संसार की सर्वोपरि सम्पत्ति ज्ञान
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
सांसारिक सुखों की उपलब्धि के लिए शरीर-बल आवश्यक है। धन हो तो प्रत्येक मनोवांछित वस्तु सरलता पूर्वक प्राप्त कर सकते हैं। जन-शक्ति के आधार पर अयोग्य व्यक्ति तक सत्तारूढ़ हुए हैं। चातुर्य, पद, सत्ता आदि से कोई भी व्यक्ति मनचाही इच्छायें पूरी कर सका है, किन्तु ज्ञान के अभाव में यह सारी शक्तियां लघु प्रतीत होती हैं। ज्ञान संसार का सर्वोत्तम बल है इसी के आधार पर दूसरी सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं। अज्ञान-वश मनुष्य तन, धन, जन सभी का नाश कर लेता है। दुष्कर्म में लगे व्यक्ति का कहां तो शरीर ठीक रहेगा, कितने दिन धन ठहरेगा और कब तक दूसरों में सहयोग सहानुभूति व आत्मीयता मिलेगी? मनुष्य ज्ञान के अभाव में ही बुरे कर्मों की ओर प्रेरित होता है। इसलिये संसार में ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ बल कहा गया है।
बुद्धिमान व्यक्ति कम-कम से साधनों में भी संतुष्ट दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि अज्ञानता के दुष्परिणामों से वे बचे रहते हैं। उनके प्रत्येक कार्य में विवेक होता है, जो कुछ करते हैं उसे पहले भली प्रकार सोच-समझ लेते हैं। पूरी तरह विचार करने के बाद किये गये कार्यों से हानि की सम्भावना प्रायः समाप्त हो जाती है और उस कार्य में पड़ने वाली बाधाओं, परेशानियों और मुसीबतों से बचने का रास्ता मिल जाता है। ज्ञान मनुष्य को जीवन का सही रास्ता प्रदर्शित करता है, जिससे उसे कठिनाइयां कम और सफलतायें अधिक मिलती हैं। कदाचित परिस्थितिवश कोई विघ्न आ जाए तो अपनी दूरदर्शिता के कारण बुद्धिमान व्यक्ति ही उसे आसानी से हल कर लेते हैं।
ओछे काम करने वाले लोगों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि ऐसे कार्य अधिकांश अज्ञानता-वश ही करते हैं। जीवन की सही दिशा निर्माण करने की क्षमता न तो धन में है, न पद और प्रतिष्ठा में। आत्म-निर्माण की प्रक्रिया सत्कर्मों से पूरी होती है। सन्मार्ग में भी कोई स्वतः प्रवृत्त होता हो यह भी नहीं कहा जा सकता। यह प्रेरणा हमें औरों से मिलती है। दूसरों की इच्छाओं का अनुकरण करते हुए भी महानता की मंजिल तक पहुंचने का नियम बना हुआ है। ऐसी बुद्धि किसी को मिल जाये तो उसे यही समझना चाहिये कि परमात्मा की उस पर बड़ी कृपा है। ज्ञान से मनुष्य की ऐसी ही धर्म-बुद्धि जागृत होती है, इसलिये ज्ञान को परमात्मा का सर्वोत्तम वरदान मानना पड़ता है।
अज्ञानता के दुष्परिणामों से बचने का सही तरीका सबसे अच्छा है कि हम अपनी मानसिक चेष्टाओं को संसार का रहस्य समझने में लगायें। विचार करने की शक्ति हमें इसलिये मिली है कि हम सृष्टि की वस्तु-स्थिति को समझें और इसका लाभ अपने सजातीयों को भी दें, किन्तु यह सब कुछ तभी सम्भव है जब हमारा ज्ञान बढ़े। जब तक हम ज्ञानवान् नहीं बनते, अज्ञानता का शैतान हमारे पीछे पड़ा रहेगा। ऐसी अवस्था में हमारी मोह-ग्रन्थियां ज्यों की त्यों बंधी रहेंगी। अज्ञानता का अन्धकार और विश्व-रहस्य की जानकारी के लिये ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है। इसी से भव-बन्धन टूटते हैं।
व्यक्ति की पात्रत्व की सच्ची कसौटी उसके ज्ञान से होती है। समाज में अधिक देर तक सम्मान व प्रतिष्ठा उन्हीं को मिलती है जो शीलवान, शिष्ट व नम्र होते हैं। उद्दण्ड, दुराचारी व अशिष्ट व्यक्ति को सभी जगह तिरस्कार ही मिलता है। इन आध्यात्मिक सद्गुणों का आन्तरिक प्रतिष्ठान ज्ञान से होता है इससे सदाचार में रुचि बढ़ती हैं। आप्त वचन है ‘‘विद्या ददाति विनयम् विनयाद्याति पात्रताम्’’ अर्थात् विद्या से ज्ञान विनयशीलता आती है। विनयशीलता युक्त ही पात्रत्व के सच्चे अधिकारी होते हैं।
मानवीय-प्रतिभा का विकास ज्ञान से होता है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन सभी के महान् व्यक्तित्व का विकास ज्ञान से हुआ है। भगवान् राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध, ईसामसीह, सुकरात आदि सभी महापुरुषों ने ज्ञान की श्रेष्ठता को स्वीकार किया है। सांसारिक दुःखों से परित्राण-पाने के लिए मानव जाति को सदैव ही इसकी आवश्यकता हुई है। शास्त्रकार ने ज्ञान की महत्ता प्रतिपादित करते हुए लिखा है:—
मोक्षस्य न हि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमे ववा।
अज्ञान हृदयग्रन्थिर्नाशौ मोक्ष इति स्सृतः।। (शिव-गीता)
अर्थात् मोक्ष किसी स्थान विशेष में उपलब्ध नहीं होता। इसे पाने के लिये गांव-गांव भटकने की भी आवश्यकता नहीं। हृदय की अज्ञान ग्रन्थि का नष्ट हो जाना ही मोक्ष है। दूसरे शब्दों में स्वर्ग, मुक्ति का साधन है—ज्ञान। इसे पा लिया तो इसी जीवन में जीवन-मुक्ति मिल गई समझनी चाहिये।
इस युग में विज्ञान की शाखा-प्रशाखायें सर्वत्र फैली हैं। प्रकाश, ताप, स्वर, विद्युत, चुम्बकत्व और पदार्थों की जितनी वैज्ञानिक शोध इस युग में हुई है उसी को ज्ञान मानने की आज परम्परा चल पड़ी है। इसी के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन भी हो रहा है। तथाकथित विज्ञान को ही ज्ञान मान लेने की भूल सभी कर रहे हैं किन्तु यह जान लेना नितान्त आवश्यक है कि ज्ञान वृद्धि की उस सूक्ष्म क्रियाशीलता का नाम है जो मनुष्य को सन्मार्ग की दिशा में प्रेरित करता है। विज्ञान का फल है इहलौकिक कामना पूर्ति और ज्ञान का सम्बन्ध है अन्तर्जगत् से। ज्ञान वह है जो मनुष्य को आत्मदर्शन में लगाये।
