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Books - गायत्री यज्ञ विधान

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यज्ञीय पदार्थ तथा पात्र परिचय

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श्रौत-स्मार्त्त यज्ञों में विविध प्रयोजनों के लिये पात्रों की आवश्यकता होती है । जिस प्रकार कुण्ड बनाया जाता है, उसी प्रकार इन यज्ञ-पात्रों को निश्चित वृक्षों के काष्ठ से, निर्धारित माप एवं आकार का बनाया जाता है । विधि पूर्वक बने यज्ञ-पात्रों का होना यज्ञ की सफलता के लिये आवश्यक है । नीचे कुछ यज्ञ-पात्रों का परिचय आवश्यक है । नीचे कुछ यज्ञ-पात्रों का परिचय दिया जा रहा है । इनका उपयोग विभिन्न यज्ञों में, विभन्न शाखाओं एवं सूत्र-ग्रंथों के आधार पर दिया जाता है ।
वेदों में इनका उल्लेख इस प्रकार मिलता है-

(1)अग्निहोत्रहवाणी
अग्निहोत्रहवाणी एक प्रकार की सूची का ही नाम है । यह बाहुमात्रलम्बी, आग्र हंसमुखी और चार अंगुल गर्त वाली होती है । इसमें स्रुवा से आज्य लेकर अग्निहोत्र किया जाता है, जिससे यह अग्निहोत्र-हवणी कही जाती है-
स्फ्यशच कपालानि चाऽगिहोत्रहवर्णी च शूर्पं च कृष्णजिनं च शय्या चोलूखलं च मुसलं च दृषच्चोपला चैतानि वै दश यज्ञायुधानि...(तै.सं.1.6.8)

(2)अतिग्राह्यपात्र
सोमाभिषव काल में दक्षिण शकट के पास तीन पात्र, ऐन्द्रपात्र, सौर्यपात्र । इस पात्र-समूह को ही अतिग्राह्य भी कहा जाता है । काम्यायन श्रौतसूत्र में प्रातः कालीन यज्ञ में अतिग्राह्य को ग्रहण करने का उल्लेख मिलता है-
प्रातः सवनेऽतिग्राह्यान्गृहीत्वा (का.श्रौ.14.1.26)
धु्रवसदमिति प्रतिमन्त्रमतिग्राह्यगृहीत्वा (का.श्रौ.14.2.1 वीर्याय)
इत्यतिग्राह्यं वा षोडशिनं वावेक्षते (बौ.श्रौ.14.8)

(3)अदाभ्य पात्र
यह सोमरस रखने का गूलर की लकड़ी का बना एक पात्र है, जो अग्निष्टोम आदि याग में प्रयुक्त होता है । सोम के साथ अदाभ्य नाम उल्लिखत होता है-
यत्ते सोमादाभ्यं नाम जागृति तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा (मैत्रा.सं. 1.3.4)

अथातोऽ शवदाभ्ययोरेव ग्रहणम् । अश्वदाभ्यौ ग्रहीष्यन्नुपकल्पयते, औदुम्बरे नवे पात्रे श्लक्ष्णमदाभ्यपात्रम् (बा. श्रौ.14.12)
‍
(4) अन्तर्धानकट
यह एक अर्धचन्द्राकार यज्ञ-पात्र है, गार्हपत्य आग्न पर पत्नी-संयाज (कर्मकाण्ड-विशेष) करने के समय अध्वर्यु द्वारा अपने और यजमान-पत्नी के बीच रखा जाता है, उसी समय देवपत्नियों का आवाहन होता है । यह बारह अँगुल लम्बा, छः अंगुल चौड़ा पात्र होता है, जैसा कि कहा गया-
अन्तथानकटसत्वर्धचन्द्राकारो द्वादशाङ्गलः ।

