एक महान् समाज सुधारक
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गुरू नानक के उपर्युक्त जीवन वृतांत पर अच्छी तरह विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि वे अपने समय के एक महान् समाज- सुधारक थे। उस समय आवागमन के साधनों के अभाव से यह तो संभव न था कि कोई प्रचारक अपने विचारों को समस्त भारतवर्ष में फैला सके। इतना ही क्यों? हम कह सकते हैं कि उन दिनों पंजाब और बंगाल जैसे दो प्रंात व्यवहार में एक- दूसरे के लिए विदेशी की तरह ही जान पड़ते थे। इसलिए गुरू नानक की सुधार योजना यद्यपि पंजाब से आगे अधिक न बढ़ सकी तो भी उन्होंने हिंदू समाज के सम्मुख एक ऐसा आदर्श रखा, जिसने उसकी आँखें खोल दीं और जगह- जगह अपने ढंग से सामाजिक अन्यायों को मिटाने का प्रयत्न अपने- अपने ढंग से किया जाने लगा। इस कार्य को चैतन्य देव और कबीर ने भी लगभग उसी समय किया था। अन्य वैष्णव आचार्यों ने भी भक्ति- मार्ग का प्रतिपादन कुछ अंशों में सामाजिक समता लाने की चेष्टा की, पर उसका परिणाम थोड़ा- सा ही हुआ और वह भी कुछ समय पश्चात् बहुत हल्का पड़ गया। इसके विपरीत नानक जी का लगाया पौधा दिन पर दिन जड़ पकड़ता गया और गोविंद सिंह के समय में उसने इतना शक्तिशाली और विशाल रूप ग्रहण कर लिया कि पंजाब तथा आस- पास के कितने ही स्थानों के हिंदुओं की एक प्रकार से कायापलट सी हो गई।
इस दृष्टि से हम नानक जी को हिंदू समाज के एक उद्धारकर्ता का दर्जा दे सकते हैं। यह बात दूसरी है कि आज सिक्खों का रवैया बहुत कुछ बदला हुआ है और वे हिंदुत्व ही क्या, भारतीय संस्कृति की ओर भी दुर्लक्ष्यकर रहे हैं। पर नानक जी की वाणियों में, जिनमें से कुछ इस लेख में उद्धत की गई है, ऐसी कोई बात दिखाई नहीं देती। उन्होंने कभी कोई ऐसा प्रचार नहीं किया और न ऐसा कार्य किया, जिससे हिंदू- धर्म पर चोट लगती हो। हिंदुओं में जो अनगिनती देवी- देवताओं की पूजा और छुआछूत का जंजाल बढ़ गया था, उसी का खंडन उन्होंने वाणी और कर्म रूप में किया और वास्तव में ये ही दो बातें हिंदू- समाज को निर्बल
तथा अन्य लोगों का भक्ष्य- शिकार बनाने वाली हैं। इनका त्याग जितना जल्दी किया गया उतना ही इस जाति का हित है, जब गुरू नानक की ५००वीं जयंती मनाई गई तो भारत के प्रधानमंत्री से लेकर छोटे- बड़े सभी नेताओं तक ने उनके महत्त्व को स्वीकार करके उन्हें धर्म तथा समाज का सच्चा संशोधक स्वीकार किया। सभी सामयिक पत्रों ने भी उनके संबंध में विद्वानों के लेख प्रकाशित किये। उससे यह अच्छी तरह विदित हो जाता है कि जिस समय विदेशियों के आक्रमणों के कारण इस देश में तथा विशेष रूप से पंजाब में धर्म डूबने लगा था तो गुरू नानक ने अपने सच्चे और निर्भीक उपदेशों द्वारा उसकी रक्षा की। उन्होंने लोगों को समझाया कि ईश्वर एक है। सब धर्म अपने- अपने मार्ग से मनुष्य को उसी के समीप पहुँचाते हैं। धर्म का असली सार बाह्य पूजा, कर्मकांड और परंपरायें नहीं हैं, वरन् उसका वास्तविक तत्त्व है, अपने आप को जीतना; इंद्रियों को वश में रखना सुख- दुःख, हानि- लाभ में एक सा भाव रखना धर्म का सबसे बड़ा लक्षण है। सबके साथ सेवा, नेकी और सच्चाई का व्यवहार करना और इन सब के साथ- साथ भगवान् को याद करते रहना। हम नहीं समझते कि कोई भी धर्म इसे अमान्य कर सकता है। गुरू नानक के उपदेशों का ही नहीं वरन् सभी शास्त्रों का यही सार है।
इस दृष्टि से हम नानक जी को हिंदू समाज के एक उद्धारकर्ता का दर्जा दे सकते हैं। यह बात दूसरी है कि आज सिक्खों का रवैया बहुत कुछ बदला हुआ है और वे हिंदुत्व ही क्या, भारतीय संस्कृति की ओर भी दुर्लक्ष्यकर रहे हैं। पर नानक जी की वाणियों में, जिनमें से कुछ इस लेख में उद्धत की गई है, ऐसी कोई बात दिखाई नहीं देती। उन्होंने कभी कोई ऐसा प्रचार नहीं किया और न ऐसा कार्य किया, जिससे हिंदू- धर्म पर चोट लगती हो। हिंदुओं में जो अनगिनती देवी- देवताओं की पूजा और छुआछूत का जंजाल बढ़ गया था, उसी का खंडन उन्होंने वाणी और कर्म रूप में किया और वास्तव में ये ही दो बातें हिंदू- समाज को निर्बल
तथा अन्य लोगों का भक्ष्य- शिकार बनाने वाली हैं। इनका त्याग जितना जल्दी किया गया उतना ही इस जाति का हित है, जब गुरू नानक की ५००वीं जयंती मनाई गई तो भारत के प्रधानमंत्री से लेकर छोटे- बड़े सभी नेताओं तक ने उनके महत्त्व को स्वीकार करके उन्हें धर्म तथा समाज का सच्चा संशोधक स्वीकार किया। सभी सामयिक पत्रों ने भी उनके संबंध में विद्वानों के लेख प्रकाशित किये। उससे यह अच्छी तरह विदित हो जाता है कि जिस समय विदेशियों के आक्रमणों के कारण इस देश में तथा विशेष रूप से पंजाब में धर्म डूबने लगा था तो गुरू नानक ने अपने सच्चे और निर्भीक उपदेशों द्वारा उसकी रक्षा की। उन्होंने लोगों को समझाया कि ईश्वर एक है। सब धर्म अपने- अपने मार्ग से मनुष्य को उसी के समीप पहुँचाते हैं। धर्म का असली सार बाह्य पूजा, कर्मकांड और परंपरायें नहीं हैं, वरन् उसका वास्तविक तत्त्व है, अपने आप को जीतना; इंद्रियों को वश में रखना सुख- दुःख, हानि- लाभ में एक सा भाव रखना धर्म का सबसे बड़ा लक्षण है। सबके साथ सेवा, नेकी और सच्चाई का व्यवहार करना और इन सब के साथ- साथ भगवान् को याद करते रहना। हम नहीं समझते कि कोई भी धर्म इसे अमान्य कर सकता है। गुरू नानक के उपदेशों का ही नहीं वरन् सभी शास्त्रों का यही सार है।