इसके लिये प्रमाद को त्याग कर विनम्र बनना पड़ता है। जो केवल अपनी ही अहंता प्रतिपादित करते रहते हैं, जिन्हें केवल अहंकार प्यारा है वे अपने संकुचित दृष्टिकोण के कारण ज्ञान के आनन्द और अनुभूति को जान नहीं पाते। छोटे से छोटा बन जाने पर ही महानता की पहचान की जा सकती है। गल्ले के भारी ढेर पंसेरियों से तौले जाते हैं। कपड़ों के थान गजों से नापते हैं। अमुक स्थान कितनी दूर है, यह मील के पत्थर बताते हैं। ऐसे ही विराट् के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के लिये महानता से गठबन्धन करने के लिये—हमें विनम्र बनना पड़ता है। भय, लज्जा और संकोच को त्याग कर तत्परतापूर्वक अपनी चेष्टाओं को उस ओर मोड़ना पड़ता है। तब कहीं ज्ञानवान् बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
अपने पास धन हो तो संसार की अनेक वस्तुयें क्रय की जा सकती हैं शारीरिक शक्ति हो तो दूसरों पर रौब जमाया जा सकता है। इससे दूसरों पर शासन भी कर सकते हैं औरों के अधिकारों का अपहरण भी कोई बलशाली कर सकता है। किन्तु विद्या किसी से खरीदी नहीं जा सकती, दूसरों से छीन भी नहीं सकते। इसके लिये एकान्त में रहकर निरन्तर शोध, अध्ययन और पर्यवेक्षण की आवश्यकता पड़ती है। अपनी मानसिक चेष्टाओं को सरस व मनोरंजक कार्यक्रमों से मोड़ कर इसमें लगाना पड़ता है। ज्ञानार्जन एक महान् तप है। इसे प्राप्त कर लेने के बाद खो जाने का भय नहीं रहता।
किन्हीं बालकों में किशोरावस्था में ही अलौकिक बौद्धिक क्षमता या प्रतिभा देखते हैं तो यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि एक ही वय, स्थान व वातावरण में अनुकूल स्थिति प्राप्त होने पर भी दो बालकों की मानसिक शक्ति में यह अन्तर क्यों होता है? तब यह मानना पड़ता है कि एक में पूर्व जन्मों के ज्ञान के संस्कार प्रबल होते हैं दूसरे में क्षीण। भरत, ध्रुव, प्रहलाद, अभिमन्यु आदि में जन्म से ही प्रखर-ज्ञान के उज्ज्वल संस्कार पड़े थे। जगद्गुरु शंकराचार्य ने थोड़ी ही अवस्था में पूर्णता प्राप्त कर ली थी। यह उनके पिछले जन्मों के परिपक्व ज्ञान के कारण ही हुआ मानना पड़ता है। इससे इस मत की पुष्टि होती है कि चिर-सहयोग के रूप में जन्म-जन्मान्तरों तक साथ रहने वाला अपना ज्ञान ही है। ज्ञान का नाश नहीं होता। वह अजर है, अमर है।
सार्थक-जीवन की आधार-शिला ज्ञान है। बुद्धिमत्ता की सच्ची कसौटी यह है कि मनुष्य अपनी सच्ची जीवन-दिशा निर्धारित करे। कुछ न कुछ करते रहें चाहे वह अहितकर क्यों न हो, यह बात तर्कसंगत प्रतीत नहीं होती। कर्म का महत्व तब है जब उससे हमें अपना जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता मिलती है। यह प्रतिक्रिया मानव-जीवन में सन्मार्ग पर चलने से पूरी होती है और सन्मार्ग पर देर तक टिके रहना ज्ञान प्राप्ति से ही सम्भव है। इसे प्राप्त करने के लिये अपने जीवन को साधनामय बनायें तो ही ज्ञानवान् बनने का सच्चा सुख प्राप्त कर सकते है। ज्ञान ही इस संसार की सर्वोपरि सम्पत्ति है।
ज्ञान को आत्मा का नेत्र कहा गया है। नेत्रविहीन व्यक्ति के लिए सारा संसार अन्धकारमय है। इसी प्रकार ज्ञानविहीन व्यक्ति के लिये इस संसार में जो कुछ उत्कृष्ट है उसे देख सकना असम्भव है। ज्ञान के आधार पर धर्म का, कर्त्तव्य का, शुभ-अशुभ का, उचित-अनुचित का विवेक होता है और पाप प्रलोभनों के आकर्षणों के पार यह देख सकना सम्भव होता है कि अन्ततः दूरवर्ती हित किसमें है। अज्ञानी व्यक्ति यह सब जान नहीं पाते। इन्द्रियों की वासना और प्रलोभनों की तृष्णा जीव को मनमाना नचाती रहती है और अन्त में उसे पतन के गहरे गर्त में धकेल देती है। इस दुर्दशा से बचाव तभी हो सकता है जब ज्ञान दीपक का प्रकाश हो रहा हो और विवेक के नेत्र खुले हुए हों।
भौतिक जीवन की सफलता और आत्मिक जीवन की पूर्णता के लिए सबसे प्रथम सोपान ज्ञान की प्राप्ति है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के आधार पर जीवन की गुत्थियों को समझना और उन्हें सुलझाने का मार्ग खोजना सम्भव होता है इसलिये मनीषियों ने इन बात पर बहुत जोर दिया है कि मनुष्य को ज्ञानवान् बनना चाहिए। अत्यन्त आवश्यक कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम ज्ञान सम्पादन का भी रहना चाहिए।
स्कूली शिक्षा ‘ज्ञान’ की श्रेणी में नहीं आती। वह ज्ञान प्राप्ति के लिये एक साधन मात्र है क्योंकि भाषा ज्ञान के बिना शास्त्रों का स्वाध्याय नहीं हो सकता। कठिन अभिव्यक्तियों को समझा नहीं जा सकता। इसलिये शिक्षा की भी आवश्यकता एवं उपयोगिता माननी ही पड़ेगी। ज्ञान का स्तर इससे ऊपर है। स्वाध्याय, सत्संग यह दो ज्ञान प्राप्ति के बाह्य उपाय हैं और चिन्तन, मनन यह आन्तरिक उपाय हैं। इन चारों चरणों से मिलकर सर्वांगपूर्ण ज्ञान साधना बनती है और उसी के आधार पर जीव अपने लक्ष्य मार्ग की ओर गतिशील होता है।
भगवान राम ने जब गुरु वशिष्ठजी से सांसारिक क्लेशों के भव बन्धनों से छुटकारे का उपाय पूछा तो उन्होंने यही कहा कि—यह सब बिना ‘ज्ञान’ प्राप्ति के सम्भव नहीं। यदि भव सागर से पार होने की इच्छा है तो सबसे प्रथम ज्ञान-संचय का प्रयत्न करो। योग वशिष्ठ में इस सम्बन्ध में बहुत बल दिया गया है—
ज्ञानान्निर्दुःखतामेति ज्ञानादज्ञान संक्षयः।
ज्ञानादेवपरासिद्धिनन्यिस्मादाम वस्तुतः।।
—योगवशिष्ठ 5।88।12
हे राम, ज्ञान से ही दुःख दूर होते हैं, ज्ञान से अज्ञान का निवारण होता है, ज्ञान से ही परम सिद्धि प्राप्त होती है और किसी उपाय से नहीं।
ज्ञानवानेन सुखवान् ज्ञानवानेन जीवति।
ज्ञानवानेन बलवास्तस्माज्ज्ञानमयी भव।।
—योगवशिष्ठ 5।92।49
ज्ञानी ही सुखी है, ज्ञानी ही जीवित है, ज्ञानी ही बलवान् है इसलिये ज्ञानी बनना चाहिये।
यथा दीपः प्रकाशात्मा स्वल्पो वा यदि वा महान्।
ज्ञानात्मान तथा विद्यादात्मान सर्वजन्तुषु।।
जैसे छोटा या बड़ा दीपक प्रकाशवान् ही होता है, वैसे ही सब छोटे-बड़े प्राणियों की आत्मा भी ज्ञानरूप ही है।
