पूर्व जन्मों का ज्ञान
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घटना लगभग १५० वर्ष पुरानी है। जयपुर के बूढ़ादेवल गाँव में दधीचि वंश के दाहिवाँ परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। उसका नाम विष्णुदास ब्रह्मचारी था। वह आठ वर्ष की आयु से ही गायत्री उपासना में प्रवृत्त हुआ तथा आगे चलकर एक महान गायत्री उपासक के रूप में प्रख्यात हुआ। विष्णुदास परिवार की स्थिति ठीक न होने को कारण चिन्तित रहा करते थे। भला मां से क्या छिपा था। एक रात मां गायत्री ने स्वप्न दिया कि ‘‘अमुक स्थान पर जमीन में धन गढ़ा है, अपनी आवश्यकतानुसार खोदकर निकाल लो।’’ ब्रह्मचारी जी माँ की आज्ञा मानकर निर्देशित स्थान को खोदने लगे। नित्य खोदकर धन निकालते तथा अपने आसन के नीचे रख देते थे। उनकी मां भी साथ रहा करती थीं। उनकी मां को शंका हुई कि पुत्र कुछ करता तो नहीं फिर धन कहाँ से आता है?
इसलिए उन्होंने एक दिन आसन उठा कर देखा, ब्रह्यचारी जी को मालूम हुआ कि माँ गायत्री की कृपा से धन प्राप्त होने की बात मां को मालूम हो गयी है और उन्होंने दूसरों को भी बता दिया है। उनको बड़ा दुःख हुआ, वे पुष्कर नामक स्थान पर जाकर गायत्री का विशेष जप करने में प्रवृत्त हो गये। पुष्कर की एक झोंपड़ी में उन्होंने गायत्री पुरश्चरण शुरू किया। इस प्रकार २४- २४ लाख के तीन पुरश्चरण किये फिर भी उनको कोई विशेषता दृष्टिगोचर नही हुई। उन्होंने समझा कि उनका तप व्यर्थ गया और स्वयं दुःखी होने लगे। एक दिन उन्होंने देखा कि उनके तीन बड़ी- बड़ी चितायें जल रही हैं और आकाशवाणी हुई कि जन्म- जन्मान्तरों में तुमने तीन ब्रह्म हत्यायें की थीं जो इस तप के प्रभाव से निर्मूल हो गई, आगे बढ़ो अब सिद्धि प्राप्त होगी।
अब नये उत्साह के साथ फिर गायत्री तप में लग गये, तप के तेज से सर्वत्र उनकी कीर्ति फैल गयी। बड़े- बड़े राजा उनकी झोपड़ी की धूल सिर पर लगाने लगे। जयपुर और जोधपुर के महाराजा ने अपने यहाँ उनको बुलाने का भारी आग्रह किया। ब्रह्मचारी जी ने कहा- हमारे पुरश्चरणों की पूर्णाहुति, ब्रह्मभोज, दक्षिणा आदि से नहीं हुई है, इसलिए हम कहीं नहीं जा सकते हैं। महाराज ने स्वयं पूरा करने का वचन दिया और ब्रह्मचारी जी को जयपुर ले गये। उदयपुर में उनका शादी स्वागत किया गया और पुरश्चरण की पूर्णाहुति का सब कार्य आनन्द के साथ सम्पन्न किया गया। ब्रह्मचारी जी की आज्ञा से महाराज ने और भी अनेक धार्मिक कार्य सम्पन्न किये।
महाराज के कल्याण के लिए दोषों और पापों के निवारण के लिए ब्रह्मचारी ने ‘काल पुरुष का दान’ नामक एक उल्लेखनीय कृत्य कराया। सुवर्ण आदि आठ धातुओं, नव रत्नों से एक ‘कालपुरुष’ की मूर्ति बनवाई। उसकी शास्त्रोक्त विधि से भूतशुद्धि और प्राण- प्रतिष्ठा की। कहा जाता है कि जो कोई ब्राह्मण काल- पुरुष की मूर्ति का दान लेने आता था, उसकी मूर्ति स्पष्ट दान न लेने के लिए संकेत करती थी, परिणामस्वरूप उसे लेने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ।