(5)अभ्रि
यह एक नोकदार (तीक्ष्णमुख) वाले डण्डे के आकार का तथा एक हाथ लम्बा उपकरण है, जो वेदिका-खनन के काम आता है । अभ्रि की तुलना वज्र से भी की गयी -
व्रजो वाऽअभ्रिः । (शत.ब्रा.6.3.1.3.9)
अभ्रिं व्याममात्रीं वारत्रिमात्री बोभयतः क्ष्णमृदं च अन्र्तवेद्याभ्रिं निदधाति । अभ्रिया प्रहरति ऋध्यासमद्य मखस्य शिरः इति -बौ.श्रौ.9.1.2. यर्जुवेद संहिता पाराशष्टांक
    
(6)अरणि-मंथन
अग्निहोत्री, जिससे श्रौताग्नि को प्रकट करता है, उसे अरणि कहते हैं । इसके चार अंग होते हैं- अधराणि उत्तरारणि, ओविली और नेत्र । अधरारणि पर मन्थी रखकर अग्नि-मंथन किया जाता है । मन्थी में उत्तरारणि (लम्बा काष्ठ) का टुकड़ा काटकर काम में लेते हैं । इस मन्थी को दबाने के लिए ओवली (12 अँगुल लम्बा काष्ठ) प्रयुक्त करते हैं । मंथन में उपयोग में आने वाली डोरी को नेत्र कहते हैं ।
वापाश्रपण्यौ रशनेअरणी अधिमन्थनःशकलोवृषणौ (शत.ब्रा. 3.6.3.1()
यह सब मिलकर अरणि-मंथन का उपकरण पूरा होता है ।

(7) अवट
कूप और गर्त के अर्थों में प्रयुक्त किया गया है । उखा निर्माण के सम्बंध में इसका विवेचन होता है-
(यजु.11.61 उपट भा.)
हे अवट गर्त! अतिर्तिदेवी पृथिव्याः सधस्थे सहस्थाने उपरिभागे त्वा त्वां खनतु
-यजु.11.61
मही. भा. तदवटं परिलिखित (शत. ब्रा. 3.8.1.4)

(8) असि-
छेदने और विदारण कार्य में प्रयुक्त होने वाली लोहे कही नुकीली शलाका को 'असि'कहते हैं । शतपथ ब्राह्माण में वज्र को ही असि कहा गया है- वज्रोवाऽअसिः (शत. ब्रा. 3.8.2.12)
असिं वै शास इत्याचक्षते (शत.ब्रा.3.8.1.4)

(9) आज्य
तप्त घृत की आज्य कहा गया है । स्रुवा पात्र से स्रुची में लेकर आज्य होम किया जाता है ।
रस रूप द्रव्य को भी आज्य कहा गया है- रस आज्यम् (शत.ब्रा. 3.7.1.13)
देवगण आज्य से ही संतुष्ट होते हैं-
एतद्वै जुष्टं देवाना यदाज्यम् (शत.1.7.2.1)
अखण्ड हवन में सूर्यास्त के बाद के प्रत्येक प्रहर में क्रमशः आज्य, सतू, धाना और लाजा से हवन करने को कहा गया है-
आज्यसूक्त धानालाजानामेकै जुहोति (का.श्रौ.2(.4.32)


(10) आज्यस्थाली
याग में आज्य रखने के पात्र को आज्यस्थाली कहते हैं । आज्यस्थाली में से स्रुवा आज्य जुहू में आठ स्रुवा उपभृत में और चार स्रुवा ध्रुवा में भरने को कहा गया है-
स्रुवेणाज्यग्रहणं चतुर्जुह्ना . . . . । अष्टावुपभूति. . । ध्रुवयाञ्व जुहूवत ( का०- श्रो० 2.7.9.10.15)

