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Books - गोपनीय गायत्री तंत्र

Media: TEXT
Language: HINDI
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अथ गायत्री तन्त्रम्

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नारद उवाच—

       नारायण महाभाग गायत्र्यास्तु समन्वितः ।
          शान्त्यादिकान्प्रयोगांस्तु वदस्व करुणानिधे !

अर्थात्  नारदजी ने प्रश्न किया—हे नारायण! गायत्री के शान्ति आदि के प्रयोगों को कहिये।

नारायण उवाच—

     अति गुह्यमिदं पृष्टंत्वया ब्रह्मतनूद्भव ?
        न कस्यापि वक्तव्यं दुष्टाय पिशुनाय च ।।

अर्थात्   यह सुनकर श्री नारायण ने कहा कि हे नारद। आपने अत्यन्त गुप्त बात पूछी है, परन्तु यह किसी दुष्ट या पिशुन (छलिया) से नहीं कहनी चाहिये।

              अथ शान्तिर्यथोक्ताभिः समिद्भिर्जुहुयात्द्विजः ।
           शमी समिद्भिः शाम्यन्ति भूत राग ग्रहादयः ।।

अर्थात्   द्विजों को शान्ति प्राप्त करने के लिये हवन करना आवश्यक है तथा शमी की समिधाओं से हवन करने पर भूत रोग एवं ग्रहादि की शान्ति होती है।

               आर्द्राभिः क्षीर वृक्षस्य समिद्भिः जुहुयात्द्विजः ।
        जुहुयाच्छकलैर्वापि भूत रोगादि शान्तये ।।

अर्थात्   दूध वाले वृक्षों की आर्द्र समिधाओं से हवन करने पर ग्रहादि की शान्ति होती है। अतः भूत रोगादि की शान्ति के लिये सम्पूर्ण प्रकार की समिधाओं से हवन करना आवश्यक है।

            जलेन तर्पयेसूर्यं पाणिभ्यां शान्तिमाप्नुयात् ।
                जानुदघ्ने छले जप्त्वा सर्वान् दोषाञ्छमं नयेत् ।।

अर्थात्   सूर्य का हाथों द्वारा जल से तर्पण करने पर शान्ति मिलती है तथा घुटनों पर्यन्त पानी में स्थिर होकर जपने से सब दोषों की शान्ति होती है।

                 कण्ठदघ्न जले जप्त्वा मुच्येत् प्राणान्तकाद्भयात् ।
                  सर्वेभ्यः शान्ति कर्मेभ्यो निमज्याप्सु जपःस्मृतः ।।

अर्थात्  कण्ठ पर्यन्त जल में खड़ा होकर जप करने से प्राणों के नाश होने का भय नहीं रहता, इसलिये सब प्रकार की शान्ति प्राप्त करने के लिये जल में प्रविष्ट होकर ही जप करना श्रेष्ठ है।

    सौवर्णे राजते वापि पात्र ताम्रमयेऽपि वा ।
     क्षीरवृक्षमयं वापि निर्वृणे मृन्मगेऽपि वा ।।
    सहस्रंपञ्च-गव्येन हुत्वा सुज्वलितेऽनले ।
      क्षीरवृक्षमयैः काष्ठैः शेषं सम्पादयेत्छनैः ।।

अर्थात्  सुवर्ण, चांदी, तांबा, दूध वाले वृक्ष की लकड़ी से बने या छेद रहित मिट्टी के बर्तन में पञ्चगव्य रखकर दुग्ध वाले वृक्ष की लकड़ियों से प्रज्वलित अग्नि में हवन करना चाहिये।

           प्रत्याहुतिं स्पृशञ्जप्त्वा सहस्रं पात्रसंस्थिताम् ।
  तेन तं प्रोक्षयेद्देशं कुशैमन्त्रमनुस्मरन् ।।