अन्त में जिसका वंश कई पीड़ियों से गायत्री का परम उपासक था,ऐसा एक ब्राह्मण दान लेने के लिए तैयार हुआ। उसने जैसे ही मूर्ति दान लिया, उसका शरीर काला पड़ गया। उसने मूर्ति का सब धन और अपनी सम्पत्ति दान में दी तब उसके शरीर की कालिमा दूर हुई, किन्तु जिस हथेली पर दान जल लिया था वह काली हो गयी। तीन गायत्री पुरश्चरण करने के बाद हथेली की कालिमा भी चली गयी। महाराज के कल्याण के लिए इस ब्राह्मण को इतना कष्ट सहन करना पड़ा। उसके लिए महाराज सदा उसके प्रति कृतज्ञ बने रहे और उसके परिवार को सदा सहयोग करते रहे। ब्रह्मचारी जी के तप के प्रभाव से असंख्यों का कल्याण हुआ। वे ब्रह्मनिष्ठ और गायत्री उपासक बनने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। उनके प्रभाव से उपदेश से कई ब्राह्मणों ने गायत्री की शरण ली और परम कल्याण का लाभ प्राप्त किया।
इसलिए उन्होंने एक दिन आसन उठा कर देखा, ब्रह्यचारी जी को मालूम हुआ कि माँ गायत्री की कृपा से धन प्राप्त होने की बात मां को मालूम हो गयी है और उन्होंने दूसरों को भी बता दिया है। उनको बड़ा दुःख हुआ, वे पुष्कर नामक स्थान पर जाकर गायत्री का विशेष जप करने में प्रवृत्त हो गये। पुष्कर की एक झोंपड़ी में उन्होंने गायत्री पुरश्चरण शुरू किया। इस प्रकार २४- २४ लाख के तीन पुरश्चरण किये फिर भी उनको कोई विशेषता दृष्टिगोचर नही हुई। उन्होंने समझा कि उनका तप व्यर्थ गया और स्वयं दुःखी होने लगे। एक दिन उन्होंने देखा कि उनके तीन बड़ी- बड़ी चितायें जल रही हैं और आकाशवाणी हुई कि जन्म- जन्मान्तरों में तुमने तीन ब्रह्म हत्यायें की थीं जो इस तप के प्रभाव से निर्मूल हो गई, आगे बढ़ो अब सिद्धि प्राप्त होगी।
अब नये उत्साह के साथ फिर गायत्री तप में लग गये, तप के तेज से सर्वत्र उनकी कीर्ति फैल गयी। बड़े- बड़े राजा उनकी झोपड़ी की धूल सिर पर लगाने लगे। जयपुर और जोधपुर के महाराजा ने अपने यहाँ उनको बुलाने का भारी आग्रह किया। ब्रह्मचारी जी ने कहा- हमारे पुरश्चरणों की पूर्णाहुति, ब्रह्मभोज, दक्षिणा आदि से नहीं हुई है, इसलिए हम कहीं नहीं जा सकते हैं। महाराज ने स्वयं पूरा करने का वचन दिया और ब्रह्मचारी जी को जयपुर ले गये। उदयपुर में उनका शादी स्वागत किया गया और पुरश्चरण की पूर्णाहुति का सब कार्य आनन्द के साथ सम्पन्न किया गया। ब्रह्मचारी जी की आज्ञा से महाराज ने और भी अनेक धार्मिक कार्य सम्पन्न किये।
महाराज के कल्याण के लिए दोषों और पापों के निवारण के लिए ब्रह्मचारी ने ‘काल पुरुष का दान’ नामक एक उल्लेखनीय कृत्य कराया। सुवर्ण आदि आठ धातुओं, नव रत्नों से एक ‘कालपुरुष’ की मूर्ति बनवाई। उसकी शास्त्रोक्त विधि से भूतशुद्धि और प्राण- प्रतिष्ठा की। कहा जाता है कि जो कोई ब्राह्मण काल- पुरुष की मूर्ति का दान लेने आता था, उसकी मूर्ति स्पष्ट दान न लेने के लिए संकेत करती थी, परिणामस्वरूप उसे लेने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ।
अन्त में जिसका वंश कई पीड़ियों से गायत्री का परम उपासक था,ऐसा एक ब्राह्मण दान लेने के लिए तैयार हुआ। उसने जैसे ही मूर्ति दान लिया, उसका शरीर काला पड़ गया। उसने मूर्ति का सब धन और अपनी सम्पत्ति दान में दी तब उसके शरीर की कालिमा दूर हुई, किन्तु जिस हथेली पर दान जल लिया था वह काली हो गयी। तीन गायत्री पुरश्चरण करने के बाद हथेली की कालिमा भी चली गयी। महाराज के कल्याण के लिए इस ब्राह्मण को इतना कष्ट सहन करना पड़ा। उसके लिए महाराज सदा उसके प्रति कृतज्ञ बने रहे और उसके परिवार को सदा सहयोग करते रहे। ब्रह्मचारी जी के तप के प्रभाव से असंख्यों का कल्याण हुआ। वे ब्रह्मनिष्ठ और गायत्री उपासक बनने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। उनके प्रभाव से उपदेश से कई ब्राह्मणों ने गायत्री की शरण ली और परम कल्याण का लाभ प्राप्त किया।