ज्ञानमेव पर ब्रह्मज्ञान वंधाय चेष्यते।
ज्ञानात्मकमिद विश्वं न ज्ञानाद्विद्यते परम्।।
ज्ञान से ही ब्रह्म की प्राप्ति होती है, विपरीत ज्ञान से ही बन्धन बांधते हैं, इस संसार में जो कुछ है ज्ञानात्मक ही है। ज्ञान से परे कुछ भी नहीं है।
अस्त देवाधि देवस्य परस्य परमात्मनः।
ज्ञानादेव परा सिद्धिर्नत्वनुष्ठानदुःखतः।।
—योगवशिष्ठ 3।6।1
उस परमदेव परमात्मा को ज्ञान द्वारा ही प्राप्त किया जाता है और किसी अनुष्ठान से उसकी प्राप्ति सम्भव नहीं।
एकेनैवाऽमृतेनैव बोधेन स्वेन पूज्यते।
एतदेव पर ध्यान पूजैर्षव परा स्मृता।।
योगवशिष्ठ 6।38।25
उस आत्मा की एक ही प्रकार से ज्ञान द्वारा पूजा की जाती है। ध्यान ही उस आत्म देवता का सबसे बड़ा पूजन है।
अत्रज्ञानमनुष्ठान न त्वन्यदुपयुज्यते।
—योगवशिष्ठ 3।6।2
मुक्ति प्राप्त करने के लिये ज्ञान ही एक मात्र उपाय है। दूसरा और कोई नहीं।
ज्ञानादेव परोसिद्धिर्नत्वनुष्ठानदुःखत्तः।
—योगवशिष्ठ 3।6।1
परम सिद्धि ज्ञान से ही प्राप्त होती है और किसी अनुष्ठान से नहीं।
ज्ञानवानुदितानन्दो न क्वचित्परिमज्जति।
—योगवशिष्ठ 4।93।24
ज्ञानी ही परम आनन्द प्राप्त करता है, वही पार होता है।
ततो वच्मि महावाहो यथाज्ञानेतरा गतिः।
नास्ति संसार तरणे पाशबन्धस्य चेतसः।।
—योगवशिष्ठ 5।6।72
बन्धन में पड़े हुए तन को मुक्त करने और संसार सागर तरने के लिये ज्ञान के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
ज्ञानयुक्ति प्लवेनैव संसारब्धि सुदुस्तरम्।
महाधियः समुत्तीर्णा निमेषेण रघूद्वह।।
—योगवशिष्ठ 2।11।16
संसाररूपी समुद्र को बुद्धिमान लोग ज्ञानरूपी नौका पर सवार होकर आसानी से पार कर जाते हैं।
संसारोत्तरणे जन्तोरुपायो ज्ञानमेव हि।
तपो दानं तथा तीर्थमनुहायाः प्रकीर्तियाः।।
—योगवशिष्ठ
संसार से पार होने का एक मात्र उपाय ज्ञान ही है। तप, दान, तीर्थ आदि उपाय नहीं।
दुरुत्तरा या विपदो दुःख कल्लोल संकुलाः।
तीर्यते प्रज्ञया ताभ्योनानाऽपद्धयो महामते।।
—योगवशिष्ठ 5।12।20
विभिन्न प्रकार की कठिन विपत्तियों के समुद्र को ज्ञान द्वारा ही तरा जाता है।
कलना सर्व जन्तूनां विज्ञानेन शमेन च।
प्रबुद्धा ब्रहृम तामेति भ्रमतीतरथा जगत्।।
—योगवशिष्ठ 5।13।59
ज्ञान और शम के द्वारा ही प्राणी ब्रह्म रूप हो जाता है। इनके अभाव में वह संसार में भटकता ही रहता है।
ज्ञान के समान इस संसार में श्रेष्ठ वस्तु कोई नहीं। ज्ञान से ही जीवन की सारी गुत्थियां सुलझती हैं और उसके अभाव में नाना प्रकार के शोक संताप सहने पड़ते हैं। ज्ञान की प्राप्ति के लिये निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। स्वाध्याय एवं सत्संग के लिए सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये।
ज्ञानेनतु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मः,
तेषामादि यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्,
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाति गच्छति।
—गीता
जिसने अपने ज्ञान से अज्ञान का नाश कर लिया है उसका ज्ञान सूर्य के समान चमकता है और परम तत्व को प्रकाशित कर देता है। ज्ञान प्राप्त होने पर तुरन्त ही परम शांति प्राप्त होती है।
प्राज्ञं विज्ञात विज्ञेयं सम्यग् दर्शनमाध्यः।
न दहन्ति वनं वर्षा सिक्तमग्नि शिखा इव।।
—योगवशिष्ठ
जिसने जानने योग्य को जान लिया है और विवेक दृष्टि प्राप्त कर ली है उस ज्ञानी को मानसिक दुःख उसी प्रकार नहीं सताते जैसे वर्षा के भीगे जंगल को अग्नि नहीं जलाती।
आधयो व्याध्यश्चैव द्वय दुःखस्य कारणम्।
तन्निवृत्तिः सुखं विद्यात् तत्क्षयो मोक्ष उच्यते।
—योगवशिष्ठ (6।87।12)
शारीरिक और मानसिक यह दो ही प्रकार के दुःख इस संसार में है। इनकी निवृत्ति ज्ञान द्वारा होती है। इस दुःख निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है।
एकः शत्रुर्न द्वितोयोऽस्ति शत्रुरज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन्।
येनावृतः कुरुते सप्रयुक्तो घोराणि कर्माणि सुदारुणानि।
—महा. शान्ति.
इस संसार में मनुष्य का एक ही शत्रु है—अज्ञान? इससे अतिरिक्त उसका और कोई शत्रु नहीं है। इस अज्ञान के कारण ही मनुष्य दारुण कर्म करने लगता है।
पाताले भूतले स्वर्गो सुखमैश्यर्यमेव।
न तत्पश्यामि यन्न म पाण्डित्यादतिरिच्यते।।
—स्कन्द पुराण (6।143।3)
पाताल, भूतल और स्वर्ग में वह सुख कहीं भी नहीं दिखाई देता जो ज्ञानवान् होने पर प्राप्त होता है।
प्रज्ञा प्रासाद मारुह्य शोच्यः शोचतो जनान्।
तमिष्ठानिव शैलस्थः, सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति।।
प्रज्ञा प्राप्त विवेकवान् योगी संसार में शोकग्रस्त मानवों को ऐसे देखता है जैसे पहाड़ की चोटी पर खड़ा मनुष्य पृथ्वी पर नीचे खड़े हुये मनुष्यों को देखता है।
बीजान्यग्न्युप दग्धानि न राहन्ति यथा पुनः।
ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्वातमना सम्पद्यते पुनः।।
जिस प्रकार आग में भुने हुये बीज फिर नहीं उगते वैसे ही विवेक रूप अग्नि से जले हुए क्लेश फिर उत्पन्न नहीं होते।
विशोक आनन्दमयी विपश्चित्,
स्वयं कुतश्चितन्न विभेति कश्चित्।
विज्ञ व्यक्ति शोकरहित होकर आनन्दपूर्वक रहते हैं। वे किसी से भी नहीं डरते।
विचारात् ज्ञायते तत्वं तत्वाद्विश्रान्तिरात्मनि।
—योगवशिष्ठ 2।14।53
विचार से तत्व दर्शन होता है और उससे आत्म-शान्ति उपलब्ध होती है।
देह दुःख विदुर्व्याधिमाध्याख्य मानसामयम्।
मौर्ख्य मूले हिते विद्यात्तत्व ज्ञानेररिक्षयः।
—योगवशिष्ठ (6।81।14)
शारीरिक दुःखों को व्याधि और मानसिक दुःखों को आधि कहते हैं। यह दोनों मूर्खता से उत्पन्न होती है और ज्ञान से नष्ट हो जाती है।
ज्ञान की उपासना कीजिये