(11)आदित्य -ग्रह
आदित्य ग्रह प्रतिप्रस्थाता नाम ऋत्विज् से सम्बंध है, जो द्रोणाकलश से सोम को आदित्य ग्रह में लेकर होम करते हैं-
होमाय प्रतिप्रस्थाता आदित्यपात्रे द्रोणकलशशादु पयामगृहीतेऽसीते गृहीत्वा द्विदेवत्याननुजुहोति (यजु.8.1 उ.भा.)
अष्टमे तृतीय सवनगता आदित्यग्रहादिमंत्रा उच्यन्ते (यजु.8.1 मही.भा.)
आदित्यग्रह रस-युक्त ही रहता है- अथैष सरसे ग्रहो यदादित्यग्रहः (कौषी.ब्रा.16.1) आदित्यग्रह से याग करने से गायों की वृद्धि होती है-
आदित्यग्रहं (अनु) गावः (प्रजायन्ते) (तैत्ति.सं.6.5.1(.1)

(12)आसन्दी
आसन या आश्रय फलक के अर्थ में प्रयुक्त हुई है । औदुम्बर, खदिर आदि काष्ठ की मूँज की डोरी से बीनी हुई खटौली को आसन्दी कहते हैं । वाजपेय याग और सौंत्रामणी याग में यजमान को इस पर बिठाकर उनका अभिषेक किया जाता है । अग्निष्टोम याग में धर्मपात्र रखने के लिए धर्मासन्दी और सोमपात्र रखने के लिए सोमासन्दी होती है । अग्निचयन याग में इस पर उखा रखी जाती है । उद्गाता राजा आदि को बिठाकर अभिषेक करने की आसन्दी उद्गाता-आसन्दी राजासन्दी आदि कही जाती है-
पुरस्तादुद्रात्रासन्दीवदासन्द्यां चतरश्राड्ग्याम् -का.श्रौ. 16.5.5 ।
आसन्दी पर अधिष्ठित होने की महत्ता ब्राह्मण ग्रंथ में दी गयी है-
इयं वा आसन्द्यस्या हीद सर्वमासत्रम् अर्थात् यह आसन्दी है, क्योंकि इस पर सब कुछ आसन्न (रखा हुआ) है । (शत.ब्रा. 6.7.1.12)
    
(13)इड़ापात्री
अधवर्यु, याग के बाद शेष बचे हविदररव्य को इड़ापात्री में रखकर होता को देते हैं । इड़ा पात्री में शेष इस द्रव्य को इडा कहते हैं । होता द्वारा मंत्र पाठ के अनन्तर ऋत्विज् और यजमान इडा भक्षण करते हैं-
इडाहोत्रे प्रदायाविसृजन् दक्षिणाऽतिक्रामति । (का.श्रौ. 3.4.5)
इडापात्री एक हाथ लम्बी, छह अंगुल चौड़ी एवं बीच में गहरी होती है ।

(14) इष्टका
अग्निचयन के प्रसंग में इष्टकाओं (ईटों) का प्रयोग होता है । चित्ति-संरचना ईटों के माध्यम से की जाती है । ईंट-निर्माण की मिट्टी में राख का मिश्रण उचित होता है । चिति-निर्माण में विकृति, भंग और अधपकी ईंटों के प्रयोग को निषिद्ध कहा गया है-
न भिन्न न कृष्णामुपध्यात् । (शत.ब्रा. 8.7.16)

(15)उखा
मिट्टी की बनायी मंजूषा को उखा कहते हैं । अग्निहोत्री वनीवाहन कर्म में रखा पात्र में अग्नि को लेकर प्रवास में जाते हैं । उखा पात्र में अंगश्रयण भी होता है । उखा पात्र में अग्नि की स्थापना करके उसका भरण करना उखा संभरण कहलाता है-
उखा संभरणमष्टभ्याम् । (का.श्रौ.16.2.1 )
शतपथ ब्रा. के अनुसार उखा की ऊँचाई, लम्बाई और चौड़ाई एक प्रादेश (बालिश्त) की होती है-
तां प्रादेशमात्रीमेवोर्ध्वाम् करोति । (शत. 6.5.2.8 )
इसे यज्ञ की मूर्धा (सिरा) भी कहा गया है- शिर एमद्यजम्य यदुखा (का.सं. 196 )

