गुरू नानक का व्यवहारिक अध्यात्मवाद
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गुरू नानक ने जब समाज को अनेक भागों में बँटा देखा तो अनुभव किया कि इसके कारण ही हिंदू जाति निर्बल होकर दूसरों की ठोकरें खा रही हैं। उन्होंने यह भी देखा कि पुजारी- पंडित वर्ग ने धर्म पर एकाधिकार किया हुआ है और वे धार्मिक संस्कारों का कराना अपनी बपौती समझकर मुक्त का माल उड़ा रहे हैं। इसी वर्ग ने अपने स्वार्थ साधन के लिए जनता को राजनैतिक और सामाजिक चेतना से हीन बना दिया था, जिससे वह देशी और विदेशियों के तरह- तरह के अन्यायों को मूक बनकर सहन कर रही थी।
इस तरह नानक जी ने जब समाज के रोग को पहिचान लिया तो उन्होंने एक ऐसा संगठन बनाने का निश्चय किया, जिसमें धर्म को व्यापार की चीज न बनाया जाये और जिसमें धार्मिका और जातीयता की दृष्टि से किसी को छोटा- बड़ा न माना जाय। इसलिए उन्होंने पृथक्- पृथक् पूजा- उपासना के स्थान पर सामुदायिक उपासना का प्रचलन किया। इसमें सब कोई एक जगह एकत्रित होकर सृष्टिकर्त्ता भगवान् की स्तुति और गुणगान करते थे। इस उपासना में भेंट- पूजा चढ़ावे या किसी एक व्यक्ति के लाभ का कोई सवाल न था। इसमें जाति की दृष्टि से ऊँच- नीच, स्त्री- पुरुष तथा विभिन्न धर्माें का भी भेद नहीं किया जाता था। सब कोई मिलकर एक जगह बैठते थे और गुरू जी के सत्य- धर्म उपदेशों को सुनते थे।
उन्होंने अपने इस सिद्धांत को व्यवहारिक रूप देने का दूसरा कार्य यह किया कि सब लोगों का खाना एक साथ बने और सब एक ही पंगत में बैठकर भोजन करें। चौके- चूल्हे की पृथकता ने भी हिंदुओं में भेदभाव की अनेक दीवारें खड़ी कर दी थीं। कौन किसके हाथ का खा सकता है और किसके हाथ का नहीं खा सकता, इसका जंजाल इतना अधिक बढ़ा दिया था कि हिंदुओं में प्रायः "आठ कनौजिया नौ चूल्हे" वाली कहावत चरितार्थ होने लगी थी। गुरू नानक ने अपने यहाँ लंगर- प्रथा प्रचलित करके इसकी जड़ ही काट दी। वे इस संबंध में कहाँ तक दृढ़ रहते थे, इसकी एक घटना इस प्रकार बतलाई जाती है-
एक बार किसी उत्सव के उपलक्ष्य में भोज था। जब सब संगत में उपस्थित जनों की पंगत बैठ गई और भोजन परोसा गया तो शिष्यों ने कहा- ‘‘महाराज, आरंभ कीजिये।’’ गुरू जी ने चारों तरफ नजर दौड़ाई और बोले- ‘‘अभी नहीं, रोटी बनाने वाले तो आए ही नहीं।’’ जब वे आ गए, तब भी गुरू जी ने खाना शुरू नहीं किया और आँगन में झाडू देने वालों को दूर खड़ा देख कर कहा- ‘‘उन्हें भी तो बुलाओं।’’
यह घटना कर्तारपुर की है, जहाँ वे अपनी अंतिम अवस्था में निवास करते थे। उस समय का जिक्र करते हुए कहा गया है कि- ‘‘यहीं पर वे गुरू कहलाए और यहीं पर अपनी मान्यताओं को उन्होंने मूर्त रूप दिया। गुरू तो बन गए पर अहंकार, आडंबर का नाम नहीं। बस, समझिए बड़े भाई की तरह रहने लगे। चढ़ावा- चढ़ने लगा, संपदा एकत्रित होने लगी, पर नानक जी के लिए इसमें से एक पाई भी हराम थी। उन्होंने अपनी गुजर खेती- बाड़ी और मूँज की रस्सी बँटकर की। कबीर, रैदास, गाँधी, नानक