कठिनाइयां आपकी सहायक भी तो हैं।
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अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जीवन-यापन के पर्याप्त साधनों का अभाव, परिजनों को वह व्यवस्थायें न जुटा पाना जिनकी वे हमसे अपेक्षा रखते हैं, दूसरे लोगों के विद्वेष व उपहास भरे व्यंग आदि, अनेकों कठिनाइयां हैं जो मनुष्य को उसके लक्ष्य से विचलित करती रहती हैं। इनसे भी बढ़कर अपना निज का आलस्य, मिथ्याभिमान, काम, क्रोध, भय व प्रलोभन ये भी तो वैसी ही कठिनाइयां हैं जैसी औरों द्वारा उत्पन्न की गईं। इनके आते ही व्यक्ति का उत्साह घट जाता है और जिस लक्ष्य की ओर वह बढ़ा था उसे बीच में ही अधूरा छोड़ देता है और यह मान लेता है कि यह उसके बस की बात नहीं।किन्तु यह बात जानने की है कि कठिनाइयां मनुष्य की बाधक बनकर नहीं आती हैं वरन् उसके लक्ष्य को आसान बनाने के लिये ही आती हैं। किसी शायर ने इसी की भावाभिव्यक्ति करते हुए लिखा है :—रञ्ज से खूं गर हुआ इंसां तो मिट जाता है जरा ।मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं ।।निरन्तर सफलता से तो संसार का केवल एक पक्ष समझ में आता है। कठिनाइयां हमें दूसरे भाग का भी बोध करा देती हैं। वे हमें यथार्थ में जीवन जीने की कला सिखा देती हैं। इनके बिना किसी भी प्रयोजन की सिद्धि, चाहे वह आध्यात्मिक हो अथवा सांसारिक, सम्भव न होगी।सुख और दुःख संसार रथ के दो पहिये हैं। एक का अस्तित्व दूसरे पर टिका है। एक दिन है तो दूसरा रात। एक शरीर है दूसरा प्राण। दोनों के मध्य से ही जीवन की सरिता का प्रवाह बहता है। यदि अन्धकार न हो तो फिर प्रकाश की महत्ता ही क्या रहेगी! तात्पर्य यह है कि जीवन को क्रियाशील बनाये रखने के लिये दोनों ही आवश्यक हैं। इनसे बचा भी नहीं जा सकता। जब तक शरीर है तब तक सुख दुःख का निवारण नहीं हो सकता। सुख-प्राप्ति के अभाव में जो परिस्थितियां बाधा उत्पन्न करती हैं उन्हें कठिनाइयां मानते हैं। धन-क्षय, शारीरिक व्याधियां, अप्रिय पुरुषों का संग, प्रियजनों से विछोह इन्हें ही मोटे तौर पर कठिनाइयां मानते हैं। आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति में मनोविकारों व स्वभावजन्य कुकृत्यों को कठिनाई माना जाता है। इन्हीं के कारण मनुष्य दुःखी रहता है। किन्तु यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो यही परिस्थितियां ही महान् परिणाम की जननी है। उपनिषद्कार ने लिखा है ‘‘दिवमारुतह तपसा तपस्वी ।’’ तप से ही आत्मोत्थान सम्भव है। तप का अर्थ कड़कती धूप में बैठकर जप ध्यान करना, गहनशीत में स्नान करना अथवा अन्य शारीरिक तितीक्षा नहीं। इसका सर्वमान्य अर्थ यही है कि मनुष्य मार्ग में आई हुई कठिनाइयों से निरन्तर संघर्ष करे। इनसे लड़ते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करे। हीरा बिना रगड़ खाये चमकता नहीं। मनुष्य बिना परीक्षा दिये पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता। कठिनाइयां और कुछ नहीं, वे एक कसौटी मात्र हैं जो आगे के लिये सचेष्ट करती हैं। कोई विद्यार्थी यह कहे कि छमाही परीक्षा में न तो मैं उत्तीर्ण होता हूं न ही अनुत्तीर्ण फिर क्यों कलम, दवात, कापी और कागजों में व्यर्थ खर्च करूं? कई बीमारी आदि का बहाना बनाकर उसे टाल भी देते हैं। किन्तु चतुर अध्यापक उन्हें ऐसा करने से रोकते हैं और उन्हें बताते हैं कि यदि यह परीक्षा न दी तो यह कैसे अनुमान लगा पायेंगे कि वार्षिक परीक्षा में किन-किन विषयों में कितना परिश्रम करना है। पहली स्थिति में तो फेल होने की ही अधिक आशंका रहती है। ऐसे विद्यार्थियों की तरह अपने लिये भी यह उचित है कि अपनी प्रगति के लिये कठिनाइयों को जीवन का एक आवश्यक अंग मान लें।बिना विपत्ति की ठोकर लगे विवेक की आंखें नहीं खुलतीं। सच्चे ज्ञान की कसौटी यह है कि उसे कठिनाइयों में प्राप्त किया गया हो। प्रसिद्ध उपन्यासकार श्री प्रेमचन्द ने लिखा है ‘‘विपत्तियों से बढ़कर तजुर्बा दिलाने वाला विद्यालय आज तक नहीं खुला। कठिनाइयां मनुष्य के विकास का साधन हैं। जिस तरह आग की तेज भट्टी में तपाने पर सोने का रंग निखर आता है वैसे ही सच्चे व्यक्ति का जीवन कठिनाइयों की आग से परिपक्व बनता है। महात्मा गांधी, बुद्ध, ईसा, आदि महापुरुष पग-पग पर कठिनाइयों से अड़े तब महान् सामाजिक व राजनैतिक क्रान्तियों का उन्नयन कर सके थे।विपत्ति में मानसिक शक्तियां अन्तर्मुखी हो जाती हैं। इससे मनुष्य को सत्य-असत्य, अपने-पराये का यथार्थ-ज्ञान होता है। आत्मीय स्वजनों की पहिचान भी कठिन समय आ पड़ने पर ही होती है—कहि रहीम सम्पति सगे बनत बहुत बहु रीति ।विपत्ति कसौटी जे कसे तेई सांचे मीत ।।सच्चे मित्र की, आत्मीय की पहिचान कठिनाइयों में होती है। इसे और भी स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हुए कवि ने लिखा है :—रहिमतन विपदा हूं भली जो थोड़े दिन होय ।हित अनहित या जगत् में जानि पड़े सब कोय ।।अपना हितैषी कौन है और कौन कपटपूर्वक धूर्तता का, धोखेबाजी का व्यवहार कर रहा है इसकी परीक्षा मुसीबत पड़ने पर ही होती है। सुखी जीवन के तो हजार साथी होते हैं पर मुसीबत पड़ने पर कोई सच्चा सगा ही काम देगा।सन्मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति की सच्ची परीक्षा कठिनाइयों में ही होती है। ऐसे अवसरों पर बहुधा लोगों को यह कहते सुना जाता है कि उन पर परमात्मा रूठा है। उनके दुर्दिन चल रहे हैं। पर स्थिति ठीक इससे विपरीत है। महात्मा स्वेट मार्डेन ने लिखा है ‘‘जितने दुःख, जितनी विपत्तियां हमें प्राप्त होती हैं उनका कारण यही है कि अनन्त ऐश्वर्यशाली एवं सर्व-शक्तिमान् परमात्मा से हम अलगाव का भाव बनाये हैं।’’ कठिनाइयां वह वरदान हैं जिन्हें देकर परमात्मा हमें अपने पास बुलाना, अपनी पवित्र गोद में बिठाना चाहता है। सच्चे अध्यात्मवादी की पहिचान मुसीबतों में होती है। मुसीबतों में तपे बिना व्यक्ति अपने आप को ब्रह्मवादी घोषित करने का अधिकार नहीं पाता है सच्चा ईश्वरवादी वह है जो कहता है—‘मालिक मुझे सुख नहीं दुःख दे।’ सुविधायें नहीं मुसीबतें दे, ताकि तुम से विलग न होऊं।’’विपत्ति वह खराद है जिससे परमात्मा अपने रत्नों की चमक बढ़ाता है। इसलिये आप देखिए कि आप के जीवन में भी कठिनाइयां हैं अथवा नहीं। आप अध्यात्मवादी हैं, आपके जीवन में निरी कठिनाइयां बाघ की तरह मुंह बाये खड़ी हैं। आप इनसे विचलित तो नहीं हो रहे। यदि आपके पांव लड़खड़ाते हैं तो सम्हल कर खड़े होइये। धर्म और अध्यवसाय का अवलम्बन लीजिए। जिसे धीरज है जो परिश्रम से पांव पीछे हटाना नहीं जानता सफलता की देवी उसी के गले विजय-माला पहनाती है। धैर्य प्रारम्भ में कड़ुआ भले ही लगे किन्तु उसका फल मधुर होता है।आत्म–निर्भर बनने का और अपने में आत्म-विश्वास जागृत करने का एक ही गुरु-मन्त्र है कि—आप अपने जीवन में कठिनाइयों को आने दीजिये, दूसरों के दुःख तकलीफ और मुसीबतों में हाथ बटाइये और दूसरों की सहायता कीजिये परमात्मा आपकी सहायता करेगा। दूसरे के दुःखों को समझिए और अनुभव कीजिये कि आप असंख्यों से सुखी हैं, ऐसा दृष्टि-कोण बना लेने से कठिनाई और दुःख की परिस्थितियां टल जायेंगी और अपने पीछे सफलता की राह बना जायेंगी। किसी कवि ने कहा है—गुम राह नहीं कि साथ दीजे ।दुःख बोझ नहीं कि बांट लीजे ।।कठिनाइयां छोटे मनुष्यों को निस्तेज निष्प्राण बना सकती हैं किन्तु महान् वे हैं जो दुःखों की छाया में पलते हैं तथा औरों के दुःखों मुसीबतों में हाथ बटाते हैं। पुरुषार्थ भी इसी का नाम है कि व्यक्ति परिस्थितियों से संघर्ष करे। स्वयं उनका पराया न हो वरन् उन्हें वशवर्ती करे।सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक हुलफ्रेड एडलर का मत है कि भयभीत और हीन भावनाओं के व्यक्ति वे होते हैं जिनके जीवन में कभी कठिनाइयां नहीं आईं होतीं अथवा जो कठिनाइयों से कतराते या बचते रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों का मानसिक विकास रुक जाता है। ऐसे व्यक्ति छोटे-छोटे कार्यों में भी सफलता नहीं पाते। कठिनाइयां अपने आप में उतनी भयावह नहीं होतीं जितनी उनकी भयोत्पादक कल्पना। जब कभी किसी कठिनाई का आभास हो, आत्म-विश्वास जगाइए, निश्चय ही उससे आप को हितप्रद परिणाम प्राप्त होंगे।पूर्व-काल में शैक्षणिक व्यवस्था ऐसी बनाई गई थी जिसमें अनिवार्य रूप से छोटे-बड़े बालकों को गुरुकुलों में रखकर अक्षर ज्ञान कम और व्यवहारिक जीवन में कठिनाइयों का अधिक से अधिक पाठ पढ़ाने का क्रम रखा जाता था। जब तक यह पद्धति चलती रही इस देश में साहसी, पुरुषार्थी, चरित्रवान् और प्रतिभाशाली नररत्नों की कमी नहीं रही। किन्तु जब से कठिन परिस्थितियों में रहकर जीवन बिताने का ह्रास हुआ तब से निर्बल निस्तेज और दुराचारी व्यक्तियों का ही बाहुल्य होता चला जा रहा है।