अप्सराओं का वशीकरण
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कितने ही मनुष्यों का ख्याल है कि अदृश्यलोक में कुछ ऐसी मायावी स्त्रियां रहती हैं, जो अपने अंदर अद्भुत शक्तियां धारण किए हुए हैं। शाकिनी, डाकिनी, चुडैल, मसानी देवी, भैरवी आदि का विश्वास सभी देशों में किया जाता है और सब मजहबों में ऐसे अलौकिक स्त्री-पुरुषों की मान्यता है, जो आंखों से नहीं दिखाई पड़ते, पर अदृश्य हैं। सभी मजहबों में अनेक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें यह बताया गया है कि ऐसी अदृश्य सत्ताएं कैसे कठिन कामों को बात की बात में हल कर देती हैं। भारतवर्ष में आमतौर से इन बातों पर विश्वास किया जाता है और ख्याल किया जाता है कि आसाम, बंगाल में इस विद्या का केंद्र रहा है और अब भी वहां बहुत-से जानकार मौजूद हैं।
देश के कोने-कोने में फैले हुए गुप्त और प्रकट तांत्रिक यह विश्वास करते हैं कि बावन भैरव और चौरासी योगिनी भी मौजूद हैं और वे विधि-विशेष से प्रकट की जा सकती हैं। तंत्रशास्त्र के अनेक ग्रंथों में ऐसी ही विधि-उपासनाएं भरी पड़ी हैं। ग्रंथों में अनेक यक्षिणी बताई गई हैं, जिनके नाम महायक्षिणी, सुंदरी, मनोहरी, कनकवती, कामेश्वरी, रतिकरी, पद्मिनी, नटी, अनुरागिणी, विशाला, चंद्रिका, लक्ष्मी, शोभना, धान्या, जया, भूतिनी, श्मशानी, अदृश्य करणी, कर्ण पिशाचनी, अन्नपूर्णा आदि हैं। यह अपने नामों के अनुसार अत्यंत रूपवान्, मन को हरण करने वाली, काम-किलोल करने वाली, नट विद्या की अभ्यस्त, अनुराग प्रिय, विशाल, चंद्रिका की तरह उज्ज्वल, विजय करने वाली, डराने वाली, किसी वस्तु को अदृश्य कर देने वाली, काम में गुप्त बात कहने वाली, अन्न से भंडार भरे रखने वाली हैं। इनमें से हर एक यक्षिणी मनुष्य की अपेक्षा अनेक गुणी शक्ति रखती है और अदृश्य लोक से उन कामों को करके ले आती हैं, जिन्हें हम चाहते हैं। इनमें कोई या कुछ यक्षिणी ऐसी भी हैं, जो वशीकरण में मदद देती हैं। जिस स्त्री या पुरुष के ऊपर उस यक्षिणी को लगा दिया जाता है, वह वहां जाकर उसके मन को ऐसा फेर देती हैं कि उसे प्रयोगकर्ता के वश में होना पड़ता है, वह उसे जैसे चलाना चाहता है, वैसे चलता है, जो कुछ आज्ञा करता है, वह पूरी करती है।
जिन तांत्रिक देवियों के बारे में उपरोक्त पंक्तियों में उल्लेख किया गया है, उनके बारे में या उनसे मिलती हुई अन्य अप्सराओं के बारे में बहुत-से मनुष्य हमसे पूछताछ किया करते हैं। वे सोचते हैं कि इनमें से कोई देवी यदि हमारे साथ लग जाए, तो हमारी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं और जो बात चाहते हैं, चुटकी बजाते ही हाजिर हो सकती हैं। लोग बहुत जगह उनकी सिद्धियां प्राप्त करने के बारे में ढूंढ़-खोज करते हैं और इसी सिलसिले में वे हमारे पास भी पत्र भेजते हैं कि कृपया अमुक यक्षिणी की साधना हमें बता दीजिए, अमुक देवी को अपनी कृपा से हमारे वश में करा दीजिए, जिससे अमुक इच्छाएं पूर्ण हो जाएं।
