गायत्री अभिचार
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मनुष्य एक अच्छा खासा बिजलीघर है। उसमें उतनी उष्णता एवं विद्युत शक्ति होती है कि यदि उस सब का ठीक प्रकार उपयोग हो सके तो एक द्रुत वेग से चलने वाली तूफान मेल रेलगाड़ी दौड़ सकती है, जो शब्द मुख में से निकलते हैं, वे अपने साथ एक विद्युत प्रवाह ले जाते हैं। फलस्वरूप उनके द्वारा सूक्ष्म जगत् में कम्पन उत्पन्न होते हैं और उन कम्पनों द्वारा अन्य वस्तुओं पर प्रभाव पड़ता है। देखा गया है कि कोई वक्ता अपनी वक्तृता के साथ-साथ ऐसी भाव विद्युत का संमिश्रण करते हैं कि सुनने वालों का हृदय हर्ष, विषाद, क्रोध, त्याग आदि से भर जाता है। वह अपने श्रोताओं को उंगलियों पर नचाता है। देखा गया है कि कई उग्र वक्ता भीड़ को उत्तेजित करके उससे भयंकर कार्य करा डालते हैं। कभी किसी-किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के भाषण इतने प्रभावपूर्ण होते हैं कि उससे समस्त संसार में हल-चल मच जाती है।
आकाश के ऊंचे स्तर पर बर्फ का चूर्ण हवाई जहाजों से फैलाकर वैज्ञानिकों ने तुरन्त वर्षा कराने की विधि ढूंढ़ निकाली है। इसी कार्य को प्राचीन काल में शब्द विज्ञान द्वारा, मन्त्रबल से किया जाता था। उस समय भी उच्चकोटि के वैज्ञानिक मौजूद थे, पर उनका आधार वर्तमान आधार से भिन्न था। उनके लिए उन्हें मशीनों की जरूरत न पड़ती थी, इतनी खर्चीली खट-पट के बिना भी उनका काम चल जाता था। आज स्थूल से सूक्ष्म को प्रभावित करके तब वह शक्ति उत्पन्न की जाती है, जिससे आविष्कारों का प्रकटीकरण होता है। आज कोयला, तेल और पानी से शक्ति पैदा की जाती है। परमाणु का विस्फोट करके शक्ति उत्पन्न करने का अब नया प्रयोग सफल हुआ है। अमेरिकन साइंस एकेडेमी के प्रधान डॉक्टर ‘एविड’ का कहना है कि आगामी तीन सौ वर्षों के भीतर विज्ञान इतनी उन्नति कर लेगा कि बाहरी किसी वस्तु की सहायता के बिना मानव शरीर के अन्तर्गत रहने वाले तत्वों के आधार द्वारा सूक्ष्म जगत् में हल-चल पैदा की जा सकेगी और यह लाभ आजकल मशीनों द्वारा मिलते हैं, वे शब्द आदि के प्रयोग द्वारा ही प्राप्त किये जा सकेंगे।
डॉक्टर एविड भविष्य में जिस वैज्ञानिक उन्नति की आशा करते हैं, भारतीय वैज्ञानिक किसी समय उसमें पारंगत हो चुके थे। शाप और वरदान देना इसी शब्द विज्ञान की चरम उन्नति थी। शब्द का आघात मार कर प्रकृति के अन्तराल में भरे हुए परमाणुओं को इस प्रकार आकर्षित-विकर्षित किया जाता था कि मनुष्य के सामने वैसे ही भले बुरे परिणाम आ उपस्थित होते थे। जैसे आज विशेष प्रक्रियाओं द्वारा, मशीनों की विशेष गति-विधि द्वारा विशेष कार्य किये जाते हैं। पर प्राचीन काल में अपने आपको एक महा शक्तिशाली यन्त्र मानकर उसी के द्वारा ऐसी शक्ति उत्पन्न करते थे, जिसके द्वारा अभीष्ट फलों को चमत्कारिक रीति से प्राप्त किया जा सकता था। वह प्रणाली, साधना, योगाभ्यास, तपश्चर्या, यन्त्र