Back to Books
Cover image of परिवार निर्माण

परिवार निर्माण

Format TEXT Language HINDI
TEXT
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download Hindi or the required language voice data for the best listening experience.

Reading: परिवार का दर्शन (अवधारणा) · Page 1

परिवार का दर्शन (अवधारणा)

     यह सारी सृष्टि एक ही सत्ता का विस्तार है। कोई उसे ईश्वरीय परिवार कहता है, तो कोई अन्य उसे माया का परिवार कहता है, पर है यह विश्व ब्रह्माण्ड एक ही परिवार, यह बात सभी को स्वीकार है। सृष्टि के प्रारम्भ में ईश्वर ने चाहा- ‘‘एकोऽहं बहुस्याम्’’ एक से अनेक बनूँ। आत्म विस्तार का यह संकल्प सृष्टि परिवार के रूप में सामने आया। यही है- ब्रह्म का विराट् रूप।
       इस प्रकार परिवार के सम्बन्ध में दो बातें आधारभूत महत्व की हैं- पहली यह कि यह सम्पूर्ण सृष्टि एक ही परिवार है- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्।’ वा. ४८/१.५
भारतीय मनीषियों की एक विशेषता रही है, वह यह कि उनके प्रयोग केवल स्थूल पक्ष अथवा भौतिक मूल्यों तक ही सीमित नहीं रहते थे। वे सूक्ष्म क्षेत्रों में विश्व का संचालन करने वाले सार्वभौमिक तथ्यों की खोज करते थे और फिर उन्हें भौतिक विधानों में व्यवस्थित करते थे। परिवार निर्माण के मूल में भी किसी ऋषि के इसी तरह के सूक्ष्म अन्वेषण का रहस्य छुपा हुआ है। ऋषियों ने जीवन में विभिन्न पहलुओं का एकीकरण करते हुए परिवार संस्था का एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया था, जो व्यावहारिक, सहज, सुलभ, सुखकर सिद्घ हुआ। परिवार संस्था ने मनुष्य के जीवन को आदिकाल से ऐसा मार्गदर्शन किया है, जैसा अन्य किसी भी संस्था ने नहीं किया होगा। इतिहास बदल गये, दुनिया का नक्शा बदल गया, समाज संस्थाओं में बड़े- बड़े परिवर्तन हुए, लेकिन भारतीय समाज में परिवार संस्था आज भी ध्रुव बिन्दु की तरह जीवित है। वा. ४८/१.६
     परिवार निर्माण मूलतः एक दर्शन है, एक दार्शनिक संकल्प एवं प्रक्रिया है, पद्घति है। जिसका लक्ष्य है- आत्मविकास, आत्मीयता की परिधि विस्तृत हो रही है अथवा नहीं। परिवार निर्माण की समस्त प्रक्रियाओं की यह आधारभूत कसौटी होनी चाहिये कि उसके परिवार के प्रत्येक सदस्य का आत्मविकास हो रहा है या नहीं। प्रत्येक सदस्य की आत्मीयता की परिधि विस्तृत हो रही है अथवा नहीं। जहाँ चिंतन और आचरण में यह विकास परिलक्षित न हो पा रहा हो, वहाँ परिवार की व्यवस्था और रीति रिवाजों का स्वरूप कोई भी क्यों न हो, परिवार निर्माण की प्रक्रिया वहाँ नहीं चल रही है- यही मानना चाहिये। वा. ४८/१.६
      नारी और पुरुष परिवार संस्था के दो मूल स्तंभ हैं। दोनों मानो नदी के दो तट हों, जिसके मध्य से परिवार के जीवन की धारा बहती है। वैदिक साहित्य में स्त्री पुरुष की उपमा पृथ्वी और द्युलोक से दी गई है। विवाह संस्कार के अवसर पर भी पुरुष स्त्री से कहता है- द्यौरहं पृथ्वी त्वम्। मैं द्यौ हूँ तू पृथ्वी। आकाश और धरती, पुरुष और प्रकृति के संयोग से ही विश्व परिवार का उदय हुआ, ठीक इसी तरह स्त्री और पुरुष के संयोग से परिवार संस्था का निर्माण होता है। भारतीय संस्कृति में परिवार संस्था की मूल भावना में स्थूल और नश्वर का संबंध विश्वव्यापी चिरंतन नित्य सूक्ष्म सत्ता के विधान से मिलाया गया है।
    स्त्री पुरुष की अभेदता को व्यक्त करते हुए पुरुष स्त्री से कहता है- सामोऽहस्मि ऋकत्वम्, मैं यह हूँ, तू वह है। तू वह है, मैं यह हूँ। मैं साम हूँ तू ऋक् है। किसी वस्तु का व्यास अथवा परिधि परस्पर अभिन्न होते हैं। व्यास न हो तो परिधि का अस्तित्व नहीं, परिधि न हो तो व्यास कहाँ से आये? सृष्टि के मूलभूत हेतु में जिस तरह द्युलोक और पृथ्वी का स्थान है, उसी तरह परिवार संस्था में स्त्री- पुरुष का। कैसी विशाल कल्पना थी हमारे समाज शिल्पी मनीषी की पारिवारिक जीवन के अंतराल में।
   यहाँ स्त्री- पुरुष दोनों को समान महत्व दिया गया है। लिंग भेद की दृष्टि से कोई श्रेष्ठ अथवा गौण नहीं है।
परिवार संस्था में जहाँ स्त्री- पुरुष की अभेदता का प्रतिपादन किया गया है वहाँ पूरे संस्थान को कर्तव्य धर्म की मर्यादाओं में बाँधकर उसे सभी भाँति अनुशासन, सेवा, त्याग, सहिष्णुताप्रिय बनाया जाता है और इन पारिवारिक मर्यादाओं पर ही समाज की सुव्यवस्था, शांति विकास निर्भर करता है। परिवार में माता- पिता, पुत्र, बहिन, भाई, पति- पत्नी, नातेदार- रिश्तेदार परस्पर कर्तव्य धर्म से बँधे हुए होते हैं। कर्तव्य की भावना मनुष्य में एक दूसरे के प्रति सेवा, सद्भावना, उत्सर्ग की सत्प्रवृत्तियाँ पैदा करती हैं।
भारतीय संस्कृति में परिवार में समस्त व्यवहार कर्तव्य भावना पर टिका हुआ है। सभी सदस्य एक दूसरे के लिये सहर्ष कष्ट सहन करते हैं, त्याग करते हैं। दूसरों के लिये अपने सुख और स्वार्थ का प्रसन्नता के साथ त्याग करते हैं। शास्त्रकारों की भाषा में यही स्वर्गीय जीवन है। वा. ४८/१.७