अर्थात्  प्रत्येक आहुति में पंचगव्य का स्पर्श करना चाहिये तथा मन्त्रोच्चारण करते हुए कुशाओं द्वारा पंचगव्य ही से सम्पूर्ण स्थान का मार्जन करना चाहिये।

         बलिं किरंस्ततूस्तमिस्मन्ध्यायेत् परदेवताम् ।
       अभिचार समुत्पन्ना कृत्या पापं च नश्यति ।।

अर्थात्  पश्चात् बलि प्रदान कर देवता का ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार ध्यान करने से अभिचारोत्पन्न कृत्या की शान्ति होती है।

 देव भूत पिशाचाद्या यद्येवं कुरुते वशे ।
 गृहं ग्रामं पुरं राष्ट्रं सर्वतेभ्यो विमुच्यते ।।

अर्थात्  देवता, भूत और पिशाच आदि को वश में करने के लिये भी उपरोक्त कही हुई विधि करनी चाहिये। इस प्रकार की क्रिया के देवता, भूत तथा पिशाच सभी अपना-अपना घर, ग्राम, नगर और राज्य छोड़कर वश में हो जाते हैं।

        निखनेन्मुच्यते तेभ्यो निखनेन्मध्यतोऽपि च ।
       मण्डले शूलमालिख्य पूर्वोक्ते च क्रमेऽपि वा ।।
    अभिमन्त्र्य सहस्रं तन्निखनेत्सर्व शान्तये ।।

अर्थात्  चतुष्कोण मण्डल में गन्ध से शूल लिखकर और पूर्वोक्त विधि द्वारा सहस्र गायत्री का जप कर गाढ़ देने पर सब प्रकार की सिद्धि मिलती है।

 सौवर्ण, राजतं वापि कम्भं ताम्रमयं च वा ।
 मृन्मयं वा नवं दिव्य सूत्रवेष्टितमब्रणम् ।।
  मण्डिले सैकते स्थाप्य पूरयेन्मन्त्रविज्जलै ।
           दिग्भ्य, आदृत्य तीर्थानि चतसृभ्यो द्विजोत्तमैः ।।

अर्थात्  सोना चांदी, तांबा, मिट्टी आदि में से किसी एक का छेद रहित घड़ा लेकर सूत्र से ढककर बालुयुक्त स्थान में स्थापित कर श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा चारों दिशाओं से लाये हुए जल से भरे।

      एला, चन्दन, कर्पूर, जाती, पाटल, मल्लिकाः ।।
     विल्वपत्रं तथा क्रान्तां, देवीं ब्रीहि यवांस्तिलान् ।
   सर्पपान् क्षीर वृक्षाणां प्रवालानि च निक्षिपेत् ।।

अर्थात्  इलायची, चन्दन, कपूर, जाती, पाटल, बेला, बिल्व-पत्र, विष्णुक्रान्ता, देवी (सहदेई), जौ, तिल, सरसों और दुग्ध निकलने वाले वृक्षों के पत्ते लेकर उसमें छोड़े।

सर्वाण्यभिविधायैवं कुश कूर्च समन्वितम् ।
   स्नातःसमाहितो विप्रः सहस्रं मन्त्रयेद्बुधः ।।

अर्थात्  इस प्रकार सबको छोड़कर कुशा की कूंची बनाकर तथा उसे भी घड़े में छोड़कर स्नान करके एक हजार बार मन्त्र का जप करना चाहिये।

      दिक्षु सौरनिधीयारान् मंत्रान विप्रास्त्रयीविदः ।
प्रोक्षयेत्पापयेदेनं तीरं तेनाभिसिंचयेत् ।।

अर्थात्  धर्मादि के ज्ञाता ब्राह्मण द्वारा मन्त्रों से पूतीकृत इस जल से भूत आदि की बाधा से पीड़ित पुरुष के ऊपर मार्जन करे तथा पिलावे तथा गायत्री मन्त्र के साथ इसी जल से अभिसिंचन करे।

