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Books - गुरु नानक देव

Media: TEXT
Language: HINDI
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जन- भाषा का प्रयोग

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गुरू नानक ने अपने प्रचार कार्य में उसी भाषा का प्रयोग किया है, जो उस समय पंजाब में बोली जाती थी और जिसे शिक्षित, अशिक्षित, छोटे- बड़े, स्त्री- पुरूष सब सहज में बोल सकते थे। फिर उन्होंने शास्त्रों के गंभीर सिद्धांतों का सरल ढंग से प्रतिपादन किया है, जिससे उनका आशय ग्रहण करने में कोई कठिनाई न हो। देखिये मनुष्य मात्र की समानता को हिंदू- शास्त्रों के सिद्धांतों के आधार पर उन्होंने किस तरह समझाया है- 
जाति का गरब न कर मूरख गावारा। 
इस गरब ते चलहिं बहुत विकारा। ।। 
माटी एक सगल संसारा। 
बहुविधि भाँड़े घढ़ें कुंभारा। 
पंच तत्त्तु मिल देही का आकारा। 
घट वध को करें विचारा॥ 
           अर्थात्- ‘‘हे मूर्ख, गँवार जाति का घमंड करना छोड़ दे, क्योंकि इससे बहुत बुराइयाँ पैदा होती हैं। समस्त संसार में एक ही मिट्टी है और कुम्हार उसे लेकर तरह- तरह के बर्तन बनाता है। इस प्रकार पाँच तत्वमिल जाने से यह मनुष्य शरीर का ढांचा बनकर खड़ा हो जाता है। इसमें छोटे- बड़े का विचार करना व्यर्थ ही है, 
जीवन- मरण की पुनर्जन्म की समस्या को उन्होंने कुँए से पानी खींचने वाली रहट का उदाहरण देकर बहुत अच्छी तरह समझाया है, 
जैसे हरकट की माला टिंड लगत है, 
इक सखनी होर फेरि भरीयत है। 
तैसो ही एह खेल खसम का जिऊ उसकी बाडियाई 
           अर्थात्- ‘‘जैसे पानी खींचने के रहट की ढोकलियाँ नीचे जाती हैं, पानी से भरी हुई ऊपर निकलती हैं और खाली होकर फिर नीचे चली जाती हैं, ऐसा ही हमारा यह जीवन कर्तार के एक खेल के समान है।’’ 
           गुरू नानक ने अपनी बाल्यावस्था में घर में कृषि- कार्य होते देखा था और अपनी अंतिम अवस्था में भी उन्होंने खेती- किसानी करके ही जीवन- निर्वाह किया। साथ ही जिन लोगों में वे प्रचार कार्य करते थे उनमें भी बहुसंख्यक व्यक्ति उसी ग्रामीण जनता के थे, जिसका जीवनाधार खेती ही है। इसलिए नानक जी ने आध्यात्मिक सिद्धांतों को खेती- किसानी के रूपक में भी बड़े सुंदर ढंग से समझाया है- 
सावण रात अहाड़ दिहु काम करोध दोई खेत। 
लव वत्तर दरोग वीउ हाली राह कुहेत। 
हल विचार विकार मन हुकमी खट्टे खाइ। 
नानक लेखै मंगी रो आउत जणेता जाई॥ 
          अर्थात्- ‘‘सावन रूपी रात और आषाढ़ रूपी दिनों में, काम- क्रोध रूपी खेतों में, लोभ रूपी जल, द्वारा मनुष्य सदा झूठ का बीज बोता रहता है। साँसारिक विषय- भोग की अभिलाषा ही उसका हल है, विकारयुक्तमन की आज्ञा से वह कमाता- खाता है, परंतु जब हिसाब का समय आता है। देह त्याग करकेपरम पिता के सम्मुख पहुँचता है।- तब उसके पास कुछ भी नहीं होता, खाली हाथ ही वहाँ जाता है।’’ 
कुबुद्धि वाले किसान का चित्रण करके उन्होंने फिर सुबुद्धि युक्त किसान का वर्णन उस प्रकार किया है- 
भउ मुइं पवित्त पापी संतोख मलीद ।। 
हल हलीमी चित्त चेता वत्तर बखत संजोग। 
नाउ बीज बखशिश बोहल दुनिया सगल दरोग। 