इन परिस्थितियों के रहते हुए किसी व्यक्ति, समाज, राष्ट्र का उत्थान सम्भव नहीं। कठिनाइयों से जूझने का अर्थ यह है कि व्यक्ति सत्य की अवहेलना कर रहा है और मिथ्याचार को प्रोत्साहन दे रहा है। साहस, सदाचार आदि नैतिक सद्गुण कठिनाइयों से विमुख होते ही पलायन कर जाते हैं तब फिर व्यक्तित्त्व के विकास का मार्ग अवरुद्ध होना ही निश्चित मानिये। एक व्यक्ति ने अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के लिये साधना-उपासना का क्रम बनाया। पड़ोस वालों ने देखा तो लगे उपहास करने। बस उसका उत्साह ढीला पड़ गया। ऐसी अवस्था में सत्य की खोज करना एवं अपनी दुर्बलताओं से जूझना कहां बन पड़ेगा? पर दूसरे वे होते हैं जो यह मानते हैं कि उपहास करने वाले व्यक्ति हमें बुराइयों से सावधान रखने वाले पहरुए हैं। जो साहसी लोग उपहास और अवरोध की परवाह न करते हुए अपने रास्ते पर चलते रहते हैं वे स्वयं सफलता प्राप्त करते हैं और दूसरों के लिये प्रेरणा का स्रोत भी बनते हैं। ऐसे ही व्यक्ति समाज का उत्थान कर सकते हैं। उन्हीं से आध्यात्मिक प्रगति की आशा की जा सकती है।जीवन के विभिन्न व्यवसायों में चाहे वह लौकिक हों अथवा आत्मा परमात्मा की भक्ति से सम्बन्ध रखने वाले हों सब में कठिनाइयों के मार्ग से ही गुजरना पड़ेगा, शरीर मिला है तो रोग, शोक, बीमारी आदि आयेंगी ही। जीवनयापन के लिये कोई भी उद्योग करें उसमें सब ओर लाभ ही लाभ हो यह सम्भव नहीं। सुख-सुविधाओं की सामान्य इच्छा सभी को होती है, फिर सारी सुख-सुविधायें आपको ही मिल जायेंगी इसकी कोई गारन्टी नहीं है। अतएव आप ऐसे समय में भी सन्तोष और धैर्य की वृत्ति बनाये रहें और अपने चरम लक्ष्य की प्राप्ति में लगे रहें तो आपका जीवन सफल माना जायेगा।दुःख और कठिनाइयों में ही सच्चे हृदय से परमात्मा की याद आती है। सुख-सुविधाओं में तो भोग और तृप्ति की ही भावना बनी रहती है। परमात्मा की याद तब आती है जब व्यक्ति असहाय-सा चारों ओर से अपने आपको कठिनाइयों से घिरा पाता है। इसलिये उचित यही है कि विपत्तियों का सच्चे हृदय से स्वागत करें। परमात्मा से मांगने लायक एक ही वरदान है कि वह कष्ट दे, मुसीबतें दे ताकि मनुष्य अपने लक्ष्य के प्रति सावधान व सजग बना रहे। कृष्ण के समक्ष अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कुन्ती ने ऐसी ही कामना की थी—विषदः सन्तु नः शाश्वत् तत्र तत्र जगद्गुरो ।भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ।।जगद्गुरो ! हमारे जीवन में पग-पग पर विपत्तियां आती रहें क्योंकि विपत्तियों में ही निश्चित रूप से आपके दर्शन हुआ करते हैं और आपके दर्शन हो जाने पर फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में नहीं आना पड़ता।’’ अपने अन्तःकरण की कुन्ती भी यदि ऐसी ही कामना करने लगे तो लक्ष्य प्राप्ति की आधी सफलता आप पा गये समझिये। पूर्णता की प्राप्ति कराने में कठिनाइयां आपकी बाधक नहीं सहायक ही होती हैं। उनके होने से ही तो संघर्ष करने का पौरुष प्रकट होता है और सुविकसित व्यक्तित्व के द्वारा किया हुआ प्रबल पुरुषार्थ कभी निरर्थक नहीं जाता। उससे लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में निरन्तर प्रगति ही होती है।

