स्वाध्याय आत्मा का भोजन
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संसार में जितने भी महापुरुष वैज्ञानिक, सन्त-महात्मा-ऋषि, महर्षि आदि हुए हैं, वे सभी स्वाध्यायशील थे। स्वाध्याय सत्साहित्य का एवं वेद, उपनिषद्, गीता आदि आर्ष-ग्रन्थ तथा महापुरुषों के जीवनवृतान्तों का अध्ययन तथा मनन करना है। कुछ भी पढ़ा जाय उसे स्वाध्याय नहीं कहा जा सकता। मनोरंजन प्रधान उपन्यास नाटक एवं शृंगार-रस पूर्ण पुस्तकों को पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। इस प्रकार का साहित्य पढ़ना तो वास्तव में समय का दुरुपयोग करना एवं अपनी आत्मा को कलुषित करना है। कुरुचिपूर्ण गन्दे साहित्य को दूना भी पाप समझना चाहिये।
सच्चा स्वाध्याय वही है, जिससे हमारी चिन्तायें दूर हों हमारी शंका-कुशंकाओं का समाधान हो, मन में सद्भाव और शुभ संकल्पों का उदय हो तथा आत्मा को शांति का अनुभव हो। हमारे शास्त्रों में स्वाध्याय का बड़ा माहात्म्य बताया गया है। योग-शास्त्रों में कहा गया है—
स्वाध्यायाद् योगमासीत् योगात् स्वाध्यायमानयेत्।
स्वाध्याय-योग-सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते।।
अर्थात्—‘‘स्वाध्याय से योग की उपासना करे और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करे। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।’’
त्रयो धर्म स्कन्धा यज्ञोऽध्ययनम् दानमिति।
अर्थात्—‘‘धर्म के तीन स्कन्ध हैं। यज्ञ, स्वाध्याय और दान।’’
श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—
स्वाध्यायाभ्यसन चैव वाङ्मयं तप उच्यते। 17।11
अर्थात्—‘‘स्वाध्याय करना ही प्राणी का तप है।’’
शरीर को स्वस्थ और सुदृढ़ बनाये रखने के लिये जिस प्रकार पौष्टिक आहार की आवश्यकता है उसी प्रकार मन और बुद्धि को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाये रखने के लिये उत्तमोत्तम ग्रन्थों का अध्ययन अनिवार्य है। अध्ययन एवं स्वाध्याय के लिये निम्न कोटि का साहित्य हानिकर होगा, उसी प्रकार जैसे अखाद्य एवं दूषित पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अतएव हमें इस सम्बन्ध में परिपूर्ण सतर्कता और सावधानी से काम लेना होगा। सच्चा स्वाध्याय वही है, जिसके द्वारा हमारा मन बाह्य विषयों से अलिप्त रहकर आत्मा के अनुसन्धान में प्रवृत्त हो एवं हमारी मानसिक दुर्भावनाओं, दुर्बलताओं तथा दूषित मनोविकारों का दमन हो सके और हमारा मन एक अनिर्वचनीय अलौकिक आनन्द से परिप्लावित हो उठे।
मनुस्मृति में कहा गया है—
स्वाध्याय नित्य युक्तः स्यादेव चैवेह कर्मणा।
अर्थात्—‘‘स्वाध्याय और शुभ कर्म में मनुष्य सदा तत्पर रहे।’’
जिसके द्वारा ‘स्व’ आत्मा व परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किया जा सके और जिसके द्वारा अभ्युदय निःश्रेयस की प्राप्ति की जा सके वही सच्चा स्वाध्याय है। अतएव प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अच्छे ग्रन्थों, सदाचार प्रवर्तक पत्र पत्रिकाओं एवं सत्प्रेरणादायी पुस्तकों का सदैव स्वाध्याय करता रहे। महाभारत के शांति-पर्व में कहा गया है—‘नित्य स्वाध्यायशीलश्च दुर्गान्याति तरन्ति ते’—नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दुःखों से पार हो जाता है।
