा। प्रेम और स्वार्थ यह दोनों ही विरोधी तत्त्व हैं, दोनों का एक साथ रहना नहीं हो सकता। जो अपनी तृष्णा को तृप्त करने के लिए दूसरों को सताता है, वह कैसा धार्मिक? कैसा भक्त? कैसा प्रेमी? संकीर्ण प्रेम के लिए दुःख भोगना पड़ेगा, पर जो अपने लिए कुछ नहीं चाहता, उसके लिए वेदना का कोई कारण नहीं। परिपूर्ण ईश्वरीय प्रेम की कक्षा तक पहुंचने के लिए मानवीय प्रेम की परीक्षा पास करनी पड़ती है। जो दृश्य मनुष्यों से प्रेम नहीं कर सकता, वह अदृश्य की भी भक्ति न कर सकेगा।
प्रेमी दूसरों के दुःख को देखकर निष्ठुर नहीं बैठा रहता, वरन् पसीज जाता है। जबकि वह सत्पुरुषों, सुखी और समृद्ध पुरुषों को देखकर प्रसन्न होता है, तो दुःखी लोगों के दुःख का भी प्रभाव होना चाहिए। बालक को जब कुछ कष्ट होता है, तो माता की आंखें छलक आती हैं, चूंकि बालक से उसका निकट संबंध स्थापित है इसलिए बालक की सुख-दुःख की अनुभूतियां भी विद्युत शक्ति की भांति माता के पास पहुंचती है और उसके हृदय में दया उमड़ आती है। यहां दुःख और दया के अंतर को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। दुःख अपने कष्ट की अनुभूति है और दया दूसरों की सहायता करने की भावना। स्वार्थ और परमार्थ में जितना अंतर है, उतना ही अंतर दुःख और दया में है। प्रेम की दो अनुभूतियां हैं—दया और आनंद। दुःखी को देखकर प्रेमी के अंतःकरण में दया उमड़ती है और सुखी को देखकर आनंद उत्पन्न होता है। इसके विपरीत क्रोध और घृणा स्वार्थ के चिह्न हैं। स्वार्थी मनुष्य दुःख के समय में समर्थ होने पर क्रोध करता है और असमर्थ होने पर रोता-चिल्लाता है एवं सुख मिलने पर घमंड में मदहोश हो जाता है।
पवित्र हृदय व्यक्ति के हृदय में पीड़ित व्यक्तियों के प्रति दया उत्पन्न होती है। आत्मा कायर या हतवीर्य नहीं है, इसलिए वह अपनी चैतन्यता दया में मिश्रित कर देती है। जिस कटोरे में खांड़ रखी हुई है, उसमें यदि दूध डाला जाए, तो उन दोनों के सम्मिश्रण से मीठा दूध तैयार हो जाएगा। चैतन्यता और करुणा का मिश्रण होते ही एक बड़ी प्रिय क्रियाशीलता उत्पन्न हो जाती है, जिसे हम सेवा के नाम से पुकारते हैं। निःस्वार्थ प्रेमी, ईश्वर भक्त के हृदय में निरंतर दया उमड़ती रहती है, इसलिए वह सदैव सेवा धर्म में प्रवृत्त रहता है, उसकी संपूर्ण क्रियाएं लोक-कल्याण के लिए होती हैं। कोई उसके परमार्थ पर भले ही हंसे, पर अपने इस कार्य पर वह स्वयं अनुमान करता है कि सेवा से बढ़कर आनंदप्रद वस्तु और कोई इस दुनिया में नहीं है। संसार का उच्चतम आनंद उस सेवा भावी को सदैव प्राप्त रहता है। ऐसा आनंद जिसकी एक बूंद भी उन कुच-कांचन की नालियों में सड़ने वाले कीड़ों को प्राप्त हो जाए, तो वे अपने सौभाग्य की तुच्छता को भली प्रकार समझ जावें।
एक भक्त का अनुभव है कि जो आंखें दया के आंसू झड़ने से पवित्र हो गई हैं, उन्हें ही ईश्वर की दिव्य मूर्ति दिखाई देती है। एक योगी का मत है कि निःस्वार्थ प्रेम ही वह ढाल है, जिसके पीछे रहकर पाप और प्रलोभनों से बचा जा सकता है। ऐसा दिव्य तत्व किस प्रकार प्राप्त किया जाय? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि अपने हृदय को स्वार्थ की कीचड़ से खाली करो, परमात्मा उसमें प्रेम का अमृत भर देगा। कुत्सित इच्छाओं के विदा होते ही उसकी आभा दिखाई देने लगती है। कहते हैं कि ईसा मसीह को शूली पर चढ़ाकर मार डाला गया, किंतु जब उनकी लाश को नीचे उतारा गया, तो वे पुनर्जीवित हो गए। आपने पवित्र प्रेम को अपने स्वार्थों की शूली पर चढ़ाकर मार डाला है। चलिए पश्चात्ताप कीजिए और मृतक को शूली पर से नीचे उतार लीजिए, वह ईश्वर का सगा बेटा अपने आप जीवित हो जाएगा और आपके पापों की गठरी अपने सिर पर लादकर आपको पार कर देगा।
ईश्वरीय प्रेम क्या है? मानवीय प्रेम का ही एक बृहत्तर रूप है। ‘‘सर्वदेव नमस्कारं केशवं प्रति गच्छति ।’’ सब देवताओं के लिए किया हुआ नमस्कार केशव को प्राप्त होता है। संपूर्ण प्राणियों से किया हुआ प्रेम ईश्वर को प्राप्त होगा। आप निष्कपट भाव से ईश्वर की भक्ति कीजिए, उसकी चलती-फिरती प्रतिमाओं के चरणों पर अपना मस्तक टेक दीजिए। ईश्वर आपको ठुकरायेंगे नहीं, वे आपको उठाकर छाती से लगा लेंगे। जब आप अपने को ईश्वर को सौंप रहे हैं, तो ईश्वर आपसे पीछे न रहेगा, वह भी अपने को आपके सुपुर्द कर देगा। इस प्रकार आप मनुष्यों को नहीं, ईश्वर को भी प्रेम के वशीकरण मंत्र द्वारा अपने वश में कर सकेंगे।