(16) उपभृत्
यह जुहू के नाप और आकार की अश्वत्थ (पीपल) काष्ठ की बनी एक स्रुची है । जुहू का आज्य समाप्त होने पर इसके आज्य को जुहू में लेकर आहुति दी जाती है-
आश्वत्क्ष्युपभृत (का.श्रौ. 1.3.3.6)
आज्यस्थाली में से चार स्रुवा आज्य जुहू में आठ स्रुवा उपभृत में और चार स्रुवा धु्रवा में रखने का विधान है । जुहू के उत्तर में उपभृत और उसके उत्तर में ध्रुवा पात्र रखे जाते हैं ।
वास्पत्यम में भी इसे एक स्रुचि भेद कहा गया है-
आश्वत्थे यज्ञाङ्गपात्रभेदे स्रुचि (वा.पृष्ठ 1233 )
पाणिभ्यां जुहूं परिग्रह्योपभृत्या धानम् (आश्व.गृ.1.10.9 )

(17) उपयमनी
उपयमनी अग्नि-प्रस्थापन करने का मिट्टी का एक पात्र है । चातुर्मास्य याग में अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता गार्हपत्य अग्नि में से इन पात्रों में अग्नि निकालकर उत्तरवेदी और आहवनीय में अग्नि का प्रस्थापन करते हैं । जुहू से बड़े आकार की एक स्रुची भी उपयमनी कहलाती है । उपयमनी से धर्मपात्र में आज्य लेने का कहा गया है-उपयमन्यासिञ्चति धर्मे (का. श्रौ. 26.6.1 )
वाचस्पत्यम् में इसका सम्बंध अग्न्याधान स बताया गया है- अग्याधानाङ्ग सिकतादौ ।
-वा.पृ. 1282
उपयमनीरु पकल्पयन्ति (शत. ब्रा. 3.5.2.1 )
उपयमनीरुपनिवपति (का.श्रौ. 5.4.18 )

(18)उपयाम
उपयाम याग का काष्ठ निर्मित एक ग्रह पात्र है, जो सोम आदि द्रव रखने के उपयोग में आता है- यज्ञाङ्गे ग्रहरूपे पात्रभेदे (वा.पृ. 1283 )
यर्जुवेद में उपयाम शब्द अनेक बार उल्लिखित हुआ है- उपयाम गृहीतोऽसि -यजु. 7.4
वातं प्राणेनापानेने नासिके उपयाममधरेण.... (युज. 25.2)
यही तथ्य संहिता में भी उल्लेखित है- उपयाममधरे णौष्टेन (मैत्रा.सं.3.15.2)

(19) उपवेष (धृष्टि)
यह यज्ञ का एक काष्ठ पात्र है । इसका आकार आगे से पंजे का और पीछे डंडे जैसा तथा नाप से एक हाथ लम्बा होता है । अग्निहोत्री इसका उपयोग खर की अग्नि को इधर-उधर हटाने में करते हैं- अङ्गार विभजनरथे काष्ठे (वा.पृ. 1330। )
स उपवेषमादने धृष्टिरसीति (शत. ब्रा. 1.2.1.3 । )
धृष्टिरसी त्युपवेषमादायापाग्न इत्यङ्गरान् प्राच. करोति (का. श्रौ. 2.4.25)
उपवेषोऽङ्गारापोहन समर्थ हस्ताकृति काष्ठम (का. श्रौ. 2.4.25 का.भा. )
पलाश शाखा के मूल को काटकर उपवेष निर्माण करने को कहा गया है- मूदुपवेषं करोति का.श्रौ.4.2.12 (उपसर्जनी)
ताँबे की जिस बटलोई में याग के लिए जल लिया जाता है, जल सहित वह पात्र उपसर्जनी कहलाता है । उपसर्जनी (जलपात्र) को गार्हपत्य अग्नि पर तपाना उपसर्जनी अधिश्रयण कहलाता है-
उपसर्जनीरधिश्रयति का.श्रौ. 2.5.1 ।
इसके बाद इस इध्र्वयु के निकट लाने को कहा गया है- उपसर्जनी राजरूत्यन्यः का.श्रौ.2.5.12
    