ऐसे लोगों के साथ हमारी पूरी हमदर्दी है। मनुष्य का धर्म है कि सर्वोत्तम सुख की तलाश करे, अपने मित्रों की इच्छा पूरी करने के लिए हमने इन अप्सराओं के बारे में अनुसंधान किया है। जैसा कहा जाता है, वैसा तो नहीं, पर कोई देवियां है जरूर। वे माल ढोने और एक के पास दूसरे की बाते ले जाने की सेवा तो नहीं करतीं, पर जिस पर प्रसन्न होती हैं, उसे स्वर्ग का सुख अनुभव करा देती हैं। रतिप्रिया, सुंदरी, मनोहरी, पद्मिनी, अनुरागिनी, चंद्रिका आदि से मिलती-जुलती अप्सराएं तो हमारे कई मित्रों ने देखी हैं और कई के पास हैं भी। वे उनकी साधना विधि बहुत जांच-पड़ताल के बाद और थोड़े-से आदमियों को बताते हैं, परंतु एक पाश्चात्य तांत्रिक ऐसे हो चुके हैं, जिन्होंने अप्सराओं का रसास्वादन किया था और उन्हें उनका स्थान, घर, रहन-सहन, साधन की विधि सब कुछ थोड़े-से किंतु बिना लाग-लपेट के शब्दों में सबके सामने खोलकर रख दिया है। ऐसा साहस बहुत कम लोक करते हैं। पाठक उत्सुक होंगे कि उस विवरण को हमें शीघ्र बतलाया जाए। अच्छा लीजिए आपको बताए देते हैं।
जिन तांत्रिक की ओर हमारा इशारा है, ये एक बड़े भारी भक्त हुए हैं, उनका नाम है—‘माईकेल ऐंजेलो।’ वे खुलेआम कहते थे। ‘‘मुझे पत्थरों-चट्टानों में भी दिव्य मूर्तियां दिखाई पड़ती हैं। एक ऐसे सिद्धपुरुष की आवश्यकता है, जो इनमें प्राण डाल सके।’’ संसार के परमाणुओं में सौंदर्य और आनंद की जीती-जागती अप्सराएं छिपी बैठी हैं किंतु निर्जीव होने के कारण वे हमारी सहायता नहीं कर सकतीं। इन प्रतिमाओं का प्राण है—‘प्रेम’ यदि हमारे हृदय में निःस्वार्थ प्रेम का अमृत भरा हुआ हो, तो उसकी बूंद पाकर ही यह निर्जीव प्रतिमाएं सजीव हो सकती हैं और अलौकिक सौंदर्य के कारण हमें अपार आनंद का अनुभव करा सकती हैं। जब हम अपने पवित्र प्रेम का अमृत संसार के ऊपर छिड़कते हैं, तो उसके कण-कण में से श्याम सलौनी अप्सराएं जाग्रत होकर सामने आ जाती हैं और यही दुनिया, यही हमारी झोंपड़ी इंद्र का परिस्तान बन जाती है।
प्रभु हमारे चारों ओर व्याप्त है। उसकी चैतन्य सत्ता सब तरफ लहरा रही है। संसार में जो कुछ है, सब उसी सत्ता के अंतर्गत है और उसी मिट्टी से बना हुआ है। ईश्वर की प्रतिज्ञा है कि ‘योयथा मा प्रपद्यन्ते तां तथैव भजाम्यहम्’ जो मुझे जिस भाव से देखता है, उसके लिए उसी भाव से प्रकट होता हूं। रामचरितमानस साक्षी है ‘‘जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।’’ हम जिस भाव से प्रभु को देखते हैं, वे उसी रूप से प्रकट हो जाते हैं। अप्सराएं क्या प्रभु के रूप से बाहर है? मनोविज्ञान के आचार्य कहते हैं, ‘‘भावना एक प्रत्यक्ष पदार्थ है, उसे ईश्वर तत्व में हम जितने बल के साथ फेंकते हैं, वह उतने ही जोर से सामने की वस्तु से टकराकर प्रेरक के पास उसी प्रकार लौट आती है, जैसे कि रबड़ की गेंद जोर से फेंकने पर सामने की दीवार से टकराकर वापस लौट आती है।’’ एक दूसरा पंडित कहता है कि ‘प्रेम और पवित्रता के विचारों से जितना लाभ दूसरों को होता है, उससे अनेक गुना अपने को होता है। इन उत्तम भावनाओं का सबसे अधिक आनंद उसे प्राप्त होता है, जिसके हृदय में कि वे निरंतर निवास करती हैं।’