के अतिरिक्त बहुत थोड़े ऐसे संत फकीर हुए हैं, जो ऋद्धि- सिद्धियुक्त होते हुए भी अपने दस नाखूनों की कमाई पर गुजर करना पसंद करते थे और एक खास बात यह हुई कि अपनी वानप्रस्थ अवस्था में जब वे गुरू के समान पूजे जाने लगे तो नानक जी ने साधु के बजाय गृहस्थों का सा वेष धारण कर लिया। वे नहीं चाहते थे कि वे या उनके उत्तराधिकारी अन्य गुरू, साधुओं की वेषभूषा के कारण पूजनीय समझे जायें। वे गेरूआ वस्त्र और कंठी, माला, तिलक के आधार पर हिंदू- साधुओं की मान्यता होने का कुपरिणाम अच्छी तरह देख चुके थे। यह है सच्चे अध्यात्म की कसौटी। दिन- रात जीवन, ब्रह्म, माया की गुत्थियाँ सुलझाते रहना, जगत् को असत्य बतलाना, सबसे निराला वेष और रहन- सहन रखना, पर किसी का रत्तीभर भी उपकार न करके समाज के सिर पर अपने निर्वाह का भार डाल देना अध्यात्म का लक्षण नहीं है। इतना ही नहीं, साधु- संन्यासी होकर अध्यात्मज्ञानी बनना और स्वयं निकम्मे रहकर गैर लोगों की कमाई पर आराम की, ठाट- बाट की जिंदगी बिताने में भी ऐसे लोगों को लज्जा नहीं आती। गुरूनानक ने समझ लिया था कि यह नकली अध्यात्मवाद समाज के लिए अभिशाप सिद्ध हो रहा है और लोगों में अंधविश्वास तथा झूठी श्रद्धा का एक बड़ा कारण बना हुआ है। इसलिए उन्होंने अपने यहाँ पुजारी और झाडू देने वाले को पंथ में समानता का दर्जा देकर इस ‘‘ठग विद्या’’ की जड़ ही काट दी।
इस सिद्धांत की यथार्थता का एक उदाहरण हमको महात्मा गाँधी द्वारा प्रकट किये गये विचारों में भी मिलता है। उनके साबरमती आश्रम में एक संन्यासी कुछ देखने- सुनने को आये। उनको वहाँ की कार्य- प्रणाली और सिद्धंात पसंद आए और वे कहने लगे कि मेरी इच्छा है कि आपके आश्रम में रहकर ही कुछ जन- सेवा का कार्य करूँ। गाँधी जी ने उत्तर दिया कि आपका विचार वैसे तो ठीक है, पर अगर आप आश्रम में रहना चाहें तो आपको अपना यह गेरूआ वेष त्याग देना होगा। यह सुनकर संन्यासी जी चकराये और कुछ असंतुष्ट भाव से कहने लगे- ‘‘मैं गेरुआ वस्त्र कैसे त्याग सकता हूँ? मैंने विधिवत् संन्यास ग्रहण करके इनको धारण किया है?’’ गाँधी जी ने उन्हें समझाया कि "आप इस वेष को धारण करके जन- सेवा का कोई कार्य नहीं कर सकते। इसे देखकर कोई आपसे सेवा कराने को तैयार नहीं होगा, वरन् वह आपकी सेवा करना ही अपना धर्म मानेगा।’’ गाँधी जी की बात उनकी समझ में आ गई और उन्होंने गेरुआ वस्त्र त्यागकर खादी के वस्त्र धारण कर लिए।
वास्तव में आध्यात्मिकता न वेष से संबंध रखती है, न पूजा- पाठ से, न जप- तप से। इन सबको करते हुए भी मनुष्य एक नंबर का पाखंडी, आडंबरी और स्वार्थपराण हो सकता है। हमने निर्जन जंगलों और दुरूह पर्वतों में रहने वाले लगभग नंगे साधुओं को भी सामान्य बातों पर दूसरों से लड़ते देखा है। एकाध बार तो धूनी की लड़कियों के संबंध में तकरार होकर ऐसे साधुओं में खून खराबी तक की नौबत आ गई। इसके विपरीत अन्य अनेक व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में रहते हुए, स्वयं अभाव सहन करके भी दूसरों की बचाव करते हैं।