(21)उपांशु (ग्रह)
जिन पात्रों को हाथ में लेकर यज्ञ-कार्य सम्पन्न किया जाता है, उन्हें ग्रह कहते हैं-
तद्यदेनं पात्रर्व्यवगृहणत् तस्माद्ग्रहा नाम-शत. ब्रा. 4.1.3.5 अध्र्वयु उपांशु ग्रह से याज्ञिक कार्य (सोमाहुति) करते हैं-उपांशु यजुषा- मै9ा. सं. 3.6.5 उपांशु ग्रह को मन्त्र से शुद्ध करके हवन करना चाहिए-
उत्तरादुपांशु जुहूयात् - कपि. क.सं. 42.1 याग के बाद भी उसका सम्मार्जन किया जाता है- उपांशुग्रहं हुत्वा पात्रमार्जन कुर्यात् - यजु. 7.3 मही. भा. । उपांशु सवन (बट्टा को ) उपांशु (ग्रह) के निकट रखा जाता है ।

(22) उलूखल
उलूखल हवि रूप द्रव्य पदार्थ को कूटने का एक काष्ठ-पात्र है । पुरोडाश निर्माण के निमित्त जौ या ब्रीहि भी इसी से कूटा जाता है ।
धान्यादिकण्डनसाधने काष्ठयमे पात्रे तच्च यज्ञियपात्रभेदःवा.पृ. 137( । कात्यायन श्रौत सूत्र में उलूखल-मुसल का उल्लेख मिलता है-
उलूखलमुसले स्वयमातृणामुत्तरेणारत्निमात्रेऽ औदुम्बरे प्रादेश मात्रे चतुरश्रमुलूखलं मध्यड्गृहीतमूद्ध वृत्तं - का.श्रौ. 17.513 अथोलूखलमुसलेऽ उपदधाति(शत. ब्रा. 7.5.1.12)

(23) ऋतुग्रह
अग्निष्टोम याग में ऋतुग्रह नामक उपयाम पात्र का समानयन किया जाता है? ऋतुग्रह से सोम रसाहुति दी जाती है । इस कार्य के ऋत्विज् अध्र्वयु और प्रतिप्रस्थाता होते हैं । ऋतुओं की संख्या बारह है । अतएवं ऋतुग्रह से बारह सोम आहुतियाँ समर्पित की जाती हैं-ऋतु ग्रहैश्चरत ..
(का.श्रौ.9.13.1)
द्वादश वै मासा संवत्सरस्य तस्मात् द्वादशगृहणीयात् (शत.ब्रा. 4.3.1. 5)
ऋत् ग्रह से प्रातः सवन में आहुतियों का विधान है- ऋतुग्रहैः प्रातः सवनमृतुमत ।
मैत्रा सं. 4.6.8
ऋतुग्रहों की उत्पत्ति सोम-पानक इन्द्र के साथ हुई बताया गया है- सोमपा इन्द्रस्य सजाता यद् ऋतुग्रहाः । कपि. क. सं. 44.2
ऋतुग्रह पात्र से आहुति देने पर प्राणियों की वृद्धि होना बताया गया है-ऋतृपात्रमेवान्वेकशफं प्रजायते ।(शत.ब्रा. 4.5.5.8)
(24) करम्भपात्र
चातुर्मास्य याग में प्रतिप्रस्थाता जौ के आटे का करम्भपात्र बनाता है । इसका आकार डमरू जैसा और नाप अंगुष्ठ पर्व जितना होता है । इनकी संख्या यजमान की प्रजा (सन्तान) से एक अधिक रखी जाती है- तेषां करम्भपात्राणि कुर्वन्ति यावन्तो गृह्याः स्मुस्तावन्त्येकेनारिक्तानि । (शत. ब्रा. 2.5.2.14)
र्पूवेद्युर्दक्षिणाग्नौ निस्तुषाम भृष्ठयवानां करम्भपात्र करणम् । यावन्तो यजमानगृह्या एकाधिकानि ।(का. श्रौ. 5.3.2.3)