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है—इसकी बुद्धि-निष्ठा ज्ञान के प्रति आग्रह। अन्ध-श्रद्धा, अन्ध-मान्यता के लिये हमारे यहां कोई स्थान नहीं है। भारतीय संस्कृति के आदि आविष्कर्त्ताओं ने प्रारम्भ से ही किसी एक प्रमाण तथ्य को महत्व न देकर बुद्धि को ही धर्म संस्कृति का निर्णायक बनाया। विवेक एवं ज्ञान भारतीय संस्कृति की आत्मा है। इसका इतना बड़ा महल अद्धबुद्ध के ऊपर ही खड़ा है। बौद्धिक आधार-शिला पर ज्ञान का सर्वांगीण विकास और उसका शोध हमारी अपनी एक विशेषता रही है। इस विशेषता को दूर कर दो, भारतीय संस्कृति का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा।
हमारे यहां जिसने भी कोई नई शोध की उसे पूज्य माना गया है। ऋषि का पद प्रदान कर उसे समाज में सर्वोपरि महत्व दिया, फिर चाहे उसका दर्शन पूर्व खोजों से भिन्न ही क्यों न रहा हो। जहां अनन्त अंशों में नई खोज करने वालों को जिन्दा जला दिया गया, अनेक कष्ट दिए गए, मर्मान्तक पीड़ाओं से प्राण लिये, वहां हमारे यहां प्रत्येक नवीन तथ्य के प्रतिपादक की, जीवन जगत् के सूक्ष्म या स्थूल क्षेत्रों में नई खोज करने वालों की पूजा की गई। यह हमारी बुद्धि-निष्ठा और ज्ञान के प्रति रचनात्मक प्रेम का परिचायक है। यही कारण है कि हमारे धर्म-ग्रन्थ, ऋषि-सन्त, समाज के मार्ग-दर्शक एक नहीं अनेकों हैं और विशेषता यह है कि प्रत्येक के दर्शन का दृष्टिकोण एक दूसरे से भिन्न है, फिर भी वे सबके सब भारतीय धर्म संस्कृति के हैं। ज्ञान की इतनी विस्तृत शोध, बुद्धि की निरन्तर साधना और कहीं भी देखने को नहीं मिलती। संसार में सबसे अधिक अवतार (युग पुरुष) दार्शनिक, ऋषि-मुनि, सन्त-महात्माओं की उपज हमारी इस स्वतन्त्र बुद्धि-निष्ठा और ज्ञान के प्रति स्वतन्त्र चिन्तन का ही परिणाम है।
गायत्री को गुरु मन्त्र माना गया है। उसे वेद-माता कहा गया है और गायत्री उपासना प्रत्येक हिन्दू के लिए आवश्यक धर्म कर्त्तव्य बताया है। क्यों? किस लिए? यह गायत्री की मूल भावना से अपने आप स्पष्ट हो जाता है जिसमें उस शक्तिशाली, तेजस्वी, सर्वव्यापी दिव्य तत्व का ध्यान करके, उससे बुद्धि की निर्मलता, शुद्धि, पवित्रता की प्रार्थना की गई है। स्पष्ट है कि गायत्री ज्ञान का, बुद्धि का, शोध अभिवृद्धि का साधना मन्त्र है। नित्य-प्रति प्रत्येक द्विजाति दिन में कम से कम समय परमात्म-तत्व का ध्यान करते हुये उससे ‘सद्बुद्धि’ की—विवेक की प्रार्थना करता है।
वेद का अर्थ है—ज्ञान और ज्ञान बुद्धि की साधना का परिणाम है। इसलिए गायत्री को वेद माता कहा गया है। भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता के मूल स्रोत आधार वेद अर्थात् ज्ञान है और ज्ञान बुद्धि की देन है। अस्तु हमारी समस्त जीवन पद्धति का संचालन बुद्धि के द्वारा होता आया है। कौटिल्य ने कहा है ‘‘जिस मनुष्य की बुद्धि का विकास नहीं होता अथवा जो बुद्धि द्रोही या अविवेकी होता है वह मनुष्यता से गिर जाता है।’’ शास्त्रकार ने बुद्धि को सर्वोपरि बल बतलाया है। ‘‘बुद्धिर्यस्य बल तस्य। निबुद्धेस्तुकुतो बलम्।’’ जिसमें बुद्धि है उसी में बल है, बुद्धिहीन के पास बल कहां?
पितामह भीष्म से पूछा गया—‘‘कोऽयं धर्मः कुतो धर्मः। ‘‘यह धर्म कौन है कहां से आता है। पितामह ने कहा—मिसलत्तम’’ विचारशील व्यक्ति चिन्तन, मनन, अध्ययन करके धर्म का निर्माण करते हैं तात्पर्य है कि हमारा धर्म हमारी संस्कृति विचार प्रधान है, बुद्धि प्रधान है—वेद-प्रधान है, अर्थात् ज्ञान के द्वारा प्रेरित है। वह किसी प्रकार के आग्रह को लेकर नहीं चलती।
हमारे शास्त्रकारों ने, धर्म संस्थापकों ने, ज्ञान देने वालों ने भी अपनी बात को ही सत्य बता कर उसे बिना कुछ कहे सुने मान लेने की बात कहीं नहीं कही है। उन्होंने अपनी ही बात पर जोर नहीं दिया है—‘बुद्धिफेलमनाग्रह’ दुराग्रह न करना ही बुद्धिमत्ता का चिह्न है। वे कहते हैं ‘‘मनःपूतं समाचरेत्’’ तुम्हारे मन को जो अच्छा लगे वही करो। अपनी बुद्धि के कपाट बन्द मत करो, अपने ज्ञान के प्रकाश को धूमिल न होने दो। गीता का लम्बा-चौड़ा उपदेश देने पर भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन की स्वतन्त्र बुद्धि का अपहरण नहीं किया। उन्होंने कहा—‘‘अर्जुन ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ जो तुझे अच्छा लगे वही कर।’’
सच पूछो तो आत्मा की कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं है। वह स्वयंपूर्ण है। आत्मा की गति स्वतः ही उर्ध्वगामी है, परन्तु जिस तरह किसी वस्तु के साथ कोई भारी वजन बांध दिया जाता है, तो वह नीचे खिंचती चली जाती है, उसी तरह ‘‘मैं यह शरीर हूं’’ के अज्ञान का बोझा आत्मा को नीचे खींच ले जाता है। अतः यदि हम किसी भी उपाय से देह और आत्मा को पृथक कर सकें तो हमारी प्रगति हो सकती है। यह काम भले ही कठिन हो, पर इसका फल भी महान है। आत्मा के पांव की यह देह रूपी बेड़ी यदि हम काट सकें, तो हम बड़े आनन्द का अनुभव करेंगे। फिर मनुष्य देह के दुख से दुखी न होगा। वह स्वतन्त्र हो जायगा। यदि इस देह रूपी वस्तु को मनुष्य जीत ले, तो फिर संसार में कौन उस पर सत्ता चला सकता है? जो अपने आप पर राज्य करता है, वह विश्व का सम्राट हो जाता है अतः आत्मा पर देह की जो सत्ता हो गई है, उसे हटा दो। देह में ये जो सुख-दुख हैं, सब विदेशी हैं। सब विजातीय हैं। आत्मा से उनका तिल मात्र भी सम्बन्ध नहीं है।
इन सब दुःख-द्वन्द्वों को किस अंश तक देह से अमल किया जाय इसे प्रभु ईसा के उदाहरण से समझिये उन्होंने दिखा दिया है कि देह टूट रही हो, फिर भी मन को शान्त और आनन्दमय रखा जा सकना है, परन्तु इस तरह देह को आत्मा से अलग रखना जहां एक ओर निग्रह का काम है वहीं दूसरी ओर विवेक का भी काम है। जिस नौका को खेने का काम बल्लियां और पतवार दोनों ही करती हैं उसी तरह देह के सुख दुःखों से आत्मा को अलग रखने के लिये विवेक और निग्रह दोनों की आवश्यकता है।