आदि नामों से पुकारी जाती है। इन प्रणालियों के भोग, जप, होम, पुरश्चरण, अनुष्ठान, तप, व्रत, यज्ञ, पूजन, पाठ आदि होते थे। विविध प्रयोजनों के लिए विविध कर्मकाण्ड थे। हवन में होमी जाने वाली सामग्रियां, मन्त्रों की ध्वनि, ध्यान का मानसिक आकर्षण, स्तोत्र और प्रार्थनाओं द्वारा आकांशा प्रदीप्ति विशेष प्रकार के आहार-विहार द्वारा मनःशक्तियों का विशेष प्रकार का निर्माण, तपश्चर्याओं द्वारा शरीर में विशेष प्रकार की उष्णता का उत्पन्न होना, देव पूजा द्वारा प्रकृति की सूक्ष्म शक्तियों को खींचकर अपने में धारण करना आदि प्रकारों से साधक अपने आपको एक ऐसा विद्युत पुंज बना लेता था कि उसका प्रवाह जिस दिशा में चल पड़े उस दिशा के प्रकृति के परमाणुओं पर उसका आधिपत्य हो जाता था और उस प्रक्रिया द्वारा अभीष्ट परिणाम प्राप्त होते थे।
बिना मशीन के चलने वाले जिन अद्भुत दिव्य अस्त्रों का भारतीय इतिहास में वर्णन है उनमें आग्नेयास्त्र भी एक था। इससे आग लगाई जाती थी, जल, आंधी या तूफान पैदा किया जाता था। व्यक्तिगत प्रयोगों में इससे किसी व्यक्ति विशेष पर प्रयोग करके उसकी जान तक लेली जाती थी। अग्निकाण्ड कराये जाते थे। इसे तान्त्रिक काल में ‘अगीया बैताल’ कहा जाता था। इसका प्रयोग गायत्री मन्त्र द्वारा भी होता था जिसका कुछ संकेत नीचे के प्रमाणों में वर्णित है। उलटी गायत्री को ‘अनुलोप जप’ कहते हैं। यही आग्नेयास्त्र है।
‘त् या द चो प्र नः यो यो धि । हि म धी स्य व दे र्गो भ ण्यं रे र्व । तु वि त्स त स्वः वः र्भु भूः ॐ ।
यह मन्त्र आग्नेयास्त्र है। इस विद्या का कुछ परिचय नीचे देखिए—
आग्नेयास्त्रस्त जानाति विसर्गादान कर्मणि ।
यः पुमान् गुरुणा शिष्टस्तस्याधीनं जगत्त्रयम् ।।
अर्थात् यः पुरुष इन आग्नेयास्त्र के छोड़ने तथा खींचने की विधि को जानता है और जो गुरु द्वारा शिक्षित है उसके अधिकार में त्रैलोक्य है।
आग्नेयास्त्राधिकारी स्यात्विधानमुदीर्यते ।
आग्नेयास्त्रमिति प्रोक्त विलोम पठितो मनुः ।।
अर्थात् और वह आग्नेयास्त्र का अधिकारी हो जाता है। अब आग्नेयास्त्र की प्रयोग विधि कहते हैं। आग्नेयास्त्र प्रतिलोम और अनुलोम दो प्रकार से कहा गया है।
अर्चनं पूर्ववत्कुर्त्याच्छक्तिस्तु प्रतिलोमतः ।
सर्वत्र देशिकः कुर्यात् गायत्र्या द्विगुणं जपम् ।।
अर्थात् प्रतिलोमता से शक्तियों का पूजन करे और सर्वत्र गायत्री का दूना जप करे।
क्ररकर्माणि कुर्वीत प्रतिलोमधानतः ।
शान्तिकं पौष्टिकं कर्म, कर्त्तव्य अनुलोमतः ।।
अर्थात् प्रतिलोम के विधान से जपादि क्ररकर्मों की सिद्धि के लिए करे और शान्तिमय एवं पुष्टिदायक कर्मों की सिद्धि के लिए अनुलोम के विधान से करे।
उपरोक्त विधि एक संकेत मात्र है। उसके साथ में एक विस्तृत कर्मकांड एवं गुप्त साधना-विधि है। उस सब का रहस्य गुप्त ही रखा जाता है क्योंकि उन बातों का सार्वजनिक प्रकटीकरण करना सब प्रकार निषिद्ध है।

