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Books - गोपनीय गायत्री तंत्र

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


गायत्री का गोपनीय वाममार्ग

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न देयं परं शिष्येभ्योह्यभक्तेभ्यो विशेषतः।
             शिष्येभ्यो भक्ति युक्तेभ्योह्यन्यथामृत्युमाप्नुयात् ।।

अर्थात्  दूसरे के शिष्य के लिये विशेषकर भक्तिरहित के लिये यह मंत्र कभी न देना चाहिये। इसकी दीक्षा भक्तियुक्त शिष्य को ही देनी चाहिये अन्यथा मृत्यु की प्राप्ति होती है।

उपरोक्त प्रमाण में यह बताया गया है कि तन्त्र एक गुप्त विज्ञान है। उसकी सब बातें सब लोगों के सामने प्रकट करने योग्य नहीं होतीं। कारण यह है कि तान्त्रिक साधनाएं बड़ी क्लिष्ट होती हैं। वे उतनी ही कठिन हैं, जितना कि समुद्र की तली में घुसकर मोती निकालना। गोताखोर लोग जान को जोखिम में डालकर पानी में बड़ी गहराई तक नीचे उतरते हैं, तब बहुत प्रयत्न के बाद उन्हें कुछ मोती हाथ लगते हैं। परन्तु इस क्रिया में अनेक बार उन्हें जल-जन्तुओं का सामना करना पड़ता है। नट अपनी कला दिखाकर लोगों को मुग्ध कर देता है और प्रशंसा भी प्राप्त करता है, परन्तु यदि एक बार चूक जाय तो खैर नहीं।

तन्त्र प्रकृति से संग्राम करके उसकी रहस्यमय शक्तियों का विजय लाभ करना है। इसके लिये असाधारण प्रयत्न करने पड़ते हैं और उनकी असाधारण ही प्रतिक्रिया होती है। पानी में जोर से ढेला फेंकने पर वहां का पानी जोर से उछाल खाता है और एक छोटे विस्फोट जैसी स्थिति दृष्टिगोचर होती है। तान्त्रिक साधक भी एक रहस्यमय साधन द्वारा प्रकृति के अन्तराल में छिपी हुई शक्ति को प्राप्त करने के लिये अपनी साधना का एक आक्रमण करता है। उसकी एक प्रतिक्रिया होती है, उस प्रतिक्रिया से कभी-कभी साधक के भी आहत हो जाने का भय रहता है।

जब बन्दूक चलाई जाती है तो जिस समय नली में से गोली बाहर निकलती है, उस समय वह पीछे की ओर एक झटका मारती है और भयंकर शब्द करती है। यदि बन्दूक चलाने वाला कमजोर प्रकृति का हो तो उस झटके से पीछे की ओर गिर सकता है, धड़ाके की आवाज से डर या घबरा सकता है। चन्दन के वृक्षों के निकट सर्पों का निवास रहता है, गुलाब के फूलों में कांटे होते हैं, शहद प्राप्त करने के लिये मक्खियों के डंक का सामना करना पड़ता है, सर्पमणि प्राप्त करने के लिये भयंकर सर्प से और गजमुक्ता प्राप्त करने के लिये मदोन्मत्त हाथी से जूझना पड़ता है। तान्त्रिक साधनाएं ऐसे ही विकट पुरुषार्थ हैं, जिनके पीछे खतरों की श्रृंखला जुड़ी रहती है। यदि ऐसा न होता तो उन लाभों को हर कोई आसानी से प्राप्त कर लिया करता।

तन्त्र एक उत्तेजनात्मक उग्र प्रणाली है। इस प्रक्रिया के अनुसार जो साधना की जाती है, उससे प्रकृति के अन्तराल में बड़े कम्पन्न होते हैं, जिनके कारण ताप और विक्षोभ की मात्रा बढ़ती है। गर्मी के दिनों में सूर्य की प्रचण्ड किरणों के कारण जब वायु-मण्डल का तापमान बढ़ जाता है तो हवा बहुत तेज चलने लगती है। लू, आंधी और तूफान के दौरे बढ़ते हैं। उस उग्र उत्तेजना में खतरे बढ़ जाते हैं, किसी को लू सता जाती है, किसी की आंख में धूल भर जाती है, अनेकों के शरीर फोड़े-फुन्सियों से भर जाते हैं, आंधी से छप्पर उड़ जाते हैं, पेड़ उखड़ जाते हैं। कई बार हवा के भंवर पड़ जाते हैं, जो एक छोटे दायरे में बड़ी तेजी से नांचते हुए डरावनी शक्ल में दिखाई पड़ते हैं। तन्त्र की साधनाओं से ग्रीष्म काल का सा उत्पात पैदा होता है और मनुष्य के वाह्य एवं आन्तरिक वातावरण में एक प्रकार की सूक्ष्म लू एवं आंधी चलने लगती है, जिसकी प्रचण्डता के झकझोरे लगते हैं। यह झकझोरे मस्तिष्क के कल्पना-तन्तुओं से जब संघर्ष करते हैं तो अनेकों प्रकार की भयंकर प्रतिमूर्तियां दृष्टिगोचर होने लगती हैं। ऐसे अवसर पर डरावने भूत, प्रेत, पिशाच, देव, दानव जैसी आकृतियां दीख सकती हैं। दृष्टि-दोष उत्पन्न होने से कुछ न कुछ दिखाई दे सकता है। अनेकों प्रकार के शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्शों का अनुभव हो सकता है। यदि साधक निर्भयतापूर्वक इन स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं को देखकर मुस्कराता न रहे तो उसका साहस नष्ट हो जाता है और उन भयंकरताओं से यदि वह भयभीत हो जाय तो वह भय उसके लिए संकट बन सकता है।