(25) कुश (दर्भ)
कुश का प्रयोग याज्ञिक कृत्यों में विशेषतः किया जाता है । चारों दिशाओं में कुशकण्डिका आस्तरण एवं जल प्रोक्षण के निमित्त इसका प्रयोग होता है । शोधन-कारक होने के कारण इसे जल रूप भी माना गया है- आपो हि कुशा शत.ब्रा. 1.3.1.3 । कुश का पर्यायवाची शब्द दर्भ माना गया है । दर्भ को मन्युशमन करने वाला कहा गया है । दर्भ का औषधीय प्रयोग द्रष्टव्य है- उभयं देतदन्नयद्दर्भा आपश्च होता ओषधयश्च या ।शत. ब्रा. 7.2.3.2
अपां वा एतदोषधीनीं तेजो यद्दर्भाः काठ.सं. 30.10
दर्भ की शुद्धता याज्ञिक कृत्य में महत्त्पूर्ण होती है- ते हि शुद्ध मेध्याः । शत.ब्रा. 7.3.2.3

(26)ग्रह पात्र
जिन पात्रों में हवन सामग्री या द्रव पदार्थ रखे जाते हैं, उन्हें ग्रह कहा गया है । सोमाभिषव काल में निचोड़ हुए सोम को एकत्र करने के लिए इस ग्रह पात्र को छन्ने के नीचे रखा जाता है- यद् गृह्णीति तस्माद् ग्रहः (शत.ब्रा. 10.1.1.5)
यद्वितं (यज्ञम्) ग्रहर्ैव्यगृह्णत तद् ग्रहाणां ग्रहाणां ग्रहत्वम् । (ऐत.ब्रा. 3.9)
इनका पवित्र प्रोक्षण करने के बाद इसे ग्रहण कर सोमाहुति दी जाती है-तान् पुरस्तात् पवित्रस्य व्यगृहणात् ते ग्रहा अभवन्- तैति. ब्रा. 1.4.1.1

(27) चमस होतृ अच्छावाक्, उद्गातृ
चमस यज्ञीय सोमपत्र को कहते है- पलाशादिकाष्ठ जाते यज्ञियपात्रभेदे तल्लक्षणभेदादिकं यज्ञपार्श्वे । सोमपानपात्रभेदे च- वा. पृ. 2895 ।
तच्चाविशेषेऽपि सति चतुरश्रं स्यात् ''चमसेनापः प्रणयति'' इतिका.श्रौ.2.311 का.भा. । अच्छावाक् होता का सहकारी ऋत्विज् होता है । इनके द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले अच्छावक् चमस और उद्गाता एवं अध्र्वयु के नाम पर क्रमशः उद्गातृ चमस एवं चमसाध्र्वयु प्रयुक्त किये जाते हैं ।
सोमस्य प्रतिष्ठा यमसोऽस्य प्रतिष्ठा सोमः स्तोमस्य स्तोम उक्थानां ग्रहं वा गृहीत्वा चमसं ।(बौधा.श्रौ. 14.2)
अच्छावाकचमसमेवैते त्रयः समुपहूय भक्षयन्ति ।(बौध.श्रौ. 7.20)