आप यदि इन अप्सराओं के साथ आनंद करना चाहते हैं, तो दूसरों से जितना बन सके, ऊंचा प्रेम कीजिए। कलुष-कषायों को बिलकुल हटा दीजिए और इस संसार को प्रभु की रम्य-वाटिका समझते हुए अपने को उसका माली मानिए, एक-एक पौधे को अपने आंसुओं से सींचिए, किसी को मुरझाया देखें, तो अपना पसीना बहाकर उसमें जल डालिए। इस वाटिका के अपरिमेय सौंदर्य को देख-देखकर अपने नयनों को तृप्त कीजिए। फिर देखिए, इस वाटिका में आपका राजा-महाराजाओं जैसा स्वागत होता है या नहीं। लताएं आपके गले से लिपटेंगी, वृक्ष आपका पंखा झलेंगे, फूल आपके लिए सुगंध भेंट करेंगे, कलियां मंद हंसी से मुस्कराती हुई स्वागत करेंगी। जिस संसार को आप इस समय रूखा, नीरस, कुरूप समझ रहे हैं, वह एक क्षण बाद मधुर, सरस, सुंदर और पवित्र बन जाएगा। जरा प्रेम को अपने हृदय में प्रवेश तो करने दीजिए, आप बदल जाएंगे और आपका संसार बदल जाएगा। जो पत्थर और चट्टान इस समय कठोर, जड़ और निर्जीव मालूम पड़ रहे हैं, वास्तव में वे वैसे नहीं हैं। भक्त माईकेल ऐंजलो की आंखों से देखिए, ‘इनमें एक-एक अप्सरा छिपी बैठी है, वह सौंदर्य की मूर्ति है और आनंद की सरिता है। परंतु बेचारी करे क्या? निर्जीव हैं, उन्हें कोई ऐसा सिद्ध पुरुष नहीं मिलता, जो प्राण डालकर जीवित कर दे और अपनी अंकशायनी बनावे। लोग जिस वस्तु के लिए व्याकुल फिर रहे हैं, वह स्वयं प्रतीक्षा में खड़ी हुई है, परंतु दुर्भाग्य की बात है कि हम उसे देख नहीं पाते। काश, हमने प्रेम का महत्त्व समझा होता और इस संजीवन रस के प्रयोग करने की विधि जानते तो कितना सुंदर होता! यह संसार हमारे लिए कितना उदार, दयालु और उपकारी बन जाता है, दुःख, शोक के स्थान पर हम चारों ओर आनंद ही आनंद उमड़ता देखते हैं।
अध्यात्म विज्ञान बतलाता है कि पिंड, ब्रह्मांड का नक्शा है। जो संसार में है, वह सभी पिंड में मौजूद है। यथार्थ में छोटे परमाणु के अंदर वह समस्त शक्तियां बीज रूप में छिपी हुई हैं, जो संसार में कहीं भी दृष्टिगोचर होती हैं। आनंद की अनुभूति जिन वस्तुओं द्वारा होती है, उनके बीज हर एक चैतन्य परमाणु में पाए जाते हैं। भक्त माइकेल झूठ नहीं बोलते, वे सच कहते हैं कि यदि किसी जड़ वस्तु पर भी सच्चा प्रेम किया जाए, तो उसके अंतर्गत छिपे हुए परमाणु उत्तेजित होकर प्रेमी की भावना स्वरूप बन जाते हैं, उनमें वह शक्ति आ जाती है, जिसके द्वारा आनंद का स्रोत फूट पड़ता है, इच्छाओं की पूर्ति के योग्य समुचित मसाला उनके अंदर से जाग्रत हो उठता है। जड़ प्रकृति में स्थूल दृष्टि से देखने पर जड़ता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। निर्दयता, निष्ठुरता, बदी, बेईमानी, यह