स्वाध्याय से हमें सत्यासत्य का विवेक होता है, उस समय देह और आत्मा की विषमता समाप्त होकर जीवन का चरम लक्ष्य आनन्द सहज रूप से प्राप्त हो जाता है। स्वाध्याय ज्ञानार्जन का वह सुलभ साधन है जिससे व्यक्ति अपना आत्म कल्याण कर सकता है।
बुद्धिमान व्यक्ति कम-कम से साधनों में भी संतुष्ट दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि अज्ञानता के दुष्परिणामों से वे बचे रहते हैं। उनके प्रत्येक कार्य में विवेक होता है, जो कुछ करते हैं उसे पहले भली प्रकार सोच-समझ लेते हैं। पूरी तरह विचार करने के बाद किये गये कार्यों से हानि की सम्भावना प्रायः समाप्त हो जाती है और उस कार्य में पड़ने वाली बाधाओं, परेशानियों और मुसीबतों से बचने का रास्ता मिल जाता है। ज्ञान मनुष्य को जीवन का सही रास्ता प्रदर्शित करता है, जिससे उसे कठिनाइयां कम और सफलतायें अधिक मिलती हैं। कदाचित परिस्थितिवश कोई विघ्न आ जाए तो अपनी दूरदर्शिता के कारण बुद्धिमान व्यक्ति ही उसे आसानी से हल कर लेते हैं।
ओछे काम करने वाले लोगों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि ऐसे कार्य अधिकांश अज्ञानता-वश ही करते हैं। जीवन की सही दिशा निर्माण करने की क्षमता न तो धन में है, न पद और प्रतिष्ठा में। आत्म-निर्माण की प्रक्रिया सत्कर्मों से पूरी होती है। सन्मार्ग में भी कोई स्वतः प्रवृत्त होता हो यह भी नहीं कहा जा सकता। यह प्रेरणा हमें औरों से मिलती है। दूसरों की इच्छाओं का अनुकरण करते हुए भी महानता की मंजिल तक पहुंचने का नियम बना हुआ है। ऐसी बुद्धि किसी को मिल जाये तो उसे यही समझना चाहिये कि परमात्मा की उस पर बड़ी कृपा है। ज्ञान से मनुष्य की ऐसी ही धर्म-बुद्धि जागृत होती है, इसलिये ज्ञान को परमात्मा का सर्वोत्तम वरदान मानना पड़ता है।
अज्ञानता के दुष्परिणामों से बचने का सही तरीका सबसे अच्छा है कि हम अपनी मानसिक चेष्टाओं को संसार का रहस्य समझने में लगायें। विचार करने की शक्ति हमें इसलिये मिली है कि हम सृष्टि की वस्तु-स्थिति को समझें और इसका लाभ अपने सजातीयों को भी दें, किन्तु यह सब कुछ तभी सम्भव है जब हमारा ज्ञान बढ़े। जब तक हम ज्ञानवान् नहीं बनते, अज्ञानता का शैतान हमारे पीछे पड़ा रहेगा। ऐसी अवस्था में हमारी मोह-ग्रन्थियां ज्यों की त्यों बंधी रहेंगी। अज्ञानता का अन्धकार और विश्व-रहस्य की जानकारी के लिये ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है। इसी से भव-बन्धन टूटते हैं।
व्यक्ति की पात्रत्व की सच्ची कसौटी उसके ज्ञान से होती है। समाज में अधिक देर तक सम्मान व प्रतिष्ठा उन्हीं को मिलती है जो शीलवान, शिष्ट व नम्र होते हैं। उद्दण्ड, दुराचारी व अशिष्ट व्यक्ति को सभी जगह तिरस्कार ही मिलता है। इन आध्यात्मिक सद्गुणों का आन्तरिक प्रतिष्ठान ज्ञान से होता है इससे सदाचार में रुचि बढ़ती हैं। आप्त वचन है ‘‘विद्या ददाति विनयम् विनयाद्याति पात्रताम्’’ अर्थात् विद्या से ज्ञान विनयशीलता आती है। विनयशीलता युक्त ही पात्रत्व के सच्चे अधिकारी होते हैं।
मानवीय-प्रतिभा का विकास ज्ञान से होता है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन सभी के महान् व्यक्तित्व का विकास ज्ञान से हुआ है। भगवान् राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध, ईसामसीह, सुकरात आदि सभी महापुरुषों ने ज्ञान की श्रेष्ठता को स्वीकार किया है। सांसारिक दुःखों से परित्राण-पाने के लिए मानव जाति को सदैव ही इसकी आवश्यकता हुई है। शास्त्रकार ने ज्ञान की महत्ता प्रतिपादित करते हुए लिखा है:—
मोक्षस्य न हि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमे ववा।
अज्ञान हृदयग्रन्थिर्नाशौ मोक्ष इति स्सृतः।। (शिव-गीता)
अर्थात् मोक्ष किसी स्थान विशेष में उपलब्ध नहीं होता। इसे पाने के लिये गांव-गांव भटकने की भी आवश्यकता नहीं। हृदय की अज्ञान ग्रन्थि का नष्ट हो जाना ही मोक्ष है। दूसरे शब्दों में स्वर्ग, मुक्ति का साधन है—ज्ञान। इसे पा लिया तो इसी जीवन में जीवन-मुक्ति मिल गई समझनी चाहिये।
इस युग में विज्ञान की शाखा-प्रशाखायें सर्वत्र फैली हैं। प्रकाश, ताप, स्वर, विद्युत, चुम्बकत्व और पदार्थों की जितनी वैज्ञानिक शोध इस युग में हुई है उसी को ज्ञान मानने की आज परम्परा चल पड़ी है। इसी के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन भी हो रहा है। तथाकथित विज्ञान को ही ज्ञान मान लेने की भूल सभी कर रहे हैं किन्तु यह जान लेना नितान्त आवश्यक है कि ज्ञान वृद्धि की उस सूक्ष्म क्रियाशीलता का नाम है जो मनुष्य को सन्मार्ग की दिशा में प्रेरित करता है। विज्ञान का फल है इहलौकिक कामना पूर्ति और ज्ञान का सम्बन्ध है अन्तर्जगत् से। ज्ञान वह है जो मनुष्य को आत्मदर्शन में लगाये।
इसके लिये प्रमाद को त्याग कर विनम्र बनना पड़ता है। जो केवल अपनी ही अहंता प्रतिपादित करते रहते हैं, जिन्हें केवल अहंकार प्यारा है वे अपने संकुचित दृष्टिकोण के कारण ज्ञान के आनन्द और अनुभूति को जान नहीं पाते। छोटे से छोटा बन जाने पर ही महानता की पहचान की जा सकती है। गल्ले के भारी ढेर पंसेरियों से तौले जाते हैं। कपड़ों के थान गजों से नापते हैं। अमुक स्थान कितनी दूर है, यह मील के पत्थर बताते हैं। ऐसे ही विराट् के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के लिये महानता से गठबन्धन करने के लिये—हमें विनम्र बनना पड़ता है। भय, लज्जा और संकोच को त्याग कर तत्परतापूर्वक अपनी चेष्टाओं को उस ओर मोड़ना पड़ता है। तब कहीं ज्ञानवान् बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