    
(28) चर्म (कृष्णाजिन, शर्दूल आदि)
याज्ञिका कार्यों में चर्म का विविध प्रयोग पाया जाता है । इनका प्रयोग मुख्यतः आसतरण के रूप में किया जाता है । फलों पर बिछाकर उनकी रक्षा की जाती थी । चर्म पर सोम को पत्थर से कूटते थे तथा उसके रस को निकालते थे । गाय, मृग, मेष, व्याघ्र आदि के चर्म का उल्लेख यज्ञ-कार्यों में हुआ है- व्याघ्र चर्मारोहति-यज्ञु. 10.5 उ.भा. । पौर्णमासयाग में अध्र्वयु कृष्णाजिन को हाथ में लेकर विविध क्रियाएँ करते हैं- कृष्णाजिनादानम् - का.श्रौ. 2.4.1 ।
चर्म से चमस बनाकर भी याज्ञिक-कार्य सम्पन्न होते हैं- अथ होत्रणां चमसानभ्युन्न्यन्ति । (शत.ब्रा. 4.2.1.31)
कृष्ण मृग के चर्म को कृष्णाजिन और व्याघ्र या सिंह के चर्म को शार्दूल कहा जाता हैः कृष्णाजिनमादत्ते-शत.ब्रा. 1.1.4.4. । मृत्योर्वा एषवर्णः । यच्छर्दूल ।
(तैत्ति.ब्रा. 1.7.8.1)
‍
(29) चात्वाल
चातुर्मास्य या अग्निष्टोम याग की वेदिका से उत्तर की ओर चात्वाल बनाया जाता है । यह एक विशेष यज्ञकुण्ड होता है, जिसकी नाप 32324 अंगुल है । इसका उल्लेख कात्यायन श्रौत्यायन श्रौतसूत्र में अनेक स्थानों पर मिलता है-
श्य्यामादाय चात्वलं मिमीते- का.श्रौ. 5.3.19 ।
विददग्निरिति चात्वो प्रहरहत का.श्रौ. 5.3.23 ।
चात्वालोत्करावन्तरेण सञ्चरः का. श्रौ.1.3.41 ।
वाचस्पत्यम् में इसका एक अर्थ है- उत्तरवेदी में स्तूप का स्थान उत्तरवेद्यङ्गे भृत्स्तूपे वा.पृ.2912

(30)जूहू
याग में हविद्र्रव्य अर्पित करने के निमित्त प्रयुक्त होने वाली स्रुची को जुहू कहते हैं । यह पलाश काष्ठ की, एक अरित्न (बाहुमात्र नाप की आगे में चार अंगुल गर्तवाली और हंसमुखी होती है- यज्ञिये स्रुगाख्ये पात्रभेदे सा च पत्नाश्घटिता वा.पृ. 3142 ।
पालाशी जुहू -का.श्रौ. 1.3.35 । पर्णयमी जुहूः तै.सं. 3.5.7.2 । इसे यज्ञ का मुख और द्युलोक की उत्पत्तिकारक कहा गया है- जुर्हूवैयज्ञमुखम् मैत्रा1 सं. 3.1.1 । जुह्वेहि घृताची द्यौर्जन्मना । (काठ.मं. 1.11)

(31) दण्ड
अग्निष्टोम याग में यजमान को ब्रह्मचर्य पूर्वक जीवन यापन करते हुए परिभ्रमण करना पड़ता था, इसलिए उस समय दण्डधारण का विधान आत्मरक्षार्थ किया था- दण्डोदेवता! हे वनस्पते वृक्षावयव दण्ड, उच्छ्रयस्व उन्नतो भव । ऊध्र्वोभूत्वा अंह सः पापात् मा मां पाहि रक्ष । तत्र कालावधिरुच्यते यजु.4.1 ( मही.भा. । याग में यजमान का मुँह के बराबर तक ऊँचाई वाला औदुम्बर काष्ठ का दण्ड धारण कराया जाता है- मुखसम्मितमादुम्बरं दण्डं प्रयच्छिति का. श्रौ. 7.4.1 । दण्ड को वज्र का प्रतीक माना गया है- वज्ररो वै दण्डो विरक्षस्तायै (शत.ब्रा. 3.2.1.32)