     भूत रोगाभिचारेभ्यः स निर्मुक्तः सुखी भवेत् ।
अभिषेकेण मुच्येत मृत्योरास्यगतोनरः ।।

अर्थात्  इस प्रकार अभिसिंचन करने पर मरणासन्न हुआ मनुष्य भी भूत-व्याधि से मुक्त होकर सुखी हो जाता है।

         गुडूच्याः पर्व विच्छिन्नः पयोक्ता जुहुयात्द्विजः ।
  एवं मृत्युंजयो होमः सवं व्याधिविनाशनः ।।

अर्थात्  जो द्विज गुर्च (गिलोय) की समिधाओं को दूध में डुबा डुबाकर हवन करता है, वह सम्पूर्ण व्याधाओं से विनर्मुक्त होता है।

  आम्रस्य जुहुयात्पत्रैः पयोक्तैःर्ज्वरशान्तये ।

अर्थात्  ज्वर की शान्ति के हेतु दूध में डाल-डालकर आम्र-पत्तों से हवन करना चाहिये।
      वचाभिः पयसिक्ताभिः क्षयं हुत्वा विनाशयेत् ।
मनुत्रितय होमेन राजयक्ष्मा विनश्यति ।।

अर्थात्  दुग्ध में बच को अभिसिक्त कर हवन करने से क्षय रोग विनष्ट होता है तथा दुग्ध, दधि एवं घृत इन तीनों का अग्नि में हवन करने से राजयक्ष्मा का विनाश होता है।

 निवेद्य भास्करायान्नं पयसं होमं पूर्वकम् ।
           राजयक्ष्माभिभूतं च प्राशवेञ्छान्तिमाप्नुयात् ।।2।।

अर्थात्  दूध की खीर बनाकर सूर्य को अर्पण करे तथा इस हवन से शेष बची हुई खीर को राजयक्ष्मा के रोगी को सेवन करावे तो रोग की शान्ति होती है।

   कुसुमैः शङ्खवृक्षस्य हुत्वा कुष्ठं विनाशयेत् ।
    अपस्मार विनाशः स्तादपामार्गस्य तण्डुलैः ।।

अर्थात्  शङ्ख वृक्ष (कोडिला) के पुष्पों से यदि होम किया जाय तो कुष्ठ रोग विनाश होता है तथा अपामार्ग के बीजों से हवन करने पर अपस्मार रोग का विनाश होता है।

 क्षीरवृक्ष समिद्धोमादुन्मादोऽपि विनश्यति ।
औदुम्बर समिद्धोमादति मेह क्षयं व्रजेत् ।।

अर्थात्  क्षीर वृक्ष की समिधाओं से हवन करने पर उन्माद रोग नहीं रहता तथा औदुम्बर (गूलर) की समिधाओं से हवन किया जाय तो महा प्रमेह विनष्ट होता है।

मनसैव जपेदनां बद्धो मुच्चेत् बन्धनात् ।।

अर्थात्  बन्धन में ग्रसित मनुष्य गायत्री मन्त्र का मन में ही जाप करने पर बन्धन-मुक्त हो जाता है।

         भूत रोग विषादिभ्यः स्पृशन् जप्त्वा विमोचयेत् ।
        भूतादिभ्यो विमुच्यते जलं पीत्वाभिमन्त्रितम् ।।

अर्थात्  भूत रोग तथा विष आदि से व्यथित पुरुष को गायत्री मन्त्र जपना चाहिये। कुश के जल को स्पर्श करता हुआ गायत्री मन्त्र का जप करे। फिर इस जल को भूत, प्रेत, तथा पिशाच आदि की पीड़ा से पीड़ित मनुष्य को पिला दिया जाय तो वह रोगमुक्त हो जाता है।

   अभिमन्त्र्य शतं भस्मन्यसद्भूतादि शान्तये ।
  शिरसा धारयेद्भस्म मंत्रयित्वा तदित्यृचा ।।