अपने पास धन हो तो संसार की अनेक वस्तुयें क्रय की जा सकती हैं शारीरिक शक्ति हो तो दूसरों पर रौब जमाया जा सकता है। इससे दूसरों पर शासन भी कर सकते हैं औरों के अधिकारों का अपहरण भी कोई बलशाली कर सकता है। किन्तु विद्या किसी से खरीदी नहीं जा सकती, दूसरों से छीन भी नहीं सकते। इसके लिये एकान्त में रहकर निरन्तर शोध, अध्ययन और पर्यवेक्षण की आवश्यकता पड़ती है। अपनी मानसिक चेष्टाओं को सरस व मनोरंजक कार्यक्रमों से मोड़ कर इसमें लगाना पड़ता है। ज्ञानार्जन एक महान् तप है। इसे प्राप्त कर लेने के बाद खो जाने का भय नहीं रहता।
किन्हीं बालकों में किशोरावस्था में ही अलौकिक बौद्धिक क्षमता या प्रतिभा देखते हैं तो यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि एक ही वय, स्थान व वातावरण में अनुकूल स्थिति प्राप्त होने पर भी दो बालकों की मानसिक शक्ति में यह अन्तर क्यों होता है? तब यह मानना पड़ता है कि एक में पूर्व जन्मों के ज्ञान के संस्कार प्रबल होते हैं दूसरे में क्षीण। भरत, ध्रुव, प्रहलाद, अभिमन्यु आदि में जन्म से ही प्रखर-ज्ञान के उज्ज्वल संस्कार पड़े थे। जगद्गुरु शंकराचार्य ने थोड़ी ही अवस्था में पूर्णता प्राप्त कर ली थी। यह उनके पिछले जन्मों के परिपक्व ज्ञान के कारण ही हुआ मानना पड़ता है। इससे इस मत की पुष्टि होती है कि चिर-सहयोग के रूप में जन्म-जन्मान्तरों तक साथ रहने वाला अपना ज्ञान ही है। ज्ञान का नाश नहीं होता। वह अजर है, अमर है।
सार्थक-जीवन की आधार-शिला ज्ञान है। बुद्धिमत्ता की सच्ची कसौटी यह है कि मनुष्य अपनी सच्ची जीवन-दिशा निर्धारित करे। कुछ न कुछ करते रहें चाहे वह अहितकर क्यों न हो, यह बात तर्कसंगत प्रतीत नहीं होती। कर्म का महत्व तब है जब उससे हमें अपना जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता मिलती है। यह प्रतिक्रिया मानव-जीवन में सन्मार्ग पर चलने से पूरी होती है और सन्मार्ग पर देर तक टिके रहना ज्ञान प्राप्ति से ही सम्भव है। इसे प्राप्त करने के लिये अपने जीवन को साधनामय बनायें तो ही ज्ञानवान् बनने का सच्चा सुख प्राप्त कर सकते है। ज्ञान ही इस संसार की सर्वोपरि सम्पत्ति है।
ज्ञान को आत्मा का नेत्र कहा गया है। नेत्रविहीन व्यक्ति के लिए सारा संसार अन्धकारमय है। इसी प्रकार ज्ञानविहीन व्यक्ति के लिये इस संसार में जो कुछ उत्कृष्ट है उसे देख सकना असम्भव है। ज्ञान के आधार पर धर्म का, कर्त्तव्य का, शुभ-अशुभ का, उचित-अनुचित का विवेक होता है और पाप प्रलोभनों के आकर्षणों के पार यह देख सकना सम्भव होता है कि अन्ततः दूरवर्ती हित किसमें है। अज्ञानी व्यक्ति यह सब जान नहीं पाते। इन्द्रियों की वासना और प्रलोभनों की तृष्णा जीव को मनमाना नचाती रहती है और अन्त में उसे पतन के गहरे गर्त में धकेल देती है। इस दुर्दशा से बचाव तभी हो सकता है जब ज्ञान दीपक का प्रकाश हो रहा हो और विवेक के नेत्र खुले हुए हों।
भौतिक जीवन की सफलता और आत्मिक जीवन की पूर्णता के लिए सबसे प्रथम सोपान ज्ञान की प्राप्ति है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के आधार पर जीवन की गुत्थियों को समझना और उन्हें सुलझाने का मार्ग खोजना सम्भव होता है इसलिये मनीषियों ने इन बात पर बहुत जोर दिया है कि मनुष्य को ज्ञानवान् बनना चाहिए। अत्यन्त आवश्यक कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम ज्ञान सम्पादन का भी रहना चाहिए।
स्कूली शिक्षा ‘ज्ञान’ की श्रेणी में नहीं आती। वह ज्ञान प्राप्ति के लिये एक साधन मात्र है क्योंकि भाषा ज्ञान के बिना शास्त्रों का स्वाध्याय नहीं हो सकता। कठिन अभिव्यक्तियों को समझा नहीं जा सकता। इसलिये शिक्षा की भी आवश्यकता एवं उपयोगिता माननी ही पड़ेगी। ज्ञान का स्तर इससे ऊपर है। स्वाध्याय, सत्संग यह दो ज्ञान प्राप्ति के बाह्य उपाय हैं और चिन्तन, मनन यह आन्तरिक उपाय हैं। इन चारों चरणों से मिलकर सर्वांगपूर्ण ज्ञान साधना बनती है और उसी के आधार पर जीव अपने लक्ष्य मार्ग की ओर गतिशील होता है।
भगवान राम ने जब गुरु वशिष्ठजी से सांसारिक क्लेशों के भव बन्धनों से छुटकारे का उपाय पूछा तो उन्होंने यही कहा कि—यह सब बिना ‘ज्ञान’ प्राप्ति के सम्भव नहीं। यदि भव सागर से पार होने की इच्छा है तो सबसे प्रथम ज्ञान-संचय का प्रयत्न करो। योग वशिष्ठ में इस सम्बन्ध में बहुत बल दिया गया है—
ज्ञानान्निर्दुःखतामेति ज्ञानादज्ञान संक्षयः।
ज्ञानादेवपरासिद्धिनन्यिस्मादाम वस्तुतः।।
—योगवशिष्ठ 5।88।12
हे राम, ज्ञान से ही दुःख दूर होते हैं, ज्ञान से अज्ञान का निवारण होता है, ज्ञान से ही परम सिद्धि प्राप्त होती है और किसी उपाय से नहीं।
ज्ञानवानेन सुखवान् ज्ञानवानेन जीवति।
ज्ञानवानेन बलवास्तस्माज्ज्ञानमयी भव।।
—योगवशिष्ठ 5।92।49
ज्ञानी ही सुखी है, ज्ञानी ही जीवित है, ज्ञानी ही बलवान् है इसलिये ज्ञानी बनना चाहिये।
यथा दीपः प्रकाशात्मा स्वल्पो वा यदि वा महान्।
ज्ञानात्मान तथा विद्यादात्मान सर्वजन्तुषु।।
जैसे छोटा या बड़ा दीपक प्रकाशवान् ही होता है, वैसे ही सब छोटे-बड़े प्राणियों की आत्मा भी ज्ञानरूप ही है।
ज्ञानमेव पर ब्रह्मज्ञान वंधाय चेष्यते।
ज्ञानात्मकमिद विश्वं न ज्ञानाद्विद्यते परम्।।
ज्ञान से ही ब्रह्म की प्राप्ति होती है, विपरीत ज्ञान से ही बन्धन बांधते हैं, इस संसार में जो कुछ है ज्ञानात्मक ही है। ज्ञान से परे कुछ भी नहीं है।
अस्त देवाधि देवस्य परस्य परमात्मनः।
ज्ञानादेव परा सिद्धिर्नत्वनुष्ठानदुःखतः।।
—योगवशिष्ठ 3।6।1
उस परमदेव परमात्मा को ज्ञान द्वारा ही प्राप्त किया जाता है और किसी अनुष्ठान से उसकी प्राप्ति सम्भव नहीं।