स्वाध्याय ब्रह्मचर्य पालन में सहायक है। स्वाध्याय से चरित्र निर्माण में भी सहायता मिलती है। इसके द्वारा दुराचारी, सदाचारी और व्यभिचारी भी ब्रह्मचारी बन जाता है। अतः यदि आप समुन्नत होना चाहते हैं, अपने जीवन को पवित्र, शुद्ध और निर्मल बनाना चाहते हैं तो आलस्य और प्रमाद को छोड़कर नित्य सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय का आज से ही संकल्प कीजिए और उसका दृढ़ता से पालन कीजिए।
सच्चा स्वाध्याय वही है, जिससे हमारी चिन्तायें दूर हों हमारी शंका-कुशंकाओं का समाधान हो, मन में सद्भाव और शुभ संकल्पों का उदय हो तथा आत्मा को शांति का अनुभव हो। हमारे शास्त्रों में स्वाध्याय का बड़ा माहात्म्य बताया गया है। योग-शास्त्रों में कहा गया है—
स्वाध्यायाद् योगमासीत् योगात् स्वाध्यायमानयेत्।
स्वाध्याय-योग-सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते।।
अर्थात्—‘‘स्वाध्याय से योग की उपासना करे और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करे। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।’’
त्रयो धर्म स्कन्धा यज्ञोऽध्ययनम् दानमिति।
अर्थात्—‘‘धर्म के तीन स्कन्ध हैं। यज्ञ, स्वाध्याय और दान।’’
श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—
स्वाध्यायाभ्यसन चैव वाङ्मयं तप उच्यते। 17।11
अर्थात्—‘‘स्वाध्याय करना ही प्राणी का तप है।’’
शरीर को स्वस्थ और सुदृढ़ बनाये रखने के लिये जिस प्रकार पौष्टिक आहार की आवश्यकता है उसी प्रकार मन और बुद्धि को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाये रखने के लिये उत्तमोत्तम ग्रन्थों का अध्ययन अनिवार्य है। अध्ययन एवं स्वाध्याय के लिये निम्न कोटि का साहित्य हानिकर होगा, उसी प्रकार जैसे अखाद्य एवं दूषित पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अतएव हमें इस सम्बन्ध में परिपूर्ण सतर्कता और सावधानी से काम लेना होगा। सच्चा स्वाध्याय वही है, जिसके द्वारा हमारा मन बाह्य विषयों से अलिप्त रहकर आत्मा के अनुसन्धान में प्रवृत्त हो एवं हमारी मानसिक दुर्भावनाओं, दुर्बलताओं तथा दूषित मनोविकारों का दमन हो सके और हमारा मन एक अनिर्वचनीय अलौकिक आनन्द से परिप्लावित हो उठे।
मनुस्मृति में कहा गया है—
स्वाध्याय नित्य युक्तः स्यादेव चैवेह कर्मणा।
अर्थात्—‘‘स्वाध्याय और शुभ कर्म में मनुष्य सदा तत्पर रहे।’’
जिसके द्वारा ‘स्व’ आत्मा व परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किया जा सके और जिसके द्वारा अभ्युदय निःश्रेयस की प्राप्ति की जा सके वही सच्चा स्वाध्याय है। अतएव प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अच्छे ग्रन्थों, सदाचार प्रवर्तक पत्र पत्रिकाओं एवं सत्प्रेरणादायी पुस्तकों का सदैव स्वाध्याय करता रहे। महाभारत के शांति-पर्व में कहा गया है—‘नित्य स्वाध्यायशीलश्च दुर्गान्याति तरन्ति ते’—नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दुःखों से पार हो जाता है।
स्वाध्याय ब्रह्मचर्य पालन में सहायक है। स्वाध्याय से चरित्र निर्माण में भी सहायता मिलती है। इसके द्वारा दुराचारी, सदाचारी और व्यभिचारी भी ब्रह्मचारी बन जाता है। अतः यदि आप समुन्नत होना चाहते हैं, अपने जीवन को पवित्र, शुद्ध और निर्मल बनाना चाहते हैं तो आलस्य और प्रमाद को छोड़कर नित्य सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय का आज से ही संकल्प कीजिए और उसका दृढ़ता से पालन कीजिए।

