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Books - ज्ञानयोग की साधना

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सद्ज्ञान और जीवन-फल

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प्रगति के लिए ज्ञान की नितान्त आवश्यकता है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य भी अन्य जीव-जन्तुओं की तरह आत्मिक दृष्टि से हीन अवस्था में ही पड़ा रह सकता है। अन्य प्रदेशों में एकाकी रहने वाले आदिवासी अनेकों मानवीय सत्प्रवृत्तियों से वंचित रह जाते हैं। शिक्षण के अभाव में न तो प्रस्तुत क्षमताओं का विकास हो सकता है और न परिष्कार। ऐसी दशा में शरीर की प्रेरणाओं के आधार पर ही जीवन-यापन करना पड़ता है। ऐसे जीवन को पाशविक जीवन ही कहा जा सकता है। ज्ञान प्राप्ति की व्यवस्था जो न कर सकेगा विवेक की आंखों जिसकी न खुल सकेंगी उसे अज्ञान के अन्धकार में भटकते हुए निम्न स्तरीय दिनचर्या के आधार पर अपनी जिन्दगी काटनी पड़ेगी।
मनुष्य में मूलतः अनेक महत्वपूर्ण शक्तियां मौजूद हैं। उसका सदुपयोग करने की गिरी हुई परिस्थितियों का व्यक्ति भी निरन्तर प्रगति करने की सुविधाएं एकत्रित कर सकता है और बड़ी से बड़ी बाधाओं को पार करते हुए उन्नति के उच्चतम शिखर पर पहुंच सकता है। पर यह सम्भव तभी है जब वह ज्ञान का महत्व समझे और उसकी प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। सीखने में जिसे रुचि न होगी या जिसे प्रशिक्षण के साधन न मिलेंगे, उसके लिए अपनी आन्तरिक क्षमताओं को पहचान सकना तक कठिन है। फिर उनका जागरण, अभिवर्धन और परिष्कार तो हो ही कैसे सकेगा? इसीलिए मनीषियों ने इस बात पर अधिक जोर दिया है कि मानवता को सार्थक बनाने वाले ज्ञान की साधना में निरन्तर संलग्न रहा जाय। एक दिन भी ऐसा न बीते जिसमें ज्ञान की आराधना न की गई हो।
लोहा एक साधारण पदार्थ है, पर उसका स्पर्श जब पारस-मणि से हो जाता है तो उसे सोने के रूप में बदलते देर नहीं लगती। मनुष्य भी साधारण तथा एक दुर्बलकाय नगण्य पशु मात्र है पर उसे जब ज्ञान का लाभ होता है, तो वह अपनी मानसिक क्षमता का पूरा लाभ उठा सकता है और उस मार्ग पर चल सकता है जिसके लिए उसे इस सुरदुर्लभ सौभाग्य की प्राप्ति हुई है।
स्वाध्याय और सत्संग मानवीय जीवन के आकाश में सूर्य और चन्द्रमा की तरह चमकने वाले दो उज्ज्वल प्रकाश-केन्द्र है। जहां इनका अस्तित्व न होगा वहां चिरस्थायी अन्धकार छाया रहेगा। अन्तरात्मा में विकास की अनेक सम्भावनाएं मौजूद हैं। पर वे प्रस्फुटित और पल्लवित तभी होती हैं जब उन्हें उपयुक्त साधक मिलें। बीज में वृक्ष बनने की सम्भावना निश्चित रूप से मौजूद है, पर उसको मूर्त रूप तभी मिल सकेगा जब खाद पानी की आवश्यकता की उचित रूप से पूर्ति होती रहे। उसके अभाव में सशक्त बीज भी अंकुरित न हो सकेगा। व्यक्ति में बीज की ही भांति ईश्वर प्रदत्त अनेक सुसम्भावनाएं विद्यमान हैं पर उनका विकास सत्संग और स्वाध्याय के ही आधार पर होता है।
दर्पण के सामने जो भी वस्तुएं आती हैं उनकी वैसी ही छाया दीखने लगती है। कपड़े को जैसे जंग में रंगा जाय वह वैसा ही बन जाता है। बालक जन्मतः सभी समान मनोभूमि लेकर आते हैं, पर उन्हें अपने परिवार एवं वातावरण में जो कुछ सीखने को मिलता है वे उसी ढांचे में ढलने लगते हैं। भाषा, स्वभाव, संस्कार, आहार, अभ्यास, दृष्टिकोण आदि का निर्माण मनुष्य का बालक अपने समीपवर्ती वातावरण से ही ग्रहण करता है। सज्जन माता से जन्मे बालक का पालन-पोषण यदि कुसंस्कारी वातावरण में हो तो वह कुसंस्कारी ही बनेगा। इसी प्रकार निम्न स्तर के घन में जन्मा बालक यदि सुसंस्कारी लोगों द्वारा पाला जाय, तो उसका वैसा ही सुसंस्कृत होना निश्चित है।
