यज्ञ का मुहूर्त
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विष्णु या याग, रुद्र, लक्ष होम, कोट होम, ज्योतिष्टोम आदि बड़े यज्ञों के लिए अलग-अलग मुहुर्त हैं। ज्योतिष के नियमों के आधार पर उनके मुहुर्त निकाले जाते हैं, पर साधारण यज्ञों के लिए बहुत गहराई तक जाने की, बहुत भारी खोज-बीन करने की आवश्यकता नहीं है । साधारण शुभ दिन, तिथि, वार देखकर छोटे यज्ञों को कभी भी किया जा सकता है । यथा-
यदैव जायते वित्तं, चित्तं श्रद्धा समन्वितम
तदैव पुण्य कालोऽयं यतोऽनियत जीवितम
अतःर्सवेषु कालेषु यज्ञकर्म शुभ प्रदः
ईश्वराधनार्थं च सर्व पापापनुत्तये ।
यदि रुद्राद्यनुष्ठानं मुहूर्तादि चिन्तयेत
जब पास में पैसा हो और चित्त में श्रद्धा हो तो उसी समय को पुण्य काल, शुभ मुहुर्त मान लेना चाहिए । क्योंकि जीवन का कोई ठिकाना नहीं, आज हैं, कल प्राण चला जा सकता है । इसलिए यज्ञ आदि शुभ कर्मों के लिए सभी दिन शुभ हैं ।
परमात्मा की प्रसन्नता के लिए, पापों से छुटकारा पाने के लिए यदि रुद्र-यज्ञ आदि का अनुष्ठान करे, तो उसके लिए मुहुर्त देखने की आवश्यकता है ।
सकाम यज्ञों में ही मुहूर्तों की बात बहुत खोज बीन के साथ की जाती है । पर निष्काम, भगवत्प्रीत्यर्थ किये जाने वाले हवनों में इसकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं है । फिर भी साधारण् मुहुर्त का उल्लेख करते हैं-
सोम सौम्य गुरु शुक्र वासराः कर्मतु भवन्ति सिद्धिदाः ।
यज्ञ आदि शुभ कर्मों में सोम, बुद्ध, गुरु, शुक्रवार सिद्धिप्रद हैं ।
शुक्ल पक्षे द्वितीयायां तृतीयायां तथैवच
पंचम्यामथ सप्तम्यां दशम्यां च विशेषतः
त्रयोदश्यां च र्कत्तव्यों द्वादश्यां च विशेषतः॥
शुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दश्मी, द्वादशी और त्रयोदशी विशेष उत्तम हैं ।
आद्रा शतभिषा स्वाती रोहिणी श्रवणं मृगः
पूर्वाषाढोत्तराषाढा ज्येष्ठा श्लेषा च रेवती ।
चित्रा हस्तो धनिष्ठास्यादनुराधा च सिद्धिदा ।
पूनर्वसु गुरोर्वीरे द्वादश्यां श्रवणे तथा ।
मृगशीर्ष तदा योगे विष्णु सर्वार्थ साधकः ।
आद्रा, शतभिषा, स्वाति, रोहिणी, श्रवण, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, ज्येष्ठा, श्लेषा, रेवती, चित्रा, हस्त, धनिष्ठा, यह नक्षत्र यज्ञ में शुभ माने गये हैं ।
गुरु-शुक्र-अस्त में यज्ञ न करने की बात भी बहुत बड़े विशाल यज्ञों पर ही लागू होती है । छोटे मध्यम श्रेणी के यज्ञों के लिए उसका विचार आवश्यक नहीं । यथा-
शान्ति कर्मणि कुर्वीत रोगे नैमित्ति के तथा ।
गुरु भाग्व मौढ्यऽपि दोषस्तत्र न विद्यते ।
नैमित्तक कर्मों के, रोग आदि के निवारणार्थ, तथा शान्ति प्रयोजनों के लिए हवन आदि करने में गुरु शुक्र के अस्त का दोष नहीं ।
अमावस्या-पूर्णमासी को दर्शपौर्णमास्य यज्ञ सदा होते हैं । इसलिये यह दोनों तिथियाँ हवन करने के लिए अतीव शुभ मानी गई हैं ।
साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, पर्वों, त्यौहारों तथा उत्सवों के समय भी अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं है । पूर्व निर्धारत कार्यक्रम ही उसका मुहूर्त है ।
यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान पृ.5.34
यदैव जायते वित्तं, चित्तं श्रद्धा समन्वितम
तदैव पुण्य कालोऽयं यतोऽनियत जीवितम
अतःर्सवेषु कालेषु यज्ञकर्म शुभ प्रदः
ईश्वराधनार्थं च सर्व पापापनुत्तये ।
यदि रुद्राद्यनुष्ठानं मुहूर्तादि चिन्तयेत
जब पास में पैसा हो और चित्त में श्रद्धा हो तो उसी समय को पुण्य काल, शुभ मुहुर्त मान लेना चाहिए । क्योंकि जीवन का कोई ठिकाना नहीं, आज हैं, कल प्राण चला जा सकता है । इसलिए यज्ञ आदि शुभ कर्मों के लिए सभी दिन शुभ हैं ।
परमात्मा की प्रसन्नता के लिए, पापों से छुटकारा पाने के लिए यदि रुद्र-यज्ञ आदि का अनुष्ठान करे, तो उसके लिए मुहुर्त देखने की आवश्यकता है ।
सकाम यज्ञों में ही मुहूर्तों की बात बहुत खोज बीन के साथ की जाती है । पर निष्काम, भगवत्प्रीत्यर्थ किये जाने वाले हवनों में इसकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं है । फिर भी साधारण् मुहुर्त का उल्लेख करते हैं-
सोम सौम्य गुरु शुक्र वासराः कर्मतु भवन्ति सिद्धिदाः ।
यज्ञ आदि शुभ कर्मों में सोम, बुद्ध, गुरु, शुक्रवार सिद्धिप्रद हैं ।
शुक्ल पक्षे द्वितीयायां तृतीयायां तथैवच
पंचम्यामथ सप्तम्यां दशम्यां च विशेषतः
त्रयोदश्यां च र्कत्तव्यों द्वादश्यां च विशेषतः॥
शुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दश्मी, द्वादशी और त्रयोदशी विशेष उत्तम हैं ।
आद्रा शतभिषा स्वाती रोहिणी श्रवणं मृगः
पूर्वाषाढोत्तराषाढा ज्येष्ठा श्लेषा च रेवती ।
चित्रा हस्तो धनिष्ठास्यादनुराधा च सिद्धिदा ।
पूनर्वसु गुरोर्वीरे द्वादश्यां श्रवणे तथा ।
मृगशीर्ष तदा योगे विष्णु सर्वार्थ साधकः ।
आद्रा, शतभिषा, स्वाति, रोहिणी, श्रवण, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, ज्येष्ठा, श्लेषा, रेवती, चित्रा, हस्त, धनिष्ठा, यह नक्षत्र यज्ञ में शुभ माने गये हैं ।
गुरु-शुक्र-अस्त में यज्ञ न करने की बात भी बहुत बड़े विशाल यज्ञों पर ही लागू होती है । छोटे मध्यम श्रेणी के यज्ञों के लिए उसका विचार आवश्यक नहीं । यथा-
शान्ति कर्मणि कुर्वीत रोगे नैमित्ति के तथा ।
गुरु भाग्व मौढ्यऽपि दोषस्तत्र न विद्यते ।
नैमित्तक कर्मों के, रोग आदि के निवारणार्थ, तथा शान्ति प्रयोजनों के लिए हवन आदि करने में गुरु शुक्र के अस्त का दोष नहीं ।
अमावस्या-पूर्णमासी को दर्शपौर्णमास्य यज्ञ सदा होते हैं । इसलिये यह दोनों तिथियाँ हवन करने के लिए अतीव शुभ मानी गई हैं ।
साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, पर्वों, त्यौहारों तथा उत्सवों के समय भी अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं है । पूर्व निर्धारत कार्यक्रम ही उसका मुहूर्त है ।
यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान पृ.5.34