नानक नदरी करम होवे जानसि सकल विजोग। ।। 
           अर्थात्- ‘‘दूसरा किसान भाव रूपी पवित्र भूमि पर सत्य और संतोष रूपी बैलों द्वारा शांति का हल चलता है। स्थितप्रज्ञता की खाद देकर वह काम रूपी बीज बोता है। ऐसे चतुर किसान को फल की प्राप्ति होतीहै।’’ 
इस बात को और भी स्पष्ट करने के लिए उन्होंने आगे चल कर कहा है- 
मनुहाली किसाणी करणी सरमु पाणी तन खेत। 
नाम बीज संतोख सुहाग रखु गरीबी वेश॥


अर्थात्- ‘‘मन को हलवाहा बनाओ, कार्य करने को हल चलाना समझो, श्रम को पानी और शरीर को खेत बनाओ। उसमें नाम रूपी बीज बोओ, संतोष रूपी खाद डालो और गरीबी का वेष धारण करों।’’ 
           इस प्रकार बहुत सरल बोलचाल में नानक जी ने सामान्य जनता को धर्म के गूढ़ तत्त्व समझाये। इस प्रकार के शिक्षण में जन- भाषा का प्रयोग बडा़ महत्त्वपूर्ण है, यद्यपि संस्कृताभिमानी पंड़ित उसे एक घटिया बात मानते हैं। स्वामी दयानंद जी ने भी सिक्ख मत की आलोचना करते हुये यही लिखा है कि ‘‘नानक जी बहुत कम पढ़े- लिखे थे, वेद, उपनिषद् आदि का अध्ययन उन्होंने कभी किया नहीं था, इसलिए उनके धार्मिक उपदेश बहुत अधिक सामान्य कोटि के हैं।’’ पर संस्कृत के बहुत बढ़े- चढ़े पक्षपाती हमें क्षमा करें, हम यह स्पष्ट कहना चाहते हैं कि जिस बात को वे एक बड़ा गुण समझते हैं, वह हमारी दृष्टि में एक बड़ी त्रुटि की तरह है। वेद, उपनिषद्, पुराणों में जो जीवनोपयोगी बातें मिलती हैं ,, आत्मोन्नति का जो मार्ग बतलाया है उसकी प्रशंसा हम भी करते हैं और उसका यथाशक्ति प्रचार भी करते हैं, पर यह आग्रह करना कि उन बातों को पूर्वकाल की भाषा में ही पढ़ा और समझा जाय उचित नहीं कहा जा सकता। करोंड़ों की संख्या वाली सामान्य जनता, जिसमें से एक बड़े भाग को अभी अक्षर- ज्ञान का अवसर भी प्राप्त नहीं हो सका है- कभी संस्कृत का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर सकेगी, यह एक दुराशामात्र ही है। तब क्या उसको धर्मज्ञान से शून्य ही रहने दिया जाय? हमें खेद के साथ कहना पड़ता है कि हिंदुओं के धार्मिक संस्कारों तथा अन्य जातीय- कृत्यों को संस्कृत भाषा में ही किये जाने का आग्रह, एक वर्ग विशेष के स्वार्थ की निगाह से ही किया जाता है। वे चाहते थे कि धर्मकृत्य सदैव एक ऐसी भाषा में कराए जायें, जिसका ज्ञान अन्य लोगों को बहुत कम है, उससे वे हमारे ऊपर ही निर्भर रहेंगे और हमको सहज में ही सुखपूर्वक निर्वाह करने का अवसर प्राप्त हो सकेगा। पर उनकी इसी स्वार्थ- पूर्ण नीति का यह नतीजा हुआ कि इस देश में अन्य मतमतांतरों को फैलाने का अवसर मिला और हिंदुओं की शक्ति घटती गई। एक तरफ तो हम आजकल ईसाई धर्म प्रचारकों को देखते हैं, जिन्होंने अपने धर्मग्रंथों को दो- चार नहीं, दो- तीन सौ भाषाओं में भाषांतर करके संसार जे कोने- कोने में पहुँचाने का प्रयत्न किया है और दूसरी तरफ हमारे वे धर्म के ठेकेदार सज्जन थे जो अपने धर्मग्रंथों को संदूक में ही बंद रखना चाहते थे और कहते थे कि अगर इसकी एक पंक्ति भी अन्य लोगों ने सुन ली तो महान् पापकर्म हो जायेगा। 