अर्थात्  गायत्री मन्त्र से अभिमन्त्रित भस्म लगाने से भूत प्रेत को शान्ति होती है। मन्त्र का उच्चारण करते हुए अभिमन्त्रित भस्म को पीड़ित पुरुष के मस्तक और शिर में लगाना चाहिये।

          अथ पुष्टिं श्रियं लक्ष्मी पुष्पै र्हुत्वाप्नुयात्द्विजः ।
          श्री कामो जुहुयात् पद्मैः रक्तैः श्रियमवाप्नुयात् ।।

अर्थात्  लक्ष्मी की आकांक्षा वाले पुरुष को गायत्री मन्त्रोच्चारण के साथ पुष्पों से हवन करना चाहिये। श्री और सौन्दर्य की कामना वाले पुरुष को रक्त कमल के फूलों से हवन करने पर श्री की प्राप्ति होती है।

  शतं शतं च सप्ताहं हुत्वा श्रियमवाप्नुयात् ।
   लाजैस्तु मधुरोपेतैर्होमे कन्य मवाप्नुयात् ।।

अर्थात्  मधुत्रय मिलाकर लाजा से सात दिन तक सौ-सौ आहुतियां देकर हवन करने पर सुन्दर कन्या की प्राप्ति होती है।

      अनेन विधिना कन्या वरमाप्नोति वाच्छितम् ।

अर्थात्  इस विधि से होम करने पर कन्या अति सुन्दर और अभीष्ट वर की प्राप्ति करती है।

निवेद्यभास्करायान्नं पायसं होमपूर्वकम् ।
भोजयेत्तदृतुस्नातां पुत्रं परमवाप्नुयात् ।।

अर्थात्  सूर्य को होमपूर्वक पायस अर्पण करके ऋतुस्नान की हुई स्त्री को भोजन कराने से पुत्र की प्राप्ति होती है।

स प्ररोहाभिरार्द्राभिर्हूत्वाआयुरवाप्नुयात् ।
    समाद्भिः क्षीरवृक्षस्य र्हुत्वायुषमवाप्नुयात् ।।

अर्थात्  पलास की समिधा से होम करने पर आयु की वृद्धि होती है। क्षीर वृक्ष की समिधा से हवन किया जाय तो भी आयु-वृद्धि होती है।

      हुत्वा पद्मशतं मासं राज्यमाप्नोत्यकण्टकम् ।
        यवागूं ग्राममाप्नोति हुत्वा शालिसमन्वितम् ।।

अर्थात्  एक मास पर्यन्त यदि कमल से हवन किया जाय तो राज्य की प्राप्ति होती है। शालि से युक्त यवांगु (हलुआ) से हवन किया जाय तो ग्राम की प्राप्ति होती है।

     अश्व थ समिधो हुत्वा युद्धादौ जयमाप्नुयात् ।
    अर्कस्य समिधी हुत्वा सर्वत्र विजयी भवेत् ।।

अर्थात्  पीपल की समिधाओं से हवन करने पर युद्ध में विजय प्राप्ति होती है। आक की समिधाओं से हवन करने पर सर्वत्र ही विजय होती है।

संयुक्तैः पयसापत्रैः पुष्पैर्वा वैतसंस्य च ।
       पायसेन शतं हुत्वा सप्ताहं वृष्टिमाप्नुयात् ।।

अर्थात्  वेत-वृक्ष के फूलों से अथवा पत्र मिलाकर खीर से हवन करने पर वृष्टि होती है।

         नाभिदघ्ने जले जपत्वा सप्ताहं वृष्टिमाप्नुयात् ।
    जले भस्म शतं हुत्वा महावृष्टि निवारयेत् ।।

अर्थात्  नाभि पर्यन्त जल में खड़े होकर एक सप्ताह तक गायत्री जपने से वृष्टि होती है और जल में सौ बार हवन करने से अति वृष्टि का निवारण होता है।

