मैं संतों की जाति का हूँ
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किसी अवसर पर एक व्यक्ति ने नानक जी से प्रश्न किया, ‘‘आपकी जाति कौन- सी है?’’ उन्होंने उत्तर दिया- ’’मैं संतों के समुदाय का हूँ। मेरी जाति वही है, जो वायु और अग्नि की है। मैं वृक्षों और पृथ्वी की तरह जीवन यापन करता हूँ और उन्हीं की तरह काटे जाने और खोदे जाने को तैयार रहता हूँ। नदी की तरह मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं कि कोई मेरे ऊपर फूल चढ़ाता है या गंदगी फेंकता है। चंदन की तरह उसी को जीवित समझता हूँ, जिससे सुगंध निकलती रहती हो।’’
मक्का की यात्रा के अवसर पर किसी ने पूछा कि ‘‘हिंदू और मुसलमान में कौन बड़ा है?’’ तो नानक जी ने जवाब दिया- "बड़ा वह है, जो भलाई का काम करता रहता है और जिसका ध्यान परमात्मा की तरफ रहता है। बिना अच्छे कर्मों के हिंदू हो या मुसलमान दोनों को रोना पड़ेगा।’’ जब यह पूछा गया कि जाग्रत् कौन है? तो उन्होंने कहा- ‘‘जो परमात्मा को अपने चारों ओर देखता है और माया में नहीं फँसता उसी को जगा हुआ समझो। ऐसे व्यक्ति की पहिचान यह है कि उसका हृदय सदा दया और सहानुभूति से ओत- प्रोत रहता है।’’
यह सत्य है कि गुरू नानक के निकट हिंदू- मुसलमान का अंतर नहीं था और वे इन दोनों को ही नहीं, मनुष्य मात्र को चाहे वह किसी धर्म, वर्ण या जाति का हो, प्रेम की दृष्टि से देखते थे। इसका परिणाम यह था कि उस मुसलमानी शासन के जमाने में जबकि हिंदू जाति की बुरी हालत की जा रही थी, मुसलमान भी उनका आदर करते थे। स्वयं बाबर बादशाह उनके परोपकारी जीवन से प्रभावित होकर दर्शन करने आया था और अन्य भी सैकड़ों मुसलमान उनके शिष्य बनकर उपदेश सुनने आया करते थे। वे सब अपने घरों में अपनी संप्रदाय के अनुसार ही चलते थे, पर गुरु नानक से ईश्वर भक्ति, सेवा, परोपकार की शिक्षा ग्रहण करके
अपने जीवन को पवित्र बनाते थे। यही कारण है कि वे हिंदू होने पर भी नानक जी को अपना भी सच्चा हितैषी और प्रेम करने वाला समझते थे और जब आश्विन शुक्ल१० संवत् १५९५ (सन् १५३८) को गुरू जी का अंत समय आया तो उन्होंने जोरों से नारा लगाया-
नानक शाह फकीर।
हिंदू का गुरू मुसलमान का पीर।
पर इतना होने पर भी नानक जी को अपने धार्मिक सिद्धांतों की प्रेरणा हिंदू- शात्रों से ही मिली, जैसा उनकी अधिकांश वाणियों और गुरू ग्रंथ साहब से विदित होता है। इसका एक कारण यह भी था कि अन्य मजहबों नेधर्मशात्रों में ईश्वर, जीव- प्रकृति, सृष्टि- रचना; कर्मफल, पुनर्जन्म आदि की समस्याओं पर इतनी गहराई से विचार भी नहीं किया गया है। हिंदू शास्त्रकारों ने तो इस संबंध में अनेक पहलुओं से इतने विस्तार के साथ विचार किया है कि एक बड़े विद्वान् से लेकर मामूली अनपढ़ ग्रामीण तक को उसमें अपने योग्य सामग्री मिल जाती हैं। नानक जी ने ईश्वर को समस्त सम्राटों का भी सम्राट बतलाते हुए उसकी प्रशंसा में कहा-
सो दरु केहा सो घर केहा जित वहि सरव समाले।
बाजे नाद अनेक असंखा केते गावण हारे। ।।
गावहि तुहिनो, पवणु, पाणी वैसंतरू गावैराजा धरम दुआरे।
गावहि चित्तगुपुत लिखि जाणहि लिख- लिख धरम विचारे। ।।
गावहि ईसरु वरमा देवी सोहनि सदा सँवारे।
गावहि इंदु इंद्रासणि बैठे देवतिया दरि नाले।
गावहि सिद्ध समाधी अंदरि गावनि साध विचारे। ।।