एकेनैवाऽमृतेनैव बोधेन स्वेन पूज्यते।
एतदेव पर ध्यान पूजैर्षव परा स्मृता।।
योगवशिष्ठ 6।38।25
उस आत्मा की एक ही प्रकार से ज्ञान द्वारा पूजा की जाती है। ध्यान ही उस आत्म देवता का सबसे बड़ा पूजन है।
अत्रज्ञानमनुष्ठान न त्वन्यदुपयुज्यते।
—योगवशिष्ठ 3।6।2
मुक्ति प्राप्त करने के लिये ज्ञान ही एक मात्र उपाय है। दूसरा और कोई नहीं।
ज्ञानादेव परोसिद्धिर्नत्वनुष्ठानदुःखत्तः।
—योगवशिष्ठ 3।6।1
परम सिद्धि ज्ञान से ही प्राप्त होती है और किसी अनुष्ठान से नहीं।
ज्ञानवानुदितानन्दो न क्वचित्परिमज्जति।
—योगवशिष्ठ 4।93।24
ज्ञानी ही परम आनन्द प्राप्त करता है, वही पार होता है।
ततो वच्मि महावाहो यथाज्ञानेतरा गतिः।
नास्ति संसार तरणे पाशबन्धस्य चेतसः।।
—योगवशिष्ठ 5।6।72
बन्धन में पड़े हुए तन को मुक्त करने और संसार सागर तरने के लिये ज्ञान के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
ज्ञानयुक्ति प्लवेनैव संसारब्धि सुदुस्तरम्।
महाधियः समुत्तीर्णा निमेषेण रघूद्वह।।
—योगवशिष्ठ 2।11।16
संसाररूपी समुद्र को बुद्धिमान लोग ज्ञानरूपी नौका पर सवार होकर आसानी से पार कर जाते हैं।
संसारोत्तरणे जन्तोरुपायो ज्ञानमेव हि।
तपो दानं तथा तीर्थमनुहायाः प्रकीर्तियाः।।
—योगवशिष्ठ
संसार से पार होने का एक मात्र उपाय ज्ञान ही है। तप, दान, तीर्थ आदि उपाय नहीं।
दुरुत्तरा या विपदो दुःख कल्लोल संकुलाः।
तीर्यते प्रज्ञया ताभ्योनानाऽपद्धयो महामते।।
—योगवशिष्ठ 5।12।20
विभिन्न प्रकार की कठिन विपत्तियों के समुद्र को ज्ञान द्वारा ही तरा जाता है।
कलना सर्व जन्तूनां विज्ञानेन शमेन च।
प्रबुद्धा ब्रहृम तामेति भ्रमतीतरथा जगत्।।
—योगवशिष्ठ 5।13।59
ज्ञान और शम के द्वारा ही प्राणी ब्रह्म रूप हो जाता है। इनके अभाव में वह संसार में भटकता ही रहता है।
ज्ञान के समान इस संसार में श्रेष्ठ वस्तु कोई नहीं। ज्ञान से ही जीवन की सारी गुत्थियां सुलझती हैं और उसके अभाव में नाना प्रकार के शोक संताप सहने पड़ते हैं। ज्ञान की प्राप्ति के लिये निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। स्वाध्याय एवं सत्संग के लिए सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये।
ज्ञानेनतु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मः,
तेषामादि यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्,
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाति गच्छति।
—गीता
जिसने अपने ज्ञान से अज्ञान का नाश कर लिया है उसका ज्ञान सूर्य के समान चमकता है और परम तत्व को प्रकाशित कर देता है। ज्ञान प्राप्त होने पर तुरन्त ही परम शांति प्राप्त होती है।
प्राज्ञं विज्ञात विज्ञेयं सम्यग् दर्शनमाध्यः।
न दहन्ति वनं वर्षा सिक्तमग्नि शिखा इव।।
—योगवशिष्ठ
जिसने जानने योग्य को जान लिया है और विवेक दृष्टि प्राप्त कर ली है उस ज्ञानी को मानसिक दुःख उसी प्रकार नहीं सताते जैसे वर्षा के भीगे जंगल को अग्नि नहीं जलाती।
आधयो व्याध्यश्चैव द्वय दुःखस्य कारणम्।
तन्निवृत्तिः सुखं विद्यात् तत्क्षयो मोक्ष उच्यते।
—योगवशिष्ठ (6।87।12)
शारीरिक और मानसिक यह दो ही प्रकार के दुःख इस संसार में है। इनकी निवृत्ति ज्ञान द्वारा होती है। इस दुःख निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है।
एकः शत्रुर्न द्वितोयोऽस्ति शत्रुरज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन्।
येनावृतः कुरुते सप्रयुक्तो घोराणि कर्माणि सुदारुणानि।
—महा. शान्ति.
इस संसार में मनुष्य का एक ही शत्रु है—अज्ञान? इससे अतिरिक्त उसका और कोई शत्रु नहीं है। इस अज्ञान के कारण ही मनुष्य दारुण कर्म करने लगता है।
पाताले भूतले स्वर्गो सुखमैश्यर्यमेव।
न तत्पश्यामि यन्न म पाण्डित्यादतिरिच्यते।।
—स्कन्द पुराण (6।143।3)
पाताल, भूतल और स्वर्ग में वह सुख कहीं भी नहीं दिखाई देता जो ज्ञानवान् होने पर प्राप्त होता है।
प्रज्ञा प्रासाद मारुह्य शोच्यः शोचतो जनान्।
तमिष्ठानिव शैलस्थः, सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति।।
प्रज्ञा प्राप्त विवेकवान् योगी संसार में शोकग्रस्त मानवों को ऐसे देखता है जैसे पहाड़ की चोटी पर खड़ा मनुष्य पृथ्वी पर नीचे खड़े हुये मनुष्यों को देखता है।
बीजान्यग्न्युप दग्धानि न राहन्ति यथा पुनः।
ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्वातमना सम्पद्यते पुनः।।
जिस प्रकार आग में भुने हुये बीज फिर नहीं उगते वैसे ही विवेक रूप अग्नि से जले हुए क्लेश फिर उत्पन्न नहीं होते।
विशोक आनन्दमयी विपश्चित्,
स्वयं कुतश्चितन्न विभेति कश्चित्।
विज्ञ व्यक्ति शोकरहित होकर आनन्दपूर्वक रहते हैं। वे किसी से भी नहीं डरते।
विचारात् ज्ञायते तत्वं तत्वाद्विश्रान्तिरात्मनि।
—योगवशिष्ठ 2।14।53
विचार से तत्व दर्शन होता है और उससे आत्म-शान्ति उपलब्ध होती है।
देह दुःख विदुर्व्याधिमाध्याख्य मानसामयम्।
मौर्ख्य मूले हिते विद्यात्तत्व ज्ञानेररिक्षयः।
—योगवशिष्ठ (6।81।14)
शारीरिक दुःखों को व्याधि और मानसिक दुःखों को आधि कहते हैं। यह दोनों मूर्खता से उत्पन्न होती है और ज्ञान से नष्ट हो जाती है।
ज्ञान की उपासना कीजिये
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है—इसकी बुद्धि-निष्ठा ज्ञान के प्रति आग्रह। अन्ध-श्रद्धा, अन्ध-मान्यता के लिये हमारे यहां कोई स्थान नहीं है। भारतीय संस्कृति के आदि आविष्कर्त्ताओं ने प्रारम्भ से ही किसी एक प्रमाण तथ्य को महत्व न देकर बुद्धि को ही धर्म संस्कृति का निर्णायक बनाया। विवेक एवं ज्ञान भारतीय संस्कृति की आत्मा है। इसका इतना बड़ा महल अद्धबुद्ध के ऊपर ही खड़ा है। बौद्धिक आधार-शिला पर ज्ञान का सर्वांगीण विकास और उसका शोध हमारी अपनी एक विशेषता रही है। इस विशेषता को दूर कर दो, भारतीय संस्कृति का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा।