     पयोहुत्वाप्नुयान्मेधामाज्यं बुद्धिमवाप्नुयात् ।
       अभिमन्त्रयपि वेद्ब्राह्मंरसं मेधामवाप्नुयात् ।।

अर्थात्  दूध का हवन करने से तथा घृत की आहुतियां देने से बुद्धि-वृद्धि होती है। मन्त्रोच्चारण करते हुए ब्राह्मी के रस का पान करने से चिर-ग्राहिणी बुद्धि होती है।

अथ चारुविधिर्मासं सहस्रं प्रत्यहं जपेत् ।
      आयुष्कामः शुचौ देशे प्राप्नुयादायुरुत्तमय् ।।

अर्थात्  उचित रीति से प्रतिदिन एक सहस्र जप एक मास तक करने से आयु की वृद्धि होती है तथा बल बढ़ता है तथा यह दीर्घायु और बल उत्तम देश में प्राप्त होता है।

   मास शतत्रयं विप्रः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।
    एवं शतोत्तरं जप्त्वा सहस्रं सर्वमाप्नुयात् ।।

अर्थात्  इसी प्रकार एक मास तक 300 मंत्र प्रतिदिन जाप करने पर सब कार्यों में सिद्धि प्राप्त करता है। इसी प्रकार ग्यारह सौ नित्य जपने से सब कार्य ही सम्पन्न हो जाते हैं।

एक पादो पजेदूर्ध्व बाहुरुद्धानिलं वशः ।
         मासं शतमावाप्नोति यदिच्छेदिति कौशिकः ।।

अर्थात्  आकाश की ओर भुजाएं उठये हुए एक पैर के ऊपर खड़ा होकर सांस को यथा शक्ति अवरोध कर एक मास तक 100 मन्त्र प्रतिदिन जपने से अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है।

        नक्तमश्नन्हविध्यान्नं वत्सरादृषिताभियात् ।
       गीरमोधा भवेदेन जप्त्वासम्वत्सर द्वयम् ।।

अर्थात्  इसी प्रकार एक पैर पर खड़ा होकर रात्रि में हविष्यान्न खाकर एक सप्ताह तक जप करने से मनुष्य ऋषि हो जाता है। इसी प्रकार दो वर्ष तक जप करने से वाणी अमोघ होती है।

त्रिवत्सरं जपेदेवं भवेत्त्रैकालदर्शनम् ।
        आयाति भवगांदेवश्चतुः सम्वत्सरं जपेत् ।।

अर्थात्  तीन वर्ष तक इसी विधि के अनुसार जप करने से मनुष्य त्रिकालदर्शी हो जाता है और यदि चार वर्ष तक इसका जाप उक्त विधि से किया गया तो भगवान ही निकट आ जाते हैं।

        मुच्येरन्नंहसः सर्व महापातकिनो द्विजाः ।
           त्रिसहस्रं जपेन्मासं प्राणायामभ्य वाग्मतः ।।

अर्थात्  शुद्ध होकर प्राणायाम करके 3000 मन्त्र एक मास तक जपने से महान् पातक से भी छूट जाता है।

    अगम्यागमनस्तेय हननाभक्ष भक्षणे ।
               दश सहस्रंमभ्यस्त गायत्री शोधयेत् द्विजम् ।।

अर्थात्  अगम्य स्थान में गमन करना, चोरी, मारना, अभक्ष वस्तु का भक्षण कर लेना, इन दोषों के मिटाने निमित्त दस हजार गायत्री का जप करना चाहिए। इससे द्विज की शुद्धि होती है।

             सहस्रमभ्यसेन्नमासं नित्य जापो वने वसन् ।
       उपवास समंजप्य त्रिसहस्रं तदित्यृचः ।।

अर्थात्  वन में बस कर हजार जप करता हुआ एक मास तक ठहरे इससे सभी किल्विष दूर होते हैं। तीन हजार जप करने से एक उपवास के समान पुण्य मिलता है।