अर्थात्- ‘‘वह स्थान किसका है? वह घर किसका है? जिसमें सब समा जाते हैं। जहाँ असंख्य प्रकार के वाद्य बज रहे हैं और सब कोई स्तुति कर रहे हैं। आकाश, वायु, जल, अग्नि आदि पंचतत्त्व उसी की महिमा गाते हैं। धर्मराज, उनके पाप- पुण्य लेखक चित्रगुप्त; ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र आदि समस्त देवता भी उसी का गुणगान कर रहे हैं। समाधि अवस्था में रहने वाले सिद्धगण तथा सब संत उसी के गुणगान कर रहे हैं।’’
मक्का की यात्रा के अवसर पर किसी ने पूछा कि ‘‘हिंदू और मुसलमान में कौन बड़ा है?’’ तो नानक जी ने जवाब दिया- "बड़ा वह है, जो भलाई का काम करता रहता है और जिसका ध्यान परमात्मा की तरफ रहता है। बिना अच्छे कर्मों के हिंदू हो या मुसलमान दोनों को रोना पड़ेगा।’’ जब यह पूछा गया कि जाग्रत् कौन है? तो उन्होंने कहा- ‘‘जो परमात्मा को अपने चारों ओर देखता है और माया में नहीं फँसता उसी को जगा हुआ समझो। ऐसे व्यक्ति की पहिचान यह है कि उसका हृदय सदा दया और सहानुभूति से ओत- प्रोत रहता है।’’
यह सत्य है कि गुरू नानक के निकट हिंदू- मुसलमान का अंतर नहीं था और वे इन दोनों को ही नहीं, मनुष्य मात्र को चाहे वह किसी धर्म, वर्ण या जाति का हो, प्रेम की दृष्टि से देखते थे। इसका परिणाम यह था कि उस मुसलमानी शासन के जमाने में जबकि हिंदू जाति की बुरी हालत की जा रही थी, मुसलमान भी उनका आदर करते थे। स्वयं बाबर बादशाह उनके परोपकारी जीवन से प्रभावित होकर दर्शन करने आया था और अन्य भी सैकड़ों मुसलमान उनके शिष्य बनकर उपदेश सुनने आया करते थे। वे सब अपने घरों में अपनी संप्रदाय के अनुसार ही चलते थे, पर गुरु नानक से ईश्वर भक्ति, सेवा, परोपकार की शिक्षा ग्रहण करके
अपने जीवन को पवित्र बनाते थे। यही कारण है कि वे हिंदू होने पर भी नानक जी को अपना भी सच्चा हितैषी और प्रेम करने वाला समझते थे और जब आश्विन शुक्ल१० संवत् १५९५ (सन् १५३८) को गुरू जी का अंत समय आया तो उन्होंने जोरों से नारा लगाया-
नानक शाह फकीर।
हिंदू का गुरू मुसलमान का पीर।
पर इतना होने पर भी नानक जी को अपने धार्मिक सिद्धांतों की प्रेरणा हिंदू- शात्रों से ही मिली, जैसा उनकी अधिकांश वाणियों और गुरू ग्रंथ साहब से विदित होता है। इसका एक कारण यह भी था कि अन्य मजहबों नेधर्मशात्रों में ईश्वर, जीव- प्रकृति, सृष्टि- रचना; कर्मफल, पुनर्जन्म आदि की समस्याओं पर इतनी गहराई से विचार भी नहीं किया गया है। हिंदू शास्त्रकारों ने तो इस संबंध में अनेक पहलुओं से इतने विस्तार के साथ विचार किया है कि एक बड़े विद्वान् से लेकर मामूली अनपढ़ ग्रामीण तक को उसमें अपने योग्य सामग्री मिल जाती हैं। नानक जी ने ईश्वर को समस्त सम्राटों का भी सम्राट बतलाते हुए उसकी प्रशंसा में कहा-
सो दरु केहा सो घर केहा जित वहि सरव समाले।
बाजे नाद अनेक असंखा केते गावण हारे। ।।
गावहि तुहिनो, पवणु, पाणी वैसंतरू गावैराजा धरम दुआरे।
गावहि चित्तगुपुत लिखि जाणहि लिख- लिख धरम विचारे। ।।
गावहि ईसरु वरमा देवी सोहनि सदा सँवारे।
गावहि इंदु इंद्रासणि बैठे देवतिया दरि नाले।
गावहि सिद्ध समाधी अंदरि गावनि साध विचारे। ।।
अर्थात्- ‘‘वह स्थान किसका है? वह घर किसका है? जिसमें सब समा जाते हैं। जहाँ असंख्य प्रकार के वाद्य बज रहे हैं और सब कोई स्तुति कर रहे हैं। आकाश, वायु, जल, अग्नि आदि पंचतत्त्व उसी की महिमा गाते हैं। धर्मराज, उनके पाप- पुण्य लेखक चित्रगुप्त; ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र आदि समस्त देवता भी उसी का गुणगान कर रहे हैं। समाधि अवस्था में रहने वाले सिद्धगण तथा सब संत उसी के गुणगान कर रहे हैं।’’