हमारे यहां जिसने भी कोई नई शोध की उसे पूज्य माना गया है। ऋषि का पद प्रदान कर उसे समाज में सर्वोपरि महत्व दिया, फिर चाहे उसका दर्शन पूर्व खोजों से भिन्न ही क्यों न रहा हो। जहां अनन्त अंशों में नई खोज करने वालों को जिन्दा जला दिया गया, अनेक कष्ट दिए गए, मर्मान्तक पीड़ाओं से प्राण लिये, वहां हमारे यहां प्रत्येक नवीन तथ्य के प्रतिपादक की, जीवन जगत् के सूक्ष्म या स्थूल क्षेत्रों में नई खोज करने वालों की पूजा की गई। यह हमारी बुद्धि-निष्ठा और ज्ञान के प्रति रचनात्मक प्रेम का परिचायक है। यही कारण है कि हमारे धर्म-ग्रन्थ, ऋषि-सन्त, समाज के मार्ग-दर्शक एक नहीं अनेकों हैं और विशेषता यह है कि प्रत्येक के दर्शन का दृष्टिकोण एक दूसरे से भिन्न है, फिर भी वे सबके सब भारतीय धर्म संस्कृति के हैं। ज्ञान की इतनी विस्तृत शोध, बुद्धि की निरन्तर साधना और कहीं भी देखने को नहीं मिलती। संसार में सबसे अधिक अवतार (युग पुरुष) दार्शनिक, ऋषि-मुनि, सन्त-महात्माओं की उपज हमारी इस स्वतन्त्र बुद्धि-निष्ठा और ज्ञान के प्रति स्वतन्त्र चिन्तन का ही परिणाम है।
गायत्री को गुरु मन्त्र माना गया है। उसे वेद-माता कहा गया है और गायत्री उपासना प्रत्येक हिन्दू के लिए आवश्यक धर्म कर्त्तव्य बताया है। क्यों? किस लिए? यह गायत्री की मूल भावना से अपने आप स्पष्ट हो जाता है जिसमें उस शक्तिशाली, तेजस्वी, सर्वव्यापी दिव्य तत्व का ध्यान करके, उससे बुद्धि की निर्मलता, शुद्धि, पवित्रता की प्रार्थना की गई है। स्पष्ट है कि गायत्री ज्ञान का, बुद्धि का, शोध अभिवृद्धि का साधना मन्त्र है। नित्य-प्रति प्रत्येक द्विजाति दिन में कम से कम समय परमात्म-तत्व का ध्यान करते हुये उससे ‘सद्बुद्धि’ की—विवेक की प्रार्थना करता है।
वेद का अर्थ है—ज्ञान और ज्ञान बुद्धि की साधना का परिणाम है। इसलिए गायत्री को वेद माता कहा गया है। भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता के मूल स्रोत आधार वेद अर्थात् ज्ञान है और ज्ञान बुद्धि की देन है। अस्तु हमारी समस्त जीवन पद्धति का संचालन बुद्धि के द्वारा होता आया है। कौटिल्य ने कहा है ‘‘जिस मनुष्य की बुद्धि का विकास नहीं होता अथवा जो बुद्धि द्रोही या अविवेकी होता है वह मनुष्यता से गिर जाता है।’’ शास्त्रकार ने बुद्धि को सर्वोपरि बल बतलाया है। ‘‘बुद्धिर्यस्य बल तस्य। निबुद्धेस्तुकुतो बलम्।’’ जिसमें बुद्धि है उसी में बल है, बुद्धिहीन के पास बल कहां?
पितामह भीष्म से पूछा गया—‘‘कोऽयं धर्मः कुतो धर्मः। ‘‘यह धर्म कौन है कहां से आता है। पितामह ने कहा—मिसलत्तम’’ विचारशील व्यक्ति चिन्तन, मनन, अध्ययन करके धर्म का निर्माण करते हैं तात्पर्य है कि हमारा धर्म हमारी संस्कृति विचार प्रधान है, बुद्धि प्रधान है—वेद-प्रधान है, अर्थात् ज्ञान के द्वारा प्रेरित है। वह किसी प्रकार के आग्रह को लेकर नहीं चलती।
हमारे शास्त्रकारों ने, धर्म संस्थापकों ने, ज्ञान देने वालों ने भी अपनी बात को ही सत्य बता कर उसे बिना कुछ कहे सुने मान लेने की बात कहीं नहीं कही है। उन्होंने अपनी ही बात पर जोर नहीं दिया है—‘बुद्धिफेलमनाग्रह’ दुराग्रह न करना ही बुद्धिमत्ता का चिह्न है। वे कहते हैं ‘‘मनःपूतं समाचरेत्’’ तुम्हारे मन को जो अच्छा लगे वही करो। अपनी बुद्धि के कपाट बन्द मत करो, अपने ज्ञान के प्रकाश को धूमिल न होने दो। गीता का लम्बा-चौड़ा उपदेश देने पर भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन की स्वतन्त्र बुद्धि का अपहरण नहीं किया। उन्होंने कहा—‘‘अर्जुन ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ जो तुझे अच्छा लगे वही कर।’’
सच पूछो तो आत्मा की कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं है। वह स्वयंपूर्ण है। आत्मा की गति स्वतः ही उर्ध्वगामी है, परन्तु जिस तरह किसी वस्तु के साथ कोई भारी वजन बांध दिया जाता है, तो वह नीचे खिंचती चली जाती है, उसी तरह ‘‘मैं यह शरीर हूं’’ के अज्ञान का बोझा आत्मा को नीचे खींच ले जाता है। अतः यदि हम किसी भी उपाय से देह और आत्मा को पृथक कर सकें तो हमारी प्रगति हो सकती है। यह काम भले ही कठिन हो, पर इसका फल भी महान है। आत्मा के पांव की यह देह रूपी बेड़ी यदि हम काट सकें, तो हम बड़े आनन्द का अनुभव करेंगे। फिर मनुष्य देह के दुख से दुखी न होगा। वह स्वतन्त्र हो जायगा। यदि इस देह रूपी वस्तु को मनुष्य जीत ले, तो फिर संसार में कौन उस पर सत्ता चला सकता है? जो अपने आप पर राज्य करता है, वह विश्व का सम्राट हो जाता है अतः आत्मा पर देह की जो सत्ता हो गई है, उसे हटा दो। देह में ये जो सुख-दुख हैं, सब विदेशी हैं। सब विजातीय हैं। आत्मा से उनका तिल मात्र भी सम्बन्ध नहीं है।
इन सब दुःख-द्वन्द्वों को किस अंश तक देह से अमल किया जाय इसे प्रभु ईसा के उदाहरण से समझिये उन्होंने दिखा दिया है कि देह टूट रही हो, फिर भी मन को शान्त और आनन्दमय रखा जा सकना है, परन्तु इस तरह देह को आत्मा से अलग रखना जहां एक ओर निग्रह का काम है वहीं दूसरी ओर विवेक का भी काम है। जिस नौका को खेने का काम बल्लियां और पतवार दोनों ही करती हैं उसी तरह देह के सुख दुःखों से आत्मा को अलग रखने के लिये विवेक और निग्रह दोनों की आवश्यकता है।
स्वाध्याय से हमें सत्यासत्य का विवेक होता है, उस समय देह और आत्मा की विषमता समाप्त होकर जीवन का चरम लक्ष्य आनन्द सहज रूप से प्राप्त हो जाता है। स्वाध्याय ज्ञानार्जन का वह सुलभ साधन है जिससे व्यक्ति अपना आत्म कल्याण कर सकता है।