बातें जड़ता में ही पाई जाती हैं। पत्थर की आप पूजा कीजिए, उसे रेशमी वस्त्र पहनाइए, उसे उठाकर गंगातट पर रख दीजिए या और भी अनेक प्रकार के अहसान कीजिए, पर वह उनका कुछ भी उत्तर या बदला न देगा। आपकी खुशी या रंजीदगी की वह जरा भी परवाह न करेगा, क्योंकि वह जड़ है। प्रकृति भी इसी प्रकार जड़ है। हम असंख्य मनुष्यों को ऐसी शिकायत करते सुनते हैं कि हमने उनके साथ इतने अहसान किए, पर उसने बदी में ही उत्तर दिया। ‘नेकी का बदला बदी’ यह संसार का स्वाभाविक धर्म जो बदला चाहता है, वह मिथ्या, माया, पापमय, नर, भवसागर आदि नामों से पुकारते हैं, उनका मतलब प्रकृति के स्थूल तत्त्वों से है, जड़ संसार सचमुच ही मिथ्या और भवसागर है। यह एक चट्टान की तरह निर्जीव है।
अब प्रश्न उठता है कि फिर इनमें आनंद क्यों प्रतीत होता है? आनंद, जड़ प्रकृति का धर्म नहीं, वरन् चैतन्य आत्मा का धर्म है। हमारा हृदय जिन वस्तुओं में प्रेम का आरोप करता है, वही आनंदमय बन जाती है। यथार्थ में वह वस्तु स्वयं कुछ नहीं, अपने मन का प्रेम ही उसमें आनंद भर देता है। बालक खिलौने से बहुत प्रेम करता है, बड़े होने पर उनसे नफरत करता है। खिलौने न तो प्रिय हैं, न अप्रिय, वे सदा एकरस हैं, पर मनोभावों का आरोप करते ही उनकी अनुभूति दूसरी तरह की हो जाती है। आपका घोड़ा आपको बहुत प्रिय है, पर यदि वह बेच दिया, तो उस पर से सारी ममता उठ गई। बच्चे को माता, तरुण को स्त्री, वृद्ध को संतान प्रिय लगती है। जवान आदमी अपनी माता से उतना प्यार नहीं करता जितना बचपन में करता था। कारण यही है कि माता के ऊपर जो सर्वोत्तम प्यार का उसने आरोप किया था, वह अब उठकर स्त्री पर चला गया। छोटा बच्चा अपनी माता से किसी को झगड़ा करते देखे, तो उसे मारने दौड़ता है, पर मर जाने पर माता के उसी शरीर को खुशी-खुशी जला देता है। तात्पर्य यह है कि इस समस्त संसार में कुछ भी वस्तु प्रिय या अप्रिय नहीं है, कोई भी चीज प्रसन्नता या अप्रसन्नता नहीं दे सकती। कूड़े-कचरे को देखकर साधारणतः घृणा होती है, पर कागज बनाने वाले उस कूड़े-कचरे को ही लक्ष्मी के रूप में देखते हैं। भक्त माइकेल के शब्दों में यही तत्त्वज्ञान भरा हुआ है। वे कहते हैं, ‘‘मुझे चट्टानों में भी अप्सरा दिखाई पड़ती हैं, पर ऐसे सिद्ध की आवश्यकता है जो उनमें प्राण डाल सके। यदि इनमें प्राण नहीं, तो यह चट्टान के चट्टान ही पड़े रहेंगे, किंतु प्राण-प्रतिष्ठा होते ही रत्नजड़ित रेशम मखमली पोशाक पहनकर उर्वशी को मात करने वाली यही अनुपम परियां आंखों के आगे ऐसा सुंदर नृत्य करेंगी कि मन मुग्ध हो जाएगा और यही जड़ संसार करोड़ों नंदन वनों से अधिक आनंददायक प्रतीक होगा।’’