           चतुर्विंशति साहस्रमभ्यस्ता कृच्छ्र संज्ञिता ।
              चतुष्पाष्टिः सहस्राणि चान्द्रायण समानितु ।।

अर्थात्  चौबीस सहस्र का जप करने से एक कृच्छ के समान और चौंसठ सहस्र का फल एक चान्द्रायण व्रत के समान होता है।

         आचारः प्रथमो धर्मो धर्मस्य प्रभुरीश्वरी ।
             इत्युक्तः सर्व शास्त्रेषु सदाचार फलं महत् ।।

अर्थात्  आचार को प्रथम धर्म कहा है तथा धर्म की स्वामिनी देवी को कहा है। यही सम्पूर्ण शास्त्रों में बतलाया गया है कि सदाचार के समान कोई भी वस्तु महान् फलदायिनी नहीं है।

       आचारवान्सदापूतः सदैवाचारवान्सुखी ।
             आचारवान्सदा धन्यः सत्यं सत्यं च नारद ।।

अर्थात्  सदाचारी पुरुष सदा पवित्र और सदा सुखी होता है। नारद! इसमें असत्य नहीं कि सदाचार युक्त पुरुष धन्य होता है।

       देवी प्रसाद जनकं सदाचार विधानकम् ।
                   यद्यपि श्रुगुयान्मर्त्यो महासम्पति सौख्यभाक् ।।

अर्थात्  जो देवी के प्रसाद सदाचार विधि को सुनता और सुनाता है वह सब प्रकार से धनी होता है।

        जप्यं त्रिवर्ग संयुक्तं गृहस्थेन विशेषतः ।
               मुनिनां ज्ञान सिद्ध्यर्थं यतीनां मोक्षसिद्धये ।।

अर्थात्  विशेषतः जप करने वाले गृहस्थों को त्रिवर्ग की प्राप्ति होती है। मुनियों को ज्ञान सिद्धि तथा यतियों को मोक्ष की सिद्धि होती है।

            सव्याहृतिका सप्रणवां गायत्री शिरसा सह ।
                  ये जपन्ति सदा तेषां न भयं विद्यते क्वचित् ।।

अर्थात्  जो मनुष्य प्रणव, व्याहृति तथा शिर सहित गायत्री मन्त्र का जाप करते हैं, उनको कहीं पर भी भय नहीं होता।

                      अभीष्ट लोकमवाप्नोति प्राप्नुयात्काममीप्सितम् ।
           गायत्री वेद जननी गायत्री पाप नाशिनी ।।

अर्थात्  गायत्री वेदों की माता एवं पाप नाश करने वाली है। अतः गायत्री की उपासना करने वाला मनुष्य इच्छित लोकों को प्राप्त करता है।

                सावित्री जाप्य निरतः स्वर्गमाप्नोति मानव ।
                 गायत्री जाप्य निरतो मोक्षोपायं च विन्दति ।।

अर्थात्  गायत्री जपने वाला पुरुष स्वर्ग को प्राप्त करता है और मोक्ष को भी प्राप्त करता है।

             तस्मात्सर्व प्रयत्नेन स्नानः प्रयतमानसः।
          गायत्रीं जपेद्भक्त्या सर्वपापप्रणाशिनी ।।

अर्थात्  इस कारण से समस्त प्रयत्नों द्वारा स्नान कर स्थिर चित्त हो सर्व पाप नाश करने वाली गायत्री का जप करे।

         सर्वकामप्रदा चैव सावित्री कथिता तत् ।
              अभिचारेषु तां देवी विपरीतां विचन्नयेत् ।।

अर्थात्  यह सर्व कामों की मनोभिलाषाओं की प्रदायिनी सावित्री कही गई है इसके अभिचार में विपरीत चिन्तन करना चाहिए।

              कार्या व्याहृतयश्चात्र विपरीता क्षरास्तथा ।
             विपरीताक्षरं कार्य शिरश्च ऋषिसत्तम ।।