           ब्राह्मण- वर्ग की इस कमजोरी को बौद्ध और जैन धर्मवालों ने पहिचाना और अपना धार्मिक साहित्य जन- भाषा में प्रस्तुत किया ! आज भी बौद्धों के समस्त मूल धर्मग्रंथ वाली भाषा में और जैनियों के प्राकृत भाषा में मिलते हैं, जो उनके युग और क्षेत्र की जन- भाषायें थीं। इसका फल हुआ कि इस देश में रहने वाले हिंदुओं में से करोड़ों ही उन धर्मों में दीक्षित हो गये। आज परिस्थिति कुछ बदली अवश्य है तो भी उच्च वर्ण वालों की संकीर्णता और स्वार्थपरता बहुत कुछ शेष है। इसका परिणाम हम यह देख रहे हैं कि पिछले साठ- सत्तर वर्ष के भीतर ही ईसाइयों की संख्या दुगुनी से अधिक होकर दो अरब से ऊपर पहुँच गई और मुसलमान भी ड्यौढे़- दुगुने हो गए। इनके मुकाबले में हिंदुओं की वृद्धि नाम मात्र को हुई है। 
यदि हम बौद्ध धर्म की स्थिति को संदिग्ध समझकर उसे छोड़ दें तो अब हिंदू जनसंख्या की दृष्टि से तीसरे नंबर पर है ,, जबकि सन् १९१० की ही मर्दुमशुमारी में हिसाब लगाकर देखा गया कि वे संसार भर की मुस्लिम आबादी से काफी अधिक थे। इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं है। धार्मिक विषयों में संकीर्णता और स्वार्थ- साधन की नीति इसके सिवा अन्य कोई परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकती। 
           इसलिए गुरू नानक ने यदि इस तथ्य को अच्छी तरह समझ लिया और अपने धार्मिक उपदेश तथा धार्मिक ग्रंथ में ठेठ पंजाबी भाषा का प्रयोग किया तो यह कोई हीनता की नहीं वरन् प्रशंसा की ही बात थी। इससे उनका समुदाय जितना फला- फूला और अपने धर्म पर सुदृढ़ रहने वाला बना, उसका प्रमाण हम बराबर अपनी आँखों से आज भी देखते रहते हैं। रह गई वेद और शास्त्रों के ज्ञान की बात, उसके लिए उन्हें मूल रूप में पढ़ना ही आवश्यक नहीं है। पुराने समय में तो पुस्तकीय शिक्षा का प्रचार बहुत कम था, और कागज उस समय एक दुर्लभ पदार्थ था। इसलिए अधिकांश ज्ञान का आदान- प्रदान मौखिक रूप से ही करते था, संत- महात्मा इस प्रकार की चर्चा देश- भाषा में ही करते थे, इसलिए वह ज्ञान शिक्षित- अशिक्षित सभी को सहज में प्राप्त होना संभव था। 
           गुरू नानक ही नहीं, संत तुकाराम और श्रीरामकृष्ण परमहंस भी इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ये सब नाम मात्र को पढ़े थे या अनपढ़ ही थे, पर उनके उपदेशों तथा धार्मिक प्रतिपादन को पढ़ कर वर्तमान समय में उच्च कोटि के विद्वान भी अपने को धन्य समझते हैं। संत कबीर ने स्वयं कहा है- "मसि कागज छूओ नहीं, कलमगहो नहिं हाथ।" तुकाराम भी कहते थे- "संतों की उच्छिष्ठ उक्ति है- मेरी वानी।’’ रामकृष्ण परमहंस ने पाठशाला भेजे जाने पर पहले ही दिन कह दिया था कि- "मुझे पढ़- लिखकर क्या करना है, मुझे जीवन निर्वाह के लिए कथा तो बाँचनी नहीं है, हमारे खेत में खाने लायक अनाज हो ही जाता है।’’ इसलिए वेद शास्त्रों केसिद्धांतो को बिना पुस्तकीय ज्ञान के भी अच्छी तरह ग्रहण किया जा सकता है। वास्तव में जो उनके अनुसार आचरण करेगा, वही उनका असली मर्म समझ सकेगा। ग्रंथों को अच्छी तरह पढ़ लेना, पर तदनुसार आचरण न करना तो तोते की तरह रटने से अधिक महत्व नहीं रखता। 

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