यह प्राण-प्रतिष्ठा कैसे होगी? प्रेम ही प्राण है। आप स्वार्थ और वासना के विषय को अंतस्थल में से हटा दीजिए, तो इनके भार से दबा हुआ पवित्र प्रेम अपने आप खिल उठेगा। इस पवित्र प्रेम को जिस मंदिर, पशु-पक्षी, स्त्री-पुरुष पर आरोपित करेंगे, उसी के अंदर की परियां छूम-छनछन करती हुई बाहर निकल पड़ेंगी। यह परियां स्वप्न नहीं सत्य है, आत्मा सत्य है, आनंद सत्य है, इसलिए उनकी अनुभूति रूपिणी यह परियां भी सत्य हैं। यह आपका मनोरंजन ही नहीं करतीं, वरन् संपूर्ण इच्छाएं तृप्त कर देती हैं। जो वस्तु मांगते हैं, वही लाकर देती हैं। इसे भी झूठ मत समझिए, क्योंकि जिनने स्वार्थ और विषयों को तिलांजलि देकर इन दिव्य देवियों को जगाया है, वह उनसे लड्डू मंगवाने का काम नहीं लेगा। बालक सोचता है कि बड़ा हो जाऊंगा तो बहुत से कुम्हार, नौकर रखूंगा, जो रोज हजारों तरह के खिलौने बनाकर मुझे प्रसन्न किया करेंगे। पर बड़े हो जाने पर कोई उसके उन बचपन के विचार की याद दिलावे कि अब तो आप बड़े हो गए हैं, खिलौना बनाने के लिए कुम्हार नौकर रखिए तो केवल मुस्करा भर देता है, क्योंकि अब वह अपनी बचपन की बुद्धि की अपूर्णता और खिलौनों की निरर्थकता समझ गया है, इसलिए उनकी तनिक भी इच्छा नहीं करता।
आप अप्सराओं को वश में करके उनसे तरह-तरह की चीजें लेने की इच्छा करते हैं, पर जब वे आपके वश में आ जावेंगी तो देखेंगे कि अब इनका प्राप्त होना ही सबसे बड़ा आनंद है। वह वस्तुएं, तो अपने आप ही इनके साथ मौजूद हैं, जिन्हें हम बौद्धिक बचपन में खिलौने की तरह चाहते थे। आप निःस्वार्थ भाव से प्रेम करना सीखिए। अपने विराने सभी से पवित्र प्रेम रखिए। सबके लिए शुभकामनाएं कीजिए। कुएं की आवाज की तरह आपकी भावनाएं आपके पास लौट आवेंगी और आत्मा को आनंद से परिपूर्ण कर देंगी। यह अप्सराएं आपके ही मानस चित्र, आपकी ही छाया मूर्तियां हैं। इन्हें उत्पन्न कीजिए और अपने को आनंदित करिए।
यक्षिणी वश में करने के इच्छुकों! यह संसार मरघट है, इसमें अनेक भैरव-भैरवी सोए हुए पड़े हैं। जब सब ओर सुनसान हो जाए, तुम्हारे मद, मत्सर दूर हो जाएं, रात्रि की एकांत एकाग्रता तुम्हारे मानसलोक में आ जाए, तब चुपचाप बैठना और निर्भय होकर मरघट पहुंचना और किसी मृतक की लाश पर बैठकर मंत्र का पुरश्चरण करना। मरे हुए प्राणी के शरीर पर नहीं, वासनाओं से रहित अपने मन की छाती पर बैठना। प्रेम का मन्त्र जपना। हे प्रेम! आपकी जय हो। आप भूतेश्वर शंकर के स्वरूप हैं, आप मेरी मनोकामनाओं को पूर्ण कर दीजिए। परीक्षा के लिए बड़े-बड़े भूत आवेंगे। कोई डरावेगा, कोई लालच देगा, पर किसी की ओर आंख उठाकर भी मत देखना। अनन्य भाव से यही मंत्र जपते रहना। हे प्रेम! आपकी जय हो, परीक्षा में उत्तीर्ण हुए तो भगवान् भूतनाथ आपको यह यक्षिणी उपहार में देंगे, जिसे आप चाहते हैं। वह बात ही बात में हर किसी को वश में कर दिया करेगी। फिर तीनों लोकों में कोई भी ऐसा न बचेगा, जो आपको वशीकरण से बाहर हो। सर्वत्र आपकी विजय दुंदुभी बजा देगी। ऐसी हो वह प्रेमी की दिव्य भावना-वशीकरण की महायक्षिणी।
यदि आप चाहे तो आप भी उसे सिद्ध कर सकते हैं और उसके ऐश्वर्य का आनंद भोग सकते हैं।