नानक जी मानते थे कि भलाई, सज्जनता आदि का गुण मनुष्य में स्वभावतः होता है। पर वह अनुकूल स्थिति न पाने के कारण छिपा रहता है। सच्चे संतों, सद्गुरू का कर्त्तव्य है कि वह इस भलाई के तत्त्व से मनुष्य को परिचित करायें और उसके बढ़ाने में मदद करें। यही गुरू का सबसे बड़ा उपकार शिष्य पर होता है, जिसके लिए वह गुरू को भगवान् के तुल्य समझकर पूजता है। पर यह कार्य सच्चे अध्यात्मवादी, निःस्वार्थी, निस्पृह गुरू ही कर सकते हैं और इसी में उनके अध्यात्मवादी का सच्चे या झूठे होने की परीक्षा हो सकती है।
गुरू नानक के प्रचार का प्रभाव हिंदू- समाज पर पड़ा, पर उसका प्रत्यक्ष परिणाम अधिकांश में पंजाब मे ही देखने को मिला। हम कह सकते हैं कि जात- पाँति के बंधनों, खान- पान में चौका- चूल्हे के नियमों और छुआछूत की बीमारी को सबसे अधिक पंजाब में ही त्यागा गया है। दक्षिण भारत में तो छूत- अछूत का प्रश्न आज भी एक समस्या के रूप में मौजूद है और वहाँ अब भी सामाजिक कारणों से अछूतों के मारे जाने के समाचार आते रहते हैं। उत्तर- प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि हिंदी भाषी प्रांतों में स्वामी दयानंद और महात्मा गाँधी के प्रचार कार्य के फलस्वरूप इस प्रकार के भेद- भाव की तीव्रता कम हो गई है और यद्यपि प्रत्यक्ष रूप में स्वीकार तो नहीं किया जाता, पर व्यवहार में अछूतों को बहुत कुछ सुविधायें मिल गई हैं। बंगाल में सौ- डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ब्रह्म- समाज के प्रचार ने परिस्थिति को बहुत कुछ बदल दिया है। इस प्रकार समाज में से विषमता को मिटाकर समता तथा एकीकरण का जो महान् कार्य गुरू नानक ने उठाया था, वह आज फलता- फूलता नजर आ रहा है, यह कम संतोष की बात नहीं है।
इस तरह नानक जी ने जब समाज के रोग को पहिचान लिया तो उन्होंने एक ऐसा संगठन बनाने का निश्चय किया, जिसमें धर्म को व्यापार की चीज न बनाया जाये और जिसमें धार्मिका और जातीयता की दृष्टि से किसी को छोटा- बड़ा न माना जाय। इसलिए उन्होंने पृथक्- पृथक् पूजा- उपासना के स्थान पर सामुदायिक उपासना का प्रचलन किया। इसमें सब कोई एक जगह एकत्रित होकर सृष्टिकर्त्ता भगवान् की स्तुति और गुणगान करते थे। इस उपासना में भेंट- पूजा चढ़ावे या किसी एक व्यक्ति के लाभ का कोई सवाल न था। इसमें जाति की दृष्टि से ऊँच- नीच, स्त्री- पुरुष तथा विभिन्न धर्माें का भी भेद नहीं किया जाता था। सब कोई मिलकर एक जगह बैठते थे और गुरू जी के सत्य- धर्म उपदेशों को सुनते थे।
उन्होंने अपने इस सिद्धांत को व्यवहारिक रूप देने का दूसरा कार्य यह किया कि सब लोगों का खाना एक साथ बने और सब एक ही पंगत में बैठकर भोजन करें। चौके- चूल्हे की पृथकता ने भी हिंदुओं में भेदभाव की अनेक दीवारें खड़ी कर दी थीं। कौन किसके हाथ का खा सकता है और किसके हाथ का नहीं खा सकता, इसका जंजाल इतना अधिक बढ़ा दिया था कि हिंदुओं में प्रायः "आठ कनौजिया नौ चूल्हे" वाली कहावत चरितार्थ होने लगी थी। गुरू नानक ने अपने यहाँ लंगर- प्रथा प्रचलित करके इसकी जड़ ही काट दी। वे इस संबंध में कहाँ तक दृढ़ रहते थे, इसकी एक घटना इस प्रकार बतलाई जाती है-