(32)दर्वि
यह विकङ्कत काष्ठ की बनी हुई और कलछुल के आकार की होती है । चातुर्मास्य याग में इसी से हवि रूप द्रवव्य की आहुतियाँ दी जाती हैं- दर्व्याऽऽदत्ते पूर्णादर्वीति (का.श्रौ.5.6.10)
अग्निहोत्रं च हुत्वा अहुत्वा वा दर्विहोमः र्कत्तव्यः (का.श्रौ.5.6.3( का.भा.)
एष खलु वै स्रिया हस्तो यद् दर्वि (मैत्रा.सं.1.1(.16)

(33)द्रोणकलश
द्रोणकलश में सोमरस छाना जाता है । यह विकङ्गत काष्ठ का मध्य में गर्तवाला और चारों ओर परिधि वाला होता है । इसकी लम्बाई अठारह अँगुल और चौड़ाई बारह अँगुल रहती है-

अतिरिक्तं वा एतत् प्रात्राणं यदू द्रोण कलशः (कपि. क.सं. 44.9)
आहवनीयं गच्छत्यादाय ग्राव द्रोणकलश सोमपात्राणि का.श्रौ.8.7.4 ।
द्रोणकलशस्य स्वशब्दाभिधानात् सोमपात्रशब्देन ग्रहपात्राणि गृह्यन्तेका.श्रौ.8.7.4 का.भा. ।
स्रुचशाच में चमसाश्च मे वाय व्यानि च मे द्रोणकलशश्च मे... ।
(यजु. 18.21)

यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान पृ.5.47
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The Great Moments of Change
Type: SCAN
Language: ENGLISH
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परिवर्तन के महान क्षण
Type: SCAN
Language: EN
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परिवर्तन के महान् क्षण
Type: TEXT
Language: EN
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परिष्कृत अध्यात्म हमारे जीवन में उतरे
Type: SCAN
Language: HINDI
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પરિષ્કૃત અધ્યાત્મ આપણા જીવનમાં ઉતરે
Type: SCAN
Language: GUJRATI
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જીવન સાધનાનાં સોનેરી સૂત્રો
Type: SCAN
Language: EN
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जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र
Type: TEXT
Language: EN
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தவ வாழ்க்கைக்கான
Type: SCAN
Language: EN
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जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र
Type: SCAN
Language: EN
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మానసిక సంతులనం
Type: SCAN
Language: TELUGU
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Mental Balance
Type: SCAN
Language: ENGLISH
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மன சமநிலை
Type: SCAN
Language: TAMIL
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मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले
Type: TEXT
Language: EN
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મન: સ્થિતિ બદલો તો પરિસ્થિતિ બદલાશે
Type: SCAN
Language: GUJRATI
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मनस्थिति बदलें तो परिस्थिति बदले
Type: SCAN
Language: EN
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गायत्री साधना से कुण्डलिनी जागरण
Type: TEXT
Language: HINDI
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गायत्री साधना से कुण्डलिनी जागरण
Type: SCAN
Language: HINDI
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गायत्री साधना के दो स्तर
Type: TEXT
Language: HINDI
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गायत्री सर्वतोन्मुखी समर्थता की अधिष्ठात्री
Type: TEXT
Language: HINDI
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ઇન્દ્રિય સંયમ
Type: SCAN
Language: GUJRATI
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इंद्रिय संयम
Type: SCAN
Language: HINDI
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इन्द्रिय संयम
Type: TEXT
Language: HINDI
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प्रज्ञा परिजनों में नव जीवन संचार
Type: SCAN
Language: HINDI
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Articles of Books

  • यज्ञाग्नि की शिक्षा तथा प्रेरणा
  • यज्ञ में पालन करने योग्य नियम
  • ब्रह्मदेव कृत सामूहिक यज्ञ
  • हवन सम्बन्धी कुछ आवश्यक बातें
  • हवन सामाग्री
  • समिधाएँ
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  • कुण्ड एवं मण्डप निर्माण
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  • कुण्डों की संख्या
  • यज्ञीय पदार्थ तथा पात्र परिचय
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Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

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