इस प्रकार की कठिनाई का हर कोई मुकाबला नहीं कर सकता, इसके लिये एक विशेष प्रकार की साहसपूर्ण मनोभूमि होनी चाहिये। मनुष्य दूसरों के विषय में तो परीक्षा बुद्धि रखता है, पर अपनी स्थिति का ठीक परीक्षण कोई विरले ही कर सकते हैं। ‘‘मैं तन्त्र साधनाएं कर सकता हूं या नहीं’’ इसका निर्णय अपने लिए कोई मनुष्य स्वयं नहीं कर सकता। इसके लिए उसे किसी दूसरे अनुभवी व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ती है। जैसे रोगी अपनी चिकित्सा स्वयं नहीं कर सकता विद्यार्थी अपने आप शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता, वैसे ही तांत्रिक साधनाएं भी अपने आप नहीं की जा सकतीं, इसके लिये किसी विज्ञ पुरुष को गुरु नियुक्त करना होता है। वह गुरु सबसे पहले अपने शिष्य की मनोभूमि का निरीक्षण करता है और तब उस परीक्षण के आधार पर यह निश्चित करता है कि इस व्यक्ति के लिए कौन साधना उपयोगी होगी और उसकी विधि में अन्यों की अपेक्षा क्या हेर-फेर करना ठीक होगा। साधना काल में जो विक्षेप आते हैं उनका तात्कालिक उपचार और भविष्य के लिए सुरक्षा व्यवस्था बनाना भी गुरु के द्वारा ही सम्भव है। इसलिये तन्त्र की साधनाएं गुरु परम्परा से चलती हैं। सिद्धि के लोभ से अनधिकारी साधक स्वयं अपने आप उन्हें ऊट-पटांग ढंग से न करने लग जायं—इसलिए उन्हें गुप्त रखा जाता है। रोगी के निकट मिठाइयां नहीं रखी जातीं, क्योंकि पचाने की शक्ति न होते हुए भी यदि लोभ वश उसने उन्हें खाना शुरू कर दिया तो अन्ततः उसका अहित ही होगा।

तन्त्र की साधनाएं सिद्ध करने के बाद जो शक्ति आती है उसका यदि दुरुपयोग करने लगे तो उससे संसार में बड़ी अव्यवस्था फेल सकती है, दूसरों का अहित हो सकता है, अनाधिकारी लोगों को अनावश्यक रीति से लाभ या हानि पहुंचाने से उनका अनिष्ट ही होता है। बिना परिश्रम के जो लाभ प्राप्त होता है, वह अनेक प्रकार के दुर्गुण पैदा करता है। जिसने जुआ खेल कर दस हजार रुपया कमाया है, वह उन रुपयों का सदुपयोग नहीं कर सकता और न उनके द्वारा वास्तविक सुख प्राप्त कर सकता है। इसी प्रकार ईश्वरीय या राजकीय विधि से मिलने वाले स्वाभाविक दण्ड विधान को छोड़कर किसी को मन्त्र बल से हानि पहुंचाई जा सकती है इसलिये हर किसी को उनकी साधना करने का अधिकार नहीं दिया गया है। यह तो एक विशेष मनोभूमि के व्यक्तियों के लिए सीमित क्षेत्र में उपयोग होने वाली वस्तु है इसलिए उसका सार्वजनिक प्रकाशन नहीं किया जाता। हमारे घर सिर्फ उन्हीं व्यक्तियों के प्रयोग के लिए होते हैं, जो उसमें अधिकारपूर्वक रहते हैं। निजी घरों का उपयोग धर्मशाला की तरह नहीं हो सकता और न हर कोई मनुष्य किसी के घर में प्रवेश कर सकता है। तन्त्र भी अधिकार-सम्पन्न मनोभूमि वाले विशेष व्यक्तियों का घर है, उसमें हर व्यक्ति का प्रवेश नहीं है। इसलिये उसे नियत सीमा तक सीमित रखने के लिये गुप्त रखा गया है।