एक बार किसी उत्सव के उपलक्ष्य में भोज था। जब सब संगत में उपस्थित जनों की पंगत बैठ गई और भोजन परोसा गया तो शिष्यों ने कहा- ‘‘महाराज, आरंभ कीजिये।’’ गुरू जी ने चारों तरफ नजर दौड़ाई और बोले- ‘‘अभी नहीं, रोटी बनाने वाले तो आए ही नहीं।’’ जब वे आ गए, तब भी गुरू जी ने खाना शुरू नहीं किया और आँगन में झाडू देने वालों को दूर खड़ा देख कर कहा- ‘‘उन्हें भी तो बुलाओं।’’
यह घटना कर्तारपुर की है, जहाँ वे अपनी अंतिम अवस्था में निवास करते थे। उस समय का जिक्र करते हुए कहा गया है कि- ‘‘यहीं पर वे गुरू कहलाए और यहीं पर अपनी मान्यताओं को उन्होंने मूर्त रूप दिया। गुरू तो बन गए पर अहंकार, आडंबर का नाम नहीं। बस, समझिए बड़े भाई की तरह रहने लगे। चढ़ावा- चढ़ने लगा, संपदा एकत्रित होने लगी, पर नानक जी के लिए इसमें से एक पाई भी हराम थी। उन्होंने अपनी गुजर खेती- बाड़ी और मूँज की रस्सी बँटकर की। कबीर, रैदास, गाँधी, नानक के अतिरिक्त बहुत थोड़े ऐसे संत फकीर हुए हैं, जो ऋद्धि- सिद्धियुक्त होते हुए भी अपने दस नाखूनों की कमाई पर गुजर करना पसंद करते थे और एक खास बात यह हुई कि अपनी वानप्रस्थ अवस्था में जब वे गुरू के समान पूजे जाने लगे तो नानक जी ने साधु के बजाय गृहस्थों का सा वेष धारण कर लिया। वे नहीं चाहते थे कि वे या उनके उत्तराधिकारी अन्य गुरू, साधुओं की वेषभूषा के कारण पूजनीय समझे जायें। वे गेरूआ वस्त्र और कंठी, माला, तिलक के आधार पर हिंदू- साधुओं की मान्यता होने का कुपरिणाम अच्छी तरह देख चुके थे। यह है सच्चे अध्यात्म की कसौटी। दिन- रात जीवन, ब्रह्म, माया की गुत्थियाँ सुलझाते रहना, जगत् को असत्य बतलाना, सबसे निराला वेष और रहन- सहन रखना, पर किसी का रत्तीभर भी उपकार न करके समाज के सिर पर अपने निर्वाह का भार डाल देना अध्यात्म का लक्षण नहीं है। इतना ही नहीं, साधु- संन्यासी होकर अध्यात्मज्ञानी बनना और स्वयं निकम्मे रहकर गैर लोगों की कमाई पर आराम की, ठाट- बाट की जिंदगी बिताने में भी ऐसे लोगों को लज्जा नहीं आती। गुरूनानक ने समझ लिया था कि यह नकली अध्यात्मवाद समाज के लिए अभिशाप सिद्ध हो रहा है और लोगों में अंधविश्वास तथा झूठी श्रद्धा का एक बड़ा कारण बना हुआ है। इसलिए उन्होंने अपने यहाँ पुजारी और झाडू देने वाले को पंथ में समानता का दर्जा देकर इस ‘‘ठग विद्या’’ की जड़ ही काट दी।