कभी-कभी कुछ अपवाद भी ऐसे दीखने में आते हैं कि अच्छे लोगों के घर जन्मे बच्चे कुसंस्कारी और बुरी स्थितियों में जन्मे बालक प्रबुद्ध स्तर के बने हैं। ऐसे उदाहरणों में से कुछ में तो पूर्व जन्मों की प्राप्त प्रेरणा प्रधान कारण रखती है और कुछ में ऐसा होता है कि वे बालक किसी प्रभावशाली सम्पर्क में आ जाते है और निकटवर्ती परिस्थितियों के प्रभाव को हटाकर किसी मनस्वी व्यक्ति की प्रेरणा से उत्थान या पतन के मार्ग पर चल पड़ते हैं। प्रेरणा कहीं न कहीं से उन्हें जरूर प्राप्त हुई होती है। यदि किसी बालक को बाह्य वातावरण से सर्वथा पृथक् रखा जाय तो वह नर पशु के अतिरिक्त और कुछ भी न बन सकेगा। भेड़िये की मांद में पकड़े गये बालक रामू का लखनऊ अस्पताल में अभी बहुत कुछ वैसा ही स्वभाव बना हुआ है जैसा कि उसका पालन करने वाले भेड़िये ने उसे सिखा दिया था।
हनुमान जी में बहुत बल विद्यमान था पर ज्ञान के अभाव में वे समुद्र लांघने को तैयार नहीं हो पा रहे थे। जामवन्त ने उन्हें आत्मबोध कराया तो वे खुशी-खुशी तैयार हो गये और सहज ही उस कार्य को सम्पन्न कर सकने में भी सफल हो गये। हनुमान की उस सफलता में जामवन्त का उद्बोधन अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। यदि जामवन्त के स्थान पर उस समय कोई कायर और डरपोक सलाहकार रहा होता तो वे अनेक आशंकायें व्यक्त करके हनुमान के मनोबल को और भी अधिक गिरा सकता था, ऐसी दशा में उनके लिये समुद्र लांघने के बात को सोच सकना भी कठिन हो जाता। संगीत का प्रभाव अन्य जीवों के लिये महत्वहीन भले ही हो मानव-प्राणी के लिये तो वही सबसे बड़ा प्रश्न है। सुसंगति और कुसंगति को उसके जीवन-मरण एवं उत्थान पतन की समस्या कहा जा सकता है।
जीवनोत्कर्ष के लिए जिस सद्ज्ञान की आवश्यकता है वह सत्संग में प्राप्त होता है और उपर्युक्त सत्संग के लिये आज सबसे सरल और सबसे प्रभावशाली उपाय यह है कि स्वाध्याय के माध्यम से सत्पुरुषों का सान्निध्य निरन्तर प्राप्त करते रहा जाय। यह कार्य श्रेष्ठ साहित्य द्वारा ही सम्भव हो सकता है। सद्ग्रन्थों में महापुरुषों के जीवन चरित्र खुले पृष्ठों की तरह सर्वसाधारण के लिये उपलब्ध हैं। बहुत पूछ-ताछ करने पर जो बातें जानी जा सकती हैं वे उन जीवन-चरित्रों में सहज ही लिखी मिल जाती हैं। फिर जिन महापुरुषों के प्रवचन जिस विषय पर सुनने हों, जिस शंका का समाधान उनसे प्राप्त करना हो उसके लिये उनका साहित्य पढ़ लेना चाहिए। इस रीति से हर घड़ी हर विषय पर हमें महापुरुष का सत्संग-लाभ घर बैठे हो सकता है।
ऐसा सत्साहित्य मानव-जीवन के विकास का सर्वश्रेष्ठ माध्यम हो सकता है, जो उसे जिन्दगी जीने की कला सिखा सके। गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार करते हुए सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने की प्रेरणा को संजीवनी बूटी कह सकते हैं। यही अमरता प्रदान करने वाला अमृत है, इसी को कायाकल्प करने वाला पारस कह सकते हैं और इसी की सच्ची तृप्ति और शाश्वत शान्ति प्राप्त करने के कारण उसे कल्पवृक्ष भी कहा जा सकता है। जिसकी सत्साहित्य में अभिरुचि उत्पन्न हो गई और जो जीवन-निर्माण के सद्ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने लगा उसका कल्याण अति निकट है यही समझना चाहिए।
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