अर्थात्  यहां विपरीताक्षर व्याहृतियों का उच्चारण करना चाहिए। हे ऋषि श्रेष्ठ! इसके शिर अक्षर को भी विपरीत करना चाहिये।

                 आदौ शिरः प्रयोक्तव्यं प्रणवोऽन्तेन वै ऋषे ।
                   मतिस्थेनेव फट्कारं मघ्य नाम प्रकीर्तितम् ।।

अर्थात्  प्रारम्भ में शिर का प्रयोग करना चाहिये तथा प्रणव को अन्त में उच्चारण करना चाहिये और फट्कार को मध्य में प्रयुक्त करे।

                गायत्री चिन्तयेत्तत्र दीप्तानलसमप्रभाम् ।
                   घातयन्ती त्रिशूलेन केशेष्वाक्षिप्यवैरिणम् ।।

अर्थात्  प्रज्वलित अग्नि की आभा के समान आभा वाली गायत्री देवी को चिन्तन करे और ऐसा ध्यान करे कि वह शत्रुओं के केशों को पकड़ कर अपने त्रिशूल द्वारा उनका घात कर रही है।

                  एवं विधा च गायत्री जप्तव्या राजसत्तम ।
                     होतव्या च यथा शक्त्या सर्वकामसमृद्धिदा ।।

अर्थात्  सकल कामनाओं की देने वाली गायत्री को इस प्रकार जपना चाहिए और शक्ति के अनुसार होम करना चाहिए।

                   निर्दहन्ती त्रिशूलेन भ्रकुटी भूषिता नमाम् ।
                        उच्चाटने तु तां देवीं वायु भूमां विचिन्तयेत् ।।

अर्थात्  अपने शूल से दहन करती हुईं तथा चढ़ी हुई भृकुटी से सुशोभित मुख मण्डल वाली उस वायु भूत देवी को उच्चाटन काल में चिन्तन करे।

                  धावमानं तथा साध्यं तस्माद्देशात्तुदूरतः ।
                     अभिचारेषु होतव्या राजिका विषमिश्रिताः ।।

अर्थात्  धावमान तथा साध्य को उस देश से दूर से ही अभिचार में विष मिश्रित होम करना चाहिए।

                    स्वरक्त मिश्रं होतव्यं, कटु तैल मथापि वा ।
                     तत्राऽपि च विषं देयं होम काले प्रयत्नतः ।।

अर्थात्  अपने रक्त को कड़वे तेल में मिलाकर तथा उसमें विष मिलाकर यत्न पूर्वक होम काल में देना चाहिये।

                  महापराधं बलिनं देव ब्राह्मण कण्टकम् ।
                      अभिचारेण यो हन्यान्न स दोषेण लिप्यते ।।

अर्थात्  महान् अपराध करने वाले बलवान को तथा देव और ब्राह्मण को कष्ट देने वाले को जो हनन करे उसे दोष नहीं लगता।

                       बहुना कण्टवं यस्तु पापात्मानं सदुर्म्मतिम् ।
                           हन्यात्प्राप्तापराधन्तु तस्य पुण्य फलं महत् ।।

अर्थात्  जो पापात्मा तथा दुर्मति अनेकों के मार्ग में कण्टक बना हुआ है, उस अपराधी के हनन करने वाले को महान् पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

गायत्री तन्त्र के अन्तर्गत कुछ थोड़े से प्रयोगों का संकेत ऊपर किया गया है, इन प्रयोगों के जो सुविस्तृत विधि-विधान, कर्मकाण्ड एवं नियम-बन्धन हैं, उनका उल्लेख यहां न करना ही उचित है, क्योंकि तन्त्र के गुह्य विषय को सर्व साधारण के सम्मुख प्रकट करने से सार्वज्निक सुव्यवस्था में बाधा उपस्थित होने की आशंका रहती है।



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इन्द्रिय संयम
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प्रज्ञा परिजनों में नव जीवन संचार
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