इस सिद्धांत की यथार्थता का एक उदाहरण हमको महात्मा गाँधी द्वारा प्रकट किये गये विचारों में भी मिलता है। उनके साबरमती आश्रम में एक संन्यासी कुछ देखने- सुनने को आये। उनको वहाँ की कार्य- प्रणाली और सिद्धंात पसंद आए और वे कहने लगे कि मेरी इच्छा है कि आपके आश्रम में रहकर ही कुछ जन- सेवा का कार्य करूँ। गाँधी जी ने उत्तर दिया कि आपका विचार वैसे तो ठीक है, पर अगर आप आश्रम में रहना चाहें तो आपको अपना यह गेरूआ वेष त्याग देना होगा। यह सुनकर संन्यासी जी चकराये और कुछ असंतुष्ट भाव से कहने लगे- ‘‘मैं गेरुआ वस्त्र कैसे त्याग सकता हूँ? मैंने विधिवत् संन्यास ग्रहण करके इनको धारण किया है?’’ गाँधी जी ने उन्हें समझाया कि "आप इस वेष को धारण करके जन- सेवा का कोई कार्य नहीं कर सकते। इसे देखकर कोई आपसे सेवा कराने को तैयार नहीं होगा, वरन् वह आपकी सेवा करना ही अपना धर्म मानेगा।’’ गाँधी जी की बात उनकी समझ में आ गई और उन्होंने गेरुआ वस्त्र त्यागकर खादी के वस्त्र धारण कर लिए।
वास्तव में आध्यात्मिकता न वेष से संबंध रखती है, न पूजा- पाठ से, न जप- तप से। इन सबको करते हुए भी मनुष्य एक नंबर का पाखंडी, आडंबरी और स्वार्थपराण हो सकता है। हमने निर्जन जंगलों और दुरूह पर्वतों में रहने वाले लगभग नंगे साधुओं को भी सामान्य बातों पर दूसरों से लड़ते देखा है। एकाध बार तो धूनी की लड़कियों के संबंध में तकरार होकर ऐसे साधुओं में खून खराबी तक की नौबत आ गई। इसके विपरीत अन्य अनेक व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में रहते हुए, स्वयं अभाव सहन करके भी दूसरों की बचाव करते हैं।
नानक जी मानते थे कि भलाई, सज्जनता आदि का गुण मनुष्य में स्वभावतः होता है। पर वह अनुकूल स्थिति न पाने के कारण छिपा रहता है। सच्चे संतों, सद्गुरू का कर्त्तव्य है कि वह इस भलाई के तत्त्व से मनुष्य को परिचित करायें और उसके बढ़ाने में मदद करें। यही गुरू का सबसे बड़ा उपकार शिष्य पर होता है, जिसके लिए वह गुरू को भगवान् के तुल्य समझकर पूजता है। पर यह कार्य सच्चे अध्यात्मवादी, निःस्वार्थी, निस्पृह गुरू ही कर सकते हैं और इसी में उनके अध्यात्मवादी का सच्चे या झूठे होने की परीक्षा हो सकती है।
गुरू नानक के प्रचार का प्रभाव हिंदू- समाज पर पड़ा, पर उसका प्रत्यक्ष परिणाम अधिकांश में पंजाब मे ही देखने को मिला। हम कह सकते हैं कि जात- पाँति के बंधनों, खान- पान में चौका- चूल्हे के नियमों और छुआछूत की बीमारी को सबसे अधिक पंजाब में ही त्यागा गया है। दक्षिण भारत में तो छूत- अछूत का प्रश्न आज भी एक समस्या के रूप में मौजूद है और वहाँ अब भी सामाजिक कारणों से अछूतों के मारे जाने के समाचार आते रहते हैं। उत्तर- प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि हिंदी भाषी प्रांतों में स्वामी दयानंद और महात्मा गाँधी के प्रचार कार्य के फलस्वरूप इस प्रकार के भेद- भाव की तीव्रता कम हो गई है और यद्यपि प्रत्यक्ष रूप में स्वीकार तो नहीं किया जाता, पर व्यवहार में अछूतों को बहुत कुछ सुविधायें मिल गई हैं। बंगाल में सौ- डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ब्रह्म- समाज के प्रचार ने परिस्थिति को बहुत कुछ बदल दिया है। इस प्रकार समाज में से विषमता को मिटाकर समता तथा एकीकरण का जो महान् कार्य गुरू नानक ने उठाया था, वह आज फलता- फूलता नजर आ रहा है, यह कम संतोष की बात नहीं है।