हम देखते हैं कि तन्त्र ग्रन्थों में जो साधन-विधियां लिखी गई हैं, वे अधूरी हैं। उनमें दो ही बातें मिलती हैं—एक साधन का फल, दूसरे साधन-विधि का कोई छोटा सा अंग। जैसे एक स्थान पर आया है कि ‘‘छोंकर की लकड़ी से हवन करने से पुत्र की उत्पत्ति होती है।’’ केवल इतने उल्लेख मात्र को पूर्ण समझकर जो छोंकर की लकड़ियों के गट्ठे भट्टी में झोंकेगा, उसकी मनोकामना कभी पूर्ण नहीं होगी। मूर्ख लोग समझेंगे कि साधना-विधि झूठी है। परन्तु इस शैली से वर्णन करने में तन्त्रकारों का मन्तव्य यह है कि साधना-विधि का संकेत कायम रहे जिससे इस विद्या का लोप न हो, वह विस्मृत न हो जाय। यह सूत्र-प्रणाली है। व्याकरण आदि के सूत्र बहुत छोटे-छोटे होते हैं। उनमें अक्षर तो दस-दस या पांच-पांच ही होते हैं पर अर्थ बहुत लघु संकेत मात्र होते हैं, जिससे याद कम करना पड़े और समय पड़ने पर पूरी बात याद हो आवे।

‘‘छोंकर के हवन से पुत्र प्राप्ति’’ इस संकेत सूत्र में एक भारी विधान छिपा हुआ है। किस मनोभूमि का मनुष्य, किस समय, किन नियमों के साथ, किन उपकरणों के द्वारा, किन मंत्रों से, कितना हवन करे, तब पुत्र की प्राप्ति हो, यह सब विधान उस सूत्र में छिपाकर रखा गया है। छिपाया इसलिए है कि अनधिकारी लोग उसका प्रयोग न कर सकें। संकेत रूप से कहा इसलिए गया है कि कालान्तर में इस तथ्य का विस्मरण न हो जाय, आधार मालूम रहने से आगे की बात का स्मरण हो आना सुगम है। तंत्र ग्रन्थों में साधना-विधियों को गुप्त रखने पर बार-बार जोर दिया गया है। साथ ही कहीं-कहीं ऐसी विधियां भी बताई हैं, जो देखने बड़ी सुगम मालूम पड़ती हैं, पर उनका फल बड़ा भारी कहा गया है। इस दिशा में अनजान लोगों के लिए यह गोरखधन्धा बड़ा उलझन भरा है। वे कभी उसे अत्यन्त सरल समझते हैं और कभी उसे असत्य मानते हैं, पर वस्तुस्थिति दूसरी ही है। संकेत-सूत्रों की विधि से उन साधनाओं का वर्णन करके तंत्रकारों ने अपनी रहस्यवादी मनोवृत्ति का परिचय दिया है।

गायत्री के दोनों ही प्रयोग हैं। वह योग भी है और तन्त्र भी। उससे आत्म दर्शन और ब्रह्मप्राप्ति भी होती है तथा सांसारिक उपार्जन—संहार भी। गायत्री योग दक्षिण मार्ग है—उस मार्ग से हमारे आत्म-कल्याण का उद्देश्य पूरा होता है। गायत्री तन्त्र वाम मार्ग है—उससे सांसारिक वस्तुएं प्राप्त की जा सकती हैं और किसी का नाश भी किया जा सकता है। तन्त्र का विषय गोपनीय है, इसलिए गायत्री तन्त्र के ग्रन्थों में ऐसी अनेकों साधनाएं प्राप्त होती हैं, जिनमें धन, सन्तान, स्त्री, यश, आरोग्य, पद-प्राप्ति, रोग-निवारण, शत्रु नाश, पाप-नाश, वशीकरण आदि लाभों का वर्णन है और संकेत रूप से उन साधनाओं का एक अंश बताया गया है। परन्तु यह भले प्रकार स्मरण रखना चाहिये कि इन संक्षिप्त संकेतों के पीछे एक भारी कर्मकाण्ड एवं विधि-विधान है। वह पुस्तकों में नहीं वरन् अनुभवी, साधना सम्पन्न व्यक्तियों से प्राप्त होता है।

तन्त्र ग्रन्थों से संग्रह करके कुछ संकेत आगे के पृष्ठों पर दिये जाते हैं, जिससे पाठकों को गायत्री द्वारा मिल सकने वाले महान् लाभों का थोड़ा-सा परिचय प्राप्त हो जाय।



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